नमुत्थुणं सूत्र मेरी क्लास का2
महान सूत्र, *नमुऽत्थु णं* का विशेष विवेचन...
18 :11:20
बोहिदायणं
*बोहिदायणं-बोधि को देने वाले परमात्मा को मेरा नमस्कार हो
बोधि यानी सम्यगदर्शन।
धागे में पडी हुई गांठ जिस तरह सुई को आगे बढ़ने नहीं देती उसी तरह ग्रंथि की हाजरी में जीव सत्यतत्व को देखने, समझने के विषय में आगे नहीं बढ़ सकता। कदाचित ज्ञानशक्ति से, इंद्रियों के माध्यम से पदार्थ का बाह्य रूपरंग का ज्ञान पा सकता है, फिर भी तीव्र रागादि के कारण उसमें रही हुइ नश्वरता, आत्मभिन्नता और आत्मा के लिए अनूपकारिता(अहित) आदि धर्म का ज्ञान जीव को नहीं हो सकता।
कई बार किसी महापुरुषों के तीन वचनामृत से ➡️1,संपत्ति आदि पदार्थ नश्वर है,
2, आत्मा को रागादि भावों से मलिन करने वाले है,
3, कर्म का बंध करा कर दुर्गति में ले जाने वाले हैं, ऐसी कुछ बातें समझ में आती है। आंशिक श्रद्धा भी होती है। फिर भी ग्रंथि की उपस्थिति में, मिथ्यात्व के उदयकाल में, यह भाव छोड़ने योग्य है, ऐसा आत्मा के लिए हितकर ऐसा संवेदन होता नहीं है। जिसको शास्त्रीय परिभाषा में अवेध-संवेध पद कहते हैं।
अवेध मतलब अज्ञान ,अलभ्य
संवेध का अर्थ है अनुभव करने
योग्य समझने योग्य
अवेध-संवेध पद उसे कहते हैं व्यक्ति का दुविधा में रहना
समझते हुए अज्ञान रहना।
जो वस्तु जिस स्वरूप में है, वो ही स्वरूप से वेदन (जानना)होना चाहिए। उसी स्वरूप में वेदन न होने से अलग अलग स्वरूप से वेदन हो सकता है, वो अवेध-संवेध पद है।
अवेध-संवेधमें
मिथ्यात्व में अवश्यमेव उपस्थिति होती है।
और सम्यग्दर्शन प्राप्त होने से ही उसका नाश होता है।
जिस तरह साँप को देख कर, ये सांप हमें डस कर मार देगा, ऐसा संवेदात्मक ज्ञान होने से जीव सांप से डरते हैं, उससे दूर भागते है, उसी तरह स्त्री, सम्पत्ति आदि हेय पदार्थों का संवेदात्मक ज्ञान होने से आत्मा उससे दूर रहने का प्रयत्न करता है।
तभी ऐसा कहेंगे कि ये यथार्थ संवेदन हुआ है। परन्तु सम्यग्दर्शन के अभाव में पाप क्रिया या पाप के साधनभूत स्त्री, संपत्ति आदि "मुझे मारने वाली है" ऐसा भय या ऐसी संवेदना जीव की नही होती है। इसलिए वो हितकारक संयम आदि गुणों की उपेक्षा करके अहितकारी स्त्री, संपत्ति, आदि में ही प्रवृत्ति किया करता है। ये सब मिथ्यात्व का उदय, बोधि की अप्राप्ति, गाढ़ रागद्वेष रूप ग्रंथि की उपस्थिति या अवेध-संवेध पद के कारण ही होती है।
जिस तरह कोई पत्थर चारों तरफ से मार खाते खाते कभी अपनेआप गोल हो जाता है, उसी तरह भव में भटकते भटकते दुःखो को सहन करते करते जीव की, भावितव्यता( होनहार, अवश्यंभावी। ) से, मिथ्यात्वमोहनीय आदि कर्म का विपाक थोडा सा मंद पड़ता है और तब जीव को शुभ भाव की प्राप्ति होती है। और तब राग, द्वेष, क्रोध आदि से होने वाली पीड़ा आत्मा को समझ मे आती है। उपरांत संसार की वास्तविकता का वो विचार कर सकता है। उसके कारण संसार मे सुख है, ऐसा अनादि काल का भ्रम कम होने से संसार के प्रति राग घटता जाता है। और भव से पार पा चूके भगवान के प्रति बहुमान होता है। यह परिणाम को ज्ञानी भगवंत यथाप्रवृत्तिकरण कहते है।
सम्यक्त्व के तीन करण, यथाप्रवृत्तिकरण, अपूर्व करण और अनिवृत्तिकरण ।
आचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा ने लिखा है:-
प्रतिदिन धर्म करने वालों को तो अपनी आत्मा से खास तौर पर पूछना चाहिए कि ‘तुझे यह सुख कैसा लगता है? प्राप्त करने योग्य या छोडने योग्य? तुझे चाहिए संसार का सुख या मुक्ति का सुख? संसार के सुख की जो आवश्यकता लगती है, वह कमजोरी है, ऐसा लगता है? ऐसा कुछ आप विचार करते हैं क्या? ऐसा विचार करें तो शुद्ध यथाप्रवृत्तिकरण आ सकता है।
शुद्ध यथाप्रवृत्तिकरण, अपूर्वकरण को लाने का परिणाम है और अपूर्वकरण के आते ही ग्रंथि-भेद होता है और इसके पश्चात अनिवृत्तिकरण नाम का परिणाम पैदा होता है, जो परिणाम सम्यक्त्व को प्रकट किए बिना नहीं रहता। इसके बाद उसे शुद्ध देव, शुद्ध गुरु और शुद्ध धर्म की उपासना के अतिरिक्त कोई भी उपासना वास्तविक रूप में करने योग्य नहीं लगती। फिर तो मोक्ष ही उसकी मंजिल है।
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अनिवृत्तिकरण करने पर सम्यक्त्व पा लेता है । यह करण सिर्फ भव्य जीव हीं कर पाते हैं ।
यथाप्रवृत्तिकरण का अर्थ, संक्षिप्त में, ये है➡️
"अनादी काल से संसार में भटकते जीव को शुभ भाव होता है।"
और फिर इस तत्वचिंतन के मार्ग में आगे बढ़ते हुए, निकट के मुक्तिगामी आत्मा को यथा प्रकार के कर्म के क्षयोपशम से अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण का अध्यवसाय प्रगटता है।
अध्यवसाय का धर्म में क्या अर्थ है जाने
अध्यवसाय का अर्थ भाव ही है ऐसे देखें तो भाव कईतरह के होते है पर समझने के लिये हम
दो भाग में विभक्त कर देते हैं
1अशुभअध्यवसाय ➡️अशुभअध्यवसाय का अर्थ
है अभिप्राय,परिणाम ,भाव ,
कषाय सहित भाव ,वे भाव जिनसे कर्मों में स्थिति व अनुभाग पड़ता है।
आठों कर्मों और प्रदेशों के परस्पर में अन्वय (एकरूपता) के कारणभूत परिणाम को अनुभाग कहते हैं
अनुभाग पूर्णरूपेण गुण का घातक होने के कारण सर्वघाती कहलाता है।
2,शुभ अध्यवसाय
शुभ अध्यवसाय से भवी जीव राग-द्वेष की ग्रन्थि (गाँठ) भेद कर के अपूर्वकरण कर सकता है ?इसी कारण से ही आत्मा रागद्वेष की तीव्र गांठ को भेद सकता है।
कर्मश्रवो का आधार मुख्यतया अध्यवसाय (भाव) है। बाह्य क्रियाएँ और इनके साधन एक सीमा तक कर्मबंध के निमित्त होते हैं। मुख्य रुप से कर्मबंध अध्यवसायो पर निर्भर करता है। बाह्य क्रिया समान होने पर भी अध्यवसायो में बहुत अंतर हो सकता है। उदाहारण के लिये चाकू या छुरी का प्रयोग एक हिंसक व्यक्ति घातक बुद्धि से करता है। और वही चाकू और छुरी का प्रयोग एक डॉक्टर शल्य चिकित्सा के लिए करता हैं। इन दोनों व्यक्ति ने शस्त्र का प्रयोग तो किया, परंतु दोनों के अध्यवसायो में बड़ा अंतर है। इसमे एक का अध्यवसाय हिंसक होने से संकलाष्ट है, अशुभ है, जब कि दूसरे के अध्यवसाय शांति, आरोग्यदायक होने से शुभ है। इसलिए एक व्यक्ति अशुभ कर्मो का और दूसरा व्यक्ति शुभ कर्मों का बंधन करता है।
प्रभु ही हैजो ऐसा ज्ञान देते है जिससे
अनिवृत्तिकरण का अध्यवसाय
प्रकटता हैं
अनिवृत्तिकरण, अर्थात, अ (नहीं) + निवृत्ति (भेद) + करण (परिणाम)अर्थात् भेद रहित समान परिणाम।
जिस परिणाम के कारण आत्मा सम्यग्दर्शन गुण प्राप्त करे बिना पीछे ही न फिरे, ऐसे विशिष्ट कोटि का अध्यवसाय।
*प्रश्न के उत्तर*
*18:11:20*
1 कषाय सहित भाव ,वे भाव जिनसे कर्मों में स्थिति व अनुभाग पड़ता है।कौन सा अध्यवसाय हैं।
A अशुभ
2अध्यवसाय का अर्थ क्या ही है
Aभाव
3किसके आते ही ग्रंथि-भेद होता है
Aअपूर्वकरण
4प्रतिदिन धर्म करने वालों को तो अपनी आत्मा से खास तौर पर पूछना चाहिए कि----इत्यादि किसने लिखा
Aआचार्य श्री विजय रामचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा ने लिखा है:-
5किस की हाजरी में जीव सत्यतत्व को देखने, समझने के विषय में आगे नहीं बढ़ सकता।
Aग्रंथि की
6,अवेध-संवेधमें में अवश्यमेव किसकी उपस्थिति होती है।
Aमिथ्यात्व
7ज्ञानशक्ति से, इंद्रियों के माध्यम से पदार्थ किसका ज्ञान पा सकता है,
Aबाह्य रूपरंग
8कौन सा पद उसे कहते हैं व्यक्ति का दुविधा में रहना
समझते हुए अज्ञान रहना।
Aअवेध-संवेध
9विपाक थोडा सा मंद पड़ता है और तब जीव को किसकी प्राप्ति होती है।
Aशुभ भाव की
10,सम्यक्त्व के कितने करण,है।
A तीन
*19:11:20*
*अध्याय*
*महान सूत्र, *नमुऽत्थु णं* *का विशेष विवेचन*...
*अध्याय*
बोहिदयाणं-*-हे बुद्धि प्रदाता परमात्मा आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो।
गतांक से आगे,
व्यक्ति में पूर्ण सम्यक दृष्टि न भी हो, ज्ञान
में व्यक्ति शायद इतना प्रबुद्ध भी ना हो फिर भी सम्यक्त्वी
ह्र्दय, में कहीं सम्यकत्व का उचित अनुचित का बोधहोता ही है,
वह गलत को गलत और सही को सही जान लेता है
आत्मा के लिए कल्याण कारी क्या है , और अकल्याणकारी क्या है जान ही लेती हैं।
जंहा उसे अवसर मिलता है
उसके पग कल्याण मार्ग पर
अग्रसर हो जाते है, और वंही
उनकी ऊहो पोह की स्थिति
समाप्त हो जाती है और वह
अवेध संवेद से ऊपर उठ जाता है ।
जैसे ही बोधि की प्राप्ति होती है, उस के साथ अविनाभावी ऐसा आस्तिक्य नाम का गुण प्राप्त होता है।
(आइये पहले यहां प्रयुक्त शब्द को समझे
अविनाभावी का काशाब्दिक अर्थ है ➡️ सम्बन्ध, लगाव, अविच्छेद संबंध जैसे आग और धुंआ
*अविनाभावी की शास्त्रीय परिभाषा*⤵️
जिसके बिना जिसकी सिद्धि न होय उसको अविनाभावी संबंध कहते हैं।तथा सहभाव नियम तथा क्रमभाव नियमको अविनाभाव कहते हैं।
अविनाभवी संबंध एक द्रव्य का उसही द्रव्य के गुण या पर्याय के साथ होता है।इसका कथन अन्वय और व्यतिरेक दो रूप में होता है।
शास्त्रों में धुंआ और अग्नि का अविनाभाव संबंध बताया गया है। क्या धुंआ अग्नि की गुण या पर्याय होती है?
आपका कहना बिल्कुल सही है। धुँआ न तो अग्नि का गुण है और न ही पर्याय। पर यहाँ धुंए और अग्नि का उदाहरण अन्वय, व्यतिरेक को समझाने के लिए है। न्याय मन्दिर में यही उदाहरण हर जगह प्रयोग किया है।
जैसे:- जहाँ-जहाँ धुँआ है, वहाँ अग्नि होगी ही-अन्वय और जहाँ अग्नि नहीं वहाँ धुँआ नहीं होगा-व्यतिरेकहैं
जैसे-जीव और ज्ञान गुण में अविनाभाव संबंध है।
1.जहाँ -जहाँ जीव वहाँ-वहाँ ज्ञान।यह अस्ति की अपेक्षा,यानी अन्वय।
2.और जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ जीव भी नहीं।यह व्यतिरेक यानी नास्ति की अपेक्षा कथन।
अविनाभवी संबंध एक द्रव्य का उसही द्रव्य के गुण या पर्याय के साथ होता है।
व्यतिरेक' का शाब्दिक अर्थ है- 'आधिक्य'। व्यतिरेक में कारण का होना अनिवार्य है।
व्यतिरेक:-दूसरी तरह से समझे तो , साध्य के अभाव में साधन का अभाव होना व्यतिरेक है। जैसे- जहाँ-जहाँ अग्नि का अभाव है, वहाँ-वहाँ धूम का भी अभाव है । हम यह न भूलें अग्नि साध्य है, धूम साधन है। धुँआ देखकर ही हम अग्नि के होने को जानते हैं, अग्नि के अभाव में धुँए का भी अभाव होता है। अतः साध्य के न होने पर साधन के न होने को व्यतिरेक कहा जाता है । इसे तर्क की भाषा में व्यतिरेक व्याप्ति कहते हैं।
अविनाभवी संबंध एक द्रव्य का उसही द्रव्य के गुण या पर्याय के साथ होता है।इसका कथन अन्वय और व्यतिरेक दो रूप में होता है।
है।
अन्वय और व्यतिरेक के सम्बन्ध का ज्ञान तर्क से होता है।
वैसे अन्वय का और व्यतिरेक का परस्पर में भेद है । जैसे–नियम से व्यतिरेकी अनेक होते हैं और अन्वयी गुण एक होता है ।
दूसरी तरफ
अध्यात्म को न माने तो सिद्धांत में अविनाभाव और निमित्त संबंध में कोई विशेष अंतर नहीं ?
जैसे, चलती गाड़ी में पेट्रोल निमित्त है। मतलब गाड़ी चलेगी तब पेट्रोल उस समय उपस्थित होगा।
गाड़ी जब नहीं चलेगी, तब या तो पेट्रोल (निमित्त) उपस्थित नहीं होगा या फिर अगर किसी अन्य कारण से खराब होगी तब निमित्त का प्रसंग ही नहीं उठेगा)
।
इसलिए ही अपनी या दूसरे की द्रव्यपीड़ा को, भाव से हुई पीड़ा या दुख को देख कर उसमें अनुकंपा का (दया का) परिणाम प्रगट होता है। इस अनुकंपा के कारण, संसार में हो रही निरंतर स्व-पर के प्राणों की हिंसा को देख कर, इस संसार की असारता का अनुभव कर, उसके प्रति अभाव, वैराग्य भाव होता है। ऐसे निर्गुण संसार से छूटने की तीव्र इच्छा स्वरूप निर्वेद का परिणाम होता है।
ऐसी सम्यकत्व भरी दृष्टि ,
और ईश्वर में पूर्ण समर्पण के जब भाव आजाते है ,दया धर्म के भाव प्रस्फुटितहोते है ,
*प्रश्न के उत्तर*
*19:11:20*
व्यतिरेक' का शाब्दिक अर्थ क्या है- ''।
Aआधिक्य
जहाँ-जहाँ धुँआ है, वहाँ क्या होगी ही
Aअग्नि
बोधि की प्राप्ति होती है, उस के साथ किस नाम के गुण प्राप्त होता है।
Aअविनाभावी,आस्तिक्य
और जहाँ ज्ञान नहीं वहाँ जीव भी नहींयह किसकी अपेक्षा कथन हैं
Aव्यतिरेक यानी नास्ति
,दया धर्म के भाव प्रस्फुटितहोते है ,तो क्या उत्पन्न होता
हैं
Aवैराग्यता (निर्वेदता) उत्पन्न होती है
कौन से ह्र्दय, में कहीं सम्यकत्व का उचित अनुचित का बोधहोता ही है,
Aसम्यक्त्वी
अविनाभावी का काशाब्दिक अर्थ क्या है
Aसम्बन्ध, लगाव, अविच्छेद संबंध जैसे आग और धुंआ
शास्त्रों में धुंआ और अग्नि का किसका संबंध बताया गया
Aअविनाभाव
ऊहो पोह की स्थिति समाप्त हो जाती है और वह किससे
ऊपर उठ जाता है ।
Aअवेध संवेद से
साध्य के अभाव में साधन का अभाव होनाक्या है।
Aव्यतिरेक हैं
वैराग्यता (निर्वेदता) उत्पन्न होती है
*20: 11:20*
*अध्याय*
महान सूत्र, *नमुऽत्थु णं* का विशेष विवेचन...
