चातुर्मास की महत्ता
शास्त्रीय विधान अनुसार जानिए, जैन धर्म में चातुर्मास की महत्ता
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से प्रारम्भ हुआ चातुर्मास पर्व आज तक निर्बाध रूप से जारी है। जिसका निर्वहन एवं अनुसरण आज भी प्रत्येक साधु-सन्त करते है। पूर्णतः अहिंसा पर आधारित जैन धर्म धार्मिक भावनाओं से भरा हुआ धर्म है। प्रतिवर्ष वर्षा योग में जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहकर धर्म की गंगा बहाने, धर्म का पालन करने व श्रावक-श्राविकाओं को कराने, प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाने हेतु चातुर्मास किया जाता है।
साधु-साध्वियों एवं श्रावक-श्राविकाओं के लिए आत्म साधना का प्रतिबिम्ब होता है चातुर्मास। यह साधु-साध्वियों सहित सभी को अहिंसा का पालन करने तथा मन, वचन एवं काय के निग्रह हेतु चातुर्मास किया जाता है। जिन धर्म का मूल स्त्रोत अहिंसा है। अहिंसा का अर्थ जहाँ तक हो सकें अपनी क्रियाओं द्वारा किसी की भी हिंसा न हों क्योंकि इस वर्षा काल में असंख्या जीवों की उत्पत्ति होती है इसलिए अहिंसा का विशेष तौर पर ध्यान दिया जाता है। जब आप विचरण करेंगें तो जीवों की हिंसा होगी इसलिए साधु सन्त एक ही स्थान पर चार माह रह कर जिनवाणी के सिद्धान्तों एवं जैन धर्म की वाणी का प्रचार-प्रसार करते है।
भारत में विभिन्न धर्मों के संत महात्माओं की अपनी-अपनी मान्यताओं और धार्मिक विधानों के अनुसार साधना पद्धतियां, अनुष्ठान और निष्ठाएं परिपक्व हुईं हैं। इन पद्धतियों में चातुर्मास की परम्परा बड़ी महत्वपूर्ण है। वैदिक परम्परा के संतों में भी चातुर्मास की परम्परा चली आ रही है परन्तु जैन धर्म में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
चातुर्मास का अर्थ है-चार मास के लिए साधु-साध्वियों का एक स्थान पर ठहरना। चातुर्मास का आरंभ वर्षा ऋतु में होता है। वर्षा के कारण सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं और जीव-जंतुओं की उत्पत्ति भी बढ़ जाती है अत: जीवों की रक्षा और संयम -साधना के लिए चार मास तक साधु-साध्वियों को एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय विधान है।
अपवाद स्वरूप ही साधु चातुर्मास में अन्यत्र जा सकते हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि संघ पर संकट आने अथवा किसी स्थविर या वृद्ध साधु की सेवा के लिए साधु चातुर्मास में दूसरे स्थान पर जा सकता है अन्यथा उसे चातुर्मास में एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय आदेश है।
जैन साधु वर्ष में 8 माह नंगे पांव और दिन में मात्र एक बार आहार लेकर विहार कर जैन सिद्धान्तों, अहिंसा, सत्य ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का विशेष प्रवचन एवं उपदेश श्रावकों को देते है।
जैन धर्म में चातुर्मास की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। स्वयं श्रमण भगवान महावीर ने अपने जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मास किए। उन्होंने अपना अंतिम 42वां चातुर्मास पावापुरी में किया था। यहां उन्होंने अपना अंतिम उपदेश तथा देशनाएं दी थीं जो जैनों के प्रसिद्ध आगम ‘उत्तराहयमन सूत्र’ में संकलित हैं। अपने इस अंतिम चातुर्मास में भगवान महावीर ने अपने प्रधान शिष्य गौतम स्वामी को प्रतिबोध देते हुए कहा था-
