आदिनाथ भगवान के पूर्व भव (भाग-५)
आदिनाथ भगवान के पूर्व भव (भाग-५)
कर्मयुग के प्रारंभ में तीर्थंकर ऋषभदेव स्वयं अपने पुत्रों के लिए कण्ठ और वक्षस्थल के अनेक आभूषण बनाते हैं, भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्र भी उन आभूषणों को धारण कर ज्योतिषी देवों के समान सुशोभित हो रहे हैं। उन आभूषणों में यष्टि, हार और रत्नावली आदि, मोती तथा रत्नों के बने हुए अनेक आभूषण हैं। उनमें से यष्टि नामक आभूषण शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक, प्रकाण्डक और तरल प्रबंध के भेद से पाँच प्रकार का होता है। ये पाँचों प्रकार की यष्टियाँ मणिमध्या और शुद्धा के भेद से दो-दो प्रकार की हैं। जिसके बीच में एक मणि लगा हो, उसे मणिमध्या और जिसके बीच में मणि नहीं लगा हो, उसे शुद्धा यष्टि कहते हैं। मणिमध्या यष्टि को सूत्र तथा एकावली भी कहते हैं और यदि यही मणिमध्या यष्टि सुवर्ण तथा मणियों से चित्र-विचित्र हो तो उसे रत्नावली भी कहते हैं। जो यष्टि किसी निश्चित प्रमाण वाले सुवर्ण मणि, माणिक्य और मोतियों के द्वारा बीच में अन्तर दे-देकर गूँथी जाती है, उसे अपवर्तिका कहते हैं। जिसके बीच में एक बड़ा मोती हो वह शीर्षक है, जिसके बीच में क्रम से तीन मोती लगे हों उसे उपशीर्षक, जिसमें पाँच मोती हों उसे प्रकाण्डक, जिसके बीच में एक बड़ा मणि हो और उसके दोनों ओर क्रम-क्रम से घटते हुए छोटे-छोटे मोती लगे हों उसे तरल प्रबंध कहते हैं।
यष्टि अर्थात् लड़ियों के समूह को हार कहते हैं, वह हार लड़ियों की संख्या के न्यूनाधिक होने से इन्द्रच्छंद आदि के भेद से ग्यारह प्रकार का होता है। जिसमें १००८ लड़ियाँ हों वह इन्द्रच्छंद है। यह हार सबसे उत्कृष्ट होता है, इसे इन्द्र, चक्रवर्ती तथा तीर्थंकर ही पहनते हैं। जिसमें ५०४ लड़ियाँ हों उसे विजयच्छंद हार कहते हैं, यह हार अर्ध चक्रवर्ती और बलभद्र के पहनने योग्य है। जिसमें १०८ लड़ियाँ हों उसे हार कहते हैं, जिसमें मोतियों की ८१ लड़ियाँ हों उसे देवच्छंद, जिसमें ६४ लड़ियाँ हों उसे अर्धहार, जिसमें ५४ हों उसे रश्मिकलाप, जिसमें ३२ हों उसे गुच्छ, जिसमें २७ हों उसे नक्षत्रमाला, जिसमें २४ हों उसे अर्धगुच्छ, २० लड़ियों के हार को माणव और १० लड़ियों के हार को अर्धमाणव कहते हैं। इन इन्द्रच्छंद आदि हारों के मध्य में जब मणि लगा दिया जाता है तब उन नामों के साथ माणव शब्द और भी सुशोभित होने लगता है अर्थात् इन्द्रच्छंद माणव, विजयच्छन्द माणव आदि।
जो एक शीर्षकहार है वह शुद्धहार है। यदि शीर्षक के आगे इन्द्रच्छंद आदि उपपद लगा दिये जाते हैं तो वह भी ग्यारह भेदों से युक्त हो जाता है। इसी प्रकार उपशीर्षक आदि शुद्ध हारों के भी ग्यारह-ग्यारह भेद होते हैं। इस प्रकार सब हार पचपन प्रकार के होते हैं। अर्धमाणव हार में यदि मणि लगाया गया हो तो उसे फलकहार कहते हैं। उसी फलकहार में जब सोने के तीन अथवा पाँच फलक लगे हों तो उसके सोपान और मणि सोपान ऐसे दो भेद हो जाते हैं। इस प्रकार से तीर्थंकरदेव के द्वारा निर्मित कराये गये आभूषणों को धारण करने से उनके सभी पुत्र और पुत्रियाँ अतिशय अलंकृत हो रहे हैं। सर्व राजकुमारों में भरत अतिशय तेजस्वी सूर्य के समान हैं, युवा बाहुबली चंद्रमा के समान हैं, शेष राजपुत्र ग्रह, नक्षत्र और तारागण के समान हैं। उन सभी राजपुत्रों में ब्राह्मी दीप्ति के समान और सुन्दरी चाँदनी के समान सुशोभित हो रही हैं। सभी पुत्र-पुत्रियों से घिरे हुए तीर्थंकर ऋषभदेव ज्योतिषी देवों से घिरे हुए ऊँचे सुमेरु पर्वत के समान शोभायमान हो रहे हैं और महाराजा नाभिराय तथा माता मरुदेवी के आनन्द को बढ़ा रहे हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव राज्यसभा में सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चित्त में विद्या और कला के उपदेश की भावना जाग्रत हो रही है। इसी बीच ब्राह्मी और सुंदरी दोनों कन्याएँ मांगलिक वेष-भूषा धारण किए हुए अपने पूज्य पिता के निकट आती हैं। उस समय देखने वालों को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि- ‘‘ये कोई दिव्य कन्याएँ हैं? अथवा नागकन्याएँ हैं? अथवा दिक् कन्याएँ हैं? अथवा सौभाग्य देवियाँ हैं? अथवा लक्ष्मी और सरस्वती हैं? अथवा उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं? अथवा उन्हीं का अवतार हैं? अथवा क्या जगन्नाथ ऋषभदेवरूपी महासमुद्र से उत्पन्न हुई लक्ष्मी हैं?’’ इत्यादिरूप सभासद लोग उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। दोनों कन्याएँ पिता के समीप आकर विनयपूर्वक हाथ जोड़कर गवासन से बैठकर नमस्कार करती हैं। ‘‘हे पूज्य पिताजी! प्रणाम।’’ ‘‘चिरंजीव रहो पुत्री!’’