*बोहिदयाणं-*-सुबोधि को देने वाले परमात्मा को मेरा नमस्कार हो।
बोधि अर्थात जिनेश्वर देव कथित धर्म की प्राप्ति होना इसे सम्यक दर्शन भी कहते हैं। इसके 5 लक्षण है
*1शम /प्रशम* ➡️शम का अर्थ है ‘शमन’ अथवा शांत होना। प्रकृष्ट शमन अथवा शांतभाव को प्रशम कहा जाता है। वास्तविक रूप से तो, अनंतानुबंधी कषाय जहां तक जोरदार विपाकोदयवाले होते हैं,
*विपाकोदय ➡️जो कर्म उदय में आकर फल देकर नष्ट हो जाता है उसे विपाकोदय कहते हैं।*
तब तक आत्मा में प्रशम का सच्चा भाव प्रकट नहीं होता।जब तक
रागादि की तीव्रता ना हो
।जैसे धूम अग्नि का लिंग है, वैसे प्रशम आदि सम्यक्त्व के लिंग हैं।
2संवेग➡️संसार से भयभीत होना।
धर्म तथा धर्म के फल में अनुराग होना संवेग कहलाता है
अथवा धार्मिक पुरुषों में अनुराग अथवा पंचपरमेष्ठी में प्रीति रखने को संवेग कहते हैं।
सोलहकारण भावनाओं में पाँचवीं भावना संवेग है। जन्म, जरा, मरण तथा रोग आदि शारीरिक और मानसिक दु:खों के भार से युक्त संसार से नित्य डरते रहना संवेग भावना है । यह भावना विषयों का छेदन करती है ।
3निर्वेद➡️निर्वेद का शाब्दिक अर्थ है
ग्लानि। घृणा। २. मन में स्वयं अपने संबंध में होनेवाली खेदपूर्ण ग्लानि और निराशा। ३. उक्त के फलस्वरूप सांसारिक बातों से होनेवाली विरक्ति। वैराग्य। और एक शब्द में कहें तो वैराग्य।
शास्त्रों की दृष्टि से
सब अभिलाषाओं का त्याग निर्वेद कहलाता है ; क्योंकि, सम्यग्दृष्टि अभिलाषावान् नहीं
फिर ऐसे निर्वेद के परिणाम को प्राप्त करने के बाद जीव को, अनंतकाल तक जहां अपने को सुख की प्राप्ति होनी है और जहां कोई भी हिंसा आदि करनी नहीं पड़ती, साथ ही अपने सुख के लिए कोई भी स्थान पर, किसी को भी दुख देने का अवसर नहीं होता, ऐसे मोक्ष की तीव्र अभिलाषा रूप संवेग का परिणाम होता है। संसार से परे ऐसे मोक्ष की इच्छा होने से ही जीवन में क्रोधlदि विषयों की व्यापकता व लालसा, तृष्णा के उपशम स्वरूप प्रशम का परिणाम प्रगट होता है। अर्थात विरक्ति के भाव प्रगट होते हैं।
4अनुकंपा➡️ अनुकंपा शब्द का अर्थ कृपा समझना चाहिए।
अथवा वैर के त्याग पूर्वक सर्व प्राणियों पर अनुग्रह, मैत्रीभाव, माध्यस्थभाव और शल्य रहित वृत्ति अनुकंपा कहलाती है
प्राणी मात्र में मैत्रीभाव रखना।
तृषातुर, क्षुधातुर अथवा दुखी को देखकर जो जीव मनमें दुःख पाता हुआ उसके प्रति करुणा से वर्तता है, उसका वह भाव अनुकंपा है।
अनुग्रह से दयार्द्र चित्तवाले के दूसरे की पीड़ा को अपनी ही मानने का जो भाव होता है, उसे अनुकंपा कहते हैं।
अनुकंपा या दया इसके तीन भेद हैं - धर्मानुकंपा, मिश्रानुकंपा और सर्वानुकंपा।
*1धर्मानुकंपा*➡️जिन्होंने असंयम का त्याग किया है। मान, अपमान, सुख, दुःख, लाभ, अलाभ, तृण, स्वर्ण इत्यादि कों में जिनकी बुद्धि रागद्वेष रहित हो गयी है, इंद्रिय और मन जिन्हों ने अपने वश किये हैं, जिन्होंने संपूर्ण परिग्रह को छोड़ कर निःसंगता धारण की, हो ऐसे संयमी मुनियों के ऊपर दया करना, उसको धर्मानुकंपा कहते हैं। यह अंतःकरण में जब उत्पन्न होती है तब विवेकी गृहस्थ यतियों को योग्य अन्नजल, निवास, औषधादिक पदार्थ देता है। अपनी शक्ति को न छिपाकर वह मुनि के उपसर्ग को दूर करता है
मुनियों का संयोग प्राप्त होने से `हम धन्य है' ऐसा समझकर मनमें आनंदित होता
यदि कोई मुनि मार्गभ्रष्ट होकर दिङ्मूढ हो गये हों तो उनको मार्ग दिखाता है। मुनियों का संयोग प्राप्त होने से `हम धन्य है' ऐसा समझकर मनमें आनंदित होता है, सभा में उनके गुणों का कीर्तन करता है। मनमें मुनियों का धर्मपिता व गुरु समझता है। उनके गुणों का चिंतन सदा मनमें करता है, ऐसे महात्माओं का फिर कब संयोग होगा ऐसा विचार करता है, उनका सहवास सदा ही होने की इच्छा करता है, दूसरों के द्वारा उनके गुणों का वर्णन सुनकर संतुष्ट होता है। इस प्रकार धर्मानुकंपा करनेवाला जीव साधु के गुणों को अनुमोदन देने वाला और उनके गुणों का अनुकरण करनेवाला होता है। आचार्य बंध के तीन प्रकार कहते हैं - अच्छे कार्य स्वयं करना, कराना और करनेवालों को अनुमति देना, इससे महान् पुण्यास्रव होता है, क्योंकि महागुणों में प्रेम धारण कर जो कृत कारित और अनुमोदन प्रवृत्ति होती है वह महापुण्य को उत्पन्न करती है।
को उत्पन्न करती है। *2मिश्रानुकंपा* -➡️महान् पातकों के मूल कारण रूप हिंसादिकों से विरक्त होकर अर्थात् अणुव्रती बनकर संतोष और वैराग्य में तत्पर रहकर जो दिग्विरति, देशविरति और अनर्थदंडत्याग इन अणुव्रतों को धारण करते हैं, जिनके सेवन से महादोष उत्पन्न होते हैं ऐसे भोगोपभोगों का त्यागकर बाकी के भोगोपभोग की वस्तुओं को जिन्हों ने प्रमाण किया है, जिनका मन पापसे भय युक्त हुआ है, पापसे डरकर विशिष्ट देश और कालकी मर्यादा करि जिन्होंने सर्व पापों का त्याग किया है अर्थात् जो सामायिक करते हैं,
पर्वों के दिनमें संपूर्ण आरंभ का त्याग कर जो उपवास करते हैं; ऐसे संयतासंयत अर्थात् गृहस्थों पर जो दया की जाती है उसको मिश्रानुकंपा कहते हैं। जो जीवों पर दया करते हैं, परंतु दया का पूर्ण स्वरूप जो नहीं जानते हैं, जो जिनसूत्रसे बाह्य हैं, जो अन्य पाखंडी गुरु की उपासना करते हैं, नम्र और कष्टदायक कायक्लेश करते हैं, इनके ऊपर कृपा करना यह भी मिश्रानुकंपा है, क्योंकि गृहस्थों की एकदेशरूपता से धर्म में प्रवृत्ति है, वे संपूर्ण चारित्र रूप धर्म का पालन नहीं कर सकते। अन्य जनों का धर्म मिथ्यात्व से युक्त है। इस वास्ते गृहस्थ धर्म और अन्य धर्म दोनों के ऊपर दया करने से मिश्रानुकंपा कहते हैं।
*3. सर्वानुकंपा*➡️ - सुदृष्टि अर्थात् सम्यग्दृष्टि जन, कुदृष्टि अर्थात् मिथ्यादृष्टि जन यह दोनों भी स्वभावतः मार्दव से युक्त होकर संपूर्ण प्राणियों के ऊपर दया करते हैं, इस दया का नाम सर्वानुकंपा है। जिनके अवयव टूट गये, जिनको जख्म हुई है, जो बाँधे गये हैं, जो स्पष्ट रूपसे लूटे जा रहे हैं, ऐसे मनुष्यों को देखकर, अपराधी अथवा निरपराधी मनुष्यों को देखकर मानो अपने को ही दुःख हो रहा हो, ऐसा मानकर उनके ऊपर दया करना यह सर्वानुकंपा है। हिरण, पक्षी, पेटसे रेंगनेवाले प्राणी, पशु इनको मांसादिक के लिए लोग मारते हैं ऐसा देखकर, अथवा आपसमें उपर्युक्त प्राणी लड़ते हैं और भक्षण करते हैं ऐसा देखकर जो दया उत्पन्न होती है, उसको सर्वानुकंपा कहते हैं। सूक्ष्म कुंथु, चींटी वगैरह प्राणी, मनुष्य, ऊँट, गधा, शरभ, हाथी, घोड़ा इत्यादिकों के द्वारा मर्दित किये जा रहे हैं, ऐसा देखकर दया करनी चाहिए। असाध्य रोग रूपी सर्प से काटे जाने से जो दुखी हुए हैं, `मैं मर रहा हूँ' `मेरा नाश हुआ' `हे जन दौड़ो' ऐसा जो दुःख से शब्द कर रहे हैं, रागों का जो अनुभव करता है उनके ऊपर दया करनी चाहिए। पुत्र, कलत्र, पत्नी वगैरह से जिनका वियोग हुआ है, जो रोग पीड़ा से शोक कर रहे हैं, अपना मस्तक वगैरह जो वेदना से पीटते हैं, कमाया हुआ धन नष्ट होनेसे जिनको शोक हुआ है, जिनके बांधव छोड़कर चले गये हैं, धैर्य, शिल्प, विद्या, व्यवसाय इत्यादिकों से रहित हैं, उनको देखकर अपने को इनका दुःख हो रहा है ऐसा मानकर उन प्राणियों को स्वस्थ करना, उनकी पीड़ा का उपशम करना, यह सर्वानुकंपा है।
और *आस्तिक्य/ आस्तिकता* ➡️
जीवादि पदार्थ हैं” ऐसी बुद्धि का होना।= सर्वज्ञ वीतराग देव द्वारा प्रणीत जीवादिक तत्त्वों में रूचि होनेको आस्तिक्य कहते हैं।
ऐसा सम्यक्त्व श्री अरिहंत देव से ही प्राप्त होता है अन्य किसी से भी नहीं मिलता है
अभय आदि भावों की तरह ही बोधि का परिणाम भी परमात्मा की कृपा से ही प्राप्त होता है। परमात्मा क्षायिक सम्यकदर्शन को प्राप्त कर चूके हैं। सम्यकदर्शन के कारणभूत तत्वमार्ग भी उन्होंने ही बतलाया है। इस कारण गुणसंपन्न परमात्मा का, परमात्मा के वचन का, आलंबन लेकर जीव बोधि को पा सकता है। इस तरह परमात्मा ही बोधि को देने वाले हैं ऐसा कहना योग्य है।
प्रश्नके उत्तर
*20:11:20*
1️⃣विपाकोदय किसे कहते हैं
🅰️जो कर्म उदय में आकर फल देकर नष्ट हो जाता है
2️⃣गृहस्थ धर्म और अन्य धर्म दोनों के ऊपर दया करने से उसे क्या कहते हैं।
🅰️मिश्र अनुकंपा
3️⃣प्रशम आदि किसके लिंग हैं।
🅰️सम्यक्त्व
4️⃣शास्त्रों की दृष्टि सेकिसका त्याग निर्वेद कहलाता है
🅰️सब अभिलाषाओं को
5️⃣सोलहकारण भावनाओं में पाँचवीं भावना कौन सी है
🅰️संवेग
6️⃣अनुकंपा शब्द का अर्थ क्या समझना चाहिए।
🅰️कृपा
7️⃣किस भाव को प्रशम कहा जाता है।
🅰️प्रकृष्ट शमन अथवा शांतभाव
8️⃣संयमी मुनियों के ऊपर दया करना, उसको क्या कहते हैं।
🅰️धर्मानुकंपा
9️⃣सर्वज्ञ वीतराग देव द्वारा प्रणीत जीवादिक तत्त्वों में रूचि होनेको क्याकहते हैं।
🅰️आस्तिक्य
1️⃣0️⃣प्राणियों को स्वस्थ करना, उनकी पीड़ा का उपशम करना, यह क्याहै
🅰️सर्वानुकंपा
*इस no पर भेजे* ⤵️
9️⃣9️⃣2️⃣6️⃣1️⃣6️⃣4️⃣0️⃣8️⃣9️⃣
*अंजुगोलछा*
*आप लिख कर टाइप करके या वॉइज मैसेज भी भेज सकते हैं*
*अघ्याय*
*21:11:20*
*महान सूत्र, *नमुऽत्थु णं* *का विशेष विवेचन*...
