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नवकार अरिहंताणं

📘1⃣मोक्ष का प्रथम चरण कौनसा है ? ☑ शास्त्र श्रवण । 📘2⃣ नवकार मंत्र के एक एक अक्षर की सेवा में अधिष्टायक देव कितने  ? ☑2⃣ एक हजार । 📘3⃣ मोक्ष यानी क्या ? ☑3⃣ मो - मोह  क्ष - क्षय ( मोह का क्षय )। 📘4⃣ परमानन्द स्वरूप किसका हैं ? ☑4⃣ अपनी आत्मा का । 📘5⃣ जिसमें अक्षर कम और भाव अधिक हो उसे क्या कहते हैं ? ☑5⃣ मंत्र  । 📘6⃣ जिससे शिक्षा मिलती हो ? ☑6⃣ शास्त्र । 📘7⃣कितने नवकार का जाप करने से नरक के बंधन शिथिल होते है   ? ☑7⃣ नौ लाख  । 📘8⃣ नवकार मंत्र का सबसे पुराना उल्लेख कहाँ मिलता हैं ? ☑8⃣ खारवेल के शिलालेख में । 📘9⃣अरिहंत का जाप करने से कौनसी गृह पीड़ा शांत होती हैं ? ☑9⃣ चंद्र , शुक्र की । 📘🔟 अरिहंत का ध्यान कहाँ किया जाय ? ☑🔟 मस्तिष्क यानी ज्ञान केंद्र पर । 📘1⃣1⃣ नवपद का अधिष्ठायक देव कौनसा ? ☑1⃣1⃣ विमलेश्वर । 📘1⃣2⃣ नवकार मंत्र के 68 अक्षरों पर कुल कितनी विद्ध्या देवियाँ हैं ? ☑1⃣2⃣ 68544. 📘1⃣3⃣ पाँच परमेष्ठि में से स्त्री कितने पद पा सकती है ? ☑1⃣3⃣ दो - साध्वी , अरिहंत । 📘1⃣4⃣ सिद्धों का ध्यान कहाँ करना चाहिए ? ☑1⃣4⃣ चक्षु तथा दर्शन केंद्र...

कथा राजा पृथु की, बौद्ध कथा

_*दूसरे की निंदा करिए और अपना घड़ा भरिए* _ राजा पृथु एक दिन सुबह सुबह घोड़ों के तबेलें में जा पहुंचे। तभी वहीं एक साधु भिक्षा मांगने आ पहुंचा। सुबह सुबह साधु को भिक्षा मांगते देख पृथु क्रोध से भर उठे। उन्होंने साधु की निंदा करते हुए बिना विचारे तबेलें से घोडें की लीद उठाई और उसके पात्र में डाल दी। साधु भी शांत स्वभाव का था सो भिक्षा ले वहाँ से चला गया और वह लीद कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी। कुछ समय उपरान्त राजा पृथु शिकार के लिए गए। पृथु ने जब जंगल में देखा एक कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का बड़ा सा ढेर लगा हुआ है उन्होंने देखा कि यहाँ तो न कोई तबेला है और न ही दूर-दूर तक कोई घोडें दिखाई दे रहे हैं। वह आश्चर्यचकित हो कुटिया में गए और साधु से बोले "महाराज! आप हमें एक बात बताइए यहाँ कोई घोड़ा भी नहीं न ही तबेला है तो यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहा से आई !" साधु ने कहा " राजन्! यह लीद मुझे एक राजा ने भिक्षा में दी है अब समय आने पर यह लीद उसी को खाना पड़ेगी। यह सुन राजा पृथु को पूरी घटना याद आ गई। वे साधु के पैरों में गिर क्षमा मांगने लगे। उन्होंने साधु से प्रश्न किया हमन...

कथा मेघरथ,लक्ष्मणा साध्वी

📖 *जैन बोध कथाये*📖 सुरेश - भइया नरेश! जिसको जो चीज अच्छी लगे उसको वह चीज दे देना, यही तो दान है? नरेश - नहीं, नहीं, तुम्हें यह किसने बताया है कि किसी की रुचि की वस्तु देना दान है। हाँ, जिसके देने से अपना और लेने वाले का दोनों का हित होता है वही दान है। सुनो, मैं तुम्हें एक छोटी-सी कथा सुनाता हूँ। पूर्व विदेह के पुष्कलावती देश में पुंडरीकिणी नाम की नगरी है। किसी समय वहाँ पर राजा मेघरथ राज्य करते थे। एक दिन वे आष्टाह्निक पर्व में उपवास करते हुए महापूजा करके जैनधर्म का उपदेश दे रहे थे कि इतने में काँपता हुआ एक कबूतर वहाँ आया और पीछे बड़े ही वेग से एक गिद्ध आया। कबूतर राजा के पास बैठ गया। तब गिद्ध ने कहा-‘‘राजन्! मैं अत्यधिक भूख की वेदना से आकुल हो रहा हूँ, अत: आप यह कबूतर मुझे दे दीजिये। हे दानवीर! यदि आप यह कबूतर मुझे नहीं देंगे तो मेरे प्राण अभी आपके सामने ही निकल जायेंगे।’’ मनुष्य की वाणी में गिद्ध को बोलते देखकर युवराज दृढ़रथ ने पूछा-‘‘हे देव! कहिये इस गिद्ध पक्षी के बोलने में क्या रहस्य है?’’ राजा मेघरथ ने कहा, सुनो- इस जम्बूद्वीप के ऐरावत क्षेत्र में पद्मिनी खेट नाम का एक नग...