*पर्वाधिराज पर्युषण* कविता

*पर्वाधिराज पर्युषण*


पर्युषण आया, लाया आत्मिक प्रसंग,

छोड़ो जगत के सारे झुढे प्रपंच,

विस्मृत आत्मा की भी सुध लो 

कर्मों से ठान लो अब जंग।


पर्व नहीं, यह आत्म-उत्सव है,

आत्म-शुद्धि का ही वैभव है,

पर्वों में सबसे ऊँचा यही,

पर्वाधिराज का गौरव  सही।


महावीर ने पाँच कर्तव्य बताए,

जो आत्मा को मुक्ति तक ले जाए -


*पर्वाधिराज के पाँच दीप*

भव सागर के सुंदर सीप


*1. अमारि प्रवर्तन - अहिंसा का दीप*


पहला कर्तव्य है अमारि प्रवर्तन,

अहिंसा का सच्चा आवर्तन।

स्वयं जियो, औरों को जीने दो,

हर जीव को अभय का वर दो।


जहाँ हिंसा है, वहाँ धर्म नहीं,

जहाँ भय है, वहाँ मर्म नहीं।

इसलिए पर्युषण में सबसे पहले,

अहिंसा का दीप जलाना है,

कर ईर्या  समिति जीव बचाने है

जीवों को अभय दिलाना है।


*2. साधर्मिक वात्सल्य - प्रेम का दीप*


दूसरा दीप है वात्सल्य अपार,

साधर्मिक ही सच्चा परिवार।

जगत के नाते तो स्वार्थ के हैं,

पर साधर्मिक नाते परमार्थ के हैं।


जिसके हृदय में धर्म बसा है,

वही तो अपना सगा है।

उसे वस्त्र दो, पात्र दो, सम्मान दो,

धर्मी को अपना कर, धर्म को मान दो।

एक साधर्मिक को अपनाने से,

साक्षात धर्म अपनाया जाता है।

धर्म का गौरव बढ़ाया जाता है


*3. परस्पर क्षमापना - क्षमा का दीप*


तीसरा दीप है सबसे पावन,

बिना इसके सब सूना-जीवन।

क्षमा बिना तप भी अधूरा,

क्षमा बिना जप भी अधूरा।


मैंने जाने-अनजाने जो दुख दिया,

मन, वचन, काया से जो चोट किया,

उसके लिए झुक कर कहती हूँ -

मिच्छामि दुक्कड़म्, मिच्छामि दुक्कड़म्।


तूने भी जो मुझे सताया,

मैंने हृदय से तुम्हें क्षमाया।

लेना-देना दोनों ही जरूरी,

तभी तो आत्मा होगी पूरी।


*4. अट्ठम तप - तप का दीप*


चौथा दीप है अट्ठम तप,

तीन दिन का अखंड जप।

न अन्न, न जल की चाह,

आत्मा की ही है राह।


जैसे अग्नि में सोना निखरता,

वैसे तप में कर्म बिखरता।

तप से निर्जरा होती है,

आत्मा उज्ज्वल होती है।


और जो अट्ठम न कर पाए,

वह भी पीछे न रह जाए -

छह आयंबिल, तीन उपवास,

नौ निवी, बारह एकासन,

चौबीस बियासना कर ले,

या छह हजार श्लोक पढ़ ले,

तप का लाभ फिर भी पा ले।


*5. चैत्य परिपाटी - भक्ति का दीप*


पाँचवाँ दीप है चैत्य परिपाटी,

जिन-मंदिर की शोभा न्यारी।

ढोल-नगाड़े, बैंड-बाजे संग,

चतुर्विध संघ चले उमंग संग।


अपने उपकारी महावीर को,

अपने तारणहार तीर्थंकर को,

ठाट-बाट से स्मृति में लाना,

उनका गौरव गुण गाना

भक्ति का दीप भावों से जलाना।


ये पाँच दीप जो जलाएगा,

पर्युषण सार्थक हो जाएगा,

जैनत्व की पहचान बनेगा,

आत्मा से परमात्मा बनेगा।


सांवत्सरिक प्रतिक्रमण है सार,

'मिच्छामि दुक्कड़म्' है आधार,

'सव्वे जीवा करु शासन रसी'


एक प्रसिद्ध जैन भावना और स्तुति पंक्ति है, जिसका अर्थ है— "संसार के सभी प्राणी जिनशासन (भगवान महावीर या तीर्थंकरों की वाणी/धर्म) के रसिक बन जाएं, अर्थात सभी जीवों को जिनशासन में प्रेम, रुचि और भक्ति हो जाए।" 


यही पर्युषण का है उद्गार।

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