*बोहिदयाणं* यह पद बोलते हुए कल्याण के अद्वितीय कारणभूत सम्यग्दर्शन गुण प्राप्त कराने वाले अरिहंत परमात्मा को नजर समक्ष ला कर, उनके ये महान उपकार को याद कर के अंतर के भाव से नमस्कार कर के, परमात्मा को प्रार्थना करनी है कि,
अभय की प्राप्ति से लेकर बोधि की प्राप्ति तक 5 भाव एक दूसरे में कार्यकारण रूप है। इसलिए ही जीव को जो अभय की प्राप्ति होती है तो उत्तरोत्तर फलस्वरुप वह अंत तक बोधि तक पहुंच सकते हैं।
अनादि काल से संसार में भटकते भटकते कालक्रम से, जब जीव
*अपुनर्बंधक अवस्था*➡️, अपुनर्बंधक अर्थात् जो आत्मा भविष्य में कभी भी मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति अर्थात् 70 कोड़ाकोड़ी सागरोपम की स्थिति का बंध करनेवाली न हो ।
*अपुनर्बंधक के लक्षण :-* अपुनर्बंधक आत्मा के मुख्य तीन लक्षण बतलाए हैं-
(1) जो तीव्र भाव से पापकर्म नहीं करती है ।
(2) आत्मा के संसार-परिभ्रमण को जो अच्छा नहीं मानती है अर्थात् जिसे संसार के सुखों का तीव्र राग नहीं होता है ।
(3) जो आत्मा सर्वत्र सभी प्रकार की मर्यादाओं का औचित्य पालन करती है ।
अपुनर्बंधक अवस्था से जो नीची भूमिका पर रही हुई आत्मा अर्थात् गाढ़ मिथ्यात्व के मोहनीय के उदय वाली आत्मा चैत्यवंदन के लिए योग्य नहीं है ।
अपुनर्बंधक अवस्था*से
विषयों से जीव को अलिप्त करने की अवस्था को प्राप्त करता है, तब उसको अभयादि पांच भावों की प्राप्ति होती है। क्योंकि जीव जब तक विष जैसे विषयों से परांङ्गमुख( विमुख विपरीत, विरुद्ध। ) नही बनता तब तक उसमे अभयादि प्राप्त करने की योग्यता आती ही नही। शास्त्र में ये योग्यता को लोकोत्तर अमृत के आस्वादस्वरूप(चखना,रस लेना, ) कही है। जीव इसी अवस्था में विषयों के उपभोग से भिन्न प्रकार के अतीन्द्रिय सुख का जरा सा ही सही पर आस्वाद पा सकता है।
जैसे अमृत से जीव अप्रतिम, अनहद(असीम) संतोष को प्राप्त कर सकता है, उसी तरह यहां प्राप्त होने वाला उपशम( शांत होना) का सुख, जीव की अनादि काल की असंतुष्ट रही विषयों की तृष्णा को शांत करता है। इसी कारण शास्त्रकार ने ये अवस्था को लोकोत्तर भावअमृता के स्वादतुल्य कही है। ये जो लोकोत्तर भावअमृता के आस्वाद स्वरूप योग्यता हम में होती है, ये औदार्यादि गुणस्वरूप है।
जीव में ये अभयादिकी योग्यता अभी प्रगट हुई की नही, ये उसमें प्रवृत्त5 गुण ➡️औदार्य, दाक्षिण्य, पापजुगुप्सा, निर्मलबोध और जिनप्रियत्व गुणों से जान सकते हैं।
1. औदार्य- अनादिकालीन तुच्छ वृत्ति का, क्षुद्र वृत्ति का त्याग कर के हृदय को विशाल बनाना, ये औदार्य है।
केवल मैं और मेरा, यह वृत्ति का त्याग कर के सर्व को अपना मानना। अपनी सर्व शक्ति और सर्व सामग्री का सर्व के लिए सदुपयोग करने की भावना रखना। सर्व के प्रति औचित्यपूर्ण वर्तन करना। वडिलों के प्रति बहुमान, छोटों के प्रति वात्सल्य भाव रखना, दीन, अनाथ या दुःखग्रस्त जीवों के प्रति दया रखना। ये सर्व भाव औदार्य गुण के कारण ही होते हैं, क्योंकि उदारतागुण प्रगट होने के बाद ही अन्य के दुःख का विचार आता है। और अपने सुख को गौण कर सकते हैं। यह गुण ही रागादि को मंद कर के आध्यात्मिक आनंद भी देता है।
औदार्य अरिहंतों में प्रकृष्ट रूप में विद्यमान है। समस्त जीवों का उद्धार करने की करुणामई उदार भावना से वे भगवता को प्राप्त हुए हैं... भगवान बने हैं।
2. दाक्षिण्य- सर्व से अनुकूल रहने की भावना है, दाक्षिण्य।
ये गुण को बिकसाने से धीरता, वीरता, गंभीरता आदि गुणों की प्राप्ति होती है। यद्यपि इसके लिये ईर्ष्या आदि दोषों का त्याग अनिवार्य है।
दूसरों को अनुकूल रहने का परिणाम स्व ईच्छा के आक्रमण को दूर करना है। अपनी इच्छा को सहजता से त्याग कर के आत्मा, वास्तविक आनंद को पा सकती है।
दाक्षिण्य सिद्धों में उत्कृष्ट रूप से है।
वे जगत के समस्त जीवों को पूर्ण स्वरुप में देख रहे हैं।कितना दाक्षिण्य है उनमें...
3. पाप जूगुप्सा- पाप के प्रति तिरस्कार। अज्ञानादि दोषों के कारण कहीं भी पाप का सेवन हो गया हो, पूर्व भव में या ये भव में जो जो पाप किये हो वह सर्व पाप का अंतःकरण पूर्वक प्रायश्चित करना, ये पापजूगुप्सा है। इस पाप जूगुप्सा का परिणाम, लोकोत्तर भावामृत है। क्योंकि ये पापवृत्ति से आत्मा को दूर रखती है। परिणाम स्वरूप, पापवृत्ति से प्राप्त कर्मों का नाश होता है और आत्मा लोकोत्तर कोटि के गुणों का आनंद ले सकती है।
आचार्य भगवंतो में भारी पाप जुगुप्सा विद्यमान है। इसी कारण वे आचारों का निर्दोष पालन करके और उपदेश देकर जगत को पाप से बचाते हैं।
4. निर्मलबोध- स्वच्छबोध।
जो बोध दुखकारक विषयों से दूर रख कर सुखकारक शास्त्र की ओर प्रवृत्ति करा सके, वो निर्मल बोध है। बोध निर्मल होने से शास्त्र को जानने की जिज्ञासा जगती है। शास्त्रज्ञ के निकट जाने का मन होता है, शास्त्र श्रवण कर के उस पर गहरा चिंतन हो, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्व का ज्ञान हो, तो उसके परिणाम से मिथ्यात्व आदि कर्म मंद पड़ते हैं। क्रोध आदि कषाय शांत होते हैं। सम्यक्त्व आदि गुण प्रगटते हैं और इस तरह ही निर्मल बोध वाली आत्मा को लोकोत्तर आनंद मिलता है।
उपाध्याय भगवंतों में उत्कृष्ट निर्मल बोध विद्यमान होता है। वे स्वयं आगम शास्त्रों के ज्ञाता होते हैं तथा अन्य मनुष्य को भी अपने समान बनाते हैं।
5. जनप्रियत्व- लोक में प्रिय होना।
लोकचाहना पाना वो जनप्रियत्व है।
परन्तु ये जनप्रियत्व निर्दोष होना चाहिए। उसमे आशंसादि नहीं होने चाहिये, अर्थात, स्वार्थ वृत्ति नहीं होनी चाहिए।
सज्जन मनुष्य में साधु सदैव प्रिय होते हैं। साधुओं को स्वाभाविक तौर पर ही लोकप्रियता हासिल होती है।
पंच परम परमेष्ठी जी,
जग में आप महान..
ध्यान धरूं मैं आपका,
बारम्बार प्रणाम..
*प्रश्न के उत्तर*
*21 :11:20*
1️⃣आस्वाद स्वरूप योग्यता हम में होती है, येकौन सा गुणस्वरूप है।
🅰️औदार्यादि गुणस्वरूप है।
2️⃣क्या सिद्धों में उत्कृष्ट रूप से है।
🅰️दाक्षिण्य
3️⃣परांङ्गमुख का अर्थ क्या है
🅰️विमुख विपरीत, विरुद्ध।
4️⃣आचार्य भगवंतो में भारी क्याविद्यमान है।
🅰️पाप जुगुप्सा
5️⃣अभय की प्राप्ति से लेकर बोधि की प्राप्ति तक कितने भाव है
🅰️5 भाव
6️⃣70 कोड़ाकोड़ी सागरोपम की स्थिति का बंध करनेवाली
कौन सी अवस्था हैं ।
🅰️अपुनर्बंधक अवस्था
7️⃣उपाध्याय भगवंतों में क्या बोध विद्यमान होता है
🅰️उत्कृष्ट निर्मलबोध
9️⃣चैत्यवंदन के लिए कौनयोग्य नहीं है
🅰️गाढ़ मिथ्यात्व के मोहनीय के उदय वाली आत्मा
1️⃣0️⃣क्याअरिहंतों में प्रकृष्ट रूप में विद्यमान है
🅰️औदार्य
*23:11:20*
*अध्याय*
गंताक से आगे
हे क्षायिक ( कर्म का सम्पूर्ण क्षय)सम्यक्त्व के स्वामी!!!!आप अनादि मिथ्यात्व का संपूर्ण नाश करा कर हमको भी क्षायिकभाव का सम्यक दर्शन प्राप्त करा दो।
मात्र आत्मकल्याण की भावना से किया हुआ औचित्यपूर्ण वर्तन(गमन) अनेक की प्रीति का कारण बनता है। ये गुण वाले आत्मा के अनुष्ठान, उसकी प्रत्येक क्रिया, अनेक जीवों को धर्म की ओर प्रेरित करती है। धर्मबीज का आधान( ग्रहण करना,रखना ,स्थापित करना) करवाती है। और स्वयं को भी धर्मभावना की वृद्धि करवा कर मोक्ष तक पहुँचाती है।
अभय आदि भावों की प्राप्ति के योग्यता रूप जो यह औदार्य(क्षुद्र वृति का त्याग ,उदारता) आदि गुण प्रगट होते हैं,
वह संसार की निर्गुणता के भाव पूर्वक के होते हैं।
*निर्गुणता का अर्थ हैं* ➡️ निराकार
बहुत से लोग परमात्मा को सगुण रूप में पूजते है और बहुत से निर्गुण रूप में । सगुण रूप में पूजने का सीधा सीधा मतलब होता है कि हम परमात्मा को एक आकर में देखते है ।जिसे मूर्तिवत रूप दे दिया गया उन्हें, जिन्हें हम पूजते है। ये है सगुण पूजा -एक रूप की, आकार की, ये है सगुण साकार
यदि हम परमात्मा को एक अस्तित्व के तौर पर सर्वत्र विद्यमान सत्ता के रूप में देखते है तभी हम अपने अंदर सोच लाते है निराकार की । एक ऐसी परम सत्ता जिसका कोई ओर-छोर नहीं, एक ऐसी सत्ता जो सर्वत्र है ।
सगुण रूप की अपेक्षा निर्गुण रूप दुर्लभ है, सगुण भगवान सुगम है-इस लिए किसी कवि ने कहा है
*सगुण रूप सुलभ अति*,
*निर्गुण जानि नहीं कोई*,
*सुगम अगम(सर्वत्र) नाना चरित*,
*सुनि-सुनि मन भ्रम होई*
निर्गुणता भाव सहित होतीहैं। इस कारण ही यह औदार्यादि गुण धीरे-धीरे वैषयिक सुख की आसक्ति को घटा कर वैराग्य आदि गुणों को प्रगटा कर विशिष्ट प्रकार के चारित्र आदि गुणों को प्राप्त करवा के आत्मिक आनंद का अनुभव करवाते हैं।
बोहिदयाणं, यह पद बोलते हुए कल्याण के अद्वितीय कारणभूत सम्यग्दर्शन गुण प्राप्त कराने वाले अरिहंत परमात्मा को नजर समक्ष ला कर, उनके ये महान उपकार को याद कर के अंतर के भाव से नमस्कार कर के, परमात्मा को प्रार्थना करनी है कि,
*घम्मदयाणं* धर्म शब्द से यहां
चारित्र धर्म , अरिहंत तात्विक धर्म के दाता है , उपदेशक हैं।
आत्मा को कर्मों का रोग लगा हुआ है, आत्मा का पूर्ण आरोग्य मोक्ष मेंं है। उसे पाने के लिए विरक्ति धर्म के पालन रूपी दवा लेनी पड़ती है। जितने अंश में विरति धर्म का पालन किया जाएगा उतना ही कर्म के रोगों से मुक्त होते जाएंगे।
जिस प्रकार कमल कीचड़ में उगता है और जल में बढ़ता है, फिर भी कीचड़ व जल से अलिप्त रहता है उसी प्रकार मुक्ति का अभिलाषी श्रावक संसार में होते हुए भी संसार से अलिप्त रहता है। उन्होंने कहा कि श्रावक अर्थात अविरति के पाप से डरने वाला।
जीव संसार में पाप क्रियाएं करता है, फिर भी उसे अल्प पाप कर्म का बंध होता है क्योंकि वह तीव्र भाव से आसक्तिपूर्वक पाप नहीं करता।
उन्होंने कहा कि जैसे क्षय रोगी रोग से मुक्त होने के लिए चिकित्सक के पास जाता है और निर्धारित अवधि में दवा का सेवन कर रोग को कम करता जाता है,उसी प्रकार जितना धर्म करेंगे उतना ही कर्म के रोग से मुक्त होते जाएंगे। आचार्य ने कहा कि जिन प्रवृत्तियों से आत्मा कर्मबंधन करती है उन प्रवृत्तियों का त्याग करना चाहिए।
प्रभु ने विरति धर्म के 2 भेद बताये है
1 देशवीरति धर्म2 सर्वविरति धर्म
1️⃣ *देशविरति धर्म*➡️देश का अर्थ है - आंशिक त्याग।
विरति अर्थात सभी पापों को छोडऩे योग्य पाते हुए आंशिक त्याग। देव व नारक अविरति के पाप मेंं डूबे हुए हैं। देश विरति की आराधना मनुष्य व तिरयंच कर सकते हैं
2️⃣ *सर्वविरति धर्म*➡️
. सर्व विरति अर्थात मन, वचन व काया से पापों का सर्वथा त्याग। सावद्य प्रवृत्ति का सर्वथा त्याग करना है। अर्थात सर्वविरतिधर आत्मा, मन, वचन व काया से किसी प्रकार की सावद्य वृत्ति स्वयं करती है, न दूसरे करने की प्रेरणा देती है और न ही किसी के किए गए पाप का अनुमोदन करती है।
गृहस्थ जीवन का त्याग करने वाले निग्रन्थ मुनि सर्वविरति धर्म का पालन करते हैं।
श्रेष्ठ कोटि का चारित्रधर्म, यह आत्मा कि सर्वथा मोह रहित अवस्था स्वरूप है। सर्वथा मोह रहित आत्मा का परिणाम निष्पाप प्रवृत्ति से प्राप्त होता है और निष्पाप प्रवृत्ति परमात्मा द्वारा दर्शाए समिति-गुप्ति आदिरूप क्रियाकलाप से प्राप्त होती है। यह क्रियाकलाप के लिए साधु वेश अत्यंत आवश्यक है। इसलिए ही साधु वेश के परिधान पूर्वक समिति-गुप्ती के पालन द्वारा सर्वथा मोहरहित होने के लिए अंतरंग प्रयत्न वही श्रमणधर्म या सर्वचारित्र है।
गृहस्थ जीवन का त्याग करने वाले निग्रन्थ मुनि सर्वविरति धर्म का पालन करते हैं।
गृहस्थ जितना त्याग करता है उसकी उतनी ही विरति होती है, शेष अविरति होती है। जो कुछ भी त्याग नहीं करता, वह अविरत होता है।
परंतु जो संयम स्वीकार करने में समर्थ न हो उसे कम से कम श्रावक जीवन के अलंकार स्वरूप समयकत्व सहित १२ व्रतों को स्वीकार जरूर करना चाहिए। इनका पालन करने से आत्मा इसी भव या आगामी भव में चरित्र पालन के लिए समर्थ बनाती है।
प्राणी मात्र का लक्ष्य यह होना चाहिए कि वह सर्व-विरत बने और मोक्ष की राह में अग्रसर हो।
*कल जानेंगे श्रावक के 12 व्रत*
*प्रश्न के उत्तर*
23:11:20
1️⃣ निर्गुणता का अर्थ क्या हैं*
🅰️निराकार
2️⃣निग्रन्थ मुनि कौन से धर्म का पालन करते हैं।
🅰️सर्वविरति
3️⃣क्या अनेक की प्रीति का कारण बनता है
🅰️औचित्यपूर्ण वर्तन(गमन)
4️⃣आत्मा को किसका रोग लगा हुआ है
🅰️कर्मों का
5️⃣सगुण रूप की अपेक्षा कौन सा रूप दुर्लभ है,
🅰️निर्गुण रूप दुर्लभ है,
6️⃣अरिहंत कौन से धर्म के दाता है , उपदेशक हैं।