‘सिद्धं नमः’ इस मंगलाचरणरूप मंत्र का उच्चारण कर पुत्रियों से उच्चारण कराकर अपने दाहिने हाथ से दार्इं ओर बैठी हुई पुत्री को ‘अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ¸ ऌ ल¸ ए ऐ ओ औ, क ख ग घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य र ल व, श ष स ह, अनुस्वार (अं), विसर्ग (अः), जिह्वामूलीय और उपध्मानीय इन चार अयोगवाहपर्यंत समस्त स्वर-व्यंजनरूप शुद्ध अक्षरावली को लिखाते हैं और बाएँ हाथ से अपनी बार्इं तरफ बैठी हुई पुत्री को इकाई-दहाई आदि स्थानों के क्रम से १, २, ३, आदि संख्यारूप गणित लिखाते हैं। वे दोनों कन्याएँ पूज्य पिता ऋषभदेव के मुख से इन सिद्धमातृकारूप अक्षरलिपि व गणित को अच्छी तरह से समझकर हृदय में धारण कर लेती हैं। गणधरदेव व्याकरणशास्त्र, छन्दशास्त्र और अलंकारशास्त्र इन तीनों के समूह को ‘वाङ्मय’ कहते हैं। इस वाङ्मय के बिना न तो कोई शास्त्र है और न कोई कला है इसलिए प्रभु ऋषभदेव सबसे पहले उन पुत्रियों को वाङ्मय का ही उपदेश देते हैं।
उस समय स्वयंभू ऋषभदेव का बनाया हुआ एक बड़ा भारी व्याकरणशास्त्र प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ था, उसमें सौ से भी अधिक अध्याय थे और वह समुद्र के समान अत्यन्त गंभीर था। इसी प्रकार उन्होंने अनेक अध्यायों में छन्दशास्त्र का भी उपदेश दिया और उसके ‘उक्ता, अत्युक्ता’ आदि छब्बीस भेद भी दिखलाए। अनेक विद्याओं के अधिपति ऋषभदेव ने प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एक द्वि त्रि लघु क्रिया, संख्या और अध्वयोग, छन्दशास़्त्र के इन छह प्रत्ययों का भी निरूपण किया। प्रभु ने अलंकारों का संग्रह करते समय अथवा अलंकार संग्रह ग्रंथ में उपमा, रूपक, यमक आदि अलंकारों का कथन किया और माधुर्य, ओज आदि दशप्राण अर्थात् गुणों का भी निरूपण किया था।
कुछ ही दिनों मे ब्राह्मी और सुन्दरी दोनों पुत्रियों की व्याकरणरूपी दीपिका से प्रकाशित हुई समस्त विद्याएँ और कलाएँ अपने आप ही परिपक्व अवस्था को प्राप्त हो जाती हैं। इस प्रकार गुरु अथवा पिता के अनुग्रह से उन्होंने समस्त विद्याएँ पढ़ ली हैं अतः अब वे दोनों पुत्रियाँ सरस्वती देवी के अवतार लेने के लिए पात्रता को प्राप्त हो चुकी हैं अर्थात् वे इतनी ज्ञानवती हो चुकी हैं कि साक्षात् सरस्वती भी उनमें अवतार ले सकती हैं।
जगद्गुरु तीर्थंकर ऋषभदेव अपने भरत आदि पुत्रों को भी विनयी बनाकर क्रम से आम्नाय के अनुसार उन्हें अनेक शास्त्र पढ़ाते हैं। भरत पुत्र को अत्यन्त विस्तृत बड़े-बड़े अध्यायों से स्पष्ट अर्थशास्त्र और संग्रह प्रकरण सहित नृत्यशास्त्र पढ़ाते हैं। वृषभसेन पुत्र को गाना, बजाना आदि अनेक पदार्थों के संग्रह सहित सौ से भी अधिक अध्याय युक्त ऐसे गंधर्व शास्त्र को पढ़ाते हैं। अनन्तविजय पुत्र के लिए नाना प्रकार के सैकड़ों अध्यायों से भरी हुई चित्रकलासंबंधी विद्या का उपदेश देते हैं और लक्ष्मीशोभा सहित समस्त कलाओं का निरूपण करते हैं तथा सूत्रकार की विद्या और मकान बनाने की विद्या को भी विस्तार से सिखाते हैं। बाहुबली पुत्र के लिए कामनीति, स्त्री-पुरुषों के लक्षण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, घोड़ा-हाथी आदि के लक्षण जानने के तंत्र और रत्न परीक्षा आदि के शास्त्रों को अनेक प्रकार के बड़े-बड़े अध्यायों में विभाजित कर सिखाते हैं।
इस विषय में अधिक कहने से क्या? संक्षेप में इतना ही बस है कि लोक का उपकार करने वाले जितने भी शास्त्र हो सकते हैं, जगद्गुरु प्रभु ऋषभदेव उन सभी को अपने पुत्रों को सिखलाते हैं। जिस प्रकार स्वभाव से देदीप्यमान रहने वाले सूर्य का तेज शरद् ऋतु में और भी अधिक हो जाता है उसी प्रकार प्रभु ऋषभदेव के अपनी समस्त विद्याओं के प्रकाशित कर देने पर उनका तेज उस समय अत्यधिक महिमा को प्राप्त हो रहा है। इस प्रकार अपने इष्ट पुत्र-पुत्रियों से घिरे हुए और अनेक प्रकार के दिव्य सुखों का अनुभव करते हुए तीर्थंकर ऋषभदेव का बीस लाख पूर्व वर्षपर्यन्त का कुमार काल पूर्ण हो चुका है।
इसी बीच में काल के प्रभाव से महौषधि, दीप्तौषधि, कल्पवृक्ष तथा सब प्रकार की औषधियाँ शक्तिहीन हो गई हैं। मनुष्यों के निर्वाह के लिए जो बिना बोये हुए धान्य उत्पन्न हो रहे थे, वे भी काल के प्रभाव से प्रायः विरलता को प्राप्त हो गये हैं, जहाँ कहीं कुछ-कुछ मात्रा में ही रह गये हैं। कल्पवृक्ष रस, वीर्य और फल देने आदि से रहित हो गये हैं। ऐसे समय में वहाँ की प्रजा रोग आदि अनेक बाधाओं से व्याकुलता को प्राप्त होने लगती है। तब जीवित रहने की इच्छा से प्रजा के प्रमुख-प्रमुख लोग महाराजा नाभिराय के समीप पहुँचकर अपना दुःख निवेदन करते हैं। महाराज नाभिराय कहते हैं- ‘‘हे प्रजाजनों! अब तुम तीर्थंकर के अवतार उन ऋषभदेव के पास जाओ, वे ही तुम्हें आजीविका का उपाय बतायेंगे।’’
इतना सुनकर तथा नाभिराय को नमस्कार कर प्रजाजन तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव के समीप आ जाते हैं और साष्टांग नमस्कार कर प्रार्थना करते हैं- ‘‘हे प्रभु! जीवित रहने की इच्छा से हम लोग आपकी शरण में आये हुए हैं, इसलिए हे तीन लोक के नाथ! अब आप जीविका का उपाय बतलाकर हम लोगों की रक्षा कीजिए। हे विभो! जो कल्पवृक्ष पिता के समान हमारी रक्षा करते थे, वे सब मूल से नष्ट हो गये हैं और जो धान्य बिना बोए हुए उग रहे थे, वे भी अब नहीं फल रहे हैं। हे देव! हम लोगों को भूख-प्यास की बाधा सता रही है और अन्न-पानी से रहित हुए हम लोग अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते हैं। हे देव! शीत, आतप, महावायु और वर्षा आदि का उपद्रव, आश्रयरहित, मकानरहित हम लोगों को दुःखी कर रहा है इसलिए अब इन सबके दूर करने का उपाय बतलाइये। हे विभो! आप ही इस युग के आदिकर्ता हैं और कल्पवृक्ष के समान उन्नत हैं सो आपका आश्रय पाकर हम लोग भय के स्थान कैसे हो सकते हैं? हे देव! जिस प्रकार हम लोगों की आजीविका निरुपद्रव हो जाये, आज उसी प्रकार का उपदेश देकर हम लोगों को कृतार्थ कीजिये। हे दयानिधे! अब शीघ्र ही हम लोगों पर प्रसन्न होइये।’’
