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अशुचि भावना

#भावना - 17 अशुचि भावना दिपै चाम चादर मढ़ी , हाड़ पिंजरा देह । भीतर या सम जगत में, और नही घिन - गेह ।6। अशुचि भावना का चिंतन सनत कुमार चक्रवर्ती ने किया था। इस अवसर्पिणी काल के चौथे चक्रवर्ती हस्तिनापुर नरेश सनत कुमार थे। इनकी आयु 3 लाख वर्ष की थी। ये तीर्थंकर धर्मनाथजी के शासन में हुए। चक्रवर्ती  यानि मनुष्यो में नरदेव, श्रेष्ठ बल तथा उत्कृष्ट वैभव के मालिक। शुभ कर्मोदय से सनतकुमार को देह भी अनुपम सुन्दर प्राप्त हुआ था। उनकी सुंदरता की  प्रशंसा देवलोक में भी होती थी। एकबार प्रथम देवलोक में इंद्र द्वारा सनतकुमार के रूप की  प्रशंसा सुनकर दो देव उनके रूप को देखने आये। देव ब्राह्मण का रूप लेकर उनके महल में आये। तब सनतकुमार स्नान कर रहे थे। उनका रूप देखकर वे सच में  आश्चर्यचकित हुए। औऱ उनके देह के रूप की  प्रशंसा की। चक्रवर्ती विप्र बने देव के मुख से उनके रूप की  प्रशंसा सुनकर और गर्वित हुए। उन्होंने कहा , अरे यह तो कुछ नही। जब  मैं पूर्ण श्रृंगार कर, इस देह को अनुपम गहनों से सजाकर जब दरबार मे परिवार समेत बैठूंगा तब इस का असली सौंदर्य तुम देखना...

श्री मुनिसुव्रत स्वामी

............बीसवे तीर्थंकर मुनिसुव्रत स्वामी.......... बहुत प्राचीन समय में अर्थात प्रागैतिहासिक काल में इस अवसर्पिणी के बीसवे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत स्वामी का जन्म जेष्ठ कृष्ण अष्टमी के दिन राजगिरी नगरी में हरिवंश के राजा सुमित्र की महारानी पद्मावती की रत्न कुक्षी से हुआ था।  frm S.S.News जन्म से ही 3 ज्ञान (मति ज्ञान श्रुत ज्ञान और अवधि ज्ञान) के धारक थे मुनिसुव्रत स्वामी ने यौवन अवस्था आने पर राजपाट संभाला और गृहस्थ आश्रम का पालन किया उसके पश्चात वैराग्य भाव जागृत होने पर दीक्षा अर्थात समस्त वैभव का त्याग कर सन्यास लिया जिसको लेते ही चौथा मन पर्यव ज्ञान उत्पन्न हुआ। आपको 11 माह की साधना के पश्चात चंपक वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान और केवल दर्शन प्राप्त हुआ जिसके पश्चात आपने चतुर्विध संघ रूपी तीर्थ की स्थापना की और जीव मात्र को कल्याण मार्ग बताया। आपके 18 गणधर थे। श्री मुनिसुव्रत स्वामी के समय में ही 63 शलाका पुरुषों मैं से बलदेव श्री पदम जी जिनको अन्यत्र श्री रामचंद्र जी के नाम से भी जाना जाता है हुए थे। frm S.S.N उनके साथ वासुदेव लक्ष्मण जी, प्रति वासुदेव रावण, 16 सतियो म...

कथा अधिष्ठायिका देवी अम्बिका

प्रभु नेमनाथ की अधिष्ठायिका देवी अम्बिका अम्बिका देवी 💐💐💐 गिरनार  पर्वत के पास एक छोटा सा गाँव । उसमें एक ब्राह्मण कुटुम्ब...। देवभट्ट नामक बुजुर्ग की मृत्यु हो गई थी । उनकी विधवा पत्नी देविला अपने पुत्र सोमभट्ट के साथ रहती थी । सोमभट्ट का विवाह अम्बिका नामक एक जैन कन्या के साथ हुआ था । अम्बिका को जन्म सॆ जैन धर्म मिला था । जैन संस्कार होने सॆ दान -धर्म उसे बहुत प्रिय थे । शादी के बाद सोमभट्ट के सिवा किसी भी पुरुष को राग दृष्टि सॆ ना देखा था ,ऐसी सत्वशील सती स्त्री थी वह । श्राद्ध के दिनों पर सोमभट्ट को भारी श्रद्धा थी । एक दिन एक महान तपस्वी मुनिराज   का आगमन हुआ । वे एक माह के उपवास के पश्चात पारणा हेतु भिक्षा लेने पधारे थे । उसी दिन सोमभट्ट के पिता का श्राद्ध था । अम्बिका ने हर्ष एवं आदरपूर्वक भिक्षा दी । मुनिराज "धर्म लाभ " कह कर चल दिए । दरवाजे के पास खड़ी एक पड़ोसन ने यह देखा और कर्कश आवाज़ सॆ अम्बिका सॆ कहा , "अरे रे !!यह तूने क्या किया ??  श्राद्ध के दिन प्रथम दान तूने मलिन कपड़े वाले साधु को दिया ? श्राद्ध का अन्न और घर दोनों अपवित्र क...