🅰️तात्विक धर्म
7️⃣देव व नारक कौन से पाप मेंं डूबे हुए हैं।
🅰️अविरति
8️⃣श्रावक जीवनके कितने व्रत है
🅰️12
9️⃣देश का अर्थ क्या है -
🅰️आंशिक त्याग।
1️⃣0️⃣जिसे मूर्तिवत रूप दे दिया गया उन्हें, जिन्हें हम पूजते है।
वो पूजा का कौन सा रूप है
🅰️ सगुण पूजा -एक रूप की,
24 : 11:20
*आज हम लोग श्रावक के 12 व्रत के बारे में जानते है* ।
व्रतों का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है| व्रतों से ही जीवन की सार्थकता है| व्रत विहीन जीवन ब्रेक रहित गाड़ी की तरह है| प्रत्येक व्यक्ति को किसी ना किसी रूप में व्रतों का पालन करना चाहिए|
प्रायः व्रत-संयम की चर्चा आते ही लोग इसे खान-पान की शुद्धि तक सीमित मानकर इसे एक जटिल प्रक्रिया मानते है जबकि अणुव्रतों का स्वरुप अत्यंत व्यापक है| एक दिन की हिंसा त्यागने वाले को यमपाल चांडाल को ही शास्त्रों में अणुव्रती कहा गया है|
श्रावक के बारह व्रतों में पाँच अणुव्रत, तीन गुण व्रत और4 शिक्षाव्रत कहलाते हैं
1 *अणुव्रत* ➡️अणुव्रत का अर्थ है 'लघुव्रत'। जैन धर्म के अनुसार श्रावक अणुव्रतों का पालन करते हैं। महाव्रत साधुओं के लिए बनाए जाते हैं। यही अणुव्रत और महाव्रत में अंतर है, अन्यथा दोनों समान हैं।
अणुव्रत इसलिए कहे जाते हैं कि साधुओं के महाव्रतों की अपेक्षा वे लघु होते हैं। महाव्रतों में सर्वत्याग की अपेक्षा रखते हुए सूक्ष्मता के साथ व्रतों का पालन होता है, जबकि अणुव्रतों का स्थूलता से पालन किया जाता है। अणुव्रत पाँच होते हैं-
*पांच अणुव्रत*⤵️
1️⃣ *अहिंसा अणुव्रत* -➡️ हिंसा के स्थूल त्याग को अहिंसाणुव्रत कहते हैं। यह श्रावक संकल्प पूर्वक मन, वचन, काय से किसी भी इस प्राणी का घात अपने मनोरंजन एवं स्वार्थपूर्ति के लिए नहीं करता है तथा शेष तीन प्रकार की हिंसा को अपने विवेक पूर्वक कम करता है। आगम कथित मर्यादा के भीतर की ही खाद्य वस्तुओं का, पानी आदि का प्रयोग करता है। सभी प्राणियों को अपने समान मानकर ही व्यवहार करता है।
*अहिंसा अणुव्रत के पाँच अतिचार* -
1️⃣ *वध* – किसी को मारना, पीटना, चाबुक मारना मर्म स्थल पर प्रहार करना ,श्रावक के लिए निषेध है
2️⃣. *बंधन* – पालतू पशुओं और आश्रित कर्मियों को जरुरत से ज्यादा नियंत्रण में रखना, पशुपालन ,पक्षी पालन
भी श्रावक के लिए योग्य नहीं है।घायल पशु ,पक्षी को बंधन में रखा हो तो ढीक है ,पर वे स्वस्थ हो जाए तो छोड़ देना चाहिए।
३. *छविछेदन* – दुर्भावना पूर्वक नाक-कान आदि छेदना, नकेल लगाना, नाथ देना आदि|
श्रावक के लिए निषेध है
४. *अतिभारारोपण* –घोड़े भैंस, मजदूर पर वृद्ध कमजोर व्यक्ति पर किसी पर अधिक भार लादना|श्रावक के लिए निषेध है
५. *अन्नपान निरोध(भक्तपान निरोध)* – पालतू पशुओं और नौकर-चाकरों को समय पर भोजन नहीं देना, ठीक भोजन नहीं देना|
2️⃣ *सत्याणुव्रत(स्थूल मृषा वाद)*➡️ - झूठ के स्थूल त्याग को सत्याणुव्रत कहते हैं। जिस झूठ से समाज में प्रतिष्ठा न रहे, प्रमाणिकता खण्डित होती हो, लोगों में अविश्वास हो, राजदण्ड का भागी बनना पड़े, इस प्रकार के झूठ को स्थूल झूठ कहते हैं। सत्याणुव्रती ऐसा सत्य भी नहीं बोलता जिससे किसी पर आपत्ति आ जावे।
ये 5स्थूल झुठ है
*१. कन्या लीक(कन्ना लीए)*– शादी संबंध में झुठ बोलना , अंधी कानी बहरी होने पर छुपाना कन्या और वर दोनों
के लिए ही सत्य छुपाना ग़लत है
२. *गवालीक*– चतुष्पदो के बारे में व्यापार में झुठ बोलना
श्रावक के लिए निषेध है, चूँकि
गौ श्रेष्ठ है इसलिए गवालीक कहा है
३. *भूमयलीक* ➡️जमीन संबंधी झुठ बोलना श्रावक के लिए निषेध है
४. *थापण मोसा*– दूसरों की धरोहर हड़प लेना| अमानत में खयानत करना
५. *कूटसाक्षी*➡️ झुठी गवाही देना श्रावक के लिए निषेद्ध है
अतिचार –
१. *परिवाद(सहसब्भक्खाण)*– किसी के साथ गली-गलौच करना।झूठा कलंक लगाना
सज्जन व्यक्ति के लिए ईर्ष्या भाव रखना, उनके लिए विघ्न
खड़ा करना
२. *रहस्याभ्याख्यान*– दुसरो कि गुप्त बातों को उजागर कर देना| चुगलखोरी करना
3, *स्वदारमन्तेय* अपनी स्त्री/पुरूष के मर्म को प्रकाशित करना
4. *मृषा उपदेश* – झूठा उपदेश देना ,यज्ञ -हवन फूल तोड़ना स्नान करना आदि हिंसक का उपदेश देना,विकथा
करना
४. *कूटलेख करना* – नकली दस्तावेज बनाना, झूठी गवाही देना, जाली मुहर लगाना (यथासंभव बचें)
असत्य भाषण के मुख्य14 कारण है
1 क्रोध क्रोध में उचित अनुचित
का भान ही नहीं रहता
2 अभिमान - घमण्ड में जैसे व्यक्ति बोल देता हैं मेरे समान
इस संसार मे कोई नहीं ना भूतो न भविष्यति
3कपट -मायाचार या दगा बाजी के लिए
4 लोभ-ब्राह्मण व्यापारी अपने लाभ के कारण
5 राग 6 द्वेष - दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जैसे बच्चे को खिलाते वक़्त राग के
कारण झूठ बोलना, ओर द्वेष के वश शत्रु पर झूठा कलंक लगाना
7 हास्य -गप्प मारते हंसी ढिढोली करते
8 भय - डर के कारण राजा स्वामी या अधिकारी के सामने
9 लज्जा-लाज के कारण ,या कुकर्म छिपाने के कारण
10 क्रीडा-खेल खेल में स्त्री आदि से
11 हर्ष-उत्सव के प्रसंगों मे
12 शोक -वियोग आदि के कारण
13 दाक्षिण्य(अपनी चतुराई बताने के लिए)
14, बहुभाषण -आवश्यकता से अधिक बोलने के कारण
बाकि कल
*24;11:20*
*प्रश्न के उत्तर*
1️⃣गुण व्रत कितने है
🅰️तीन
2️⃣कूटसाक्षी क्या है
🅰️झुठी गवाही देना
3️⃣अणुव्रत का क्या अर्थ है
🅰️अणुव्रत का अर्थ है 'लघुव्रत'
4️⃣छविछेदनअणु व्रत क्या है
🅰️दुर्भावना पूर्वक नाक-कान आदि छेदना, नकेल लगाना,
5️⃣व्रत विहीन जीवन किस की तरह है|
🅰️ब्रेक रहित गाड़ी
6️⃣यज्ञ -हवन फूल तोड़ना स्नान करना आदि का __-उपदेश देना
🅰️हिंसक
7️⃣दाक्षिण्य का अर्थ
🅰️अपनी चतुराई बताने के लिए)
8️⃣असत्य भाषण के मुख्य कितने कारण है
🅰️मुख्य14 कारण है
9️⃣ मेरे समान इस संसार मे कोई नहीं ना भूतो न भविष्यति
ये असत्य का कौन सा कारण है।
🅰️अभिमान
1️⃣0️⃣ - कौन दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जैसे
🅰️ राग ,द्वेष
*25:11:20*
*अध्याय*
*असत्य का फल*
झूठ बोलने वाले के सब सद्गुण लुप्त हो जाते हैं झूठे आदमी को प्रतीति नहीं रहती वह चाहे सत्य ही बोल रहा हो फिर भी कोई उस पर विश्वास नहीं करता। झूठे के मंत्र तंत्र यंत्र विद्या औषध आदि फलित नहीं होते झूठे को कभी भी अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है। झूठे को लोग गप्पी लबाड लुच्चा बदमाश धूर्त आदि को नामों से संबोधन करते हैं , इत्यादि अनेक दुर्गुणों और अनर्थों का भागी इसी लोक में बनना पड़ता है।
परलोक में भी उसकी दुर्दशा होती है।
झूठा मरकर मूक बोबडा कटुवासी तोतला गूंगा दुर्गन्धित मुख वाला और अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त होता है वह प्राय एकेंद्रीय जाति में उत्पन्न होता है नर्क में जाए तो वहां पर परमा धामीदेव उसके मुख में कांटे ठूंसते हैं कटारी घुसेडते हैं जीभ खींचकर निकाल देते हैं इत्यादि झूठ के दुखप्रद फल समझकर सुज्ञ जनों को झूठ बोलने का सर्वथा परित्याग कर देना चाहिए।
*सत्य का फल*
सत्य में ऐसी शक्ति है कि शत्रु भी सत्यवान के वशीभूत हो जाते हैं।
सत्य का सेवक इसी लोक में देवेंद्रो और नरेंद्र ओं का पूज्य बन जाता है, और भविष्य में इष्ट ,मिष्ट आदेय, वचन वाला और स्वर्ग तथा मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
3️⃣ *अचौर्य अणुव्रत(अदतादान वीरमण)* - स्थूल चोरी का त्याग करने वाला अचौर्य अणुव्रती श्रावक कहलाता है। अचौर्याणुव्रती जल और मिट्टी के सिवा बिना अनुमति के किसी के भी स्वामित्व की वस्तु का उपयोग नहीं करता। लूटना, डाका-डालना, जेब काटना, किसी की धन-सम्पति, जमीन हड़प लेना, गड़ा धन निकाल लेना स्थूल चोरी के उदाहरण हैं। यह श्रावक चोरों की सहायता नहीं करता, चोरी का माल नहीं खरीदता, राजकीय नियमों का उल्लंघन नहीं करता कालाबाजारी एवं मिलावट नहीं करता है।
पाँच बड़ी चोरी
1. *सेंध लगाना* – चोरी की योजना बनाना, चोरों को प्रोत्साहित करना, गुप्त रूप से
रखे धन के पास किसी तरह पँहुचना । ये सब श्रावक के लिए त्याज्य हैं।
2 *गठड़ी छोड़कर*- क़ोई आपको चीज़ सम्भालने के लिए दे , उसमें से चीज निकाल लेना , कोई घर चाबी देकर जाए तो घर से चीज चुराना।
ये सब श्रावक के लिए त्याज्य हैं।
3. *बाट पाड़ कर(रहजनी,)* – गिरोह बना रास्ते मे लोगों को
लूटना ,डाकु ,लुटेरों का काम करना चाकू छूरी से डरा कर लूटना इत्यादि ।ये सब श्रावक के लिए त्याज्य हैं।
4, *ताले की कुंजी लगाकर*
ताले की कुंजी बनवा कर किसी के बंद घर दुकान से सामान की चोरी करना।ये सब श्रावक के लिए त्याज्य हैं।
5 *पड़ी हुईवस्तु* के मालिक को जानते हुए भी उठा कर रख
लेना कोइ भूल से वस्तु रख दिया हो उसे उठा लेना।
।ये सब श्रावक के लिए त्याज्य हैं।
व्रत के 5 अतिचार
1️⃣ *तेनाहडे(स्तेनाह्रत)*- अर्थात चोर द्वारा चुराई हुई वस्तु को ग्रहण करना ।
पहला अतिचार है कितने ही लोग चोरी के कर्म को त्याग कर देते हैं किंतु बहुमूल्य का माल अल्प मूल्य में मिलता देख कर उसे चोरी का माल समझते हैं पर फिर भी सोचते हैं कि मैंने तो चोरी करने का त्याग किया है पराया माल कीमत देकर ले लेने में क्या हर्ज है और इस प्रकार अपने मन को तसल्ली देकर उस माल को खरीद लेते हैं, मन ही मन बहुत प्रसन्न होते हैं कि आज अच्छी कमाई हुई उस समय उन्हें यह विचार नहीं आता है क्या अगर यह बात प्रकट हो जाएगी तो 2 गुना चौगुना का द्रव्य खर्च करने पर भी इज्जत की रक्षा करना कठिन हो जाएगा।
विवेकी श्रावक लालच में ना फंसते हुए हुए चोरी का माल लेना चोरी के करने के समान समझ कर उसका परित्याग कर देते हैं
2️⃣ *तस्कर प्रयोग*- अर्थात चोर को चोरी करने में सहायता देना यह भी चोरी का अतिचार है ,कितनेक लोभी चोरी का माल लेने में अधिक लाभ समझकर उसे प्राप्त करने के लिए चोर को चोरी करने का उपाय बतलाते हैं। उसे खानपान, शस्त्र, मकान आदि आवश्यक साधन देते हैं चोर से कहते हैं डरो मत बेधड़क होकर चोरी करो हम तुम्हारा सब माल ले लेंगे। इस तरह वे राज दण्ड के पात्र होते हैं सुश्रावक ऐसे कृतियों को अनुचित समझकर उनका परित्याग कर देते हैं
3️⃣. *विरुद्धरज्जाइकम्मे* –अर्थात राज विरुद्ध कार्य करना राष्ट्रीय के कल्याण के लिए या प्रजा के सुख के लिए जो नियम बनते हैं उसका पालन करना प्रजा का कर्त्तव्य हैं ,अगर कोई ऐसे नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे तीसरे व्रत का अतिचार लगता है उदाहरणार्थ- राजा ने प्रजा का अहित समझकर मदिरा आदि वस्तुओं का व्यापार करने की मनाही कर दी। अथवा किसी वस्तु को आवश्यकता से अधिक संग्रह करने का निषेध कर दिया तथापि लोग लालच से प्रेरित होकर ऐसा व्यवहार करना या संग्रह करना चोरीका अतिचार कहलाएगा, टेक्स न भरना ,रिश्वत देना इत्यादि
सुश्रावक ऐसे कृतियों को अनुचित समझकर उनका परित्याग कर देते हैं
4️⃣ *कूटतुलामानोन्मान* –अर्थात नाप-तौल में कमती-बढ़ती करना, डंडी मारना सुश्रावक ऐसे कृतियों को अनुचित समझकर उनका परित्याग कर देते हैं
5️⃣ *तत्प्रतिरूपकव्यवहार* अर्थात सरीखी वस्तु मिलाकर बेचना
से भीअचौर्य व्रत में अतिचार लगता है ,लालची मनुष्य जिस रूप रंग की बहुमूल्य वस्तु होती है उसी रंग रूप के अल्प मूल्य की वस्तु उसमें मिलाकर बहुमूल्य के भाव बेचते हैं, हीरा पन्ना माणक मोती आदि में भी ऐसी मिलावट होती है इनमें की भी मिलावट को कुशल जौहरी के सिवाय और कौन पहचान सकते हैं। इसी प्रकार गिरवी रखने वाले रखते हुए कुछ हैं और उन्हें वापस लौटाते कुछ हैं कई और व्यापारी भीवनस्पति का तेल मूंगफली आदि का तेल शक्कर में आटा दूध पानी अच्छे धान्य में खराब धान्य। आदि सरीखी वस्तु को मिला देते हैं कितने लोग सुपारी आदि पर रंग चढ़ा कर नए माल में मिलाकर नहीं भाव में बेच देते हैं कोई कोई नमूना अच्छा दिखला कर खराब चीज दे देते हैं इसी प्रकार की चोरी की वस्तु का रूप बदलकर उसे भांग तोड़कर गला कर दूसरा रंग चढ़ा कर बेच देते हैं औरकई पशुओं को अंग उपांग खेदन कर के रूप लट् कर बेच देते हैं यह सब बड़ी चोरी कहलाती है धर्मात्मा को को यह सब चोरी का कर्म करना उचित नहीं है अतः श्रावक इनका त्याग करते हैं
कल आगे
*प्रश्न के उत्तर*
*25:11:20*
1️⃣स्थूल चोरी का त्याग करने वाला क्या कहलाता है
🅰️अचौर्य अणुव्रती श्रावक कहलाता है।
2️⃣तत्प्रतिरूपकव्यवहार* अर्थात क्या ?
