बड़ी साधुवंदना 5

बड़ी साधुवंदना - 41

वली मल्लीनाथ ना छह मित्र, महाबल प्रमुख  मुनिराय,
सर्वे मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय ।46।

एक अटल सत्य,
किये कर्मो के भुगतान तीर्थंकर भगवंत को भी करना होता है तो हम अपने कर्मो के परिणाम से कैसे बच सकते है।

इस गाथा में हम हमारे इस अवसर्पिणी काल के उन्नीसवें तीर्थंकर श्री मल्लीनाथजी का ऊपरी वर्णन समझने का प्रयास करेंगे।
पिछली पोस्टस में हमने 10 आश्चर्य का देखा जिसमे एक था स्त्री तीर्थंकर।
यानी तीर्थंकर आदि श्लाघनीय पदवी मात्र  पुरुष वेद में ही मिलती है। परंतु इस काल मे यह आश्चर्य हुआ कि पिछले एक भव में उन्होंने माया कपट के कृत्य से स्त्री वेद का बन्ध कर लिया। और यह कभी न होने वाली घटना बनी - मल्लीनाथजी स्त्री रूप में तीर्थंकर बने।

क्यों , कैसे -  यह जानने के लिए हम उनके पूर्वभव को देखते है।

एक समय महाविदेह की सलिलावती विजय में वीतशोका नगरी में बल राजा व धारिणी रानी के पुत्र थे युवराज महाबल । महाबल के अन्य 6 मित्र राजकुमार भी थे।
इनके नाम थे अचल, धरण, पूरण, वसु, वैश्रमण ,अभिचन्द्र ।

 इन सातों में परस्पर गहरा लगाव था। एक उम्र के पड़ाव पर आने के बाद बल राजा ने युवराज महाबल को राज्य सौंपकर संयम अंगीकार किया। उत्कृष्ट संयम पालन करते हुए उन्होंने अंतिम समय मे चारु नामक पर्वत पर जाकर अंतिम आराधना संलेखना ग्रहण की। कैवल्यज्ञान केवलदर्शन प्राप्त कर सिद्ध बुद्ध मुक्त हुए।

 अब महाबल राजा बनकर बहुत समय तक राज्य भोगते रहे। उनके अन्य 6 मित्र भी राजा बन चुके थे। सातो का लगाव भी बना हुआ था। कोई भी कार्य करते तब साथ करते। एकबार नगरी में धर्मघोष नामक मुनि का पदार्पण हुआ। उनका उपदेश सुनकर, चिंतन करते हुए उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। तब युवराज बलभद्र को राजा बनाया ।
छहो मित्रो के साथ लेकर उन्होंने संयम स्वीकार किया। सातो मित्र उत्कृष्ट संयम व तप आराधना करते रहे। लघु सिंह निष्क्रीडित तप, मासखमण, अर्ध मासखमण, विभिन्न भिक्षु प्रतिमाएं आदि कई विभिन्न तप किये। अब महाबल मुनि के मन में एक बात कंही से प्रवेश कर गई। मेरे पिछले भवो की आराधना की वजह से आज में हम सातो मैं सबसे श्रेष्ठ हूं। इस बार यदि हम सात समान आराधना करेंगे तो आगे के भव में भी एक समान बनेंगे। मुझे इन सबमे श्रेष्ठ बनना है तो इन से ज्यादा आराधना करनी हॉगी। बस मन में कपट आया, माया करने लगे। उन मित्र मुनियों को बताये बिना ज्यादा तप करने लगे। गुप्त रूप से अपना तप बढ़ाते रहते। इस तरह माया का सेवन करते हुए स्त्री वेद का बन्ध कर लिया।
 इसी तरह उत्कृष्ट आराधना करते हुए तीर्थंकर बनने के 20 बोल की एक से ज्यादा बार आराधना करते हुए उन्होंने तीर्थंकर नाम कर्म का बन्ध कर लिया।

अंत समय मे चारु पर्वत पर अनशन संलेखना ग्रहण कर काल किया। सातो मित्र तीसरे अनुत्तर विमान में देव हुए। महाबल मुनिजी 32 सागरोपम व 6 मित्र मुनिकी 32 सागरोपम से कुछ कम की आयु थी।

 तीर्थंकर नाम कर्म बांधने के 20 बोल क्या है?
 यह कल की पोस्ट में ....



इस गाथा का अगला विवेचन कल....

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सन्दर्भ : - डॉ पदम् मुनि के ग्रंथ से,

जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।


बड़ी साधुवंदना - 42

वली मल्लीनाथ ना छह मित्र, महाबल प्रमुख  मुनिराय,
सर्वे मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय ।46।

 तीर्थंकर नाम कर्म बांधने के 20 बोल क्या है?
जीव यदि निम्नोक्त 20 में से एक या अधिक की एकाधिक बार आराधना करते हुए उत्कृष्ट भाव भाते है तो अगले तीसरे भव में तीर्थंकर बन सकता है।

1- अरिहंत ,
2 - सिद्ध ,
3 - जिनवाणी ,
4 - सुगुरु ,
5 - स्थविर ,
6 - बहुसूत्री विद्वान ,
7 - तपस्वी
इन सात का गुणानुवाद करे,
8 - बार बार ज्ञान का उपयोग करना ,
9 - निर्मल समकित का पालन करने से,
10 - गुरु आदि पूज्यजनो का विनय ,
11 - निरन्तर षडआवश्यक अनुष्ठान,
12 - ब्रह्मचर्य या उत्तर गुणो के , मूल गुणो के व्रत के प्रत्याख्यान अतिचार रहित पाले
13 - सदैव वैराग्य भाव ,
14 - बाह्याभ्यंतर तप करने से
15 - सुपात्र दान
16 - गुरु, रोगी, तपस्वी, वृद्ध, नवदीक्षित की वैयावृत्य सेवा ,
17 -समाधिभाव क्षमाभाव से  , 18 -नित्य नये ज्ञान सीखने ,
19 - जिनेश्वर भगवान की वाणी पर दृढ़ श्रद्धा
20 - तन मन धन से जिनशासन की प्रभावना करने ।