कथा आचार्य हेमचंद्राचार्य

कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्राचार्य :— बाल्यवस्था का नाम चांगदेव, पिता का नाम —चाचंग और माता का नाम था— पाहिनी देवी था । जन्म स्थल — गुजरात का धंधूका शहर । बालक चांगदेव जब गर्भ में था तब माता पहिनी ने आश्चर्यजनक स्वप्न देखा।स्वप्न में माता ने दो दिव्य हाथों को देखा, जिसमें दिव्य रत्न था।” इस दिव्य रत्न को आप ग्रहण करे “ एसी ध्वनि उनको सुनाई दी।इस स्वप्न के अर्थ को जानने के लिए  पहिनीदेवी उसी नगर में उपस्थित आचार्य देवचंद्रसुरी के पास जाती है।आचार्य ने कहा की , “ दिव्य रत्न के समान आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी।आगे चलकर आपका पुत्र जिनशासन का महान आचार्य बनेगा और शासन की शोभा बढ़ाएगा।” पहिनी ने अपने आप को धन्य समझा और गुरु को सविनय वंदन किया।विक्रम संवत ११४५ के कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि मे पाहिनी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम ‘ चांगदेव ‘ रखा गया।बाल्यकाल से ही चांगदेव को धर्म के प्रति अत्यंत रुचि एवं श्रद्धा थी।गुरु देवचंद्रजी के सानिध्य में धर्म के संस्कार  और दृढ़ हुए और एक दिन खंभात में जैन संघ की अनुमति से और उदायन मंत्री के सहयोग से नव वर्ष की आयु...

निर्जरा भावना

#भावना - 25 निर्जरा भावना ज्ञान दीप तप तेल भर, घर शोधे भ्रम छोर। या विधि निकसै नही, पैठे पूरब चोर। पँच महाव्रत संचरण, समिति पांच प्रकार । प्रबल पंच इन्द्रिय विजय , धार निर्जरा सार ।9। आश्रव रूपी छिद्र द्वारा  नांव में आ रहे पानी को हमने संवर रूपी बुच से बंद कर दिया। अब नांव के पहले से अंदर भरा हुआ पानी भी निकालना आवश्यक है। उस पानी को बाहर निकालने की क्रिया जैसी है निर्जरा। गाथा में कवि कह रहे है, ज्ञान के साथ , सही मार्ग की श्रद्धा व समझ के साथ आत्मा रूपी द्वीप में तप का तेल भरकर इस भवसागर का हमे अंत ढूंढना है। इसके बिना पूर्व में संचित किये कर्मो से छूटने  का रास्ता नही। पांच महाव्रत, पांच समिति , तीन गुप्ति का पालन कर के पांचों इंद्रियों को वश में करना यही निर्जरा का सार है। निर्जरा यानी क्या? तो हमने पूर्व में जो पाप किये है उनको तप रूपी अग्नि में जलाने का उपक्रम करना। ताकि हम कर्म मल से छुटकारा पाकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सके। इस निर्जरा को समझकर उसका चिंतन करना, आराधना करना निर्जरा भावना है। यानी कर्मो को आत्मा से पृथक करते जाने का विचार कर...