🅰️सरीखी वस्तु मिलाकर बेचना
3️⃣चोर को चोरी करने का उपाय बतलाते हैं वो कौन साअतिचार है
🅰️तस्कर प्रयोग
4️⃣कौन से श्रावक लालच में ना फंसते हुए हुए चोरी का माल लेना चोरी के करने के समान समझ कर उसका परित्याग कर देते हैं
🅰️विवेकी
5️⃣,किसके वाले के सब सद्गुण लुप्त हो जाते हैं
🅰️झूठ बोलने
6️⃣गुप्त रूप से रखे धन के पास किसी तरह पँहुचना ।कौन सी चोरी है
🅰️सेंध लगाना
7️⃣झूठा मरकर क्या बनता है
🅰️मूक बोबडा कटुवासी तोतला गूंगा दुर्गन्धित मुख वाला और अनेक प्रकार के रोगों से ग्रस्त होता है
8️⃣कूटतुलामानोन्मान* –अर्थात क्या?
🅰️नाप-तौल में कमती-बढ़ती करना, डंडी मार
9️⃣किसका पालन करना प्रजा का कर्त्तव्य हैं ,
🅰️राष्ट्रीय के कल्याण के लिए या प्रजा के सुख के लिए जो नियम बनते हैं।
1️⃣0️⃣ तीसरी बड़ी चोरी क्या है
🅰️बाट पाड़ कर(रहजनी,)
*26:11:20*
*अध्याय*
4️⃣ *ब्रह्मचर्य अणुव्रत* - इसका दूसरा नाम स्वस्त्री संतोष व्रत भी है। अपनी विवाहिता स्त्री के अतिरिक्त शेष स्त्रियों के प्रति माँ बहन और बेटी का व्यवहार करना ब्रह्मचर्य अणुव्रत है। ब्रह्मचर्याणुव्रती अपने परिवार जन को छोड़कर अन्य जनों के विवाहव्यवसाय नहीं करता और न कराता है। काम सम्बन्धी कुचेष्टाओं को नहीं करता, चारित्रहीन स्त्री-पुरुषों की संगति नहीं करता।
अतिचार –
१. *इतरि परिग्गहिया गमणे* – पर स्त्री का त्याग करें ।
वेश्याओं का भी त्याग करें यह ना सोचें हैं कि वह किसी की स्त्रीनहीं है तो भोग कर सकते हैं
२. *अपरिग्गहिया गमणे**–
सगाई होने के बाद उसके साथ गमन न करें , न ही कुंवारी कन्या के साथ गमन करें ये सोच कर की मैं ने तो परस्त्री
का त्याग किया है , ये तो कुंवारी है ,किसकी स्त्री नहीं बनी
गलत चाल वाले विवाहित स्त्री/पुरुषों के साथ उठना-बैठना ये श्रावक को
नहीं करना चाहिए।
३. *अनंगक्रीडा* – अप्राकृतिक यौनाचार नही करना चाहिए।
*परविवाहकरण* ➡️अपने पारिवारिक दायित्व से बहार के लोगों के शादी विवाह करने में रूचि नहीं लेना।
*5,तीव्रकामभोगाभिलाषा*
*(विपुलतृषा)* – काम की तीव्र लालसा रखना ।विटत्व* (अर्थात कामुक, वैश्या रखने वाला।)
भोड़ापन करना, फूहड़पन अपनाना, भांडगिरी करना
ब्रह्मचर्य रूप से श्रेष्ठ व्रत का पालन करने वाले की देवादिक भी सेवा करते हैं। उसकी कीर्ति विश्वव्यापीनी हो जाती है उसकी बुद्धि बल रूप तेज की अधिक वृद्धि होती है। दुष्टों द्वारा किए जाने वाले मंत्र तंत्र मूठ , कामण, आदि का उस पर किंचित भी असर नहीं होता व्यन्तर आदि देव उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते इसके लिए अग्नि भी पानी बन जाती है समुंदर स्थल के समान हो जाता है सिंह बकरी सरीखा बन जाता है।नाग फूल माला के समान और वन ग्राम के समान हो जाता है विष अमृत के रूप में परिणित हो जाता तात्पर्य है कि ब्रह्मचर्य पुरुष के लिए अनिष्ट पदार्थ भी इष्ट रूप धारण कर लेते हैं। प्रतिदिन करोड़ों मोहरों का दान करने की अपेक्षा भी एक दिन ब्रह्मचर्य पालन करने का फल अधिक होता है।
इस प्रकार ब्रह्मचारी इस लोक में भी एक प्रकार के सुखों को भोक्ता है और भविष्य में भी स्वर्ग में अधिक परमसुख उसे प्राप्त होता है।
5️⃣ *परिग्रह परिमाण व्रत*➡️ - परिग्रह के मुख्य दो कारण है
1 *तृष्णा* दुःख का परम कारण है।तृष्णाके लिए कहा है बिना पाल का तालाब, जितना भी पानी आजाये वह भरता ही नहीं
और दूसरा *लोभ* है।
ज्यों ज्यों लाभ बढ़ता है त्यों त्यों
लोभ बढ़ता है
तृष्णाऔरतीव्र लोभ को मिटाने के लिए परिग्रह की सीमा निर्धारित करना परिग्रह परिणाम व्रत है। धन धान्यादि बाह्य पदार्थों के प्रति ममत्व, मूच्छा या आशक्ति को परिग्रह कहते हैं, धन धान्यादि बाह्य पदार्थों की सीमा बनाकर उसमें संतोष धारण करना परिग्रह परिमाणुव्रत है।
श्रावक 9 प्रकार के परिमाण करता है
1 *खेत यथा परिमाण*- खुली भूमि की इच्छा परिमाण करें वर्षा के पानी से जहां धान्यकी उत्पत्ति होती है वह खेत कहलाता है। जहां घास उत्पन्न होती है उसे वन कहते हैं इस सब खुली भूमि का त्याग करें तो अच्छा है सर्वथा त्याग ना कर सके तो उक्त खेत आदि की लंबाई चौड़ाई और संख्या का परिमाण करके अधिक रखने का प्रत्याख्यान करें उससे अधिक ना रखें बल्कि कम करता जाए।
2 *वत्थु यथा परिमाण*- अर्थात ग्रहण की भूमि का इच्छित परिमाण करें ।
1 मंजिल वाला मकान करके लाता है दो या दो से अधिक मंजिल वाला मकान हवेलिया महल के लाता है जो शिखर बंद हो वह प्रासाद कहलाता है व्यापार करने की जगह को दुकान कहते हैं माल किराना आदि रखने वाली जगह को गोदाम कहते है बगीचे में घर हो उसे बंगला कहते है इन सब में जिस जिस की जितनी आवश्यकता हो उतने की लंबाई चौड़ाई की मर्यादा करके उससे अधिक रखने का प्रत्याख्यानकरें रहने को मकान पर्याप्त हो तो नया बनवाने का आरंभ ना करें। और जरूरी हो बना बनाया मकान मिल सके तो उसे ले।
यथासंभव आरंभ से बचना चाहिए फिर भी काम ना चलता हो तो मकान की संख्या तथा लंबाई चौड़ाई की मर्यादा करके अधिक मकान बनवाने का तथा अपनी सीमा करे और उससे अधिक का त्याग करें।
3,4 *हिरण्य -सुवर्णयथा* *परिमाण* -
हिरण्य अर्थात चाँदी सुवर्ण अर्थात सोना, इनका परिमाण करें जहां तक पुराने आभूषणों से काम चलता हो नए आभूषण ना बनवाएं क्योंकि अग्नि का आरंभ जहां होता है वहां 6 कायो कि हिंसा होती है बने बनाए आभूषण मिलते हो तो आरंभ करके वृथा कर्म बंध करना उचित नहीं है कदाचित इसका इस प्रकार काम ना चले तो नए जेवर बनवाने के नग तोलऔर कीमत का परिमाण करें तथा अपने सेसीमा रखने का भी परिमाण करें परिमाण से अधिक का त्याग करें।
बाकि कल
*प्रश्न के उत्तर*
*26:11:20*
1️⃣,कहाँ 6 कायो कि हिंसा होती है
🅰️अग्नि का आरंभ जहां होता है
2️⃣हिरण्य अर्थात क्या
🅰️चाँदी
3️⃣शिखर बंद हो वह क्या कहलाता है
🅰️प्रासाद कहलाता है
4️⃣तीव्रकामभोगाभिलाषा को क्या कहते है
🅰️विपुलतृषा
5️⃣तृष्णाऔरतीव्र लोभ को मिटाने के लिए परिग्रह की सीमा निर्धारित करना क्या कहलाता है
🅰️परिग्रह व्रत है
6️⃣बिना पाल का तालाब,किसे कहा है
🅰️तृष्णा
7️⃣विवाहिता स्त्री के अतिरिक्त शेष स्त्रियों के प्रति माँ बहन और बेटी का व्यवहार करना कौन सा अणुव्रत है
🅰️ब्रह्मचर्य अणुव्रत है।
8️⃣परिग्रह परिमाणुव्रत मेंश्रावक कितनेप्रकार के परिमाण करता है
🅰️ 9 प्रकार
9️⃣वत्थु यथा परिमाण अर्थात क्या
🅰️अर्थात ग्रहण की भूमि का इच्छित परिमाण करें ।
1️⃣0️⃣जहां घास उत्पन्न होती है उसे क्याकहते है
🅰️वन कहते है
27 :11 :20
अध्याय
कल 4 कारण का विवेचन किया अब आगे
5 *धनयथापरिमाण*
पैसा सोना चांदी नोट हीरा माणक मोती आदि जेवरात की कीमत की तथा गिनती की मर्यादा करें अधिक रखने का प्रतियाख्यान करें पृथ्वी खुदवा कर पत्थर चिरवाकर जवाहरात निकालने तथा सीपों को चिरवा कर मोती निकालने का काम ना करें क्योंकि इससे त्रस् जीवो का भी घात होता है सीप तो द्वीइंद्रिय प्राणी ही है उनको चीरने से लाल रंग का रक्त जैसा पानी निकलता है श्रावक को ऐसा कृत्य करना उचित नहीं है उसे अपनी आवश्यकता को कम से कम करते जाना चाहिए जिससे अल्प से अल्प आरंभ में ही उनका काम निकल जाए कदाचित काम ना चले तो भी सीप चिरवाने का काम तो तो नहीं करना चाहिए
6, *धान्य यथापरिमाण*- धान्य मेंधान के साथ साथ मेवा मिठाई पकवान घृत गुड़ शक्कर किराणा नमक तेल आदि अनेक वस्तुएं भी सम्मिलित समझी जानी चाहिए।
यह सब वस्तुएं घर खर्च के लिए जितनी आवश्यक हो उतनी की मर्यादा रखकर शेष का त्याग करें सेर मन आदि के हिसाब से इनकी मर्यादा करें इन सब वस्तुओं को अधिक समय रखने से इनमें त्रस जीवन की उत्पत्ति हो जाती है अतः इनके रखने के समय की मर्यादा करना भी आवश्यक है अधिक समय तक इन्हें रखना उचित नहीं है श्रावक इनका व्यापार करें तो अच्छा नहीं है क्योंकि इनका व्यापार करने से त्रस जीवो की हिंसा होती है इसके अतिरिक्त अनाज का व्यापारी प्रायः दुष्काल पड़ने की भावना किया करता है। क्योंकि दुष्कल पड़ने से उसे अधिक कमाई हो सकती है।
इस प्रकार के आर्त रौद्र ध्यान से कितने कर्मों का बंद होता है कदाचित ऐसा व्यवहार किए बिना ना चल सकता हो तो वस्तुओं के वजन का और इन्हें रखने के समय का परिमाण करें और परिणाम परिमाण से अधिक वस्तु ना रखें मर्यादित समय से अधिक बिना रखें मन में ऐसा विचार कदापि ना आने दे कि अकाल पड़ जाए तो अच्छा श्रावक प्राणी मात्र के हित की अभिलाषा करें
7 ,8 *द्विपदयथापरिमाण, चतुष्पद-यथापरिमाण* द्विपद अर्थात दो पैर वालों,या चतुष्पद चार पैरों वालों का परिमाण करें दास दासी नौकर चाकर तोता,गाय कुत्ता द्वीपद अपरिग्रह गिने जाते हैं जहां तक संभव हो श्रावक दास दासी नौकर चाकर ना रखें क्योंकि ऐसा करने से प्रमाद की वृद्धि होती है इसके अतिरिक्त अपने हाथ से काम करने से भी यतना हो सकती है दूसरे से काम कराने पर उतनी यतना नहीं होती इतने पर भी यदि नौकर चाकर रखने ही पड़े तो यहां पर स्वधर्मी का योग मिले विधर्मी को ना रखें। इसमें इससे स्वधर्मी को सहायता मिलेगी। और यतना पूर्वक तथा नमक हलाली से काम होगा।
विधर्मी को रखना पड़े तो उसे स्वधर्मी बनाने का प्रयास करें और उसके काम पर पूरी पूरी देखरेख रखे। जिससे अयतना से काम ना होने पावे और
धर्मात्मा की संगति के फल स्वरुप वह भी दयालु और धर्मात्मा बन जाए इसी प्रकार गाड़ी रथ आदि वाहन भी आवश्यकता से अधिक नहीं रखनी चाहिए इससे भी प्रमाद की वृद्धि होती है कदाचित रखने पड़े तो इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि अधिक से अधिक अयतना किस प्रकार टाली जा सकती है।
9 , *कुविययथापरिमाण*- जितनी संपत्ति उतनी विपत्ति अर्थात काम में जो थोड़े ही बर्तन आदि आते हैं तो सार संभाल सबके करनी पड़ती है घर में ज्यादा बिखेरा होने से उसमें नीलन फूलन अनंत काय जीवों की तथा त्रस जीवो की भी हिंसा हो जाती है ऐसा जानकर अधिक समान बढ़ाना उचित नहीं है अतएव आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का प्रतियाख्यान कर देना उचित है।
*पाँचवे व्रत का5अतिचार*
1, *खेतयथा परिमाण*
2 *हिरण्य -सुवर्णयथा परिमाण*
3 *धान्य यथापरिमाण*
4 *द्विपदचतुष्पदयथापरिमाण
5, *कुविययथापरिमाण*
इनका वर्णन उपरोक्त ही समझे
सारांश अतिवाहन – अधिक भाग-दौड़ करना , अतिसंग्रह – अधिक मुनाफाखोरी की चाहत में जरुरत से ज्यादा संग्रह करना
. अतिविस्मय – का अर्थ अधिक लाभ में हर्ष और दूसरों के अधिक लाभ में विषाद करना
अति लोभ – मनचाहा लाभ होने पर भी और अधिक लाभ की चाह होना. अतिभार वहन – नौकर-चाकर और पालतू पशुओं से जरुरत से ज्यादा काम लेना, उनसे अधिक भाग-दौड़ करवाना
चूंकि इस व्रत के द्वारा वह अपनी अन्तहीन इच्छाओं को एक सीमा में बांध देता है। अत:परिग्रह व्रत को इच्छापरिमाण व्रत भी कहते हैं।
अब *तीन गुण व्रत* का विवेचन
*तीन गुण व्रत* तीन गुण व्यक्तियों को धारण करने से पांच अणुव्रतों की रक्षा होती है और असंयमी जीव को समस्त दिशाओं और समस्त देशों संबंधी अविरति निरंतर आया करती है गुण व्रत को धारण करने से उसका संकोच होता है और आत्मा के गुणों में विशुद्धि तथा वृद्धि होती है इस कारण इन्हें गुण व्रत कहते हैं तीनों गुण व्रतों का स्वरूप आगे लिखा जाता है
6️⃣ *दिशा परिमाण*- जीवन पर्यन्त के लिए दशों दिशाओं में आने-जाने की मर्यादा बना लेना दिग्व्रत है। जैसे कि मैं व्यापार आदि के निमित अमुक दिशा में वहाँ जाऊँगा उससे आगे नहीं।
*कौन सी दिशाओं का परिमाण*
१. *उर्ध्वदिशा परिमाण* – ऊपर की सीमा का उल्लंघन, पहाड़ पर वृक्ष पर महल पर मीनार पर हवाई जहाज अभिमान में बैठ कर उनके जाने का इच्छा अनुसार परिमाण करें