महाबल राजा ने इन बीस बोल की उत्कृष्ट आराधना कर के तीर्थंकर नाम कर्म का बन्ध किया। और संलेखना सहित काल कर जयंत अनुत्तर विमान में उत्पन्न हुए।
वँहा से आयु पूर्ण कर मिथिला नगरी में कुंभ राजा के यहां रानी की कुक्षी में आये। माता ने 14 स्वप्न देखे। कुछ समय बाद रानी ने पुत्री को जन्म दिया।
प्रभु का जन्म कल्याणक,

अहाहाहा, एक अलौकिक अवसर,
कई ग्रंथो में इस प्रसंग का अदभुत वर्णन आता है। तीनो लोक के नाथ जिनेश्वर देव का इस धरा पर अवतरण । कितना सुंदर अवसर होगा वह। मध्यरात्री का उत्तम प्रहर, घड़ी, ग्रह नक्षत्रों  की श्रेष्ठ युति में माता को कष्ट दिए बिना प्रभु जन्म लेते है। तीनो लोक के जीवों को सहसा आनन्द की अनुभूति होती है। कहते है नरक समेत पूर्ण लोक में कुछ देर प्रकाश हो जाता है। वेदना भोग रहे जीवो को थोड़ी देर शाता मिल जाती है। प्रभु जन्म की सूचना 56 दिककुमारिकाओ को मिलते ही शुचि कर्म के लिए आ जाती है। शुचि कर्म पूर्ण होने के बाद सौधर्मेन्द्र सहित सभी 64 इंद्र,  रत्न कुक्षिणी माता के पास आते है। उन्हें वन्दन कर अवस्वापिनी निंद्रा से निन्द्रित कर देते है। प्रभु का बिंब वँहा रखकर प्रभु को उठा लेते है। सौधर्मेन्द्र अपने 5 रूप बनाकर प्रभु को गोद मे लेकर, चामर, छत्र सहित सभी इन्द्रो व देवताओके साथ जंबूद्वीप के मध्य स्थित मेरुपर्वत के पंडग वन में ले जाते है। वँहा रही शिला पर सिंहासन पर प्रभु को बैठाकर उनपर अभिषेक करते है। सभी देव, इंद्र महोत्सव मनाते है। फिर वापिस प्रभुको लाकर माता के पास रखते है। सभी तीर्थंकरों का जन्मोत्सव ऐसे ही मनाया जाता है।
अदभुत अदभुत।
प्रभु के जन्म का वर्णन पढ़ते भी इतना आनन्द हो जाता है तो उस समय उपस्थित जीवो के भावों की क्या स्थिति हॉगी।
👌👌


बड़ी साधुवंदना - 43

वली मल्लीनाथ ना छह मित्र, महाबल प्रमुख  मुनिराय,
सर्वे मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय ।46।

तीर्थंकर भगवती मल्ली कुंवरी ,
समय के साथ बड़े होने लगे।
तीर्थंकर प्रभु च्यवन के समय ही 3 ज्ञान ( मति , श्रुत व अवधि )लेकर आते है। दीक्षा के समय ही उन्हें चौथा मनः पर्यव ज्ञान उत्पन्न होता है। और चार घाती कर्मो के क्षय पर केवलज्ञान प्रकट होता है।

पिछली पोस्ट्स में हमने 5 ज्ञान का ऊपरी वर्णन देखा था।
मनःपर्यव ज्ञान यानी लोक के समस्त सन्नी जीवो के मन के भावों को जानना।
ओर केवलज्ञान : - यानी संपूर्ण ज्ञान, बिना मन व इंद्रियों की सहायता के सीधे आत्मा से लोक अलोक का संपूर्ण ज्ञान। इस ज्ञान के आने के बाद अन्य किसी ज्ञान की आवश्यकता नही रहती। उस जीव का मोक्ष निश्चित है।

मल्ली कुंवरी तीनो ज्ञान युक्त थे। अवधिज्ञान से उन्होंने अपने छह मित्रो का वर्णन देखा। छहो मित्र अलग अलग राज्यो में राजा के पुत्रों के रूप में जन्म ले चुके थे।
आनेवाले भविष्य को देखकर उन्होंने एक तैयारी शुरू कर दी। एक सुंदर विशाल मोहनभुवन बनवाया। उसके बीचों बीच एक बड़ा सा कक्ष। उस कक्ष में अपने कद की एक आबेहुब सुंदर सुवर्ण प्रतिमा का सर्जन करवाया। उस प्रतिमा को बीच से पोली व ढक्कन युक्त रखवाई। वह सुंदर प्रतिमा अद्दल मल्ली कुंवरी जैसी ही दिखती थी। दूर से देखनेवाला उसे बिल्कुल राजकुमारी मल्ली ही समझते। ईस प्रतिमा को उस विशाल कक्ष में रखवाकर उसकी दीवार के बाहर 6 कमरे बनवाये। जँहा छहों कमरों से एक खिड़की से वह प्रतिमा देखी जा सकती थी।
राजकुंवरी भविष्य की तैयारी रूप उस पोली प्रतिमा का ढक्कन खोल प्रतिदिन अपने भोजन में से एक एक कौर डालने लगी थी। ढक्कन खोलते ही वह भोजन सड़कर उस कक्ष में दुर्गंध का भयानक वातावरण खड़ा कर देता।
कुंवरी यौवन वन में आई । अत्यंत सुंदर उस कुंवरी की लावण्यता की गाथा सब दिशाओमे फैल गई। कई राजा, राजकुमार उसे पत्नी बनाने के प्रयास करने लगे।
यह गाथा मल्लिकुंवरी के पूर्वभव के छह साथी, और अब राजा बन चुके मित्रो तक भी पंहुची। पूर्व भव का स्नेह का बंधन उजागर हुआ । वे छहो मित्र मल्ली कुंवरी को प्राप्त करने के लिए अत्यंत व्याकुल बन गए। ये छह थे ...