प्रमाद की कथा

आलोचना लेने में प्रमाद नहीं करना चाहिए| (कमलश्री कुत्ती, बंदरी बनी।।) शिवभूति और वसुभूति दो भाई थे| शिवभूति की स्त्री कमलश्री अपने देवर वसुभूति के प्रति राग वाली बनी और उसने मोहवश अनुचित याचना की| भाभी के ऐसे अनुचित वचनों को सुनकर वसुभूति विचार करने लगा कि-‘‘ओह ! धिक्कार हो कामवासना को, जो ऐसी अनुचित याचना करवाती है| मुझे तो, किसी भी हालत में कामाधीन नहीं होना है|’’ इस प्रकार वैराग्य उत्पन्न होने पर उसने दीक्षा ग्रहण कर ली| यह बात कमलश्री तक पहुँची| राग के उदय से आर्तध्यान में रहती हुई वह मानसिक और वाचिक पाप की आलोचना लिए बिना ही शुनी (कुत्ती) के रूप में उत्पन्न हुई| एक बार वसुभूति मुनि गोचरी के लिये जा रहे थे| कुत्ती की दृष्टि मुनि पर पड़ी| पूर्वभव के राग के कारण वह मुनि की छाया के समान उनके साथ-साथ चलने लगी| हमेशा मुनि के साथ कुत्ती को देखकर जहां भी मुनि जाते, लोग उनको शुनीपति (कुत्ती पति) मुनि कहने लगे| लोगों के ऐसे वचन सुनकर मुनि लज्जित होने लगे| एक दिन मुनि किसी भी तरीके से कुत्ती की दृष्टि से बचकर अन्यत्र चले गए| मुनि को न देखने पर कुत्ती आर्तध्यान से मरकर जंगल में बन्दरी बनी...

बोधिदुर्लभ भावना

#भावना - 32 बोधिबीज भावना या बोधिदुर्लभ भावना, धन जन कंचन राज सुख, सबहि सुलभ कर जान। दुर्लभ है संसार में, एक यथारथ ज्ञान  ।।11।। बोधिबीज भावना का चिंतन बताते हुए ग्रन्थकार मुनि फरमाते है : - हे जीव, हमारा मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र साधन सम्यक्त्व है । इस सम्यक्त्व के अभाव में हम 9 ग्रेवयक तक के देव बनकर आ चुके होंगे। पर सम्यक्त्त्व के बिना इतना ऊपर जाकर भी कोई कल्याण न हुआ। इसलिए अब यदि इस भव में कषायों को क्षय या उपशम कर सम्यक्त्व प्राप्त करने का मौका मिला है तो इसका हमें लाभ उठाना चाहिए। जिस तरह अकेली सुई कचरे के ढेर में गुम हो तो वह वापिस ढूंढना मुश्किल है। पर यदि सुई डोरे से सहित है तो आसानी से मिल जाती है । बस सम्यक्त्व उस धागे की तरह है जो हमारी आत्मा को ज्यादा खोने नही देता। यह बोधिबीज भावना ऋषभदेव के 98 पुत्रों ने भायी थी। जब चक्रवर्ती भरतेश्वर 6 खण्ड जीतकर वापिस लौटे तब चक्र रत्न ने आयुध शाला में प्रवेश नही किया। जब वजह तलाश करवाई तब पता चला कि अभी तक उनके 99 भाइयों ने उनकी अधीनता स्वीकृत नही की थी। बाहुबली जी व अन्य 98 भाई का कहना था कि यह राज्य हमें पि...

गौतमस्वामी की मानसिक अधैर्यता की व्यथा

प्रश्न-११ : गौतमस्वामी की मानसिक अधैर्यता की व्यथा का भगवान ने किस प्रकार निवारण किया था ? उत्तर- प्रस्तुत उद्देशक-१३/७ अनुसार एक बार राजगृहनगर में प्रवचन हुआ, परिषद चली गई । उस दिन प्रवचन में संभवतः अनेक जीवों के केवली होकर मोक्ष जाने का वर्णन चला होगा या गौतम स्वामी के ९ छोटे साथी गणधरों को केवलज्ञान और मुक्ति हो चुकी होगी। उस विषय से गौतमस्वामी के मनोमंथन  में खुद को केवलज्ञान नहीं होने की व्यथा अत्यंत उग्र बन रही थी। उनके चहेरे में, भावों में खेद-उदासीनता वर्तने लगी और मन आर्तध्यान में तल्लीन हो रहा था। तब भगवान ने गौतमस्वामी को स्वत:  संबोधन करते हुए कहा कि हे गौतम! तुम-हम चिरकाल से  साथी हैं, पूर्व देव भव में, उसके पूर्व मानव भव में, यों अनेक लंबे  समय से परिचित साथी है और इस भव के बाद भी हम दोनों मोक्ष में भी आत्मस्वरूप से तुल्य बन कर साथ में ही रहेंगे । इस कथन से गौतमस्वामी को केवलज्ञान और मुक्ति होने की स्पष्टता हो जाने से उन्हें अत्यंत संतुष्टी हो गई कि मैं भी चरम शरीरी हूँ एव इसी भव से  संसार  का अंत करके मुक्त होने वाला हूँ। इस तरह उनका अ...