‘समयं गोयम मा पमाए’
अर्थात ‘‘हे गौतम! संयम साधना के लिए एक क्षण भी आलस्य मत करो।’’
भगवान महावीर का यह संदेश केवल गौतम स्वामी के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक साधक के लिए था।
जैन धर्म में सामाजिक तथा धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यक्ति और समाज में परपस्पर सम्बद्ध हैं। एक-दूसरे का विकास परस्पर सहयोग से होता है। हमारे साधु-साध्वियां वर्षावास में लोगों को समाज में परस्पर भाईचारे, सद्भावना और आत्मीयता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में व्यक्ति और समाज की परिस्थितियां बदल गई हैं। जीवन में कुंठाएं, धन लोलुपता और पक्ष राग बढ़ गया है तथा धर्म राग कम हो गया है। फिर भी साधु-साध्वी इसमें संतुलन रखने और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं जिससे समाज में एकसुरता बनी रहती है। धार्मिक दृष्टि से तप, जप, स्वाध्याय, दान, उपकार और सेवा आदि प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना उनका ध्येय भी है और कर्तव्य भी, क्योंकि साधु-साध्वियां समाज के अधिक निकट होते हैं और वे समाज में पनप रही रूढिय़ों और मिथ्या धारणाओं का निराकरण करने का प्रयत्न करते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में चातुर्मास की यही विशेषता है।
चातुर्मास में दशलक्क्षण महापर्व भी आता है। इस दृष्टि से इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। यह जैनों का अलौकिक पर्व है। एक ओर जहां यह तप, त्याग का पर्व है वहां परस्पर वैमनस्य और वैर, विरोध को दूर करने का सशक्त माध्यम भी है।
भगवान महावीर ने चातुर्मास में इसकी गवेषणा इसलिए की थी कि व्यक्ति समाज में रहते अनेक प्रकार के मन-मुटावों का शिकार हो सकता है अत: महापर्व में क्षमा धर्म से इनका सुधार कर लिया जाए।
यह धारणा एक स्वस्थ और सभ्य समाज की गारंटी है। इस प्रकार जैन धर्म में चातुर्मास का सामाजिक और धार्मिक महत्व तो है ही व्यक्ति और समाज को एक सूत्र में पिरोने का भागीरथ प्रयत्न भी है।
चातुर्मास किसलिए-
चातुर्मास स्वंय को समझनें, श्रावक- श्राविकाओं को धर्म की ओर अग्रसर करना,धर्म की महिमा बतलाना, उपदेशो के माध्यम से धर्म की प्रवृत्ति सिखाना, धर्मसंसद में आने से व्यक्ति तनाव से मुक्ति पाने का सूत्र पाता है। उनका कहना है कि साधु के सम्पर्क में आने पर श्रावक को यम, नियम एवं संयम की शिक्षा मिलती है और धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। साधु धर्म की मिसाल के रूप में देखा जाता है। चातुर्मास के दौरान मौन, उपवास, तपस्या, आदि कार्यो का बहुत प्रभाव देखा जाता है। चातुर्मास के दौरान ही जैन अनुयायियों के लिए दक्षलक्षण महापर्व आते है। यह धर्म आराधना का पर्व होता है। चातुर्मास का समय उपर्युक्त होने के कारण इस दौरान श्रावक-श्राविकाओं को प्यास एवं भूख भी कम लगती है, जिससे श्रावक आसानी से तपस्या कर सकता है।