1 - इक्ष्वाकु वंश में चंपा नगरी के प्रतिबुद्ध राजा
2 - अंगदेश की राजधानी में चन्द्रच्छाय राजा
3 -  काशी देश की वाराणसी में शंख राजा,
4 - कुणाल देश की श्रावस्ती नगरी के रुक्मी राजा
5 -  कुरु देश के हस्तिनापुर में अदिनशत्रु राजा
6 - पांचाल देश के कांपिल्य पुर में  जितशत्रु राजा

इन छहो ने कुंभ राजा के पास मल्लिकुंवरी से विवाह की मांग की। आगे??
इस गाथा का अगला विवेचन कल....


बड़ी साधुवंदना - 44

वली मल्लीनाथ ना छह मित्र, महाबल प्रमुख  मुनिराय,
सर्वे मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय ।46।

तीर्थंकर भगवती मल्ली कुंवरी ,
एक तो विश्व सुंदरी सा अदभुत अनुपम सौंदर्य , ऊपर से पूर्व भव का स्नेह। छहो राजा मल्ली कुंवरी को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठे। कुंभ राजा के पास छहों राजाओंने विवाह प्रस्ताव भेजा। किसी वजह से कुंभ राजा ने उन प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
इसका अत्यंत विपरीत परिणाम आया। छहो राजाओंने एक साथ मिथिला नगरी पर आक्रमण कर दिया। नगरी को चारों ओर से घेर लिया गया।
अब एक साथ छहो से युद्ध करना मुश्किल था। राजा कुंभ चिंतित हुए।
मल्ली कुंवरी इस संकट की घड़ी को समझकर पिता के पास आई । और उनकी वजह से आये संकट को वे ही दूर करेंगे यह आश्वासन दिया। तीनो ज्ञान के स्वामी मल्लिकुंवरी ने इस घटना की पूर्व तैयारी कर ली थी।
छहो राजाओं को अलग अलग यह आश्वासन दे दिया गया कि कुंवरी का विवाह उन्हीं से होगा। उन्हें मुलाकात के लिए आमंत्रित किया। छहो राजा को लगा यह सिर्फ उनके लिए ही सन्देश आया है।
छहो राजा एक दूसरे से अनभिज्ञ आये। उन्हें शाम को उसी मोहनभुवन में प्रतिमा वाले कक्ष के चारो तरफ बनवाये कमरों में ठहराया गया। रात बीती। सुबह प्रभात की पहली किरण के साथ खिड़की से प्रतिमा के दर्शन हुए। सभी को लगा कि वही मल्लिकुंवरी ही है। उसके अदभुत लावण्य, उनके मनोरम्य सुंदरता में खो गए। सब को यह विश्वसुंदरी कुछ समय मे उनकी रानी बनेगी इस विचार से प्रसन्नता होने लगी।
पर यह क्या?
प्रसन्नता अचानक बिभत्सता, तीव्र अरुचि में बदल गई। धृणा से मुंह का आकार बदल गया।
क्यों?
क्योंकि कुंवरी के आदेश से उस प्रतिमा का ढक्कन खोल दिया गया। उस ढक्कन खोलने  से अंदर जो भोजन था, सड़कर अत्यंत दुर्गंध पैदा कर रहा था। वह दुर्गंध असह्य बन गई राजाओं के लिए।
तभी कुंवरी ने प्रवेश किया। सभी उसे देखकर आश्चर्य चकित हो गए। यह मल्लिकुंवरी है तो यह कौन है जिसे हम देख रहे थे।?
मल्ली कुंवरी ने तब सभी को प्रतिबोध दिया। जो भोजन प्रतिदिन में करती थी उसी भोजन का सिर्फ एक कौर इस प्रतिमा में डाला जाता है। इस इतने भोजन की दुर्गंध आप सह नही पाये तो मेरे इस अशुचिमय शरीर से इतना मोह क्यों? जो कि मल मूत्र अधोवायु, कफ, पित्त की अत्यंत धृणित अशुचियो से ही भरा व बना है।
छहों राजा विचार में पड़ गए। फिर मल्लिकुंवरी ने उन्हें पूर्वभव की कथा सुनाई। किस तरह धर्माराधना कर हम देवलोक गये व वँहा से यहां आए। अब हम ऐसी आराधना करें कि हमेशा के लिए जन्म मृत्यु से ही छूट जाये।
छहो राजाओको तब जातिस्मरण ज्ञान हुआ। मल्लिकुंवरी कि बातो की यथार्थता उन्हें समझ मे आई।
उनका कुंवरी के प्रति स्नेह का कारण समझ आया। और इस भव को अंतिम भव बनाने का निश्चय कर लिया।
मल्लिकुंवरी के साथ सातो ने संयम ग्रहण करने का निर्णय कुंभराजाको बताया।
कुंभराजा ने सहर्ष अनुमति दी।

अब आगे?
इस गाथा का अगला विवेचन कल....

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सन्दर्भ : - विभिन्न ग्रंथ से,

जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।
बड़ी साधुवंदना - 45

वली मल्लीनाथ ना छह मित्र, महाबल प्रमुख  मुनिराय,
सर्वे मुक्ति सिधाव्या, मोटी पदवी पाय  ।।46।।

भगवती मल्लीनाथजी,

मिथिला पर युद्ध का आया हुआ संकट मल्लिकुंवरी द्वारा दूर हुआ। मल्लिकुंवरी व छहों राजाओंने अपने संयमग्रहण का निर्णय कुंभराजा को बतलाया।
कुंभराजा ने हर्षित होकर दीक्षा महोत्सव की तैयारी शुरू कर दी।
मल्लिकुंवरी ने वर्सीदान देना प्रारंभ किया। तीर्थंकर प्रभु दीक्षा से पहले प्रतिदिन 1 करोड़ 8 लाख सुवर्ण मुद्रा का एक वर्ष तक दान करते है  । कुल 3 अरब अठ्यासी क्रोड अस्सी लाख सुवर्ण मुद्रा। यह धन शकेन्द्र की आज्ञा से वैश्रमण देव लेकर राजभण्डार में रखते है। यह धन पृथ्वी पर जिस धन का कोई मालिक नही, जो जमीन में गढ़ा हो, आदि जगह से लाया जाता है।

सभी तीर्थंकरों द्वारा वर्सीदान की इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य,  दरिद्रो के लिए अनुकंपा व मुख्य धन की आसक्ति के त्याग के लिए निर्वहन किया जाता है।