कथा सती पुष्पचूला

आलोचना और प्रायश्चित लेकर शुद्ध बनी पुष्पाचूला 🙏🙏🙏 (अरे जीव ! पाप करते हुए नहीं डरा, तो पापों की शुद्धि करने से क्यों डरता है?) पुष्पभद्र नगर में पुष्पकेतु नाम का राजा था| उसकी पुष्पवती नाम की रानी थी| उसने पुष्पचूल और पुष्पचूला नाम के युगल को जन्म दिया| पुष्पचूल और पुष्पचूला परस्पर अत्यन्त प्रेम से बड़े हुए| दोनों एक दूसरे से अलग नहीं रह सकते थे| अब राजा विचार करने लगा कि यदि पुत्री पुष्पचूला का विवाह अन्यत्र करूँगा, तो दोनों का वियोग हो जाएगा| अतः उसने प्रजाजनों की सभा बुलाई| सभा में पुष्पकेतु राजाने प्रश्‍न किया कि अगर मेरी धरती पर रत्न उत्पन्न हो जाये, तो उसे कहॉं जोड़ना, यह अधिकार किसका है? प्रजा ने उत्तर दिया कि, उत्पन्न हुए रत्न को जोड़ने का अधिकार आपको ही है| राजा ने घोषणा की-कि मैं इस पुत्ररत्न व पुत्रीरत्न को शादी द्वारा जोड़ता हूँ| इस प्रकार कपट से प्रजाजनों की सम्मति लेकर उनका परस्पर विवाह कर दिया| इस प्रकार के अन्याय से पुष्पवती के ह्रदय को गहरी चोट लगी| वैराग्य आने से उसने दीक्षा ले ली| मर कर देव बनी| पुष्पकेतु राजा भी कालांतर में परलोक में चला गया| आलोचना प्रायश्च...

कथा कामलक्ष्मी

अपने को भी लज्जा रखे बिना शुद्ध आलोचना लेनी चाहिए| ( कामलक्ष्मी और उनके पुत्र केवलज्ञानी बने।।) लक्ष्मीतिलक नगर में एक दरिद्र वेदसार नामक ब्राह्मण था| उसकी पत्नी का नाम कामलक्ष्मी था| वेदसार ब्राह्मण के वेदविचक्षण नाम का पुत्र था| प्रतिपक्षी राजा ने लक्ष्मीतिलक नगर पर आक्रमण कर दिया| कामलक्ष्मी पानी भरने के लिए नगर के बाहर गई थी| आक्रमण के कारण नगर के दरवाजे बन्द कर दिये| अतः कामलक्ष्मी बाहर ही रह गई| कामलक्ष्मी और उनके पुत्र केवलज्ञानी बने एक सिपाही उसे उठाकर राजा के पास ले गया| राजा ने उसे सौन्दर्य की मूर्ति जानकर अपनी रानी बना ली| कालान्तर में जब वेदविचक्षण बड़ा हो गया| तब उसे घर सौंप कर वेदसार ब्राह्मण अपनी पत्नी की खोज के लिये निकल पड़ा| दूसरी ओर स्वपति पर अनुराग रखने वाली कामलक्ष्मी राजा की अनुमति से प्रतिदिन दान देने लगी, ताकि उसका ब्राह्मण पति उसे किसी भी तरह से याचकसमूह में मिल जाये| एक बार घूमता-घूमता वेदसार ब्राह्मण वहॉं दान लेने आया| कामलक्ष्मी ने उसे पहचान लिया| पास में बुलाकर उसको स्वयं का परिचय दिया और उसके साथ भाग जाने के लिये एक योजना बनाई और कहा कि सातवें दिन मैं...