चातुर्मास के दौरान श्रावक-श्राविकाओं को सूर्योदय पूर्व नहाना चाहिये। पूरे चार माह थाली में भोजन नहीं करना चाहिये और पूर्व में अपने से जाने-अनजानें में हुई जीवों की हिंसा की क्षमा याचना के लिए उपवास भी करने चाहिये ताकि आपकी मानसिक एवं शारिरीक शक्ति बनी रह सकें।
चातुर्मास २०२०
अष्टान्हिका महापर्व~ २८ जून से ०५ जुलाई तक
चातुर्मास स्थापना दिवस~ ४ जुलाई
गुरू पूर्णिमा~ ५ जुलाई
वीर शासन जयंती~ ६ जुलाई
पार्श्वनाथ भगवान मोक्ष कल्याणक(मोक्ष सप्तमी)~ २६ जुलाई
रक्षाबंधन एवं श्रेयांसनाथ भगवान मोक्ष कल्याणक~ ३ अगस्त
सोलहकारण व्रत प्रारम्भ~ ४ अगस्त से ३ सितम्बर तक
आचार्यश्री शान्तिसागरजी की पुण्यतिथि ~ २० अगस्त
रोट तीज~ २१ अगस्त
दशलक्षण पर्व~२३ अगस्त से १ सितम्बर तक
पुष्पदन्त भगवान मोक्ष कल्याणक~ २६ अगस्त
सुगंध दशमी २८ अगस्त
दशलक्षण पर्व पूर्ण, अनन्त चतुर्दसी एवं वासुपूज्य भगवान मोक्ष कल्याणक~ १ सितम्बर
क्षमावणी~ ३ सितम्बर
शीतलनाथ भगवान मोक्ष कल्याणक~ २३ अक्टूबर
चातुर्मास निष्ठापन~ १४ नवम्बर
भगवान महावीर स्वामी निर्वाण कल्याणक, दीपावली पर्व एवं वीर निर्वाण संवत प्रारम्भ~ १५ नवम्बर
अष्टान्हिका महापर्व~ २२ नवम्बर से ३० नवम्बर तक।
इस बार दिगंबर जैन धर्म के अनुसार चातुर्मास ४ जुलाई को प्रारंभ होगा और १५ नवंबर दीपावली तक चलेगा यानी १३५ दिन का चातुर्मास अर्थात साढे चार माह का चातुर्मास होगा इसलिए समर्पित होकर हमें चातुर्मास करवाना है,जिससे हम साधुओं का स्वास्थ्य
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ से प्रारम्भ हुआ चातुर्मास पर्व आज तक निर्बाध रूप से जारी है। जिसका निर्वहन एवं अनुसरण आज भी प्रत्येक साधु-सन्त करते है। पूर्णतः अहिंसा पर आधारित जैन धर्म धार्मिक भावनाओं से भरा हुआ धर्म है। प्रतिवर्ष वर्षा योग में जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहकर धर्म की गंगा बहाने, धर्म का पालन करने व श्रावक-श्राविकाओं को कराने, प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर ले जाने हेतु चातुर्मास किया जाता है।
साधु-साध्वियों एवं श्रावक-श्राविकाओं के लिए आत्म साधना का प्रतिबिम्ब होता है चातुर्मास। यह साधु-साध्वियों सहित सभी को अहिंसा का पालन करने तथा मन, वचन एवं काय के निग्रह हेतु चातुर्मास किया जाता है। जिन धर्म का मूल स्त्रोत अहिंसा है। अहिंसा का अर्थ जहाँ तक हो सकें अपनी क्रियाओं द्वारा किसी की भी हिंसा न हों क्योंकि इस वर्षा काल में असंख्या जीवों की उत्पत्ति होती है इसलिए अहिंसा का विशेष तौर पर ध्यान दिया जाता है। जब आप विचरण करेंगें तो जीवों की हिंसा होगी इसलिए साधु सन्त एक ही स्थान पर चार माह रह कर जिनवाणी के सिद्धान्तों एवं जैन धर्म की वाणी का प्रचार-प्रसार करते है।
भारत में विभिन्न धर्मों के संत महात्माओं की अपनी-अपनी मान्यताओं और धार्मिक विधानों के अनुसार साधना पद्धतियां, अनुष्ठान और निष्ठाएं परिपक्व हुईं हैं। इन पद्धतियों में चातुर्मास की परम्परा बड़ी महत्वपूर्ण है। वैदिक परम्परा के संतों में भी चातुर्मास की परम्परा चली आ रही है परन्तु जैन धर्म में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