एक वर्ष पूरा हुआ तब 9 लौकांतिक देव आकर प्रभुको दीक्षा लेकर तीर्थ प्रवर्तन करने की विनती करते है। यह तीर्थंकरों के लिए बोध नही, मात्र इन देवो का एक आचार होता है। तीर्थंकर बिना किसी के बोध से, किसी निमित्त से नही, अपितु स्वयं बोधित होते है, स्वयंबुद्ध।
9 लौकांतिक देव,
सारस्वत, वह्नि, वरुण, अव्याबाध, आदित्य, गर्दतोय, रिष्ट, आग्नेय, तुषित
यो एक वर्ष बाद मल्लिकुंवरी 300 स्त्रियों व 300 पुरुषों के साथ दीक्षा लेते है। उसी शाम उन्हें केवल्यप्राप्ति हुई। तीर्थंकर जब दीक्षा लेते है तब से केवल्यप्राप्ति हो तब तक का काल उनका छद्मस्थ काल कहलाता है। मल्लीनाथजी का छद्मस्थकाल सभी 24 प्रभुजी में सबसे कम रहा।
केवल्यप्राप्ति बाद उन्होंने तीर्थ प्रवर्तन किया। कुंभराजा, माता धारिणी ने श्रावक व्रत लिए तो कई नरनारियो ने संयम ग्रहण किया। इस तरह संघ स्थापना हुई। 28 प्रमुख शिष्य यानी गणधर , कुल 40,000 साधुजी व 55,000  साध्वीयां जी उनके शिष्य परिवार में थे। कई वादी, मनःपर्यव ज्ञानी, केवली आदि भी उनके गण में संमिलित थे।
भगवान मल्लीनाथजी केवल्यप्राप्ति बाद भव्य जीवो को उपदेश देते हुए विचरने लगे। कुल 55,000 वर्ष आयु पूर्ण होने पर  पादोपगमन संथारा अंगीकार किया, एक माह के अनशन बाद वे निर्वाण को प्राप्त कर सिद्ध पद आसिन हुए। उनके साथ 500 साधुजी 500 साध्वीयां जी भी मुक्त हुई। कालांतर में छहो राजा भी सिद्ध बुद्ध मुक्त हुए।

अत्यंत उपकारी तीर्थंकर भगवन्तों का चारित्र लिख - पढ़ , उससे धर्म की प्राप्ति करने का हमे जो सौभाग्य मिला वो हमारे कई उच्च कर्मो का परिणाम।  इस धर्म को जानकर हम सबका आगे का मोक्ष मार्ग प्रशस्त बने यही हार्दिक मंगल कामना।

प्रभु तारू नाम लेता , हैयु म्हारु नृत्य करे।
क्यारे आवीश तारी समीप, झँखना ए नित्य रहे,
अदभुत हशे रूप तारू, अदभुत सुख नो स्वामी हशे,
तुझ चरण मां जल्दी आवु , कृपा काईक एवी करजे।

भगवती मल्लीनाथजी का चारित्र पूर्ण।

आज भगवती मल्लीनाथजी के कथानक को पूर्ण करते समय आप सभी का धन्यवाद करना चाहूंगा। आप सभी के सकारात्मक प्रतिभाव से मिली प्रेरणा से ही इस श्रृंखला को आज 45 पोस्ट तक लाया। इसमें बताये कथानकों को लिखते समय इतने अदभुत आनन्द की अनुभूति  होती है कि उसे शब्दो मे वर्णन नही कर सकते। खासकर अंतिम 4 गाथा में भगवती मल्लीनाथजी का चरित्र लिखते समय। यह सब आप सभी की प्रेरणा से ही। धन्यवाद सभीको।


बड़ी साधुवंदना - 46

वली जितशत्रु राजा, सुबुद्धि नामें प्रधान,
पोते चारित्र्य लइ ने पाम्या मोक्ष निधान । ।47।।

चंपानगरी राजा जितशत्रु,
9 तत्त्व से जिन धर्म से अनभिज्ञ  था। उसका सुबुद्धि नामका एक प्रधान दृढ़ जिन धर्मानुरागी था। 9 तत्त्व का ज्ञाता व श्रमणोपासक था।
सुबुद्धि प्रधान कभी प्रयत्न भी करता था कि राजा सही तत्त्व, सही धर्म , मनुष्य भव की उपयोगिता समझे। पर राजा की रुचि इस ओर होती ही नही।
एक बार दोनो साथ भोजन कर रहे थे। उस दिन अत्यंत रुचिकारी भोजन बना था। राजा उसकी खुब प्रसंशा कर कर के खा रहे थे, जबकि सुबुद्धि प्रधान निर्लेपता से भोजन कर रहे थे। जब राजा ने उन्हें भोजन कैसा है यह पूछा तब निस्पृहता से प्रधान ने उत्तर दिया : - राजन यह भोजन  पुद़्गल से निर्मित है, इसका स्वभाव परिवर्तनशील है। आज बेहतर,  कल  घृणास्पद होगा। सड़ जाना, गल जाना,  बास मारेगा यह इसका स्वभाव है। इसकी अनिश्चितता पर क्या प्रसंशा करना। देह की आवश्यकता समझकर बिना आसक्ति या अरुचि ग्रहण कर लेना ही हमारा धर्म होना चाहिए। राजन को जवाब पसन्द नही आया पर वह चुप रहा।
कुछ दिनों बाद वे एक जंगल से गुज़र रहे थे। तब पास में ही एक सूखे गड्ढे में पानी भरा दिखाई दिया। अत्यंत बदबूदार, जानवरो की अस्थियां आदि, मिट्टी, कचरे से युक्त पानी था । इतनी असह्य बदबू से राजन का चेहरा  घृणा से भर कर विकृत हो गया। पर सुबुद्धि प्रधान आज भी निर्लिप्त था।
राजा के पूछने पर प्रधान ने वही  पुद़्गल का उत्तर दिया। आज पानी खराब है तो कल अच्छा भी हो जाएगा। आपके महल के पानी से भी स्वादिष्ट।  राजा को बुरा लगा, कि यह गन्दा पानी कभी अच्छा नही हो सकता। पर बिना कुछ बोले , दोनो वँहा से चले गए।
अब सुबुद्धि प्रधान ने कुम्हार के यहां से कुछ कोरे मटके मंगवाये। सभी मटकों में नीचे छोटा से छेद करवाकर किसी मे कोयला, किसी मे राख तो किसी मे कोयले का चूरा या धूल भरवाकर रख दिये। फिर उन मटकों को एक के ऊपर एक ऐसे क्रम से जमाकर सबसे उपर उस गंदे गड्ढे के पानी से भरे मटके के नीचे बारीक छेद कर रख दिया। सबसे नीचे बिना छिद्र का एक खाली मटका रख दिया।
पानी अब धीरे धीरे सभी मटकों से रिसता हुआ कोयला, कोयले का चूरा, धूल, राख आदि से पसार होते हुए कुछ दिनों में आखिरी मटके तक पहुंच गया। इस प्रक्रिया में सब अशुद्धियां छन जाने से अब वह स्वच्छ व पीने लायक मधुर पानी बन चुका था। मंत्री ने उसे थोड़ा और शुद्ध कर हल्की सुगन्ध डालकर एक मटका राजा के घर पहुंचा दिया।