प्रजाजनों के इस प्रकार के दीन वचन सुनकर दया के सागर तीर्थंकर देव का हृदय करुणा से आद्र्र हो उठा, वे अपने मन में विचार करने लगे- ‘‘पूर्व और पश्चिम विदेहक्षेत्र में जो स्थिति वर्तमान है, वही स्थिति आज यहाँ प्रवृत्त करने योग्य है तभी यह प्रजा जीवित रह सकती है। वहाँ जिस प्रकार असि, मषि आदि छह कर्म हैं, जैसी क्षत्रिय आदि वर्णों की स्थिति है और जैसी ग्राम-नगर, घर आदि की पृथक-पृथक रचना है उसी प्रकार यहाँ पर भी होनी चाहिए। इन्हीं उपायों से इन सबकी आजीविका चल सकती है। इनके जीवन के लिए और कोई अन्य उपाय नहीं हैं।१ कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने पर अब यह कर्मभूमि प्रगट हो गई है, इसलिए यहाँ अब प्रजा को असि, मषि आदि छह क्रियाओं द्वारा आजीविका करना ही उचित है।’’ इस प्रकार प्रभु ऋषभदेव क्षणभर सोचकर पुनः प्रजा को बार-बार आश्वासन देते हुए कहते हैं- ‘‘तुम लोग भयभीय मत होओ।’’
इतना कहते ही प्रभु उसी क्षण मन में इन्द्र का स्मरण करते हैं। प्रभु के स्मरणमात्र से ही सौधर्म इन्द्र बहुत से देवों के साथ वहाँ उपस्थित हो जाता है और प्रभु को नमस्कार कर उनकी इच्छानुसार प्रथम ही मांगलिक कार्य करके अयोध्यापुरी के मध्य में जिनमंदिर की रचना करता है। उस काल में शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न था तथा सूर्य आदि ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में स्थित थे और जगद्गुरु ऋषभदेव की हर तरह की अनुवूâलता थी। मध्य में जिनमंदिर का निर्माण करके वह इन्द्र पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर इस प्रकार चारों दिशाओं में भी क्रम से जिनमंदिर का निर्माण करता है पुनः कौशल आदि महादेश, अयोध्या आदि महानगर, वन और सीमा सहित गाँव, खेड़ों आदि की भी रचना करता है।
सुकोशल, अवन्ती, पुण्ड्र, उण्ड्र, अश्मक, रम्यक, कुरु, काशी, कलिंग, अंग, वंग, सुह्य, समुद्रक, काश्मीर, उशीनर, आनर्त, वत्स,पंचाल, मालव, दशार्ण, कच्छ, मगध, विदर्भ, कुरुजांगल, करहाट, महाराष्ट्र, सुराष्ट्र, आभीर, कोंकण, वनवास, आन्ध्र, कर्णाट, कौशल, चोल, केरल, दारु, अभिसार, सोवीर, शूरसेन, अपरान्तक, विदेह, सिन्धु, गान्धार, यवन, चेदि, पल्लव, काम्बोज, आरट्ट, बाल्हीक, तुरुष्क, शक और केकय इन देशों की रचना करता है तथा इनके सिवाय और भी अनेक देशों का विभाग कर देता है।
उस समय इन्द्र ने कितने ही देश अदेवमातृक, कितने ही देश देवमातृक और कितने ही देश साधारण बनाएँ। जहाँ नदी और नहरों से सिंचाई होती है वे अदेवमातृक हैं, जहाँ वर्षा के जल से सिंचाई हो जाती है ऐसे प्रदेश देवमातृक कहलाते हैं और जहाँ दोनों प्रकार से सिंचाई संभव हो उन्हें साधारण देश कहते हैं।
‘विजयार्ध पर्वत के समीप से लेकर समुद्रपर्यंत (दक्षिण दिशा में लवण समुद्रपर्यंत) कितने ही देश साधारण थे, कितने ही बहुत जल वाले थे और कितने ही देश जल की दुर्लभता से सहित थे।’ उन सभी देशों से व्याप्त यह पृथ्वी (भरत क्षेत्र का आर्यख्ण्ड) ऐसी प्रतीत हो रही थी मानों यह स्वर्ग का एक टुकड़ा ही हो। जिस प्रकार स्वर्ग के स्थानों की सीमाओं पर लोकपाल देवों के स्थान होते हैं उसी प्रकार उन देशों की अन्त सीमाओं पर भी सब ओर सीमारक्षक पुरुषों के किले बना दिए। उन देशों के मध्य में भी अनेक देश ऐसे थे जो लुब्धक, आरण्य, चरट, पुलिंद तथा शबर आदि म्लेच्छ जाति के लोगों द्वारा रक्षित हो रहे थे। उन देशों के मध्य भाग में कोट, प्राकार, परिखा, गोपुर और अटारी आदि से शोभायमान राजधानी बनाई गई थीं। राजधानी को घेरकर सब ओर शास्त्रोक्त लक्षण वाले गाँवों आदि की रचना हुई थी।
जिनमें बाड़ से घिरे हुए घर हों, अधिकतर शूद्र और किसान लोग रहते हों, जो बगीचे और तालाबों से सहित हों, उन्हें ग्राम कहते हैं। जिसमें सौ घर हों उसे छोटा गाँव कहते हैं। जिसमें पाँच सौ घर हों और किसान धनसंपन्न हों उसे बड़ा गाँव कहते हैं। छोटे गाँवों की सीमा एक कोस की और बड़े गाँवों की सीमा दो कोस की होती है। नदी, पहाड़, गुफा, श्मशान, क्षीरवृक्ष, बबूल आदि कंटीले वृक्ष, वन और पुल, इनसे गाँवों की सीमा का विभाग किया जाता है।
जो परिखा, गोपुर, अटारी, कोट और प्राकार से सुशोभित हो, जिसमें अनेक भवन बने हों और प्रधान पुरुषों के रहने योग्य हो, वह पुर या नगर कहलाता है।
जो नगर नदी और पर्वत से घिरा हो, उसे खेट कहते हैं। जो केवल पर्वत से घिरा हो, उसे कर्वट कहते हैं। जो पाँच सौ गाँवों से घिरा हो, वह मडम्ब कहलाता है। जो समुद्र के किनारे बसा हो, उसे पत्तन कहते हैं। जो नदी के किनारे हो, वह द्रोणमुख है। जो ऊँचे-ऊँचे धान्य के ढेरों से सहित हो, वह संवाह है।
इस प्रकार इन्द्र जहाँ-तहाँ उन-उन योग्य स्थानों के अनुसार बड़े ही अच्छे ढंग से गाँव-नगर आदि की रचना कर देता है, उसी समय से वह ‘पुरन्दर’ इस सार्थक नाम को धारण कर लेता है। तदनन्तर वह सौधर्म इन्द्र तीर्थंकर ऋषभदेव की आज्ञा से इन नगर आदि स्थानों में प्रजा को बसाकर कृतकृत्य होता हुआ प्रभु की आज्ञा लेकर अपने स्वर्गधाम को चला जाता है पुनः तीर्थंकर ऋषभदेव अपनी बुद्धि की कुशलता से असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्पकला इन छह क्रियाओं का प्रजा के लिए उपदेश देते हैं। उस समय प्रभु सरागी हैं, गृहस्थावस्था में राज्य सिंहासन पर आरूढ़ हैं, वीतरागी नहीं हैं, इसलिए वो प्रजा को गृहस्थाश्रम की आजीविका का उपाय बतला रहे हैं
‘‘हे प्रजाजनों! असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह क्रियाओं द्वारा तुम लोग आजीविका करो। तलवार आदि धारण करना असि कर्म है। लिखकर आजीविका करना मषिकर्म है। जमीन को जोतना-बोना कृषि कर्म है। शास्त्र पढ़ाकर या नृत्य-गायन आदि सिखाकर आजीविका करना विद्या कर्म है। व्यापार करना वाणिज्य कर्म है और हस्त की कुशलता से जीविका करना शिल्पकर्म है, यह शिल्प चित्र खींचना, पूâल-पत्ते काटना आदि की अपेक्षा अनेक प्रकार है।’’
ऋषभ तीर्थंकर उस समय उन-उन की योग्यतानुसार उन्हें वैसी-वैसी शिक्षा दे रहे हैं। उसी समय आदिब्रह्मा ऋषभदेव तीन वर्ण की स्थापना करते हैं। जो तलवार धारण कर विपत्ति से रक्षा करने में समर्थ हैं उन्हें क्षत्रिय संज्ञा देते हैं, जो खेती, व्यापार तथा पशुपालन आदि के द्वारा आजीविका करने योग्य हैं उन्हें वैश्य संज्ञा दी तथा जो उनकी सेवा शुश्रूषा के योग्य हैं उन्हें शूद्र संज्ञा से अभिहित करते हैं, शूद्र में दो भेद हैं-कारू और अकारू। धोबी आदि शूद्र कारू हैं और उनसे भिन्न अकारू हैं।
प्रभु से उपदेश, आदेश और वर्ण व्यवस्था को प्राप्त कर प्रजा अपने-अपने योग्य कर्मों को यथायोग्य रूप से करना प्रारंभ कर देती है। अपने वर्ण की निश्चित आजीविका को छोड़कर कोई भी मनुष्य दूसरी आजीविका नहीं करता है, इसलिए उनके कार्यों में कभी संकर (मिलावट) दोष नहीं आता है। उस समय उनके विवाह, जाति संबंध तथा व्यवहार आदि सभी कार्य प्रभु ऋषभदेव की आज्ञानुसार ही होते थे। उस काल में जितने भी पापरहित आजीविका के उपाय थे, वे सब प्रभु ऋषभदेव की सम्मति से ही प्रवृत्त हुए थे, क्योंकि सनातन ब्रह्मा प्रभु ऋषभदेव ही माने गए हैं।