२. *अधो दिशा परिमाण*- नीचे की सीमा का उल्लंघन,
जैसे तलघर खान कुआ बावड़ी आदि में घुसने की मर्यादा करें
३. *तिर्छि दिशा परिमाण*- तिरछी सीमा का उल्लंघन
अर्थात पूर्व पश्चिम उत्तर और दक्षिण में इतने कोस से आगे नहीं जाऊंगा इस प्रकार प्रतियाख्यान करें यह प्रतियाख्यान दो करण तीन योग से होता है इस प्रतियाख्यान
का उद्देश्य मर्यादित क्षेत्र से बाहर अट्ठारह पापों से तथा पांचआश्रवों से निवृत होना है किंतु किसी जीव को बचाने के लिए या साधु के दर्शन के लिए अथवा महान उपकार के लिए कार्य के लिए जाना है तथा दीक्षा धारण करने के पश्चात उस प्रदेश में जाने से व्रत भंग नहीं होता
दिशा परिमाण के अतिचार
1️⃣,2️⃣,3️⃣ *उर्ध्व अधः तिर्यंग दिशा परिमाण*-सभीदिशा में जाने का
दूरी के हिसाब से परिमाण करें
4️⃣ *क्षेत्र वृद्धि*-क्षेत्र वृद्धि का अर्थ है लोभवश पूर्व निर्धारित क्षेत्र को बढ़ाना।
क्षेत्र में वृद्धि करें तो अतिचार लगता है जैसे चारों दिशाओं में 50 50 कोस क्षेत्र रखा हो और किसी समय पूर्व में 100 को जाने की आवश्यकता पड़ जाए तो सोचे पश्चिम में जाने की मुझे आवश्यकता नहीं पड़ती है अतः पश्चिम के 50 को पूर्व में मिला लो ऐसा सोचकर पूर्व में 100 कोस चले जाएं तो अतिचार लगता है श्रावक को ऐसा नहीं करना चाहिए
5️⃣ *सइअंतरद्धा* – सइअंतरद्धाका अर्थ है
अपनी सीमा को भूल जाना
सन से होने पर भी आगे चला जाए चित्र भ्रम आदि के कारण विस्मरण हो जाएगी मैंने 50 कोस रखे हैं या 75 कोस अथवा 50 कोशिया पूरे हो गए हैं या नहीं इस प्रकार शंका होने पर आगे चला जाए तो अतिचार लगता है
*छठा व्रत* धारण करने से 343 धनरज्जू विस्तार वाले संपूर्ण लोक संबंधी जो पाप आता है वह रुक कर जितने कोस की मर्यादा की जाती है उतने ही को क्षेत्र का पाप लगता है व्यापक तृष्णा का निरोध हो जाता है और मन को संतोष तथा शांति प्राप्त होती है
*27:11:20*
*प्रश्न केउत्तर*
1️⃣सइअंतरद्धाका अर्थक्या है
🅰️अपनी सीमा को भूल जाना
2️⃣छठा व्रत* धारण करने से कितने धनरज्जू विस्तार वालेपाप रूक जाता हैं
🅰️343 धनरज्जू विस्तार वाले
3️⃣नीलन फूलन -----जीवों की तथा ---- जीवो की भी हिंसा हो जाती है
🅰️अनंत काय,त्रस
4️⃣अधिक लाभ में हर्ष और दूसरों के अधिक लाभ में विषाद करना किसका अर्थ है
🅰️अतिविस्मय – का अर्थ
5️⃣ऊपर की सीमा का उल्लंघन,करना कौन सा परिमाण है
🅰️उर्ध्वदिशा परिमाण*
6️⃣धान्य मेंधान के साथ साथ क्या क्या चीज सम्मिलित समझी जाती हैं किन्हीं तीन के नाम लिखें
🅰️घृत मेवा मिठाई पकवान घृत गुड़ शक्कर किराणा नमक तेल आदि अनेक वस्तुएं भी सम्मिलित समझी जानी चाहिए।
7️⃣सीप के कितनी इंद्रिय प्राणी है
🅰️द्वीइंद्रिय प्राणी ही है
8️⃣प्रतियाख्यान कितने करण कितने योग से होता है
🅰️प्रतियाख्यान दो करण तीन योग से होता है
9️⃣ जितनी संपत्ति उतनी क्या होगी
🅰️विपत्ति
1️⃣0️⃣परिग्रह व्रत को और कौन सा व्रत भी कहते हैं।
🅰️इच्छापरिमाण
28:11 20
*गुणव्रत का दूसरा वैसे*
*सातवाँ,उपभोगोपरिभोग परिमण*
इस व्रत में दो शब्द हैं
उपभोग और परिभोग
*उपभोग*- जो वस्तु एक बार ही काम में आती हो अर्थात जो वस्तु शरीर के अंदर जाती हो उसको भोग वस्तु कहते हैं जैसे अन्न जल शाक भाजी फल मिठाई इत्र सेंट तंबोलआदि
*परिभोग* -जिस वस्तु को बार-बार काम में ले सकते हैं अर्थात जो शरीर के ऊपर बाहर ही बाहर काम आती हो उसको उपभोग वस्तु कहते हैं जैसे स्वर्णा अलंकार घर मकान स्त्री वस्त्र शयन आसन आदि वस्तुएं
- भोग और उपभोग के साधनों का कुछ समय या जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करना भोगोपभोग परिणाम व्रत कहलाता है।
इससे गृहस्थ अनावश्यक संग्रह, खर्च और आकुलता से बच जाता है।
उपभोगोपरिभोग परिमाण व्रत इसके दो प्रकार हैं
1 भोजन नियंत्रण एवं कर्म नियंत्रण
*भोजन*- अनंतकाय उम्बर फल और अत्यंग इन तीन प्रकार के आहार का त्याग करना एवं भक्ष्य भोजन का परमाण करना सातवां भोग उपभोग विरमण व्रत है
अत्यंत भोजन अर्थात् मादक भोजन का त्याग करना जैसे शहद मक्खन मांस रात्रि भोजन यह सभी आहर देह के लिए मादक के पोषक है और शोषक हैं।
2 *कर्म नियंत्रण*- इस व्रत में अधिक हिंसा वाले व्यापार/ बिजनेस/ धंधे का त्याग होता है जिस व्यवसाय में पाप का भाग अधिक होता है उसको पाप की आजीविका कहते हैं और जिस में पाप का भाग अल्प होता है उसको धर्म की आजीविका कहते हैं जैसे
चंद्रमा में थोड़ी सी कालिमा होने से चांद काला नहीं कहलाता वैसे ही जिस व्यवसाय में पाप का अंश कम होता है उसको पापपूर्ण नहीं माने जाते।
उपभोगोपरिभोग योग्य 26 वस्तुएं है
1,उल्लणियाविहं- शरीर साफ करने या शौक के लिए रखे जाने वाले रुमाल टॉवल आदि की मर्यादा
2 , दंतणविहं- दांत ऑन करने के काष्ठ ब्रश पेस्ट की मर्यादा
3, फलविहं- आम जामुन नारियल नारंगी आदि फलों की खाने की मर्यादा तथा माथे में लगाने के लिए आंवला आदि की मर्यादा
4 अब्भंगणविहं- अत्तर तेल फुलेल आदि की मर्यादा
5, उव्वट्टणविहं- शरीर को स्वच्छ और सत्य करने के लिए पीटी वगैरह उबटन लगाने की मर्यादा
6, मज्जणविहं- स्नान के पानी की मर्यादा करनीचाहिए
घुटने तक पैर ,कोहनी तक हाथ एवं गर्दन से मष्तक तक धोना यह देश स्नान है। नख शिख सर्वांग स्नान करना वह
सर्वस्त्रास्नान है इन दोनों स्नान की एवं स्नान जल की मर्यादा करना।
एक सावधानी अवश्य रखनी चाहिए गर्म पानी में कच्चा पानी नहीं मिलाना चाहिए मिलाने से कच्चे पानी के असंख्य जीवो की हिंसा होती है।
7,वत्थविहं-वस्त्रों की जाति की मर्यादा जैसे
1 गज रेशम बनाने में हजारों कीड़ों का घात होता है रेशम के कीड़े अपने मुंह से लार निकालकर अपने ही शरीर पर लपेट लेते हैं उन कीड़ों को उबलतेहुए पानी में डाल कर मार डाला जाता है और फिर रेशम उकेल ली जाती है रेशमी वस्त्र पहनने वाले भी इस हिंसा का भागी होता है अतः श्रावक को ऐसे रेशमी वस्त्र नहीं पहनने चाहिए
8, विलेवणविहं- शरीर पर लेपन करने की अगर तगर
केसर अतर तेल सेंट आदि वस्तुओं की मर्यादा।
9 पुफ़्फ़विहं - फूलों की जाति तथा संख्या की मर्यादा फूल अत्यंत कोमल होने से अनंत जी वो वाला होता है उसमें तरस जीवो का भी निवास होता है उसका छेदन वेतन करने से त्रस्त जीवो की भी हिंसा होती है कितने क्लॉक देवियों को फूल चढ़ाने में धर्म मानते हैं श्रावक को ऐसा नहीं करना चाहिए। करना ही है तो
चंपा चमेली आदि के फूल गजरे एवं पुष्पहार ---माह और-- दिन के हिसाब से--- प्रकार के हिसाब से किलो छूट शेष त्याग कर सकते हैं।
10आभरणविहं-आभूषण की संख्या की मर्यादा
11, धूपविहं- अगरबत्ती
दशांगधूप लोबान आदि की सुगंधि तथा छाने आदि की दुर्गंध वजन के हिसाब से छूट शेष त्याग।
12 पेज्जविहं- शरबत चाय कॉफी उक्काली आदि पर की मर्यादा
13 भक्खणविहं- पकवान और मिठाई की मर्यादा
14, ओदणविहं- चावल ,खिचड़ी थुली की मर्यादा
15सुपविहं- चना मूंग मोठ उड़द आदि दालों की तथा 24 प्रकार के धान्यों की मर्यादा
16,विगयविहं - दूध दही घी तेल गुड़ शक्कर आदि की मर्यादा
17सागविहं -मेथी चंद्र ले आती भाजी तथा तोरई ककड़ी भिंडी आदि अन्य शाकों की मर्यादा
18, माहुरविहं- बादाम पिस्ता चिरौंजी खारक डाक अंगूर आदि मेवा की तथा आंवला आदि के मुरब्बा की मर्यादा।
19जीमणविहं - भोजन में जितने पदार्थ भोगने में आवे उनकी मर्यादा
20पाणिविहं -नदी तालाब कुएं आदि के पानी की मर्यादा
21मुखवासविहं- पान सुपारी लौंग इलाइची जायफल खटाई पापड़ आदि की मर्यादा
22वाहनविहं -हाथी घोड़ा ऊंट बेल आदि चलने वाली गाड़ी बग्गी मोटरसाइकिल आदि फिरने वाली जहाज स्टीमर आदि तीरने वाली, विमान हवाई जहाज गुब्बारा आदि उड़ने वाली तथा अन्य प्रकार की सवारियों की मर्यादा
23वाणह(उपानह) विहं जूता चप्पल खड़ाऊ आदि की मर्यादा
24 सयणविहं - खाट पलंग पाट कोच टेबल कुर्सी बिछौने की जितनी भी जाति हैं उन सब की मर्यादा
25 सचित्त विहं - ,सचित बीज वनस्पति पानी नमक आदि की मर्यादा ।
26 जितने स्वाद बदलने जाते हैं जैसे गेहूं एक वस्तु है पर उसकी रोटी पूरी बहुत सी चीजें बनती है वह सब अलग-अलग द्रव्य गिने जाते हैं इसी प्रकार और- और द्रव्य समझ लेना चाहिए इन द्रव्यों की मर्यादा कर लेना द्रव्य लाती है
इन 26 में से कोई वस्तु उपभोग की है तो कोई परिभोग कीहै उपभोग की 20, एवं नंबर1,7,10,22,23,24 वाली 6 वस्तुएं परिभोग है 26 वस्तुओं में से ग्यारह वस्तुए शरीर को स्वच्छ- स्वस्थ एवं सुशोभित बनाती है। मध्य की 10 वस्तु खानपान से संबंधित है और शेष पांच काया की रक्षक है एवं मौज शौक के साधन है इनमें 14 नियम का भी समावेश प्राय हो जाता है फिर भी 14 नियम अलग से समझाना जरूरी है।
श्रावक का कर्तव्य हैं कि जो जो वस्तु अधिक पाप जनक हो उसका परित्याग करें। और जिन-जिन को काम में लाए बिना काम ना चल सकता हो उनकी संख्या का एवं वजन आदि की मर्यादा करें। और अतिरिक्त का त्याग कर दें मर्यादा की हुईं वस्तुओं में से भी अवसरोचित कम करता जाए उन में लुब्धता ना धारण करें। अपनी आवश्यकताओं को कम से कम बनाना और संतोष वृत्ति को अधिक बढ़ाना इस व्रत का प्रधान प्रयोजन है ज्यों ज्यों यह प्रयोजन पूरा होता जाता है ,त्यों त्यों वो जीवन हल्का और अनुकूलता पूर्ण बनता चला जाता है।
*प्रश्न के उत्तर*
*28:11:20*
1️⃣,दंतणविहं किसकी मर्यादा करना है
🅰️,दांतुन करने के काष्ठ ब्रश पेस्ट की मर्यादा
2️⃣,उपभोगोपरिभोगपरिमाण व्रत इसके दो प्रकार हैंकौन से
🅰️1 भोजन नियंत्रण एवं कर्म नियंत्रण
3️⃣वाणह(उपानह)विहं किसकी मर्यादा करना
🅰️जूता चप्पल खड़ाऊ आदि की मर्यादा
4️⃣उपभोगोपरिभोग योग्य कितनी वस्तुएं है*
🅰️26 वस्तुएं है*
5️⃣ अब्भंगणविहं किसकी मर्यादा करना है
🅰️अत्तर तेल फुलेल आदि की मर्यादा
6️⃣,अत्यंग भोजन अर्थात् क्या
🅰️मादक भोजन का त्याग करना
7️⃣जो वस्तु एक बार ही काम में आती उसे क्या कहते है
🅰️उपभोग
8️⃣फूलो काछेदन वेदन करने से कौन से जीवो की हिंसा होती है
🅰️त्रस जीवो की भी हिंसा होती है
9️⃣इनमें कितने नियम का भी समावेश प्राय हो जाता है
🅰️14 नियम
1️⃣0️⃣1 गज रेशम बनाने में कितने कीड़ों का घात होता है
🅰️हजारों कीड़ों
*अध्याय*
*30:11:20*
*22 अभक्ष्य*
1, ओला,2 घोरवाडा, 3निशिभोजन, 4बहुबिजा, 5बैंगन, 6संधान,7बड़, 8पीपल, 9ऊम्बर, 10कठुबर, 11पाकर( पर्कटी),12 फल जो होए अनजान,
13कंदमूल, 14माटी, 15विष,16आमिष, 17मधु, 18मख्खन, अरु 19मदिरा पान,
20फल, अति तुच्छ, 21तुषार, 22चलितरस, जिनमत, यह बाइस ।
(1️⃣ से 5️⃣)-बड़ के फल, पीपल के फल, गूलर के फल, कठूमर के फल और पाकर(पर्कटी) के फल इन पांच प्रकार के फलों में बहुत ही सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं और अनगिनत त्रस जीव भी होते हैं गुल्लर आदि के फल को तोड़ने से त्रस जीव प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं
6️⃣ *मदिरा* - महुआ के तथा खजूर के फल को को या द्राक्षादी को सड़ा कर मदिरा बनाई जाती है।और आजकल तो सड़ीगली सब्जीकचरे ,और एसिड से बनाई जाती है
सड़ ने में उनमें अनगिनत जीव पैदा होते हैं मदिरा में उनका अर्क भी शामिल ही निकलता है, मदिरा के सेवन से लोग पागल हो जाते हैं। बेभान होकर अंट शंट बकते हैं और मल मूत्र के स्थानों में और सड़कों पर गिरते पड़ते बुरी हालत में प्राप्त होते हैं माता भगिनी और पुत्री के साथ कुकर्म करने पर उतारू हो जाते हैं। मदिरापान का व्यसन अति निंदनीय अहितकारी है इसके चंगुल में फंसने वाला पुरुष जीवन को पूरी तरह बर्बाद कर लेता है। शराबी को सभी घृणा की दृष्टि से देखते हैं ,उसकी दशा बड़ी ही दयनीय होती है जब नशा उतर जाता है तो माल खाने की इच्छा होती है घर में पैसा नहीं बचता है तो स्त्री माता आदि के गहने गिरवी रखकर माल खाता है। जब वह समाप्त हो जाता है तो उनसे झगड़ा मारपीट करता है। और उन्हें सताता है शराबी को भक्ष्य अभक्ष्य का ध्यान नहीं रहता शराबी का घर नरक सरीखा बन जाता है उसे अकाल मृत्यु का ग्रास बन कर नरक का अतिथी बनना पड़ता है। इस कारण सभी मतों में इसके सेवन का निषेध किया गया है।