चातुर्मास का अर्थ है-चार मास के लिए साधु-साध्वियों का एक स्थान पर ठहरना। चातुर्मास का आरंभ वर्षा ऋतु में होता है। वर्षा के कारण सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं और जीव-जंतुओं की उत्पत्ति भी बढ़ जाती है अत: जीवों की रक्षा और संयम -साधना के लिए चार मास तक साधु-साध्वियों को एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय विधान है।
अपवाद स्वरूप ही साधु चातुर्मास में अन्यत्र जा सकते हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि संघ पर संकट आने अथवा किसी स्थविर या वृद्ध साधु की सेवा के लिए साधु चातुर्मास में दूसरे स्थान पर जा सकता है अन्यथा उसे चातुर्मास में एक स्थान पर रुकने का शास्त्रीय आदेश है।
जैन साधु वर्ष में 8 माह नंगे पांव और दिन में मात्र एक बार आहार लेकर विहार कर जैन सिद्धान्तों, अहिंसा, सत्य ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का विशेष प्रवचन एवं उपदेश श्रावकों को देते है।
जैन धर्म में चातुर्मास की परम्परा अत्यंत प्राचीन है। स्वयं श्रमण भगवान महावीर ने अपने जीवन में विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मास किए। उन्होंने अपना अंतिम 42वां चातुर्मास पावापुरी में किया था। यहां उन्होंने अपना अंतिम उपदेश तथा देशनाएं दी थीं जो जैनों के प्रसिद्ध आगम ‘उत्तराहयमन सूत्र’ में संकलित हैं। अपने इस अंतिम चातुर्मास में भगवान महावीर ने अपने प्रधान शिष्य गौतम स्वामी को प्रतिबोध देते हुए कहा था-
‘समयं गोयम मा पमाए’
अर्थात ‘‘हे गौतम! संयम साधना के लिए एक क्षण भी आलस्य मत करो।’’
भगवान महावीर का यह संदेश केवल गौतम स्वामी के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक साधक के लिए था।
जैन धर्म में सामाजिक तथा धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। व्यक्ति और समाज में परपस्पर सम्बद्ध हैं। एक-दूसरे का विकास परस्पर सहयोग से होता है। हमारे साधु-साध्वियां वर्षावास में लोगों को समाज में परस्पर भाईचारे, सद्भावना और आत्मीयता बनाए रखने की प्रेरणा देते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में व्यक्ति और समाज की परिस्थितियां बदल गई हैं। जीवन में कुंठाएं, धन लोलुपता और पक्ष राग बढ़ गया है तथा धर्म राग कम हो गया है। फिर भी साधु-साध्वी इसमें संतुलन रखने और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं जिससे समाज में एकसुरता बनी रहती है। धार्मिक दृष्टि से तप, जप, स्वाध्याय, दान, उपकार और सेवा आदि प्रवृत्तियों को प्रश्रय देना उनका ध्येय भी है और कर्तव्य भी, क्योंकि साधु-साध्वियां समाज के अधिक निकट होते हैं और वे समाज में पनप रही रूढिय़ों और मिथ्या धारणाओं का निराकरण करने का प्रयत्न करते हैं। आधुनिक युग संदर्भ में चातुर्मास की यही विशेषता है।
चातुर्मास में दशलक्क्षण महापर्व भी आता है। इस दृष्टि से इसकी महत्ता और भी बढ़ जाती है। यह जैनों का अलौकिक पर्व है। एक ओर जहां यह तप, त्याग का पर्व है वहां परस्पर वैमनस्य और वैर, विरोध को दूर करने का सशक्त माध्यम भी है।