जब राजा ने पानी पिया तो अत्यंत खुश हुआ। आज तक इतना मधुर पानी उसने  पीया नही यह स्वीकार किया।  तथा उस पानी को कहां से प्राप्त किया यह सवाल किया। जब राजा ने यह जाना कि यह उस गड्ढे का वही गन्दा पानी है, जिससे राजा चिढ़ गये थे , तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
मंत्री की प्रसंशा की। और उसकी मान्यता को भी सन्मान दिया। उससे कई तत्त्व संबँधी प्रश्न पूछे। आश्चर्यजनक समाधान पाकर वह संतुष्ट हुआ। राजन ने प्रधान से ही 12 व्रत अंगीकार कर लिए।
एकबार एक निर्ग्रन्थ आचार्य के नगर पदार्पण पर  सुबुद्धि का मन संयम लेने को उत्सुक था , पर राजा ने साथ मे संयम लेने के लिए उन्हें रोक रक्खा। करीब 12 वर्ष बाद सुबुद्धि की इच्छा पूरी हुई। राजा मंत्री ने दोनो ने साथ संयम लिया।
ग्यारह अंगों के अभ्यास उपरांत उत्कृष्ट धर्म आराधना कर अंत मे सिद्ध बुद्ध मुक्त हुए।


बड़ी साधुवंदना - 47

धन्य तेतली मुनिवर, दियो छकाय अभयदान,
पोट्टीला प्रतिबोध्या पाम्या केवलज्ञान ।48।

ज्ञाताधर्म कथांग सूत्र की कथा

तेतली पुर नामक नगर में तेतली पुत्र नामक एक श्रेष्ठी रहते थे। जो पिता तेतली के नाम से जाने जाते थे। तेतली पुत्र अत्यंत वैभव का मालिक  व नगर के  राजा कनक रथ का माननीय मंत्री। उनका विवाह उनकी मर्जी से मृषिका नामक स्वर्णकार की पुत्री पोट्टीला से हुआ था।
तेतली पुर का राजा कनकरथ नीच की कक्षा तक लोभी था।  अपने राज्य, वाहन, कोष कोठार आदि में इतना आसक्त था कि उसे स्वयं के पुत्रों से ही भय की कल्पना सताती रहती। की कोई पुत्र बड़ा होकर उससे उसका राज्य न हड़प ले।
इसकी नीचता इस हद तक गई थी कि इस डर से वह अपने पुत्रों के जन्मते ही नासिका, कान, पैर का अंगुलिया ,अंगूठा आदि अंगों में से कुछ काटकर उन्हें विकलांग बना देता था। चूंकि उस राज्य का नियम था कि कोई विकलांग व्यक्ति उस राज्य का राजा नही बन सकता था ।राज्यलोभ ने उसे विवेकान्ध बना दिया था।
एक बार  राजा की पद्मावती नामक रानी ने गर्भवती होने पर तेतली पुत्र अमात्य की सहायता मांगी। राजा से पुत्र को बचाने मंत्री के साथ एक योजना बनवाई। ओर उस योजना के तहत  रानी पद्मावती के  पुत्र को राजा के जुल्म से कनकध्वज को बचा लीया । वह राजकुमार तेतलीपुत्र के पुत्र की पहचान से अमात्य के यहां बड़ा हुआ।  कनकरथ की मृत्यु के बाद यह रहस्य सभी के सामने खोलकर उसे राजा बनाया। अपने उपकारी तेतलीपुत्र को,  राजा कनकध्वज बहुत सन्मान देता था और उसकी वजह से सब जगह तेतलीपुत्र सन्मान पाते थे।

प्रेम विवाह के कुछ वर्षों में ही अचानक तेतलीपुत्र का पत्नी पोट्टीला से मन उठ गया। पोट्टीला ने उसे रिझाने बहुत प्रयास किया परन्तु तेतलीपुत्र अब उससे उदासीन बन चुके थे। पति द्वारा उपेक्षित पोट्टीला अब दान व धर्म मे मन को पिरोने लगी। एक बार एक सुव्रता जी आर्या व उनके साध्वी वृन्द का सत्संग मिला तो उनसे अपना दुख बताया। पति को वापिस स्वयं में अनुरक्त करने  के लिए कोई मन्त्र आदि की मांग की। तब गुरुणी साध्वीजी ने कहा : - कि जैन धर्म इन लौकिक, व भोग आदि सुख के लिए कोई मन्त्र नही बतलाता परन्तु अपने कर्म जलाकर मोक्ष का सुख बताने , तथा मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बतलाते है। उनके उपदेश के बाद पोट्टीला ने उनके पास दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की।
पति तेतलीपुत्र से दीक्षा की आज्ञा मांगी।
उन्होंने आज्ञा तो दी परन्तु शर्त रक्खी की साधुव्रत पालते हुए काल कर वे देवलोक में देव बने तो मुझे प्रतिबोध देने के लिए आना पड़ेगा।
पति की शर्त स्वीकार कर पोट्टीला ने संयम अंगीकार किया। उत्कृष्ट आराधना से मृत्यु बाद देवलोक में  देव बने।
वँहा से अवधिज्ञान में देखते हुए उन्हें अपने वचन याद आये। और उस वचन को पालन के लिए मध्यलोक में आये।
इधर तेतलीपुत्र कनकध्वज राजा की स्नेहछाया में अत्यंत आसक्तिमय जीवन जी रहे थे।