प्रभु महावीर का जीवन चरित्र

प्रभु महावीर का जीवन चरित्र ।। जन्म कल्याणक ।। 84 लाख योनियों में भव भ्रमण करते हुए जब तीर्थांकर प्रभु की आत्मा अपने आखरी पड़ाव यानी की मोक्ष मार्ग के आखरी भव में जन्म लेती है तब उसे जन्म कल्याणक कहा जाता है । इस लोक में जब धर्म शनै शनै न्यून होते जाता है तब इसकी पुनःस्थापन करके मोक्षगति को प्राप्त करती है। एक ऐसा दिन जब हमारे प्रभु इस लोक में अवतरित होते है । हम जैसे पामर मनुष्य जीवों पर एक बहोत बड़ा उपकार करते है। वे इस लोक में आकर हम सबको धर्म समझाते है। स्वयं धर्म के मार्ग पर चलते है तथा हमें भी उसी रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते है । इस भव में जन्म लेकर तीर्थंकर परमात्मा समस्त राजलोक में यह बता देते है की अगर किसी आत्मा को भव सागर पार उतरना है तो इसका एक मात्र रास्ता इस एक गति से ही मुमकिन है। देवगति की आत्मा शारीरक रूप से कितनी की उत्कृष्ट हो पर मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकती । चाहकर कर भी धर्म से जुड़ नहीं सकती। प्रभु के निकट रह नहीं सकती। प्रभु का सतत सानिध्य प्राप्त नहीं कर सकती। यह सब विशेषता सिर्फ और सिर्फ मनुष्य गति की आत्मा को प्राप्त है। तो हे मानव अपने आप को किसी भी आत...

कथा चित्रक और संभूति चांडाल बने ।।

काश, पश्चाताप और आलोचना की होती !! 🙏🙏🙏 चित्रक और संभूति चांडाल बने ।। जंगल से एक मुनि गुज़र रहे थे| रास्ता भूल जाने के कारण दोपहर के समय बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े| गाय चराने के लिए आये हुये चार ग्वालों ने इस दृश्य को दूर से देखा| वे नज़दीक आये| मुनि बेहोश थे| होठ सूख गए थे| चेहरा कुम्हला गया था| तृषा का अनुमान कर उन्होंने गाय को दुहकर मुँह में दूध डाला| इससे मुनि होश में आये| कुछ समय के बाद मुनिश्री ने चारों को समझाने का प्रयास करते हुए कहा कि संसाररूपी जंगल में उनकी आत्मा भटक रही हैं| उस दुःख से पार उतरने के लिये एकमात्र साधन है चारित्र धर्म| इस प्रकार का बोध दिया| चारों ने प्रतिबोध पाकर चारित्र ग्रहण किया| उनमें से दो आत्माएं तो उसी भव में केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष में चली गई| शेष दो जनों को एक विचार आया कि स्नान किये बिना शुद्धि किस प्रकार से हो सकती है? क्या इतने मैले कपड़े रखने? इस प्रकार घृणा करने से नीच गोत्र कर्म बांध दिया| उसकी आलोचना लिये बिना ही काल कर गये| बाद में क्रम से पूर्व भव में बांधे हुए नीच गोत्र के उदय से चंडालकुल में चित्रक व संभूति के रूप में उत्पन्न हुए|...

कथा अंजनासुंदरी का पूर्व भव

अंजनासुंदरी (यदि हम किये गये पापों की आलोचना नहीं करते हैं और प्रायश्‍चित लेकर शुद्ध नहीं बनते हैं, तो उसका अति भयंकर परिणाम भुगतना पड़ता है, जैसे अंजना सुन्दरी की जिन्दगी के वे वियोग भरे वर्ष आँसू की कहानी बन कर रह गये|) एक राजा की दो पत्नियॉं थी| लक्ष्मीवती और कनकोदरी| लक्ष्मीवती रानी ने अरिहंत-परमात्मा की रत्नजड़ित मूर्त्ति बनवाकर अपने गृहचैत्य में उसकी स्थापना की| वह उसकी पूजा-भक्ति में सदा तल्लीन रहने लगी| उसकी भक्ति की सर्वत्र प्रशंसा होने लगी| ‘‘धन्य है रानी लक्ष्मीवती को, दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय|’’ यह रानी तो सुख में भी प्रभु सुमिरन करती हैंै, धन्य है !!’ बच्चे, बूढे, नौजवान सभी के मुँह पर एक ही बात-धन्य है रानी लक्ष्मीवती, धन्य है इसकी प्रभु भक्ति| लोक में कहा जाता है कि जिसको ज्वर चढ़ जाता है, उसे अच्छे से अच्छा भोजन भी कडवा लगता है| रसगुल्ला खिलाओ, तो भी वह व्यक्ति थू….थू करेगा| ईर्ष्यालु व्यक्ति की यही दशा होती है| रानी कनकोदरी के अंग-अंग में ईर्ष्या का बुखार व्याप्त हो गया| अपनी सौतन की प्रशंसा उससे सहन नहीं हो पाती थी| ‘लोग मेरी प्रशंसा क्यों नहीं करते?’...