युग की आदि में प्रथम तीर्थंकर के अवतार ऋषभदेव ने इस प्रकार से कर्मयुग का प्रारंभ किया था, इसलिए पुराण के जानने वाले महामुनि उन्हें ‘कृतयुग’ नाम से पुकारते हैं। जिस दिन प्रभु ने वर्ण व्यवस्था बनाकर प्रजा को असि, मसि आदि षट्कर्मों का उपदेश दिया था वह पुण्य तिथि मानी जा रही है अतः उसी समय से प्रभु ऋषभदेव को प्रजा ने ‘प्रजापति’ कहकर भी सम्बोधा था। अब प्रभु के द्वारा सदुपदेश प्राप्त कर प्रजा सुख से अपना गार्हस्थ्य जीवन बिता रही है।
एक लाख योजन विस्तृत गोलाकार (थाली सदृश) इस जम्बूद्वीप में हिमवान, महाहिमवान, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी इन छह कुलाचलों से विभाजित सात क्षेत्र हैं, जिनके नाम-भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत हैं। भरत क्षेत्र का दक्षिण-उत्तर विस्तार ५२६-६/१९ योजन है। आगे पर्वत और क्षेत्र के विस्तार विदेह क्षेत्र तक दूने-दूने हैं पुनः आधे-आधे हैं।
इनमें से भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में षट्काल परिवर्तन से भोगभूमि और कर्मभूमि की व्यवस्था चलती रहती है जो अशाश्वत कहलाती है। हैमवत और हैरण्यवत क्षेत्र में जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है, हरि और रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि की व्यवस्था है। विदेहक्षेत्र में दक्षिण-उत्तर में देवकुरु-उत्तरकुरु नाम से क्षेत्र हैं जहाँ पर उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था है। ये छहों भोगभूमियाँ शाश्वत हैं। विदेहक्षेत्र में पूर्व-पश्चिम में १६ वक्षार पर्वत और १२ विभंगा नदियों के निमित्त से ३२ क्षेत्र हो जाते हैं जिनके नाम कच्छा, सुकच्छा आदि हैं। इन बत्तीसों विदेहक्षेत्रों में कर्मभूमि की व्यवस्था सदाकाल एक जैसी रहती है अतः इन्हें शाश्वत कर्मभूमि कहते हैं।
विदेहक्षेत्र का विस्तार (दक्षिण-उत्तर) ३३६८४-४/१९ योजन है और उसकी लम्बाई (पूर्व-पश्चिम) १००००० योजन है। इस विदेह के ठीक मध्य में सुदर्शन मेरु पर्वत है जो एक लाख चालीस योजन ऊँचा है। पृथ्वी पर इसकी चौड़ाई १० हजार है और घटते-घटते ऊपर जाकर ४ योजन मात्र की रह गई है। इस सुमेरु की चारों विदिशाओं में एक-एक गजदन्त पर्वत है जो कि एक तरफ से सुमेरु का स्पर्श कर रहे हैं और दूसरी तरफ से निषध-नील पर्वत को छूते हुए हैं। इन पर्वतों के निमित्तों से भी विदेह की चारों दिशाएँ पृथव्â-पृथक् विभक्त हो गई हैं। सुमेरु से उत्तर की ओर उत्तरकुरु में ईशान कोण में जम्बूवृक्ष है और सुमेरु से दक्षिण की ओर देवकुरु है जिसमें आग्नेय कोण में शाल्मलीवृक्ष है। इन दोनों कुरुओं में दश प्रकार के कल्पवृक्ष होने से वहाँ पर सदा ही उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है।
सुमेरु के पूर्व-पश्चिम में विदेह क्षेत्र में सीता-सीतोदा नदियाँ बहती हैं। इससे पूर्व-पश्चिम विदेह में भी दक्षिण-उत्तर भाग हो जाते हैं। सुमेरु के पूर्व में और सीता नदी के उत्तर में सर्वप्रथम भद्रसाल वन की वेदिका है, पुनः क्षेत्र है, पुनः वक्षार पर्वत है जो कि ५०० योजन विस्तृत, १५५९३-२/१९ योजन लम्बा तथा नील पर्वत के पास ४०० योजन एवं सीता नदी के पास ५०० योजन ऊँचा है। यह पर्वत सुवर्णमय है। इस पर चार वूâट हैं। जिनमें से नदी के पास के वूâट पर जिनमंदिर एवं शेष तीन कूटों पर देव-देवियों के आवास हैं। इस पर्वत के बाद क्षेत्र, पुनः विभंगानदी, पुनः क्षेत्र, पुनः वक्षार पर्वत ऐसे क्रम से चार वक्षार पर्वत और तीन विभंगा नदियों के अन्तराल से तथा एक तरफ भद्रसाल की वेदी और दूसरी तरफ देवारण्य वन की वेदी के निमित्त से इस एक तरफ से विदेह में आठ क्षेत्र हो गए हैं। ऐसे ही सीता नदी के दक्षिण तरफ ८ क्षेत्र हैं तथा पश्चिम विदेह में सीतोदा नदी के दक्षिण-उत्तर में ८-८ क्षेत्र ऐसे बत्तीस क्षेत्र हैं। बत्तीस विदेह क्षेत्रों के नाम-
कच्छा, सुकच्छा, महाकच्छा, कच्छकावती, आवर्ता, लांगलावर्ता, पुष्कला, पुष्कलावती, वत्सा, सुवत्सा, महावत्सा, वत्सकावती, रम्या, सुरम्या, रमणीया, रम्यकावती, पद्मा, सुपद्मा, महापद्मा, पद्मकावती, शंखा, नलिनी, कुमुदा, सरिता, वप्रा, सुवप्रा, महावप्रा, वप्रकावती, गन्धा, सुगन्धा, गन्धिला और गन्धमालिनी।
कच्छा विदेह का वर्णन-
यह कच्छा विदेह क्षेत्र पूर्व-पश्चिम में २२१२-७/८ योजन विस्तृत है और दक्षिण-उत्तर में १६५९२-२/१९ योजन लम्बा है। इस क्षेत्र के बीचों-बीच में ५० योजन चौड़ा, २२१२-७/८ योजन लम्बा और २५ योजन ऊँचा विजयार्ध पर्वत है। इस विजयार्ध में भी भरतक्षेत्र के विजयार्ध के समान दोनों पाश्र्व भागों में दो-दो विद्याधर श्रेणियाँ हैं। इन दोनों तरफ की श्रेणियों पर विद्याधर मनुष्यों की ५५-५५ नगरियाँ हैं। इस विजयार्ध पर्वत पर ९ कूट हैं, इनमे से एक कूट पर जिनमंदिर और शेष ८ कूटों पर देवों के भवन हैं। नील पर्वत की तलहटी में गंगा-सिंधु नदियों के निकलने के लिए दो कुण्ड बने हैं। इन कुण्डों में से दो नदियाँ निकलकर सीधी बहती हुई विजयार्ध पर्वत की तिमिस्रगुफा और खण्डप्रपातगुफा में प्रवेश कर बाहर निकलकर क्षेत्र में बहती हुई आगे आकर सीता नदी में प्रवेश कर जाती हैं। इस कच्छा देश में विजयार्ध और गंगा-सिंधु के निमित्त से छह खण्ड हो जाते हैं। इनमें से नदी के पास के मध्य में आर्यखण्ड है और शेष पाँचों म्लेच्छ खण्ड हैं। आर्यखण्ड के बीचों-बीच में क्षेमा नाम की नगरी है, जो कि मुख्य राजधानी है। यह एक कच्छा विदेह देश का वर्णन है। इसी प्रकार से महाकच्छा आदि इकतीस विदेह देशों की व्यवस्था है, ऐसा समझना।
विदेह क्षेत्र की व्यवस्था-प्रत्येक विदेह में ९६ करोड़ ग्राम, २६ हजार नगर, १६ हजार खेट,२४ हजार कर्वट, ४ हजार मडंब, ४८ हजार पत्तन, ९९ हजार द्रोण, १४ हजार संवाह और २८ हजार दुर्गाटवी हैं।
जो चारों ओर कांटों की बाड़ से वेष्टित हो, उसे ग्राम कहते हैं। चार दरवाजों युक्त कोट से वेष्टित को नगर कहते हैं। नदी और पर्वत दोनों से वेष्टित को खेट कहते हैं। पर्वत से वेष्टित कर्वट हैं। ५०० ग्रामों से संयुक्त मडंब हैं। जहाँ रत्नादि वस्तुओं की निष्पत्ति होती है, वे पत्तन हैं। नदी से वेष्टित को द्रोण, समुद्र की वेला से वेष्टित संवाह और पर्वत के ऊपर बने हुए को दुर्गाटवी कहते हैं।
प्रत्येक विदेह देश में प्रधान राजधानी और महानदी के बीच स्थित आर्यखण्ड में एक-एक उपसमुद्र है, और उस समुद्र में एक-एक टापू है, जिस पर ५६ अन्तरद्वीप, २६ हजार रत्नाकर और रत्नों के क्रय-विक्रय के स्थानभूत ऐसे ७०० कुक्षिवास होते हैं।