भगवान महावीर ने चातुर्मास में इसकी गवेषणा इसलिए की थी कि व्यक्ति समाज में रहते अनेक प्रकार के मन-मुटावों का शिकार हो सकता है अत: महापर्व में क्षमा धर्म से इनका सुधार कर लिया जाए।
यह धारणा एक स्वस्थ और सभ्य समाज की गारंटी है। इस प्रकार जैन धर्म में चातुर्मास का सामाजिक और धार्मिक महत्व तो है ही व्यक्ति और समाज को एक सूत्र में पिरोने का भागीरथ प्रयत्न भी है।
चातुर्मास किसलिए-
चातुर्मास स्वंय को समझनें, श्रावक- श्राविकाओं को धर्म की ओर अग्रसर करना,धर्म की महिमा बतलाना, उपदेशो के माध्यम से धर्म की प्रवृत्ति सिखाना, धर्मसंसद में आने से व्यक्ति तनाव से मुक्ति पाने का सूत्र पाता है। उनका कहना है कि साधु के सम्पर्क में आने पर श्रावक को यम, नियम एवं संयम की शिक्षा मिलती है और धीरे-धीरे यह प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। साधु धर्म की मिसाल के रूप में देखा जाता है। चातुर्मास के दौरान मौन, उपवास, तपस्या, आदि कार्यो का बहुत प्रभाव देखा जाता है। चातुर्मास के दौरान ही जैन अनुयायियों के लिए दक्षलक्षण महापर्व आते है। यह धर्म आराधना का पर्व होता है। चातुर्मास का समय उपर्युक्त होने के कारण इस दौरान श्रावक-श्राविकाओं को प्यास एवं भूख भी कम लगती है, जिससे श्रावक आसानी से तपस्या कर सकता है।
चातुर्मास के दौरान श्रावक-श्राविकाओं को सूर्योदय पूर्व नहाना चाहिये। पूरे चार माह थाली में भोजन नहीं करना चाहिये और पूर्व में अपने से जाने-अनजानें में हुई जीवों की हिंसा की क्षमा याचना के लिए उपवास भी करने चाहिये ताकि आपकी मानसिक एवं शारिरीक शक्ति बनी रह सकें।
चातुर्मास २०२०
अष्टान्हिका महापर्व~ २८ जून से ०५ जुलाई तक
चातुर्मास स्थापना दिवस~ ४ जुलाई
गुरू पूर्णिमा~ ५ जुलाई
वीर शासन जयंती~ ६ जुलाई
पार्श्वनाथ भगवान मोक्ष कल्याणक(मोक्ष सप्तमी)~ २६ जुलाई
रक्षाबंधन एवं श्रेयांसनाथ भगवान मोक्ष कल्याणक~ ३ अगस्त
सोलहकारण व्रत प्रारम्भ~ ४ अगस्त से ३ सितम्बर तक
आचार्यश्री शान्तिसागरजी की पुण्यतिथि ~ २० अगस्त
रोट तीज~ २१ अगस्त
दशलक्षण पर्व~२३ अगस्त से १ सितम्बर तक
पुष्पदन्त भगवान मोक्ष कल्याणक~ २६ अगस्त
सुगंध दशमी २८ अगस्त
दशलक्षण पर्व पूर्ण, अनन्त चतुर्दसी एवं वासुपूज्य भगवान मोक्ष कल्याणक~ १ सितम्बर
क्षमावणी~ ३ सितम्बर
शीतलनाथ भगवान मोक्ष कल्याणक~ २३ अक्टूबर
चातुर्मास निष्ठापन~ १४ नवम्बर
भगवान महावीर स्वामी निर्वाण कल्याणक, दीपावली पर्व एवं वीर निर्वाण संवत प्रारम्भ~ १५ नवम्बर
अष्टान्हिका महापर्व~ २२ नवम्बर से ३० नवम्बर तक।
इस बार दिगंबर जैन धर्म के अनुसार चातुर्मास ४ जुलाई को प्रारंभ होगा और १५ नवंबर दीपावली तक चलेगा यानी १३५ दिन का चातुर्मास अर्थात साढे चार माह का चातुर्मास होगा इसलिए समर्पित होकर हमें चातुर्मास करवाना है,जिससे हम साधुओं का स्वास्थ्य
अच्छे रह सके।
जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
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