अष्ट सिद्धी नवनिधी

अष्ट सिद्धी नवनिधी मिले 1) सुई के छेद जितनी जगह मे से पसार होने वाली सिद्धी का नाम? ज 1 ) अणिमा 2) मेरू पर्वत से भी बडा रूप बनाने की सिद्धी का नाम? ज 2) महीमा 3) पवन से भी हलका शरीर बनाने की सिद्धी? ज 3) लधीमा 4) इंद्र भी सहन न कर सके ऐसी गुरूत्व करण सिद्धी? ज 4) गरिमा 5) भूमि पर रहकर मेरू पर्वत की चोटी को स्पर्श करने की सिद्धि? ज 5) प्राप्ति 6) जमीन पर पानी की तरह और पानी में जमीन के तरह चलने की सिद्धि? ज6) प्राकाम्य 7) चक्रवर्ती और इंद्र जैसी खुद की शोभा करने की सिद्धि? ज 7 )ईशित्व 8) क्रूर जीव भी जिसके दशर्न से शांत हो जाता है ऐसी सिद्धि? ज 8) वशित्व 9) नवकार महामंत्र में नवपद क्या देते है? ज 9) नवनिधी 10) ग्राम नगर आदि का व्यवहार जिससे होता है वह कौन-सा निधान है? ज 10) नैसर्प 11) पुरूष, स्त्री ,  घोड़े और हाथी की आभरण विधि जिससे होती हैं वह निधान ? ज 11) पिंगल 12) चक्रवर्ती के चौदह रत्न और अन्य रत्न की उत्पत्ति जिससे होती है वह कौन-सा निधान? ज 12) सर्व रत्न 13) सफेद और रंगीन वस्र की उत्पत्ति होती है वह कौन-सा निधान? ज 13) महापद्म 14)...

मयूर

एक भव में मयूर कौन बना था यशोधर राजा मयूर सिंहासन किसका था  बादशाह शाहजहाँ के मयूर  सिंहासन का दूसरा नाम तख्ते ताउस था मयूर किसका वाहन है कार्तिकेय नीला मोर भारत और कौन से देश  का राष्ट्रीय पक्षी है।  A श्री लंका  किसके राज्य में जो सिक्के चलते थे, उनके एक तरफ मोर बना होता था। Aसम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के मोर पंख की पिच्छी कौन इस्तेमाल करते है Aदिगम्बर मुनि मयूर कौनसे तीर्थंकर की छत्र छाया में  एक अवतारी बने अजित नाथ जी एक दानवीर राज जिसकी परीक्षा  कृष्ण अर्जुन ने ली 🅰️मोरध्वज राजा शिवजी को उनके गले के कारण कहते है 🅰️नीलकंठ

श्रृंगार

https://www.facebook.com/groups/161379847558821/?ref=share 05 - 07 - 2020 (2---2::20) Rekha Dilip Rathod ®️🕊️ Topic -::- *आभूषण -- श्रृंगार ®️🕊️* 1️⃣ *सर्वश्रेष्ठ आभूषण कौनसा है*❓®️ 🅰️ *मुकुट*🕊️ 2️⃣ *नमि राजर्षि जी के दाह ज्वर मे कौनसा आभूषण उनके वैराग्य में निम्मित बना*❓®️ 🅰️ *कंगन*🕊️ 3️⃣ *कौनसी औरत अपने श्रृंगार का त्याग करती है*❓®️ 🅰️ *विधवा औरत*🕊️ 4️⃣ *पत्नी का श्रृंगार करते करते आत्म श्रृंगार किसका हुआ*❓®️ 🅰️ *रतिसार जी*🕊️ 5️⃣ *औरतों को प्रिय,,, लेकिन इसे ही एक सती ने खो दिया... सती कौन -- उन्होंने क्या खोया... बयाये*❓®️ 🅰️ *चंदनबाला जी -- केश*🕊️ 6️⃣ *एक सूत्र की रचना करते रहे और लोहे के आभूषण उतरते रहे... कौन*❓®️ 🅰️ *मानतुंग सुरी जी -- भक्तामर*🕊️ 7️⃣ *श्रीरामचंद्र जी और सीता जी के बीच कौनसे आभूषण ने Message का काम किया*❓®️ 🅰️ *मुद्रिका*🕊️ 8️⃣ *श्रृंगार की एक वस्तु जो शाकाहारी नही होती*❓®️ 🅰️ *लिपस्टिक 💄*🕊️ 9️⃣ *रत्नावली हार पहनकर आत्मा का श्रृंगार किस रानी ने किया*❓®️ 🅰️ *काली रानी जी*🕊️ 🔟 *चक्षुंद्रिय का श्रृंगार क्या है*...