सीता-सीतोदा नदियों के समीप जल में पूर्वादि दिशाओं में मागध, वरतनु और प्रभास नामक व्यंतर देवों के तीन द्वीप हैं। विदेह क्षेत्र में वर्षा ऋतु-विदेह क्षेत्र में वर्षाकाल में सात प्रकार के कालमेघ सात-सात दिन तक अर्थात् ४९ दिनों तक और द्रोण नाम वाले बारह प्रकार के श्वेत मेघ सात-सात दिन तक (१२²७·८४ दिनों तक) बरसते हैं। इस प्रकार वहाँ वर्षा ऋतु में कुल ४९±८४·१३३ दिन मर्यादापूर्वक वर्षा होती है। विदेह देश में क्या-क्या नहीं है ?- विदेह क्षेत्र में सर्वत्र कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता है। सात प्रकार की ‘‘ईति’’ नहीं है। १. अतिवृष्टि
२. अनावृष्टि
३. मूषक प्रकोप
४. शलभ प्रकोप (टिड्डी)
५. शुक प्रकोप
६. स्वचक्र प्रकोप और
७. परचक्र प्रकोप-ये सात ईतियाँ वहाँ नहीं हैं तथा गाय या मनुष्य आदि जिसमें अधिक मरने लगें, उसे मारि रोग कहते हैं वह भी वहाँ नहीं है। वहाँ कुदेव, कुलिंगी साधु और कुमत भी नहीं है अर्थात् वहाँ पर दुर्भिक्ष, ईति, मारि रोग, कुदेव, कुलिंगी और कुमतों का अभाव है। वहाँ विदेह में हमेशा चतुर्थकाल सदृश ही वर्तना रहती है अर्थात् सतत ही उत्कृष्ट ५०० धनुष की अवगाहना वाले मनुष्य होते हैं और वहाँ मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक कोटि पूर्व वर्ष की है। वहाँ पर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये तीन वर्ण होते हैं जो कि असि, मषि, कृषि आदि के द्वारा आजीविका करते हैं। वहाँ पर हमेशा गृहस्थ धर्म और मुनि धर्म चलता रहता है तथा हमेशा ही तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण और प्रतिनारायण होते रहते हैं। इस जम्बूद्वीप के ३२ विदेहों में यदि अधिक से अधिक तीर्थंकर आदि होते हैं तो ३२ होते हैं और कम से कम ४ अवश्य होते हैं। वहाँ चार तीर्थंकर आज भी विद्यमान है जिनके नाम हैं-सीमंधर, युगमंधर, बाहु और सुबाहु। ये विहरमाण तीर्थंकर भी कहलाते हैं ऐसे ही पाँचों मेरु संबंधी ३२²५·१६० विदेह होते हैं। उनमें तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि भी अधिक रूप से १६० और कम से कम २० माने गये हैं।
चौदह नदियाँ-हिमवान आदि छह पर्वतों पर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिंच्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ऐसे छह सरोवर हैं इनमें पद्म तथा पुण्डरीक सरोवर से तीन एवं शेष चार सरोवरों से दो-दो नदियाँ निकलती हैं। जिनके नाम हैं-गंगा-सिंधु, रोहित-रोहितास्या, हरित-हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकांता, सुवर्णकूला-रूप्यकूला और रक्ता-रक्तोदा। ये चौदह नदियाँ दो-दो मिलकर भरत आदि सात क्षेत्रों में बहती हैं।
कच्छा विदेह का वर्णन-2
इस क्षेत्र का विस्तार ५२६-६/१९ योजन है। इसके बीच में पूर्व-पश्चिम लम्बा, ५० योजन चौड़ा और २५ योजन ऊँचा एक विजयार्ध पर्वत है इसमें दक्षिण उत्तर बाजू में विद्याधरों की नगरियाँ हैं। इस पर्वत में दो गुफाएँ हैं जिनके नाम हैं-तमिस्र गुफा और खण्डप्रपात गुफा। हिमवान पर्वत के पद्म सरोवर के पूर्वतोरण द्वार से गंगा नदी एवं पश्चिम तोरण द्वार से सिंधु नदी निकलकर ५००-५०० योजन तक पूर्व-पश्चिम दिशा में पर्वत पर ही बहकर पुनः दक्षिण की ओर मुड़कर पर्वत के किनारे आ जाती है। वहाँ पर गोमुख आकार वाली नालिका से नीचे गिरती है। हिमवान पर्वत की तलहटी में नदी गिरने के स्थान पर गंगा-सिंधु कुण्ड बने हुए हैं। जिनमें बने कूटों पर गंगा-सिंधु देवी के भवन हैं। भवन की छत पर फूले हुए कमलासन पर अकृत्रिम जिनप्रतिमा विराजमान हैं। उन प्रतिमा के मस्तक पर जटाजूट का आकार बना हुआ है। ऊपर से गिरती हुई गंगा-सिंधु नदियाँ ठीक भगवान की प्रतिमा के मस्तक पर अभिषेक करते हुए के समान पड़ती हैं पुनः कुण्ड से बाहर निकलकर क्षेत्र में कुटिलाकार से बहती हुई पूर्व-पश्चिम की तरफ लवण समुद्र में प्रवेश कर जाती हैं।
इसलिए इस भरतक्षेत्र के विजयार्ध पर्वत और गंगा-सिंधु नदी के निमित्त से छह खण्ड हो जाते हैं। इनमें से जो दक्षिण की तरफ बीच का खण्ड है वह आर्यखण्ड है, शेष पाँच म्लेच्छ खण्ड हैं। उत्तर की तरफ के तीन म्लेच्छ खण्डों में से बीच वाले म्लेच्छ खण्ड में एक वृषभाचल पर्वत है। चक्रवर्ती जब इन छहों खण्डों को जीत लेता है तब अपनी विजय प्रशस्ति इसी पर्वत पर लिखता है।
भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड के मध्य में अयोध्या नगरी है। इस अयोध्या के दक्षिण में ११९ योजन की दूरी पर लवण समुद्र की वेदी है और उत्तर की तरफ इतनी ही दूरी पर विजयार्ध पर्वत की वेदिका है। अयोध्या से पूर्व में १००० योजन की दूरी पर गंगा नदी की तट वेदी है अर्थात् आर्यखण्ड की दक्षिण दिशा में लवण समुद्र, उत्तर दिशा में विजयार्ध, पूर्व दिशा में गंगा नदी एवं पश्चिम दिशा में सिन्धु नदी है, ये चारों आर्यखण्ड की सीमारूप हैं।
अयोध्या से दक्षिण में ४७६००० मील (चार लाख छियत्तर हजार मील) जाने से लवण समुद्र है और उत्तर में ४७६००० मील जाने से विजयार्ध पर्वत है। उसी प्रकार अयोध्या से पूर्व ४०००००० (चालीस लाख) मील दूर पर गंगा नदी तथा पश्चिम में इतनी ही दूर पर सिन्धु नदी है। आज का उपलब्ध सारा विश्व इस आर्यखण्ड में है। हम और आप सभी इस आर्यखण्ड में ही भारतवर्ष में रहते हैं। इस भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड से विदेह क्षेत्र की दूरी २० करोड़ मील से अधिक ही है। भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में सदा ही अरहट घटीr यंत्र के समान छह कालों का परिवर्तन होता रहता है। षट्काल परिवर्तन-‘‘भरत और ऐरावत क्षेत्र में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी इन दो कालों के द्वारा षट्काल परिवर्तन होता रहता है। इनमें से अवसर्पिणीकाल में जीवों के आयु, शरीर आदि की हानि एवं उत्सर्पिणी में वृद्धि होती रहती है।’’