7️⃣ *मांस* - सिर्फ पेट के गड्ढे को भरने के लिए उपयोगी और उपकारी दूध जैसे पौष्टिक पदार्थ देने वाले ऊन आदि उपयोगी वस्तुएं देने वाले और घास पात जैसी मामूली वस्तुएं खा कर अपना जीवन निर्वाह करने वाले बेचारे निरपराध जीवो को खत्म करना कितनी बड़ी कृतज्ञता है। प्राचीन काल में ऐसा रिवाज था कि कट्टर शत्रु भी अगर मुंह में तिनका दबा ले तो उसे अभयदान मिलता था। तो फिर नित्य ही तिनके खाने वाले पशुओं को क्या पूरी तरह अभयदान नहीं मिलना चाहिए। आइये देखते है क़ोई भी धर्म इसको उचित नहीं मानता *वैदिक धर्म*
*में कहा* है कि ईश्वर ने मच्छ कच्छ वराह, और नरसिंह यह चारअवतार और चार पशु योनियों में उसे धारण किए थे ईश्वर के ऐसे प्यारे पशुओं का घात करना कितना भयंकर पाप है।
*इस्लाम*- के सुराह हज की 36वी आयत में खुद अल्लाह ताला ने फरमाया है कि गोश्त और लहू मेरे पास नहीं पहुंच सकेगा पर पापका डर और संयम ही पहुंच सकेगा। इसी प्रकार *बाइबल* के बीसवे में प्रकरण में कहा है कि thou shalt not kill अर्थात जीव हिंसा मत करो इस प्रकार सभी धर्मों के माननीय शास्त्रों में हिंसा करनेका निषेध किया गया है और हिंसा किए बिना मांस मिल नहीं सकता अतः मांस खाने की मनाई तो अपने आप हो गई इसके अतिरिक्त मांस और रक्त अशुची से भरा हुआ और दुर्गंध युक्त होता है। मांस सेकई रोग हो जाते हैं जैसे क्षय , गंडमाल रक्तपित्त ,वात, पित्त संधिवात, ताप अतिसार आदि आदि अनेक रोगों का उत्पादक होता है। धर्म से भ्रष्ट करने वाले भविष्य में नरक गति में ले जाने वाला और घोर अतिघोर दुख देने वाला अतएव सर्वदा अभक्ष्यहैं
मांसाहारी जब नरक में जाते हैं तो परमाधामी देव नारकी जीव से कहते हैं तुझे मांस बहुत प्रिय था मांस के टुकड़ों को तल तल के तू खाया करता था। तो ले तुझे अब हम तेरे ही शरीर का मांस गरमा गरम खिलाते हैं। यह तुझे खाना पड़ेगा इस प्रकार के कह उसके शरीर का मांस चिमटों से नोच नोच कर और आग में गर्म कर करके खिलाते हैं इस तरह मांसाहार जीव को नर्क में बड़ी दुर्दशा होती है।
8️⃣, *मधु* - अर्थात शहद भी अभक्ष्य है, मधुमक्खियां अनेक वनस्पतियों के फूलों के रस को इकट्ठा करके उस पर बैठती है भील, कोल आदि और असंस्कारी जाति के लोग आग लगाकर धुआं कर कर के मक्खियों को उड़ाते हैं और मक्खियों द्वारा बड़ी मुसीबत से तैयार किए हुए छत्ते को तोड़कर कपड़े में बांधकर निचोड़ लेते हैं निचोड़ते समय मक्खियों के अंडों का रस भी उसमें मिल जाता है इस प्रकार घृणास्पद और पाप से पैदा होने वाला मधु खाने योग्य नहीं है
9️⃣ *मख्खन* छाछ से अलग होने के बाद थोड़े ही समय में मक्खन में कृमि आदि जीवों की उत्पत्ति हो जाती है, उसमें लीलन फूलन भी आ जाती है इसके अतिरिक्त मक्खन काम विकार को उत्पन्न करने वाला होने से भी अभक्ष्य है
1️⃣0️⃣ *हिम* - बर्फ कच्चे पानी का जमाया हुआ होने से असंख्य जीवो का पिंड है अतएव अभक्ष्य है
बाकि कल
*प्रश्न के उत्तर*
*30:11:20*
1️⃣मांस खाने से कौन से रोग हो जाते हैं किन्ही तीन के नाम लिखें
🅰️क्षय , गंडमाल रक्तपित्त ,वात, पित्त संधिवात, ताप अतिसार आदि आदि अनेक रोगों का उत्पादक होता है
2️⃣कितने प्रकार के फलों में बहुत ही सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं
🅰️पांच प्रकार
3️⃣किस आयत में खुद अल्लाह ताला ने फरमाया है कि गोश्त और लहू मेरे पास नहीं पहुंच सकेगा
🅰️सुराह हज की 36वी
4️⃣कितने प्रकार के फलों में बहुत ही सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं
🅰️पाँच
5️⃣असंख्य जीवो का पिंड कौनहै
🅰️हिम बर्फ़
6️⃣कौन अगर मुंह में तिनका दबा ले तो उसे अभयदान मिलता था।
🅰️कट्टर शत्रु
7️⃣ईश्वर ने कौनसेचारअवतार लिये है
🅰️मच्छ कच्छ वराह, और नरसिंह
8️⃣ किसका व्यसन अति निंदनीय अहितकारी है
🅰️मदिरापान।
9️⃣कौन काम विकार को उत्पन्न करने वाला होता हैं
🅰️मख्खन
1️⃣0️⃣thou shalt not kill अर्थात जीव हिंसा मत करो ये किस में कहा है
🅰️बाइबल में
*अध्याय*
*1:12:20*
कल से आगे
1️⃣1️⃣ *विष*- नशीली वस्तुओं को सेवन करने वाले मनुष्य बलहीनरूपहीन,तेजो हीन बन जाते हैं, उनका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है समय पर नशे की वस्तु ना मिले तो बहुत दुख होता है, तड़पता है और कभी-कभी अकाल मृत्यु का शिकार हो जाता है इसके अतिरिक्त अफीम आदि विषैले पदार्थ तैयार करने में अनेक त्रस जीवो का भी घात होता है, इस लिए किसी भी प्रकार की नशीली वस्तु सेवन करने योग्य नहीं है
1️⃣2️⃣ *ओला*- आकाश से बरसने वाले ओले भी असंख्य अपकाय जीवो के पिंड और रोग उत्पादक होने के कारण खाने योग्य नहीं है।
1️⃣3️⃣ *माटी*- गेरू गोपी चंदन खड़िया मैनसिल आदि मृतिका खाने से पथरी पांडु रोग उदर वृद्धि मन्दाग्नि बंधकोष आदि अनेक रोग उत्पन्न होते हैं इसके अतिरिक्त वह असंख्य जीवों का पिंड होने से भी अभक्ष्य है।
1️⃣4️⃣ *रात्रि भोजन*- सूर्यास्त के पश्चात और सूर्योदय से पहले किसी भी वस्तु को खाना पीना बिल्कुल अनुचित है। कोई कोई रात्रि में केवल अन्न नहीं खाते किंतु मिठाई पकवान खा लेते हैं वह भी अनुचित है क्योंकि रात्रि भोजन *अंधा भोजन* भी कहते है रात्रि में भोजन करने से अनेक त्रस जीवो का भक्षण हो जाता है और तरह तरह के रोग उत्पन्न होते हैं कि पकली मकड़ी सर की गरल आदि रात्रि भोजन में खाकर कई मर गए हैं ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं
1️⃣5️⃣ *पंपोटफ़ल(बहबीजी)*- अनार बैंगन अंजीर टमाटर आदि बहुत बीज वाले फल भी भक्षण करने योग्य नहीं है क्योंकि जितने बीज उतने ही जीव उनमें होते हैं
1️⃣6️⃣ *अनन्त काय* - जमी कन्द, साजी वृक्ष, अमरबेल, अंकुरित अनाज, कच्ची इमली(जिसमें गूढली) ना बनी हो आदि सभी अनन्त काय है
ये अनन्तांत जीवों के पिण्ड होने से अभक्ष्य है
1️⃣7️⃣ अधाना (अचार) आम नींबू मिर्ची आदि के अचार में बहुत दिनों तक रहने के कारण फूलन और जीवों की उत्पत्ति हो जाती है वह सड़ जाता है अतः ऐसा अचार भी खाने योग्य नहीं है।
1️⃣8️⃣ *घोलबड़े(दही बडे)*
कच्चे दही को पानी में घोलकर उसमें बड़े पकोड़े डाले जाते हैं वह कुछ समय बाद खदबदा जाते हैं वह भी अभक्ष्य हैं।
1️⃣9️⃣ *बैंगन*- बहु बीजा में भी ये तो बिल्कुल नहीं खानी चाहिए
2️⃣0️⃣ *अनजाने फल*- जिस फल का नाम और गुण मालूम ना हो उसका भक्षण करना उचित नहीं है उससे अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति के यहां तक की मृत्यु की भी संभावना रहती है और इस अनजाने फल के प्रकरण से मुझे वंक्चुल की कथा याद आ गई उसमें आपने देखा कि एक अनजाना फल नहीं खाकर उसकी कैसे जान बच गई और जो उनके साथियों ने खाए वह सब मृत्यु को प्राप्त हुए।
अतएव यह कहानी हमेशा याद रख कर कभी भी अनजाना फल नहीं खाना चाहिए।
2️⃣1️⃣ *तुच्छ फल*- जिसमें खाने योग्य अंश कम हो और फेंकने योग्य अंश अधिक हो वह त्याज्य है जैसे एक सीताफल बेर तथा जामुन।
2️⃣2️⃣ *चलित रस*- जो वस्तु बिगड़ कर खट्टी से मीठी और मीठी से खट्टी हो गई हो दुर्गंध आने लगी हो वह त्याज्य है ,ऐसी वस्तु से रोग उत्पत्ति तथा असंख्य जीवों की हिंसा होने की संभावना रहती है।
*सातवें व्रत के अतिचार*
सातवें व्रत के भोजन संबंधी पांच और कर्म व्यापार संबंधी अतिचार है इस प्रकार इस व्रत के अतिचारों की संख्या 20 है। *भोजन संबंधी अतिचार इस प्रकार हैं*
1️⃣ *सचित आहारे*-
*प्रश्न*
*1: 12:20*
1️⃣बहु बीजा में ये तो बिल्कुल नहीं खानी चाहिए क्या
🅰️ बैंगन ।
2️⃣सातवें व्रत के अतिचार कितने है
🅰️ 20 है ।
3️⃣बहुत दिनों तक रहने के कारण किसमेंफूलन और जीवों की उत्पत्ति हो जाती है।
🅰️ अचार मे ।
4️⃣किन्हीं 3 नशीली वस्तुओं का नाम लिखें ।
🅰️ अफीम, शराब, गाजां
5️⃣तुच्छ फल किसे कहते है
🅰️ जिसमे खाने योग्य अंश कम हो,फेकने योग्य अंश अधिक हो ।
6️⃣खट्टी से मीठी और मीठी से खट्टी हो गई हो उसे क्या कहते हैं
🅰️ चलित रस ।
7️⃣रात्रि भोजन *को क्या कहते है
🅰️ अंधा भोजन ।
8️⃣अनजाने फल के प्रकरण से किस की कथा याद
🅰️ वंक्चुल की ।
9️⃣अपकाय जीवो के पिंड क्या है
🅰️ ओला ।
1️⃣0️⃣मृतिका (मिट्टी )खाने से कौन2 से रोग उत्पन्न होते हैं
🅰️ पथरी, उदर वृद्धि आदि ।
*2: 12:20*
*अध्याय*
1 *सचित आहारे*- जहां तक काम चल सकता हो श्रावकको सचित वस्तु मात्र का त्याग कर देना चाहिए। काम ना चल सकता हो या त्याग की इतनी मात्रा ना बढ़ पाई हो तो मर्यादा तो करनी चाहिए। श्रावक ने जिस सचेत वस्तु का प्रतियाख्यान कर दिया वह वस्तु भोजन में आ जाए और भली-भांति निर्णय ना हो सके कि यह सचित हैं या अचित हैं तब तक उसका उपभोग नहीं करना चाहिए उपभोग करने से अतिचार लगता है, इस जिसने सचित वस्तुओं की मर्यादा की है व कदाचित की हुई मर्यादा को भूल जाए तो जब तक स्मरण ना हो तब तक सचित वस्तु का उपयोग ना करें अगर वह उपभोग कर ले तो उसे अतिचार लगता है
*2 सचित प्रतिबद्ध आहारे*
पका हुआ आम खरबूजे आदि ऊपर से निर्जीव है और उसके अंदर के बीज तथा गुठली सजीव है वृक्ष से तुरंत तोड़ा हुआ गोंद तत्काल पीसी हुईं चटनी, तत्काल का धोवन पानी इत्यादि वस्तुएं सचित प्रतिबद्ध कहलाती है। आम आदि की गुठली को अलग करने से पहले तथा चटनी आदि पर पूरी तरह से शस्त्र का परिणमन होने से पहले सचित त्यागी उनका उपयोग करें तो अतिचार लगता है।
*3अपक्व भक्षण*- आम केले आदि फल पकाने के लिए किसी घास आदि में दबाए हो किंतु पूरी तरह से पके ना हो हरी तरकारी पूरी पक्की ना हो चने के बूट गेहूं की उम्बी भी जवार के हुरडे बाजरे के पूंख मक्का के भुट्टे आग में भुंजे गए हो तो उनमें कई दाने सचित भी रह जाते हैं उन्हें अचित समझ कर खाने से अतिचार लगता है।
*4दुसपक्व भक्षण*- जो वस्तु बहुत पककर बिगड़ गई हो सड़ गई हो दुर्गंधित हो गई हो जिसमें त्रस जीव उत्पन्न हो गए हो ऐसी वस्तु को खाने से अतिचार लगता है।
*5तुच्छ भक्षण*- एक सीताफल बोर सेमल की फली आदि वस्तु जिसमें खाद्य अंश बहुत कम और फेंकने योग्य और ज्यादा होता है खाने से अच्छा लगता है।
*15 कर्मादान*
*1 अंगार कर्म*- कोयला बना बनाकर बेचने का व्यापार करना तथा लोहार सुनार कुंभार हलवाई भड़भुजा कसेरा धातुमार और गिरनियो आदि का व्यापार करना जो कि अग्नि के आरंभ से होता है
*2 वन कर्म*- खेत बाग बगीचे का काम कन्दमूल बेचने का काम
*3शकट कर्म*- गाड़ी रथ छकड़ा बग्गी तांगा म्याना पालकी नाव जहाज आदि बना बनाकर बेचना या उनके उपकरण चक्र आदि बेचना
*4 भाटी कर्म*- ऊंट घोड़े गधे बेल गाड़ी जहाज आदि को भाड़े पर दूसरों को देना
*5स्फोट कर्म*- जमीन को फोड़ने का व्यापार करना मिट्टी पत्थर कंकर मूरड़ सिला रेल के कोयले आदि को खुदवा कर उनका व्यापार करना कुंआ बावड़ी कुंड एवं तालाब नहर आदि बनवा बनवा कर बेचना घटी(चक्की) उंखली कुंडी खरल आदि पत्थर के बना बनाकर बेचना हल बखर आदि से पृथ्वी सुधारने का धंधा करना तथा ऐसे ही विशिष्ट आरंभ के अन्य कार्य करना
*6 दन्त वाणिज्य* हाथी के दांतो का उल्लू या व्याघ्र के नाखूनों का हिरण या व्याघ्र आदि के चमड़े का चमरी की पूंछ के बालों का तथा सीप,कौड़ी और कस्तूरी आदि का व्यापार करना।