एक नाम के दो लोग

Topic -::- *एक यह तो दूसरा कौन ®️🕊️* Example -::- ®️ *एक वज्र मुनि है तो दूसरा वज्र क्या है*❓ 🅰️ *लंछन (धर्म नाथ जी)*🕊️ 1️⃣ *एक सीता सती है तो दूसरी सीता कौन है*❓®️ 🅰️ *नदी*🕊️ 2️⃣ *एक सुदर्शन जी सेठ है तो दूसरे सुदर्शन क्या है*❓®️ 🅰️ *चक्र*🕊️ 3️⃣ *एक विनय धर्म का मूल है तो दूसरा विनय क्या है*❓®️ 🅰️ *तप*🕊️ 4️⃣ *एक इसान देवलोक है तो दूसरा इशान क्या है*❓®️ 🅰️ *विदिशा*🕊️ 5️⃣ *एक विजय चोर है तो दूसरा विजय क्या है*❓®️ 🅰️ *मुहूर्त -- विमान*🕊️ 6️⃣ *यह अंजना सती है तो दूसरी अंजना कौन है*❓®️ 🅰️ *नरक*🕊️ 7️⃣ *एक जीव तत्व है तो दूसरा जीव क्या है*❓®️ 🅰️ *राशी*🕊️ 8️⃣ *एक मुला सेठानी है तो दूसरी मुला क्या है*❓®️ 🅰️ *कंदमूल -नक्षत्र*🕊️ 9️⃣ *एक सुदर्शना जी महावीर स्वामी की बहन है तो दूसरी सुदर्शना क्या है*❓®️ 🅰️ *आदिनाथ जी की दीक्षा शिविका*🕊️ 🔟 *एक पद्मावती जी सती है तो दूसरी पद्मावती जी कौन*❓®️ 🅰️ *देवी*🕊️ 1️⃣1️⃣ *एक नंदन जी महावीर स्वामी जी का भव है तो दूसरा नंदन जी कौन है*❓®️ 🅰️ *बलदेव जी - वन*🕊️ 1️⃣2️⃣ *एक त्रस काय है तो दूसरा त्रस ...

माता पिता

*📚किस माता ने अपने जन्म से अंधे, बहरे, गूंगे, हाथपैर आदि से रहित पुत्र की सेवा की ❓* *🅰️ मृगालोढ़ा माताजी ने मृगापुत्रजी की ❗* *📚2. किस माता ने अपने पुत्र को दृष्टिवाद पढ़ने मामा के पास भेजा ❓* *🅰️ रुद्रसोमाजी ने आर्यरक्षितजी को ❗* *📚3.किस माता के पुत्र को सामायिक के उपकरण देखकर वैराग्य उत्पन्न हुआ ❓* *🅰️ आद्रका राणी माता आद्रकुमारजी ❗* *📚4. किस माता के पुत्र का जन्मतेही अपहरण हो गया ❓* *🅰️रुक्मिणी माता ,प्रद्युम्न कुमारजी ❗* *📚5 किस माता ने साध्वी अवस्था मे पुत्र को जन्म दिया ❓* *🅰️ पद्मावती माता ने कुरगूडु जी को ❗* *📚6.  किस माताका पुत्र निन्हव बना ❓* *🅰️ सुदर्शना माता का पुत्र जमाली  जी ❗* *📚7. किस माता ने जंगल मे पुत्र को जन्म दिया ❓* *🅰️ मदनरेखाजी ने नमिराजर्षि जी को ❗* *📚 8 .6 चरम शरीरी पुत्रो की पालक माता कौन ❓* *🅰️ सुलसाजी अनिकसेन आदी 6 पुत्रो की ❗* *📚9. 8 वर्ष के इकलौते पुत्र को किस माता ने दिक्षा की अनुमति दी ❓* *🅰️.  श्रीमती जी ने अतिमुक्त कुमारजी को ❗* *.📚10किस माताने जन्मते पुत्र को दासी द्वारा उकरडेपर फिकवाया ❓* *🅰️ चेलनाराणी ने कोणिक कुम...