अवसर्पिणी के सुषमा-सुषमा, सुषमा, सुषमादुःषमा, दुःषमासुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा ऐसे छह भेद हैं। ऐसे ही उत्सर्पिणी के इनसे उल्टे अर्थात् दुःषमादुःषमा, दुःषमा, दुःषमासुषमा, सुषमादुःषम, सुषमा, और सुषमासुषमा ये छह भेद हैं। अवसर्पिणी के सुषमासुषमा की स्थिति ४ कोड़ाकोड़ी सागर, सुषमा की ३ कोड़ाकोड़ी सागर, सुषमादुःषमा की २ कोड़ाकोड़ी सागर, दुःषमासुषमा की ४२ हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर, दुषमा की २१ हजार वर्ष की एवं अतिदुःषमा की २१ हजार वर्ष की है। ऐसे ही उत्सर्पिणी में २१ हजार वर्ष से समझना। इन छह कालों में से प्रथम, द्वितीय और तृतीय काल में क्रम से उत्तम, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है तथा चौथे, पाँचवे और छठे काल में कर्मभूमि की व्यवस्था हो जाती है। उत्तम भोगभूमि में मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई तीन कोश और आयु तीन पल्य प्रमाण होती है। मध्यम भोगभूमि में शरीर की ऊंचाई दो कोश, आयु दो पल्य की होती है और जघन्य भोगभूमि में शरीर की ऊँचाई एक कोश और आयु एक पल्य की है। यहाँ पर दश प्रकार के कल्पवृक्षों से भोगोपभोग सामग्री प्राप्त होती है। चतुर्थ काल में उत्कृष्ट अवगाहना सवा पाँच सौ धनुष और उत्कृष्ट आयु एक पूर्व कोटि वर्ष है। पंचम काल में शरीर की ऊँचाई ७ हाथ और आयु १२० वर्ष है। छठे काल में शरीर २ हाथ का और आयु २० वर्ष है।
इस वर्तमान की अवसर्पिणी में-‘‘तृतीय काल में पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमन्धर, सीमंकर, सीमन्धर, विमलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित्, नाभिराज और उनके पुत्र ऋषभदेव ये कुलकर उत्पन्न हुए हैं।’’ अन्यत्र ग्रंथों में नाभिराय को १४वाँ अंतिम कुलकर माना है। यहाँ पर नाभिराय के पुत्र प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को भी कुलकर संज्ञा दे दी है। इस युग में कर्मभूमि के प्रारंभ में तीर्थंकर ऋषभदेव के सामने जब प्रजा आजीविका की समस्या लेकर आई, तभी प्रभु की आज्ञा से इन्द्र ने ग्राम, नगर आदि की रचना कर दी पुनः प्रभु ने अपने अवधिज्ञान से विदेह क्षेत्र की सारी व्यवस्था को ज्ञातकर प्रजा में वर्ण व्यवस्था बनाकर उन्हें आजीविका के साधन बतलाये थे।
एक समय स्वर्ग से इन्द्र के साथ देवगण आकर तीर्थंकर ऋषभदेव महाराज का सम्राट पद पर अभिषेक करने के लिए महाराजा नाभिराय से अनुमति प्राप्त कर बहुत वैभव के साथ राज्याभिषेक महोत्सव मनाते हैं। उस समय समस्त आर्यखण्ड आनन्द से भर जाता है और अयोध्या नगर देव-देवियों से खचाखच भर जाता है। देवों ने अयोध्या नगरी को खूब अच्छी तरह से सजाई है। प्रजा के लोगों ने अपने-अपने मकानों के अग्रभाग पर पताकायें लगाई हैं जो कि आकाश में फहरा रही हैं। उस समय राजमन्दिर में आनन्दभेरियाँ बज रही हैं, स्त्रियाँ मंगलगान गा रही हैं और देवांगनाएँ नृत्य कर रही हैं। गन्धर्वजाति के देव मंगलस्तोत्रों के साथ तीर्थंकर प्रभु का पराक्रम गा रहे हैं और देवगण मिलकर-
‘हे नाथ! त्वं जय, जीव, वर्धस्व, वर्धस्व।’’ इत्यादि पदों के द्वारा जय-जयनाद कर रहे हैं।
राज्याभिषेक के पहले देव-कारीगरों ने आनन्दमण्डप बनाया है और उसके मध्य में मिट्टी की वेदी बनाई है, उस पर रत्नों के चूर्ण से रांगोली-चित्ररचना की गई है और सर्वत्र नाना वर्ण के फूल बिखेरे गये हैं। ऊपर से चनेवा बाँधा गया है, मोतियों और मणियों से निर्मित तोरणद्वार सजाये गये हैं। वेदी में मंगलद्रव्य और मंगलकलश स्थापित हैं। देवियाँ अष्ट मंगलद्रव्य को हाथ में धारण कर खड़ी हैं। देवअप्सराएँ चँवर ढोर रही हैं और देवगण मंगलस्नान की सामग्री लेकर वहाँ आ रहे हैं।
उसी समय राजमहल के आँगनरूपी रंगभूमि में सौधर्मइन्द्र योग्य सिंहासन पर पूर्व की ओर मुख करके श्री ऋषभदेव को बैठाते हैं। तब देवों द्वारा मृदंग आदि वाद्य बजाये जाने लगते हैं जिनका गंभीर नाद सारे लोक में व्याप्त हो जाता है। किन्नरियाँ वीणा बजाती हुई संगीत स्वर के साथ प्रभु का यश गाने लगती हैं। प्रभु के अभिषेक के लिए गंगा-सिन्धु इन दोनों महानदियों का जल लाया जा रहा है जो कि हिमवानपर्वत के शिखर से धारारूप में नीचे गिरते समय ही लिया जाता है, नीचे गिरकर पृथ्वीतल से स्पर्शित होने के पहले ही घड़ों में भरा जा रहा है। इसी प्रकार ऊपर पड़ती हुई अन्य नदियों का पवित्र जल भी लाया जा रहा है।
इन्द्र स्वयं खड़े होकर बड़े हर्ष से श्री ऋषभदेव के मस्तक पर घड़े से जलधारा डालते हुए राज्याभिषेक कर रहा है। अन्य देवगण भी भक्ति से विभोर होकर प्रभु का अभिषेक कर रहे हैं। श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी देवियाँ भी अपने-अपने सरोवरों से जल लाकर मंगल अभिषेक कर रही हैं। नन्दीश्वर द्वीप में जो नन्दा, नन्दोत्तरा आदि बावड़ियाँ हैं उनके जल से भी अभिषेक किया जा रहा है। इसके सिवाय लवणसमुद्र, क्षीरसमुद्र, नन्दीश्वर समुद्र, और स्वयंभूरमण समुद्र के जल को लाकर भी देवगण अभिषेक कर रहे हैं। इन्द्र उस समय स्वयं पवित्र जगद्गुरु ऋषभदेव के शरीर का ही प्रक्षालन नहीं कर रहे थे प्रत्युत् देखने वाले देवों और मनुष्यों की मनोवृत्ति, नेत्र और शरीर का भी प्रक्षालन कर रहे थे। अर्थात् उस समय दर्शकों के मन का पाप मैल धुल रहा था, उन्हें पुण्यबंध हो रहा था, उनके नेत्र पवित्र और तृप्त हो रहे थे तथा प्रत्येक दर्शक के शरीर पर अभिषेक के जल के छींटे पड़ने से उनके शरीर भी पवित्र हो रहे थे। उस समय प्रभु के अभिषेक के बहते हुए जल से सब तरफ पृथ्वी व्याप्त हो गई थी सो ऐसा मालूम पड़ता था मानो स्वामी ऋषभदेव की राज्य-सम्पदा से संतुष्ट होकर अपने शुभ भाग्य से यह पृथ्वी बढ़ ही रही है।
जैनम जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
कर्मयुग के प्रारंभ में तीर्थंकर ऋषभदेव स्वयं अपने पुत्रों के लिए कण्ठ और वक्षस्थल के अनेक आभूषण बनाते हैं, भरत, बाहुबली आदि सभी पुत्र भी उन आभूषणों को धारण कर ज्योतिषी देवों के समान सुशोभित हो रहे हैं। उन आभूषणों में यष्टि, हार और रत्नावली आदि, मोती तथा रत्नों के बने हुए अनेक आभूषण हैं। उनमें से यष्टि नामक आभूषण शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक, प्रकाण्डक और तरल प्रबंध के भेद से पाँच प्रकार का होता है। ये पाँचों प्रकार की यष्टियाँ मणिमध्या और शुद्धा के भेद से दो-दो प्रकार की हैं। जिसके बीच में एक मणि लगा हो, उसे मणिमध्या और जिसके बीच में मणि नहीं लगा हो, उसे शुद्धा यष्टि कहते हैं। मणिमध्या यष्टि को सूत्र तथा एकावली भी कहते हैं और यदि यही मणिमध्या यष्टि सुवर्ण तथा मणियों से चित्र-विचित्र हो तो उसे रत्नावली भी कहते हैं। जो यष्टि किसी निश्चित प्रमाण वाले सुवर्ण मणि, माणिक्य और मोतियों के द्वारा बीच में अन्तर दे-देकर गूँथी जाती है, उसे अपवर्तिका कहते हैं। जिसके बीच में एक बड़ा मोती हो वह शीर्षक है, जिसके बीच में क्रम से तीन मोती लगे हों उसे उपशीर्षक, जिसमें पाँच मोती हों उसे प्रकाण्डक, जिसके बीच में एक बड़ा मणि हो और उसके दोनों ओर क्रम-क्रम से घटते हुए छोटे-छोटे मोती लगे हों उसे तरल प्रबंध कहते हैं।
