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 18,भवनपति,वाणव्यन्तर,ज्योतिषी, वैमानिक ? 🅰️ चार प्रकार के देव! 15.ज्ञानावरणीय,दर्शनावरणीय,,मोहनियअंतराय? 🅰️ घातीकर्म ! 9️⃣बोल अब तीसरा पॉव कहॉ रखूं❓ * * 🅰विष्णु कुमार ने नमुचि से। * * 🔟मैं कर लिए बिना शव जलाने नहीं दुंगा❓ * * 🅰हरिशचंद्र ने तारा रानी से। * * 16,.स्त्री भक्त, देश, राज ? 🅰️चार विकथा ! 17. आहार भय मैथुन परिग्रह ? 🅰️  चार सज्ञा ! 1,. अशन पान खादीम स्वादिम ? 🅰️ आहार के चार प्रकार! 2. मद्य मक्खन मांस मदिरा ? 🅰️ महाविगई ! 3,. नाम स्थापना द्रव्य भाव ? 🅰️ चार निक्षेप! * 6️⃣छठी नरक में तो श्रीदेवी जाती है,मुझे तो सातवीं नरक में जाना है❓ * * 🅰कोणिक राजा ने प्रभु महावीरजी से। * * 7️⃣चला जा मेरे सामने से, मुझे मुंह मत दिखा❓ * * 🅰राजा श्रेणिक ने अभयकुमार से। * * 8️⃣जानुं सो नहीं जानुं माता, नहीं जानुं सो जानुं❓ * * 🅰ऐवंताकुमार ने माता श्रीदेवी से। * * 4. मैत्री प्रमोद करुणा मध्यस्थ ? 🅰️ चार भावना ! 5,औत्पातीक,वैनयिकी,  कार्मिक,परिणामिक 🅰️ चार प्रकारकी बुध्दि ! 6,अतिक्रम, व्यतिक्रम,अतिचार अनाचार ? 🅰️दोष 7,मनुष्यत्व,आर्यक्षेत्र,उत्तमकुल जिनवाणीश...

संगम और महावीर

भगवान महावीर की साधना सत्य की साधना थी।  भगवान महावीर की साधना  12 वर्षों तक चली, प्रभु महावीर की इस साधना काल के दौरान, न जाने कितने ही भयंकर उपसर्गों को सहा। इन्हीं उपसर्गों में से 1 उपसर्ग संगम देव का उपसर्ग था । जिसने  एक ही रात में 20 उपसर्ग प्रभु महावीर को दिए  थे। यही नहीं  उसने 6 माह तक, प्रभु को कष्ट दिया। कभी चोरी का अरोप लगाया, कभी असहनीय पीड़ा उत्पन्न की , क्या थी संगम देव की कहानी ? जानिए इस कहानी के माध्यम से - इन्द्र देव द्वारा प्रभु महावीर की प्रशंसा- भगवान महावीर स्वामी ने सानुलठ्ठिय से दृढ़ भूमि की ओर प्रस्थान किया।  पेढाल  उद्यान में अवस्थित पोलास चैत्य में त्रिदिवसीय उपवास कर कायोत्सर्ग मुद्रा की। भगवान की के अपूर्व एकाग्रता, कष्ट सहिष्णुता, अद्भुत धैर्य से स्वयं देवराज इन्द्र में भी इनके प्रति अनन्त आस्थाएँ उत्पन्न हुईं, उन्होंने देवसभा में गद्गढ़ स्वरों में महाप्रभु को सश्रद्ध वन्दन करते हुए कहा- "हे प्रभो ! आपका धैर्य, आपका साहस और आपका ध्यान, वस्तुतः अद्वितीय है। मानव क्या शक्तिशाली देव और दैत्य भी आपको अपनी साधना से कदापि विचलि...

कोशा, एक अदभुत व्यक्तित्व,

 कोशा, एक अदभुत व्यक्तित्व, कीचड़ में रहकर भी कमल अशुचियों से अलिप्त रहकर अपना छोटा सा जीवन अन्यो को सौंदर्य, महक देकर, प्रभु चरणों मे समर्पित रहकर सार्थक कर लेता है । ठीक उसी तरह राजनर्तकी या गणिका समुदाय में रहकर भी कोशा ने निमित्त मिलते ही अपने कल्याण का यथासंभव मार्ग सुनिश्चित कर लिया इतना ही नही परन्तु अन्य पतितो को भी पतन से रोककर उनका जीवन उर्ध्वगामी बनाने का प्रयास किया। कोशा ने श्राविका व्रत ग्रहण कर उसे दृढ़तापूर्वक पालन किया।  जिनशासन के सती रत्नों के कुछ दृष्टांत की श्रेणी पूर्ण हुई, अब हम थोड़ा अब कोशा के व्यक्तित्व को जानते है। वीरनिर्वाण की दूसरी शताब्दी की यह घटना है। पाटलिपुत्र में राजा नंद के राज्य में जब शकडाल महामंत्री का सूर्य प्रखर ताप से तप रहा था । उस समय पाटलिपुत्र में एक कुशल वाकपटु, सौंदर्य में अप्सरा सम, नैसर्गिक अभिनयकला में निपुण, अवसर अनुसार बाहोश नर्तकी कोशा को राज्याश्रय प्राप्त हुआ था।  शकडाल मंत्रीश्वर के ज्येष्ठ पुत्र स्थूलिभद्र जब सर्व विद्याओं में निपुण बन गए ,  तब शकडाल मंत्री ने संसार के भोगमार्ग से भी स्थूलिभद्र अनभिज्ञ न रहे इस ...