इरियावहियं

Q1 पश्चाताप सूत्र किसे कहा है ❓ 🅰️1इरियावहियं प्र 2 इरियावहियं से क्या तात्पर्य ❓ 🅰️2 गमनागमन में हुई  विराधना प्र 3 विराधना कितनी ❓ 🅰️ 3  दश प्र 4  पहली विराधना क्या ❓ 🅰️ 4 अभिहया प्र 5 अभिहया से तात्पर्य ❓ 🅰️ 5 लात मारना प्र 6 अभिहया से रोगोत्पति की संभावना❓ 🅰️ 6 घुटनों संबंधित रोग प्र 7 दूसरी  विराधना ❓ 🅰️ 7 वत्तिया प्र 8 वत्तिया का क्या मतलब ❓ 🅰️ 8 धूल से ढ़कना प्र 9 वत्तिया से रोगोत्पति की संभावना ❓ 🅰️9 श्वास व घुटन संबंधित प्रश्न 10 लेसिया का क्या मतलब ❓ 🅰️ 10 भूमि के साथ रगड़ना प्रश्न 11 लेसिया से रोगोत्पति की संभावना ❓ 🅰️ 11 कुष्ठ आदि चमड़ी के रोग प्रश्न 12 संघाइया विराधना से क्या मतलब ❓ 🅰️12 इक्ट्ठा करना प्रश्न  13 संघाइया से रोगोत्पति की संभावना❓ 🅰️ 13 धक्का - मुक्की तथा भीड़ में आना-जाना पड़े। प्रश्न 14 संघट्टिया विराधना का तात्पर्य ....❓ 🅰️ 14 स्पर्श से दुख देना प्रश्न 15 संघट्टिया विराधना  से रोगोत्पति की संभावना ...❓ 🅰️ 15  चर्म रोग,  मलेरिया,बुखार आदि प्रश्न 16  थकाकर ब...

दीक्षा

1⃣ गौतम स्वामी ने किसके पास दिक्षा ली ? 🅰 भ.महावीर स्वामी 2⃣ गौतम स्वामी जी की दिक्षा तिथि कौनसी है ? 🅰 वैसाख सुदी ग्यारस ! 3⃣ संयम लेना यह श्रावक का कौनसा मनोरथ है ? 🅰 दुसरा ! 4⃣ सीमंधर स्वामी जी ने कौनसी उम्र मे दिक्षा ली ? 🅰 83 लाख पूर्व की उम्र मे ! 5⃣ चतुर्विध संघ मे  गणधर  कितने है ? 🅰 1452 6⃣ तीर्थंकर कितने तीर्थ की स्थापना करते है ? 🅰 चार 7⃣ भ.महावीर स्वामी जी ने सर्वप्रथम कितनो को संयम दान दिया ? 🅰 4411 8⃣ भ.ऋषभ स्वामी जी शासन में संयमी हुए ? 🅰 अंसख्य! 9⃣सयंति राजा ने किसके पास संयम लिया ? 🅰 गर्दभाली राजा 🔟 मुनि के देखकर किसने सयंम लिया ? 🅰 मृगापुत्र ! 1⃣1⃣ 1000 मित्रों के साथ दिक्षा किसने ली ? 🅰 कार्तिक सेठ 1⃣2⃣ उदयान राजा ने दिक्षा लेने के,लिए किसके राज्य दिया ? 🅰 भांजे को 1⃣3⃣ संयम का वेश एक भाई ने उतारा दुसरे ने पहना ? 🅰 कुंडरिक पुंडरिक ! 1⃣4⃣ बाल्यवय मे किसने दिक्षा ली ? 🅰 एवंता मुनि 1⃣5⃣ कुमारवय मे किसने दिक्षा ली ? 🅰 गजसुकुमाल मुनि ने ! 1⃣6⃣ युवावय मे किसने दीक्षा ली ? 🅰 मेघकुमार जम्बुजी ने ! 1...