पोट्टीलदेव ने उन्हें सही मार्ग पर लाने व जिन धर्म आराधना करने के लिए समझाने के लिए बहुत प्रयत्न  किया । पर तेतलीपुत्र की मति पर रहा मोह का आवरण हट ही नही रहा था।
आखिरकार देव ने कुछ ऐसा जाल बुना की राजा कनकध्वज तेतलीपुत्र से उदासीन हो गया। उसकी उदासी देखकर क्रमशः राज्यसभा के सभी सदस्य, फिर देव की रचना अनुसार परिवार व स्नेही तक उससे उदास हो गये। उसे मिलता मान सन्मान सब  बन्द हो गया।
यह आघात तेतलीपुत्र सहन नही कर सका। उसे जीवन से ही  घृणा हो गईं। उसने आत्म हत्या की सोची। फिर 3- 4 बार अलग अलग तरीको से आत्महत्या के प्रयास किया। कभी तालपुट विष  पीया तो कभी फांसी खाई तो एकबार अपनी तलवार अपने पेट मे डालने की कोशिश की, पर उसमे भी वह सफल नही हुआ।
वह कुदरत की लीला समझ नही पा रहा था।
पोट्टीलदेव सब देख ही रहे थे। लोहा अब गरम था, उन्होंने उपदेश दिया और साधना में मानवजीवन की सार्थकता समझाई । तेतलीपुत्र पर प्रभाव पड़ा। उन्होंने दीक्षा ली और उत्कृष्ट आराधना करने लगे। 14 पूर्व तक ज्ञान प्राप्त किया।कालांतर में केवल्यप्राप्ति कर शेष आयु पूरी कर सिद्ध बुद्ध मुक्त बने।

धन्य जिनशासन

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सन्दर्भ : - विभिन्न ग्रंथ से, 

लंबी ऐसी इस स्टोरी को बहुत संक्षिप्त किया। इस क्रिया में तथ्यो के साथ कोई अशातना हुई हो, जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।

Fb ग्रुप जैनिज़्म
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सन्दर्भ : - विभिन्न ग्रंथ से, 

जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।




बड़ी साधुवंदना - 48

धन्य पांचे पांडव तजी द्रोपदी नार,
थिवरा नी पासे लीधो संयम भार ।49।
श्री नेमीवन्दन नो एहवो अभिग्रह कीद्ध,
मास मास खमण तप, शत्रुंजय जई सिद्ध।50।

गागर में सागर समान बहुत सारे आगमो को दोहकर श्री जयमलजी महाराज साहेब ने कितने ही प्रेरणादायक कथानकों को संक्षिप्त रूप से इस महान स्तोत्र में संजो लिया है।
ऐसा ही एक कथानक है पांच पांडव व महासतीजी द्रोपदी  का। श्रीकृष्ण वासुदेव के साथ इनका जीवन बहुत सारे उतार चढ़ाव युक्त रहा। इनका पूरा कथानक यानी जैन महाभारत - तीर्थंकर चरित्र में मिलता है।


यहां 49 से 52 इन 4 गाथाओमे हम उस विस्तृत कथा का अंतभाग देखेंगे। पहले 5 पांडव ।

जराकुमार द्वारा पांडव मथुरा में श्रीकृष्ण के देहत्याग के समाचार मिलने से दुखी हुए  पांडवो को वैराग्य हुआ। वासुदेवकी मृत्यु ने उन्हें मनुष्यभव की सार्थकता किसमे है यह समझा दिया।
नगर में आचार्य धर्मघोष पधार रहे थे। पांचों पांडव ने उनके पास संयम ग्रहण किया।

 द्रोपदीजी ने भी आर्या सुव्रता के पास दीक्षा ली। बहूत वर्षोंतक विविध तप आराधना करते हुए द्रोपदी जी एक माह की संलेखना कर काल कर पांचवे देवलोक ब्रह्म में 10 सागरोपम की स्थिति वाले देव बने। यहां से काल कर आगामी भव में महाविदेह से मोक्ष जाएंगे।
इधर पाँचपाण्डवों ने भी बहुत वर्षो तक
14 पूर्व तक का अध्ययन स्वाध्याय ,धर्म , मासखमन आदिउग्र तप की सम्यक आराधना करते हुए विचरने लगे। एक बार उन्हें समाचार मिले की नेम प्रभु सौराष्ट्र जनपद में विचर रहे है। तब उन्होंने प्रभुदर्शन होने तक मासखमण का अभिग्रह लिया। ।  इस अभिग्रह के बाद वे सौराष्ट्र की तरफ विहार करने लगे।
विहार करते हुए हस्तिकल्प नगर के बाहर पधारे। आज मासखमण के पारणे का दिन था। नगर में वे गोचरी के लिए पधारे। वँहा लोगो से समाचार मिले की भगवाननेमप्रभु उज्जयन्तगिरी पर 536 मुनियों के साथ मोक्ष पधारे।
तब परस्पर विचार कर के लाया हुआ आहार परठकर शत्रुंजय पर्वत पर जाकर अंतिम आराधना रूप  संथारा संलेखना किया।दो मास तक अनशन पालकर पांचों भाई सिद्ध बुद्ध मुक्त हुए।


बड़ी साधुवंदना - 49

धर्मघोष ना शिष्य, धर्मरूचि अणगार,
किडियो नी करुणा, आणि दया अपार।51।
कड़वा तुंबा नो कीधो सघलो आहार,
सर्वार्थ सिद्ध पहोच्या चवी लेशे भवपार ।52।