यष्टि अर्थात् लड़ियों के समूह को हार कहते हैं, वह हार लड़ियों की संख्या के न्यूनाधिक होने से इन्द्रच्छंद आदि के भेद से ग्यारह प्रकार का होता है। जिसमें १००८ लड़ियाँ हों वह इन्द्रच्छंद है। यह हार सबसे उत्कृष्ट होता है, इसे इन्द्र, चक्रवर्ती तथा तीर्थंकर ही पहनते हैं। जिसमें ५०४ लड़ियाँ हों उसे विजयच्छंद हार कहते हैं, यह हार अर्ध चक्रवर्ती और बलभद्र के पहनने योग्य है। जिसमें १०८ लड़ियाँ हों उसे हार कहते हैं, जिसमें मोतियों की ८१ लड़ियाँ हों उसे देवच्छंद, जिसमें ६४ लड़ियाँ हों उसे अर्धहार, जिसमें ५४ हों उसे रश्मिकलाप, जिसमें ३२ हों उसे गुच्छ, जिसमें २७ हों उसे नक्षत्रमाला, जिसमें २४ हों उसे अर्धगुच्छ, २० लड़ियों के हार को माणव और १० लड़ियों के हार को अर्धमाणव कहते हैं। इन इन्द्रच्छंद आदि हारों के मध्य में जब मणि लगा दिया जाता है तब उन नामों के साथ माणव शब्द और भी सुशोभित होने लगता है अर्थात् इन्द्रच्छंद माणव, विजयच्छन्द माणव आदि।
जो एक शीर्षकहार है वह शुद्धहार है। यदि शीर्षक के आगे इन्द्रच्छंद आदि उपपद लगा दिये जाते हैं तो वह भी ग्यारह भेदों से युक्त हो जाता है। इसी प्रकार उपशीर्षक आदि शुद्ध हारों के भी ग्यारह-ग्यारह भेद होते हैं। इस प्रकार सब हार पचपन प्रकार के होते हैं। अर्धमाणव हार में यदि मणि लगाया गया हो तो उसे फलकहार कहते हैं। उसी फलकहार में जब सोने के तीन अथवा पाँच फलक लगे हों तो उसके सोपान और मणि सोपान ऐसे दो भेद हो जाते हैं। इस प्रकार से तीर्थंकरदेव के द्वारा निर्मित कराये गये आभूषणों को धारण करने से उनके सभी पुत्र और पुत्रियाँ अतिशय अलंकृत हो रहे हैं। सर्व राजकुमारों में भरत अतिशय तेजस्वी सूर्य के समान हैं, युवा बाहुबली चंद्रमा के समान हैं, शेष राजपुत्र ग्रह, नक्षत्र और तारागण के समान हैं। उन सभी राजपुत्रों में ब्राह्मी दीप्ति के समान और सुन्दरी चाँदनी के समान सुशोभित हो रही हैं। सभी पुत्र-पुत्रियों से घिरे हुए तीर्थंकर ऋषभदेव ज्योतिषी देवों से घिरे हुए ऊँचे सुमेरु पर्वत के समान शोभायमान हो रहे हैं और महाराजा नाभिराय तथा माता मरुदेवी के आनन्द को बढ़ा रहे हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव राज्यसभा में सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके चित्त में विद्या और कला के उपदेश की भावना जाग्रत हो रही है। इसी बीच ब्राह्मी और सुंदरी दोनों कन्याएँ मांगलिक वेष-भूषा धारण किए हुए अपने पूज्य पिता के निकट आती हैं। उस समय देखने वालों को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि- ‘‘ये कोई दिव्य कन्याएँ हैं? अथवा नागकन्याएँ हैं? अथवा दिक् कन्याएँ हैं? अथवा सौभाग्य देवियाँ हैं? अथवा लक्ष्मी और सरस्वती हैं? अथवा उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं? अथवा उन्हीं का अवतार हैं? अथवा क्या जगन्नाथ ऋषभदेवरूपी महासमुद्र से उत्पन्न हुई लक्ष्मी हैं?’’ इत्यादिरूप सभासद लोग उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। दोनों कन्याएँ पिता के समीप आकर विनयपूर्वक हाथ जोड़कर गवासन से बैठकर नमस्कार करती हैं। ‘‘हे पूज्य पिताजी! प्रणाम।’’ ‘‘चिरंजीव रहो पुत्री!’’
ऐसा आशीर्वाद देते हुए तीर्थंकर महाराज नमस्कार करती हुई अपनी पुत्रियों को बड़े प्यार से उठाकर अपनी गोद में बिठा लेते हैं पुनः उनके मस्तक पर हाथ पेâरते हुए और मुस्कुराते हुए बड़े प्रेम से कहते हैं- ‘‘आओ, पुत्रियों आओ! तुम समझती होंगी कि हम आज देवों के साथ अमरवन को जाएँगी परन्तु अब ऐसा नहीं हो सकता चूँकि वे देवगण पहले ही चले गए।’’ दोनों कन्याएँ भी पिता का असीम प्रेम प्राप्त कर और उनके ऐसे विनोदपूर्ण मधुर शब्द सुनकर हँस पड़ती हैं। तब ऐसा प्रतीत होता है कि मानों उनके मुख से पूâल ही झड़ रहे हैं। इस प्रकार कुछेक क्षण तीर्थंकर देव अपनी पुत्रियों के साथ विनोद करते हुए अनंतर कहते हैं- ‘‘पुत्रियों! तुम अपने शील और विनय गुण के कारण इस किशोरावस्था में भी वृद्धा के समान हो। तुम दोनों का यह शरीर, यह अवस्था और यह अनुपम शील यदि विद्या से विभूषित कर दिया जावे तो तुम दोनों का यह जन्म सफल हो सकता है। इस लोक में विद्यावान् पुरुष पंडितों के द्वारा भी सम्मान को प्राप्त होता है और विद्यावती स्त्री भी सर्वश्रेष्ठ पद को प्राप्त होती है। विद्या ही सभी मनुष्यों का हित करने वाली है, विद्या ही सम्पूर्ण दिशाओं में यश को विस्तृत करने वाली है, अच्छी तरह से आराधना की गई यह विद्यादेवता ही मनुष्यों के संपूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाली है। यह विद्या ही मनुष्यों के लिए कामधेनु है, विद्या ही चिंतामणि रत्न है, विद्या ही धर्म, अर्थ तथा कामरूप फल से सहित संपदाओं को उत्पन्न करती है, विद्या ही बंधु है, विद्या ही मित्र है, विद्या ही कल्याण करने वाली है, विद्या ही साथ जाने वाला धन है और विद्या ही सर्व प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली है इसलिए हे पुत्रियों! तुम दोनों अब विद्या ग्रहण करने में प्रयत्न करो क्योंकि तुम दोनों की यही विद्या ग्रहण करने की उम्र है।’’ तीर्थंकर ऋषभदेव ऐसा कहकर बार-बार उन्हें आशीर्वाद देकर अपने चित्त में स्थित श्रुतदेवता को आदरपूर्वक सुवर्ण के विस्तृत पट्टे पर स्थापित करते हैं, पुनः-
‘सिद्धं नमः’ इस मंगलाचरणरूप मंत्र का उच्चारण कर पुत्रियों से उच्चारण कराकर अपने दाहिने हाथ से दार्इं ओर बैठी हुई पुत्री को ‘अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ¸ ऌ ल¸ ए ऐ ओ औ, क ख ग घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म, य र ल व, श ष स ह, अनुस्वार (अं), विसर्ग (अः), जिह्वामूलीय और उपध्मानीय इन चार अयोगवाहपर्यंत समस्त स्वर-व्यंजनरूप शुद्ध अक्षरावली को लिखाते हैं और बाएँ हाथ से अपनी बार्इं तरफ बैठी हुई पुत्री को इकाई-दहाई आदि स्थानों के क्रम से १, २, ३, आदि संख्यारूप गणित लिखाते हैं। वे दोनों कन्याएँ पूज्य पिता ऋषभदेव के मुख से इन सिद्धमातृकारूप अक्षरलिपि व गणित को अच्छी तरह से समझकर हृदय में धारण कर लेती हैं। गणधरदेव व्याकरणशास्त्र, छन्दशास्त्र और अलंकारशास्त्र इन तीनों के समूह को ‘वाङ्मय’ कहते हैं। इस वाङ्मय के बिना न तो कोई शास्त्र है और न कोई कला है इसलिए प्रभु ऋषभदेव सबसे पहले उन पुत्रियों को वाङ्मय का ही उपदेश देते हैं।
