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पारणे की नगरी तीर्थंकर जी की

 https://www.facebook.com/groups/521310878315183/?ref=share  * 💎 :~ *अजय जी भंडारी*         *अहमदाबाद*💐 हम सब आपका हार्दिक स्वागत करते हैं!!👏👏     *आपको प्रणाम सा* 🙏🙏 Jai jinendra 🅿️1️⃣ भ. श्री ऋषभदेव जी  ? 🅰️1️⃣  हस्तिनापुर 🅿️2️⃣  भ. श्री अजितनाथ जी  ? 🅰️2️⃣  अयोध्या 🅿️3️⃣  भ. श्री संभवनाथ जी  ? 🅰️3️⃣  श्रावस्ती 🅿️4️⃣  भ. श्री अभिनन्दन स्वामी जी  ? 🅰️4️⃣  अयोध्या 🅿️5️⃣  भ. श्री सुमतिनाथ जी  ? 🅰️5️⃣  विजय पुर 🅿️6️⃣  भ. श्री पद्मप्रभु जी  ? 🅰️6️⃣  ब्रह्मस्थल 🅿️7️⃣  भ. श्री सुपाश्वनाथ जी  ? 🅰️7️⃣  पाटलीखंड 🅿️8️⃣  भ. श्री चन्द्रप्रभु जी  ? 🅰️8️⃣  पद्मखंड 🅿️9️⃣  भ. श्री सुविधिनाथ जी  ? 🅰️9️⃣  श्वेतपुर 🅿️1️⃣0️⃣  भ. श्री शीतलनाथ जी  ? 🅰️1️⃣0️⃣  रिष्तपुर 🅿️1️⃣1️⃣  भ.  श्री श्रेयांसनाथ जी  ? 🅰️1️⃣1️⃣  सिध्दाथॅपुर 🅿️1️⃣2️⃣  भ .श्री वासुपुज्य स्वामी जी  ? ?...

पच्चीस बोल की पूरी व्याख्या2

  7 aug Day - 61  *पच्चीस बोल का* *नौवां बोल है - उपयोग बारह* *भाग  -- 7* *उपयोग बारह* *पांच ज्ञान --* मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान और केवल ज्ञान। *तीन अज्ञान  --* मतिअज्ञान,  श्रुत अज्ञान और विभंग अज्ञान। *चार दर्शन --* चक्षुःदर्शन, अचक्षुःदर्शन, अवधि दर्शन और केवल दर्शन। अभी तक हमने 5 ज्ञान और 3 अज्ञान के बारे में जानने का प्रयास किया था।  आइए अब हम दर्शन को जानने का प्रयास करें। *दर्शन* दर्शन का सामान्य अर्थ देखना होता है। किंतु जैन दर्शन में अनाकार उपयोग दर्शन कहलाता है। किसी भी वस्तु को जानने के दो रास्ते हैं -- एकरूपता, अनेकरूपता। जब हम एक वस्तु को एक ही रूप से जानते हैं तब हमारा ज्ञान सामान्य-ग्राही होने के कारण सामान्य बोध अर्थात् दर्शन कहलाता है। जब हम एक ही वस्तु को अनेक रुप से भिन्न-भिन्न रूप से जानते हैं तब हमारा वही ज्ञान भिन्न रूपग्राही होने के कारण विशेष बोध अर्थात् ज्ञान कहा जाता है। इन्हें हम भिन्नाकार  प्रतीति और एकाकार प्रतीति भी कह सकते हैं। दर्शन के चार भेद हैं -- चक्षुःदर्शन, अचक्षुःदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन।...