*विशेष बात* जीवित चमरी गाय की पूंछ दगा से काट ली जाती है, जिसके चमर बनते हैं और अत्यंत खेद की बात है कि धर्म स्थानों में भी उनका प्रयोग किया जाता है, पूछ कटने से कभी-कभी गाय की मौत भी हो जाती है।
बाकि कल
*प्रश्न के उत्तर*
*2:12:20*
1️⃣सीप,कौड़ी और कस्तूरी आदि का व्यापार करनाकौनसा अतिचार है
🅰️दन्त वाणिज्य
2️⃣जहाज आदि को भाड़े पर दूसरों को देना कौन सा कर्म
हैं।
🅰️भाटी कर्म
3️⃣आम खरबूजे आदि ऊपर से क्या है
🅰️निर्जीव
4️⃣दुसपक्व भक्षण क्या है*
🅰️जो बहुत पककर बिगड़ गई,सङ गई,दुर्गंधित हो गई और त्रस जीव उत्पन्न हो गये हो
5️⃣कदाचित की हुई मर्यादा को भूल जाए तो जब तक स्मरण ना हो तब तक किस वस्तु का उपयोग ना करें
🅰️सचित वस्तु का
6️⃣,अंगार कर्म*- का अर्थ क्या है
🅰️कोयला बनाकर बेचने का व्यापार
7️⃣कन्दमूल बेचने का काम कौन सा कर्म है
🅰️वन कर्म
8️⃣धर्म स्थानों में किस का प्रयोग किया जाता है,
🅰️चमर का
9️⃣चटनी, तत्काल का धोवन पानी इत्यादि वस्तुएं कौन सेअतिचार में आती है
🅰️सचित्त प्रतिबध्द आहारे
1️⃣0️⃣बावड़ी कुंड एवं तालाब नहर आदि बनवा बनवा कर बेचना कौन सा अतिचार हैं।
🅰️स्फोट कर्म
*अध्याय*
*3:12:20*
अब आगे
*7 लाक्षा वाणिज्य*- लाख चमड़ी गोंद मनसिल धावड़ी के फूल कुसुंबा हड़तालाआदि का व्यापार लाक्षा वाणिज्य के अंतर्गत है।
*8 रसवाणिज्य*- मदिरा आदि रसों का व्यापार करना।
*9 विषयवाणिज्य*- अफीम वच्छनाग सोमल धतूरा आदि जहरीली प्राणघातक वस्तुओं का तथा तलवार खड़ग बंदूक तो आदि शस्त्रों का व्यापार करना।
*10 केशवाणिज्य*-पशुओं और पक्षियों का व्यापार करना
या मनुष्यों को बेचना।
*11 यंत्र पीड़न कर्म*- तेल निकालने की घानी, ईख आदि पीलने की कोल्हू आदि अथवा अनेक पुर्जे बनाकर बेचने का धंधा करना।
*12निर्लाञ्छनकर्म*- बैल घोड़े आदि पशुओं को खस्सी करना (अंडकोष फोड़कर उन्हें नपुंसक बनाना) उनके कान नाक सिंग पूंछ आदि अंगों को छेदन करना मनुष्य को नाजर करना (अंग भंग करके नामर्द बनाना) इस प्रकार के कार्य निर्लाञ्छनकर्म कहलाते हैं
*13दावाग्नि दापनिका कर्म*- बाग बगीचा में खेत में तथा जंगल में धान्य , घास या वृक्ष अधिक उगाने के लिए आग लगाना कई भील आदि और असंस्कारी लोग धर्म समझकर जंगल में आग लगा देते हैं वह *दावाग्निदापनिका* कर्म कहलाते हैं।
*14 सरद्रहतालाब शोषण कर्म*- तालाब कुंड आदि जलाशयों को सुखाने के कार्य करना जिससे जल काय की हिंसा तो होती है जलाशय में रहे हुए मछली आदि त्रस जीवों की भी अपरिमित हिंसा होती है।
*15 असतीजनपोषणकर्म*-
असती अर्थात दुराचारीनि स्त्रियों का पोषण करके उनसे दुराचार का सेवन करवाकर द्रव्य उपार्जन करना। तथा चूहे मारने के लिए बिल्ली पालना बिल्ली मारने के निमित्त कुत्ता पालना, शिकारी कुत्ते आदि पालकर बेचना इत्यादि इस प्रकार के धंधा करने और *असतीजन पोषण कर्म* कहलाता है ।दया की भावना से अथवा किसी दूसरी पशु पक्षी मनुष्य की रक्षा करने के उद्देश्य से जीवो का पालन किया तो दोष नहीं है।
कितने ही लोग का "असईजन"की जगह भ्रम से या धोखा देने के लिए और "असंजईजन" पाठ बदल देते हैं और कहते हैं कि असयंती अर्थात अव्रती का पोषण करने से कर्मादान का पाप लगता है किंतु ऐसा पाठ और अर्थ शास्त्र विरुद्ध है उपासकदशांग सूत्र में उल्लेख है कि आनंद आदि श्रावको के यहां हजारों हजारों गायें थी,भगवती सूत्र में तुंगिया नगरी के श्रावको की ऋद्धि का वर्णन करते हुए कहा है, कि उन के यहां गायें भेंसे बकरी आदि पशु बहुत है और दास दासिया भी बहुत थी,तब इस हिसाब से सभी असंयमी ही होने चाहिए। पर श्रावक उनका पालन पोषण करते थे। अगर उनका पोषण नहीं किया जाता तो, पहले व्रत का पांचवा अतिचार नामक अतिचार लगता है।
इसीलिए जो लोग सूत्र पाठ को उलट कर या बदलकर उल्टा अर्थ करते हैं वह वज्र कर्मों का बंधन करते हैं आत्महित चाहने वालों को उनके चक्कर में नहीं आना चाहिए, और ऊपर जो अर्थ किया है वहीं अर्थ यथार्थ समझना चाहिए ना तो दया करने से वंचित होना चाहिए और ना दान देने से ही।
दया दान से आत्मा का परम कल्याण होता है।
अर्थात यदि आप दास दासियों, पशुओं को रखते हैं तो भली प्रकार से पालन पोषण करना चाहिए।
उक्त 15 ही कर्मा दान विशेष कर्म बंध के कारण हैं क्योंकि इनमें जीव हिंसा की अधिकता है ,कितने व्यापार ऐसे भी हैं जो अनर्थकारी हैं और निंदित हैं अतः यह श्रावक के करने योग्य नहीं है। किंतु कदाचित उसी व्यापार से आजीविका चलती हो तो उसकी मर्यादा अवश्य करनी चाहिए जैसे आनंद श्रावक ने 500 हलों की जमीन रखी थी सकडाल कुंभार निंबाड़े पचाकर ही अपनी आजीविका करते थे इस प्रकार जो श्रावक बीसों अतिचारों से बचकर साथ में व्रत का पालन करते हैं वह मेरु पर्वत के बराबर पापों से बच जाते हैं। और उन्हें राई के बराबर पाप ही लगते हैं। वह शारीरिक आरोग्यता और मानसिक शांति निराकुलता संतोष और सुख के साथ अपना जीवन व्यतीत कर के स्वर्ग के और क्रमशः मोक्ष के अनंत सुखों के पुख्ता बन जाते हैं।
*प्रश्न के उत्तर*
*3:12:20*
1️⃣लोग सूत्र पाठ को उलट कर या बदलकर उल्टा अर्थ करते हैं वह किसकाबंधन करते हैं
🅰️वज्र कर्मों का
2️⃣तुंगिया नगरी के श्रावको की ऋद्धि का वर्णनकौन से सूत्रमें आई हैं
🅰️भगवती सूत्र
3️⃣सकडाल कुंभार क्या पचाकर अपनी आजीविका करते थे
🅰️निंबाड़े
4️⃣तलवार खड़ग बंदूक आदि शस्त्रों का व्यापार करना।
कौन सा अतिचार है
🅰️विषयवाणिज्य
5️⃣ केशवाणिज्य अतिचार क्या है।
🅰️पशुओं और पक्षियों का व्यापार करना या मनुष्य को बेचना।
6️⃣आनंद आदि श्रावको के यहां हजारों हजारों गायें थी,इसका कौन से सूत्र में उल्लेख है।
🅰️उपासकदशांग सूत्र
7️⃣असयंती अर्थात अव्रती का पोषण करने से कौन का पाप लगता है
🅰️कर्मादान
8️⃣अनेक पुर्जे बनाकर बेचने का धंधा करना। कौन सा अतिचार है।
🅰️यंत्र पीड़न कर्म
9️⃣कौन से नगर के श्रावकों के यहां गाय भेंसे बकरी आदि पशु बहुत है और दास दासिया भी बहुत थी।
🅰️तुंगिया नगरी
1️⃣0️⃣आनंद श्रावक ने कितने हलों की जमीन रखी थी
🅰️500
*अध्याय*
*4:12:20*
*आठवां व्रत-अनर्थ दण्ड विरमण*
दंड दो प्रकार के हैं- अर्थदंड और अनर्थदंड। अपने शरीर आदि की रक्षा के लिए अथवा कुटुंब परिवार समाज देश आदि के पालन पोषण करने के लिए जो आरंभ होता है वह अर्थदंड कहलाते हैं और बिना प्रयोजन अथवा प्रयोजन से अधिक जो आरंभ कर दिया जाता है वह अनर्थ दंड कहलाता है। अर्थदंड की अपेक्षा अनर्थ दंड से ज्यादा पाप होते हैं, क्योंकि अर्थदंड करने में करने की भावना गौण और प्रयोजन को सिद्ध करने की भावना प्रधान होती है। जबकि अनर्थ दंड में आरंभ करने की बुद्धि प्रधान होती है। और प्रयोजन कुछ नहीं होता गृहस्थ श्रावक साधु के समान पूरी तरह दंड से निवृत नहीं हो सकते, क्योंकि प्रयोजन वश उन्हें आरंभ संभारम्भ करना पड़ता है ,तथापि जो श्रावक इस बात का भली-भांति ध्यान रखते हैं, कि अनिवार्य आवश्यकता से अधिक आरंभ ना हो वह उस आरंभ में आसक्त भी नहीं बनते ,जो कार्य आरंभ के बिना नहीं होते उन्हें करते हुए भी अनुकंपा और विवेक के साथ उन्हें यथासंभव संकुचित करते जाते हैं और अवसर प्राप्त होने पर सर्वथा त्याग कर देने की अभिलाषा रखते हैं निरर्थक दंड से पूरी तरह बचते हैं।
*अनर्थ दण्ड विरमण के पाँच अतिचार*
*1कन्दप्पे (कंदर्प)*- अर्थात काम उत्पादक कथा करना जैसे स्त्रियों के सम्मुख पुरुष के और पुरुष के सम्मुख स्त्रियों के हाव-भाव विलास खानपान श्रृंगार भोगोपभोग गमना- गमन हंसी विनोद। गुप्त अंग उपांग का वर्णन रूप विकार जनक बातें करने से कहने वाले और सुनने वालों के चित में विकार उत्पन्न होता है अनेक प्रकार की दूषित भावनाएं उत्पन्न होती है और कुकर्म से प्रवृत्ति होती है अतएव यह अतिचार कहा गया है।
*2 कुक्कुइए(कौत्कुच्य)*- अर्थात काय से कुचेष्टा करना। जैसे भौंहे मटकाना आंख टमकाना होढ़ बजाना, नासिका मोड़ना उबासी लेना, मुंह मलकाना हाथ पैर नचाना इत्यादि विकार पैदा करने वाले अंग चेष्टा करना तथा होली के दिनों में नग्न पुतला विठलाना नग्न रूप धारण करके अशिष्ट गान- नृत्य करना आदि।
*3 मोहरिए(मोखर्य)*- वेरी के समान वचन बोलना। जिस वचन के बोलने से अपने या दूसरे के आत्मिक गुणों का द्रव्य का या मनुष्य का नुकसान हो ऐसा वचन बोलना औरअसम्बद्ध वचन बोलना वचन के चपलता करना वाचालता धारण करना, असभ्य गालियां देना रे तू आदि तुच्छ वचन बोलना, खराब गायन, ख्याल आदि बनाना या गाना, गालियां गाना, काम राग उत्पन्न करने वाले, तथा द्वेष जगाने वाले वचन बोलना यह सब मोखार्य नामक अतिचार है ऐसे वचन बोलने से निंदा होती है ।झगड़े होते हैं और मारपीट आदि अनेक प्रकार के उपद्रव उठ खड़े होते हैं। उपद्रव गाली अपशब्द कहनायह काम असंस्कारी और अज्ञानी जनों के हैं ,श्रावक को उनकी देखा देखी नहीं करनी चाहिए।
*4संजुत्ताहिगरण(संयुक्ताधिकरण)*- अर्थात शस्त्र का सहयोग मिलाना। जैसे ओखल हो तो मुसल और मुसल हो तो ऊखल नया बनवाना चक्की का एक पाट हो तो दूसरा पाट बनवाना चाकू छुरी तलवार आदि को हत्था या मूंढ लगवाना, धार मोटी हो गई हो तो तीक्ष्ण करवाना कुल्हाड़ी बरछी आदि में डंडा लगवाना इस प्रकार अपूर्ण उपकरण को पूर्ण करने से आरंभ की वृद्धि करने वाले बन जाते हैं ।कोई दूसरा मांगे तो उन्हें भी देने पड़ते हैं ऐसा जानकर अपूर्ण शास्त्र को बिना प्रयोजन पूर्ण नहीं कराना चाहिए और आवश्यकता से अधिक शस्त्रों का संग्रह भी नहीं करना चाहिए जो शस्त्र घर में हो उन्हें इस प्रकार गुप्त रखना चाहिए कि वह अन्य के हाथों में ना पड़े इस प्रकार श्रावक को ऐसे कार्यों में सावधान रहना चाहिए।
*5,उपभोगपरिभोगाइते* उपभोग और परिभोग में अति आसक्त बनकर आवश्यकता से अधिक साधन जुटाना परिग्रह भी इसमें आता हैं,तथा नाटक खेल तमाशा स्त्री पुरुषों के रूप का निरीक्षण करने में राग रागिनी आदि वाद्य सुनने में अत्तर पुष्प आदि सुगंध सुंघनेमें मनोज्ञ भोजन के उपभोग में ,स्त्री प्रसंग में अत्यंत आसक्त बनना वाह! वाह! क्याबात है, मजा है। इत्यादि शब्दों का प्रयोग करना आदि इस प्रकार भोगोपभोग में आसक्त बनने से जीव तीव्र वाले चिकने और लंबी स्थिति वाले दूसरे कर्मों का बंध करता है ऐसा जानकर श्रावक अप्राप्त भोगों की इच्छा मात्र नहीं करता और प्राप्त भोगों में अत्यंत आसक्त नहीं बनता।
में लाला रणजीत सिंह जी की रचित वृहदा लोयणा में उन्होंने
कहा है⤵️
*समझा शंके पापसे* , *अनसमझा हर्षन्त*।
*"वे लूखै वे चिकणे, इस विध कर्म बन्धत*।।
*समझ सारसंसारमें,समझा*
*टालै दोष*।
*समझ समझ कर जीवड़े, गये अनन्ते मोक्ष*।।
आगे कल
*प्रश्न के उत्तर*
*4:12:20*
1️⃣जो शस्त्र घर में हो उन्हें किस प्रकार रखना चाहिए कि
🅰️गुप्त रखना चाहिए
2️⃣लाला रणजीत सिंह जी की रचित रचना कौन सी हैं।
🅰️वृहदा लोयणा
3️⃣भोगोपभोग में आसक्त बनने से जीव कौन से कर्म बंध करता हैं
🅰️तीव्र वाले चिकने और लंबी स्थिति वाले दूसरे कर्मों का बंध करता है
4️⃣मोहरिए(मोखर्य) अतिचार के अंतर्गत क्या आता हैं,कोई दो बातें बताइये
🅰️वैरी के समान बोलना,चपलता करना
5️⃣ दंड कितने प्रकार के हैं- और कौन कौन से
दो प्रकारअर्थदंड और अनर्थदंड।
6️⃣ कुक्कुइए(कौत्कुच्य)
अतिचार का अर्थ*-
🅰️अर्थात काय से कुचेष्टा करना।
7️⃣अनर्थ दंड में आरंभ करने में क्या प्रधान होती है।
🅰️बुद्धि
8️⃣संजुत्ताहिगरण
(संयुक्ताधिकरण)*- अतिचार अर्थातक्या
🅰️अर्थात शस्त्र का सहयोग मिलाना
9️⃣उपद्रव गाली अपशब्द कहना यह काम किस के है
🅰️असंस्कारी और अज्ञानी जनों के हैं ,
1️⃣0️⃣अपूर्ण उपकरण को पूर्ण करने से किसकी वृद्धि करने वाले बन जाते हैं
🅰️आरंभ की वृद्धि करने वाले बन जाते हैं
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