चंपा नगरी सोम, सोमदत्त सोमभूति नामक 3 ब्राह्मण भाई रहते थे। सोम की पत्नि का नाम नागश्री था। एक दिन सभी 3 भाइयों के समुहभोजन का प्रसंग सोम के यहां था। नागश्री ने सुंदर , घी व उत्तम मसालों से , विविध व्यंजन युक्त भोजन बनाया। अंत मे सब  भोजन बनने के बाद एक बार चखने लगी। उसमे एक तुंबे की सब्जी की बूंद उसने चखी तब उसे लगा यह अत्यंत कड़वी है। उसे परिवार के भोजन में देना उचित नही। यह सोचकर तुंबे की वह कटु सब्जी उसने अलग रख दी। परिवार को अच्छे से भोजन कराने के बाद उसने एक सन्त महात्मा गोचरी हेतु भ्रमण करते हुए देखे। वे उस समय वँहा बीराज रहे धर्मघोष आचार्य के शिष्य उग्र तपस्वी धर्मरुचि अणगार थे। आज उनके मासखमण का पारणा था। गुरु आज्ञा लेकर पारणे हेतु वह निकले ही थे। तब मूढ़मति नागश्री के दिमाग मे वह सब्जी का ख्याल आया। इस सब्जी को कंहा फेकने जाऊंगी? इससे अच्छा तो इन साधुजीको दे देती हूं। इस कटु आशय से मुनि को बुलाया। मुनि पधारे, थोड़ी सब्जी के लिए उन्होंने पात्र खुल्ला किये, उनके खुब इंकार के बाद भी बर्तन की सारी सब्जी उनके पात्रे में उंडेल दी। जैसे नागश्री ने अपनी सारी समस्या से मुक्ति पा ली। मुनि दुविधा में फस गये। अब सब्जी इतनी सारी ले ली है तो अन्य कुछ भी नही ग्रहण कर पाएंगे। यह सोचकर वह उद्यान में आये। विनयपूर्वक अपने आचार का पालन करते हुए सब्जी गुरु को दिखाई। इतनी सारी सब्जी देखकर गुरु को भी आश्चर्य हुआ। उन्होंने कुछ अनिष्ट की आशंका से सब्जी को सूंघा और तत्काल समझ गए। वह सब्जी विषाक्त थी। जहरीली थी। खाते तो मृत्यु निश्चित थी। आचारांग सूत्र में एक जगह बताये अनुसार ऐसे संयोगों में मुनि आहार को परठ सकते है। आचार्य धर्मघोष ने धर्मरुचि अणगार को तत्काल उस सब्जी को किसी निर्वध्य स्थान में , जँहा कोई जानवर, कोई जीव जंतु न खा सके ऐसे स्थान में उस सब्जी को परठकर आनेकी सूचना दी। परठना यानी उस वस्तु का योग्य निर्वध्य निकाल करना।
मुनि वन तरफ आये। एक योग्य पथरीली भूमि देखी। जँहा कोई जानवर जीव जंतु आदि नही था। अचानक उनके मन मे एक खयाल आया। इस सब्जीमें  रहे घी व मसाले की खुशबू से खींचकर चींटियां आदि आई और उन्होंने खा कर प्राण त्याग दिए तो?
यह सोचकर परखने के लिए एक बून्द सब्जी लेकर पत्थर पर रक्खी। थोड़ी ही क्षणों में कई चींटियां उसकी खुशबू से खींची चली आई। और खाते ही सारी चींटियां मृत्यु को प्राप्त हो गई। यह देख करुणावान मुनि हतप्रभ रह गए। एक बूंद सब्जी से इतने जीवो की हिंसा , तो पूरी सब्जी से कितनी हजारों जीवोंकी मृत्यु होंगी। यह सोचकर जीवदया का उच्च आदर्श रखते हुए मुनि ने एक बड़ा निर्णय तत्काल ले लिया। सबसे निर्वध्य स्थान मेरा उदर है। इस सारी सब्जी को मैं खाकर मृत्यु को प्राप्त होजाऊ तो चिंता नही , पर अन्य हजारों जीवो की जान  बचाई जाएगी। तत्काल मुनि ने सारी सब्जी खा ली। मुनि ने अंतिम आराधना की। जगत के सभी जीवों से क्षमा याचना की और समाधिभाव से काल कर  सर्वार्थसिद्ध  विमान में उत्पन्न हुए।
इधर नगर में यह बात फैल गई नागश्री के द्वारा एक सन्त की मृत्यु । सोम ब्राह्मण ने उसे घर से निकाल दिया। गांव में किसी ने उसे आश्रय नही दिया। भटकती बिलखती नागश्री जंगल मे चली गई। अत्यंत रोग, वेदना से जीवन पूरा कर नरक में गई। वँहा से जलचर, फिर नरक, तिर्यंच आदि कई भवो में वेदना सहती रही। एक भव में एक श्रेष्ठी के यहां पुत्री बनी। पर हाय कर्मकी लीला। वँहा कोई उसका पति बनने को तैयार नही हुआ। क्यों कि उसका शरीर दीप्त लोहे सा गर्म - जलानेवाला दाहक था। पिता ने उसकी शादी करनेका बहुत प्रयत्न किया पर,  व्यर्थ। यहां तक कि कोटयाधिपति श्रीमंत पुत्री सुकुमालिका को एक भिखारी से ब्याहा गया तो वह भिखारी भी भाग गया। फिर कुछ श्रमणी वृन्द से बोध पाकर दीक्षा ली। पर शरीर बकुशिका बन गई । सचेत पानी से बार बार हाथ पैर मुंह धोना आदि। एक बार एक उद्यान में गुरुणी के मना करने के बाद भी आतापना ले रही थी, तब एक गणिका को 5 पुरुषों के साथ क्रीड़ा करते  देखकर उसकी पुरानी सुप्त कामनाएं भड़क उठी। और अपने धर्म क्रिया के बदले में अगले भव में ऐसे सुख की प्राप्ति का निदान कर लिया।
ओर उस निदान की वजह से द्रोपदी के भव में पाँचपाण्डवों के साथ विवाह हुआ।

 यही द्रोपदी महासतीजी के  पूर्वभव की कथा थी। जो अभी 5 वे ब्रह्म देवलोक में है और आगे के भव में महाविदेह से मोक्ष जाएंगी।



बड़ी साधुवंदना - 50

वली पुंडरिक राजा कंडरिक डगियो जाण,
पोते चारित्र लइ ने न घाली धर्म मा हाण ।53।
सर्वार्थसिद्ध पहोंच्या चवी लेशे निर्वाण ।
श्री ज्ञातासूत्र मा जिनवरे कर्या बखाण। 54।

यह कथा महाविदेह की पुष्कलावती विजय की  पुण्डरीकिणी नगरी के महापद्म राजा के 2 राजकुमार पुंडरीक व कंडरिक की है । एकबार धर्मघोष स्थविर मुनि के पदार्पण पर उनकी देशना सुनकर महापदम राजा वैराग्यवासित हुए। पुण्डरीक को राजा व कंडरिक को युवराज बनाकर उन्होंने दीक्षा अंगीकार की। अनेक वर्षों तक उत्कृष्ट संयम पालन कर सिद्ध बुद्ध मुक्त बने।
कुछ समय बाद जब स्थविर मुनि का पदार्पण हुआ तब उनकी वाणी से बोधित होकर युवराज कन्डरिक ने भी दीक्षा ग्रहण की आज्ञा मांगी। भाई पुंडरिकजी ने उसे राजा बनाने का बोला। परन्तु कंडरिक दीक्षा लेने को उत्सुक था।
उन्होंने संयम ग्रहण किया व धर्मघोष मुनि के साथ विहार करने लगे। कई वर्षो तक उग्र तप,रुक्ष आहार , विहार आदि से उनका देह अस्वस्थ हो गया था।
एकबार जब पुनः वे  पुण्डरीकिणी नगरी पधारे तब कन्डरीक मुनि की अस्वस्थता देख पुण्डरीक राजा ने धर्मघोष मुनि से उनकी चिकित्सा के लिए राजमहल की यानशाला में पधारने की विनती की। स्थविर मुनि राजमहल पधारे।
राजवेदो ने उत्तम औषधियों व आहार से कंडरिक मुनि को बिल्कुल स्वस्थ कर दिया।
मुनि का निस्तेज शरीर कांतिवान हो गया। अब स्थविर मुनि ने वँहा से विहार की आज्ञा दी। तब , राजमहल की सुख सुविधा, रसयुक्त भोजन , आराम के आदति बन चुके कंडरिक मुनि ने विहार करने में असमर्थता जताई। स्थविर मुनि समझ गए कि मुनि अब कषायों में घिर चुके है। स्व तथा साथ के अन्य सन्तो के संयम की सुरक्षा के लिए उन्होंने कंडरिक मुनि को छोड़कर वँहा से विहार कर दिया।
तब पुण्डरीक राजा ने अत्यंत मान सन्मान देते उन्हें बोध दिया । अनमोल संयम रत्न को प्राप्त कर देह के सुख के लिए उसे न खोने देने का प्रत्यक्ष उपदेश दिया। तब शर्मिंदा होकर वे विहार कर स्थविर के पास चले गए। पर अब उनके मन मे संयम की रुचि रही नही थी। राजमहल का खानपान उन्हें आकर्षित कर रहा था। कुछ समय बाद वे पुनः नगरी के बाहर आ गए।
राजा पुण्डरीक को यह समाचार मिले। वे दर्शन करने आये । उनका मन देख समझकर पुनः उन्हें समझाने का प्रयास किया। पर इस बार वे निष्फल रहे। तब राजा ने पूछा: - क्या आप भोग भोगना चाहते है?
कंडरिक मुनि ने संकोच छोड़कर साफ  हाँ बोला।
राजा सोच में पड़ गए। यह जैन धर्म की अवहेलना का प्रसंग बनेगा। जिनशासन के लिए निंदा का विषय बनेगा। सभी मुद्दे सोचकर उन्होंने तुरन्त निर्णय ले लिया।
कंडरिक को नगरी का राजा बना दिया व स्वयं मुनि वेश धारण कर दीक्षित हो गए। स्थविर के पास पहुंचकर चतुर्याम धर्म स्वीकार किया। उत्कृष्ट आराधना कर 33 सागरोपम की स्थिति वाले सर्वार्थसिद्ध विमान में देव बने।
इधर अपथ्य भोग भोगने से कंडरिक भी अल्पकाल में आर्तध्यान पूर्वक मरकर 33 सागरोपम  स्थिति वाले 7 वी नर्क के वासी बने।
जिनशासन के प्रति अपरिमित श्रद्धा के प्रेरणास्त्रोत महाराज पुण्डरीक अपना नाम अमर कर गये।

ऐसे ही ऐसा एक प्रसंग हमारे देश मे कुछ समय पूर्व बन गया। आचार्य धर्मदासजी महाराज साहेब के एक बीमार शिष्य संत ने दुराग्रह कर संलेखना संथारा ग्रहण कर लिया। कुछ दिनों बाद जब बात सर्वत्र फैल गई तब धर्म का प्रताप या कर्म का फल - मुनि स्वस्थ हो गए। और अब आहार ग्रहण की जिद्द करने लगे। यदि मुनि संथारा छोड़ते है तो जिनशासन की, संलेखना व्रत की महिमा की अत्यंत अवहेलना हॉगी। अतः गुरुवर्य धर्मदासजी महाराज साहब ने उस शिष्य की जगह स्वयं संथारा ग्रहण किया। 7 दिनों में देह त्यागकर जिनशासन की महिमा पर चार चांद लगा दिए। अपने प्राणों को हंसते हँसते कुर्बान कर दिया।

धन्य धन्य जिनशासन,

Fb ग्रुप जैनिज़्म
All india jain aagam group

सन्दर्भ : - विभिन्न ग्रंथ से, 

पोस्ट  में तथ्यो के साथ कोई अशातना हुई हो, जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।



धन्य जिनशासन

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सन्दर्भ : - विभिन्न ग्रंथ से, 

पोस्ट  में तथ्यो के साथ कोई अशातना हुई हो, जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।

पिक प्रतीकात्मक है।





धन्य जिनशासन

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पोस्ट  में तथ्यो के साथ कोई अशातना हुई हो, जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।





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जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।




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जिनवाणी विपरीत अंशमात्र भी लिखा हो , जाने अनजाने कोई अशातना हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडम ।




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