उस समय स्वयंभू ऋषभदेव का बनाया हुआ एक बड़ा भारी व्याकरणशास्त्र प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ था, उसमें सौ से भी अधिक अध्याय थे और वह समुद्र के समान अत्यन्त गंभीर था। इसी प्रकार उन्होंने अनेक अध्यायों में छन्दशास्त्र का भी उपदेश दिया और उसके ‘उक्ता, अत्युक्ता’ आदि छब्बीस भेद भी दिखलाए। अनेक विद्याओं के अधिपति ऋषभदेव ने प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, एक द्वि त्रि लघु क्रिया, संख्या और अध्वयोग, छन्दशास़्त्र के इन छह प्रत्ययों का भी निरूपण किया। प्रभु ने अलंकारों का संग्रह करते समय अथवा अलंकार संग्रह ग्रंथ में उपमा, रूपक, यमक आदि अलंकारों का कथन किया और माधुर्य, ओज आदि दशप्राण अर्थात् गुणों का भी निरूपण किया था।
कुछ ही दिनों मे ब्राह्मी और सुन्दरी दोनों पुत्रियों की व्याकरणरूपी दीपिका से प्रकाशित हुई समस्त विद्याएँ और कलाएँ अपने आप ही परिपक्व अवस्था को प्राप्त हो जाती हैं। इस प्रकार गुरु अथवा पिता के अनुग्रह से उन्होंने समस्त विद्याएँ पढ़ ली हैं अतः अब वे दोनों पुत्रियाँ सरस्वती देवी के अवतार लेने के लिए पात्रता को प्राप्त हो चुकी हैं अर्थात् वे इतनी ज्ञानवती हो चुकी हैं कि साक्षात् सरस्वती भी उनमें अवतार ले सकती हैं।
जगद्गुरु तीर्थंकर ऋषभदेव अपने भरत आदि पुत्रों को भी विनयी बनाकर क्रम से आम्नाय के अनुसार उन्हें अनेक शास्त्र पढ़ाते हैं। भरत पुत्र को अत्यन्त विस्तृत बड़े-बड़े अध्यायों से स्पष्ट अर्थशास्त्र और संग्रह प्रकरण सहित नृत्यशास्त्र पढ़ाते हैं। वृषभसेन पुत्र को गाना, बजाना आदि अनेक पदार्थों के संग्रह सहित सौ से भी अधिक अध्याय युक्त ऐसे गंधर्व शास्त्र को पढ़ाते हैं। अनन्तविजय पुत्र के लिए नाना प्रकार के सैकड़ों अध्यायों से भरी हुई चित्रकलासंबंधी विद्या का उपदेश देते हैं और लक्ष्मीशोभा सहित समस्त कलाओं का निरूपण करते हैं तथा सूत्रकार की विद्या और मकान बनाने की विद्या को भी विस्तार से सिखाते हैं। बाहुबली पुत्र के लिए कामनीति, स्त्री-पुरुषों के लक्षण, आयुर्वेद, धनुर्वेद, घोड़ा-हाथी आदि के लक्षण जानने के तंत्र और रत्न परीक्षा आदि के शास्त्रों को अनेक प्रकार के बड़े-बड़े अध्यायों में विभाजित कर सिखाते हैं।
इस विषय में अधिक कहने से क्या? संक्षेप में इतना ही बस है कि लोक का उपकार करने वाले जितने भी शास्त्र हो सकते हैं, जगद्गुरु प्रभु ऋषभदेव उन सभी को अपने पुत्रों को सिखलाते हैं। जिस प्रकार स्वभाव से देदीप्यमान रहने वाले सूर्य का तेज शरद् ऋतु में और भी अधिक हो जाता है उसी प्रकार प्रभु ऋषभदेव के अपनी समस्त विद्याओं के प्रकाशित कर देने पर उनका तेज उस समय अत्यधिक महिमा को प्राप्त हो रहा है। इस प्रकार अपने इष्ट पुत्र-पुत्रियों से घिरे हुए और अनेक प्रकार के दिव्य सुखों का अनुभव करते हुए तीर्थंकर ऋषभदेव का बीस लाख पूर्व वर्षपर्यन्त का कुमार काल पूर्ण हो चुका है।
इसी बीच में काल के प्रभाव से महौषधि, दीप्तौषधि, कल्पवृक्ष तथा सब प्रकार की औषधियाँ शक्तिहीन हो गई हैं। मनुष्यों के निर्वाह के लिए जो बिना बोये हुए धान्य उत्पन्न हो रहे थे, वे भी काल के प्रभाव से प्रायः विरलता को प्राप्त हो गये हैं, जहाँ कहीं कुछ-कुछ मात्रा में ही रह गये हैं। कल्पवृक्ष रस, वीर्य और फल देने आदि से रहित हो गये हैं। ऐसे समय में वहाँ की प्रजा रोग आदि अनेक बाधाओं से व्याकुलता को प्राप्त होने लगती है। तब जीवित रहने की इच्छा से प्रजा के प्रमुख-प्रमुख लोग महाराजा नाभिराय के समीप पहुँचकर अपना दुःख निवेदन करते हैं। महाराज नाभिराय कहते हैं- ‘‘हे प्रजाजनों! अब तुम तीर्थंकर के अवतार उन ऋषभदेव के पास जाओ, वे ही तुम्हें आजीविका का उपाय बतायेंगे।’’
इतना सुनकर तथा नाभिराय को नमस्कार कर प्रजाजन तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव के समीप आ जाते हैं और साष्टांग नमस्कार कर प्रार्थना करते हैं- ‘‘हे प्रभु! जीवित रहने की इच्छा से हम लोग आपकी शरण में आये हुए हैं, इसलिए हे तीन लोक के नाथ! अब आप जीविका का उपाय बतलाकर हम लोगों की रक्षा कीजिए। हे विभो! जो कल्पवृक्ष पिता के समान हमारी रक्षा करते थे, वे सब मूल से नष्ट हो गये हैं और जो धान्य बिना बोए हुए उग रहे थे, वे भी अब नहीं फल रहे हैं। हे देव! हम लोगों को भूख-प्यास की बाधा सता रही है और अन्न-पानी से रहित हुए हम लोग अब एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते हैं। हे देव! शीत, आतप, महावायु और वर्षा आदि का उपद्रव, आश्रयरहित, मकानरहित हम लोगों को दुःखी कर रहा है इसलिए अब इन सबके दूर करने का उपाय बतलाइये। हे विभो! आप ही इस युग के आदिकर्ता हैं और कल्पवृक्ष के समान उन्नत हैं सो आपका आश्रय पाकर हम लोग भय के स्थान कैसे हो सकते हैं? हे देव! जिस प्रकार हम लोगों की आजीविका निरुपद्रव हो जाये, आज उसी प्रकार का उपदेश देकर हम लोगों को कृतार्थ कीजिये। हे दयानिधे! अब शीघ्र ही हम लोगों पर प्रसन्न होइये।’’
प्रजाजनों के इस प्रकार के दीन वचन सुनकर दया के सागर तीर्थंकर देव का हृदय करुणा से आद्र्र हो उठा, वे अपने मन में विचार करने लगे- ‘‘पूर्व और पश्चिम विदेहक्षेत्र में जो स्थिति वर्तमान है, वही स्थिति आज यहाँ प्रवृत्त करने योग्य है तभी यह प्रजा जीवित रह सकती है। वहाँ जिस प्रकार असि, मषि आदि छह कर्म हैं, जैसी क्षत्रिय आदि वर्णों की स्थिति है और जैसी ग्राम-नगर, घर आदि की पृथक-पृथक रचना है उसी प्रकार यहाँ पर भी होनी चाहिए। इन्हीं उपायों से इन सबकी आजीविका चल सकती है। इनके जीवन के लिए और कोई अन्य उपाय नहीं हैं।१ कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने पर अब यह कर्मभूमि प्रगट हो गई है, इसलिए यहाँ अब प्रजा को असि, मषि आदि छह क्रियाओं द्वारा आजीविका करना ही उचित है।’’ इस प्रकार प्रभु ऋषभदेव क्षणभर सोचकर पुनः प्रजा को बार-बार आश्वासन देते हुए कहते हैं- ‘‘तुम लोग भयभीय मत होओ।’’
इतना कहते ही प्रभु उसी क्षण मन में इन्द्र का स्मरण करते हैं। प्रभु के स्मरणमात्र से ही सौधर्म इन्द्र बहुत से देवों के साथ वहाँ उपस्थित हो जाता है और प्रभु को नमस्कार कर उनकी इच्छानुसार प्रथम ही मांगलिक कार्य करके अयोध्यापुरी के मध्य में जिनमंदिर की रचना करता है। उस काल में शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न था तथा सूर्य आदि ग्रह अपने-अपने उच्च स्थान में स्थित थे और जगद्गुरु ऋषभदेव की हर तरह की अनुवूâलता थी। मध्य में जिनमंदिर का निर्माण करके वह इन्द्र पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर इस प्रकार चारों दिशाओं में भी क्रम से जिनमंदिर का निर्माण करता है पुनः कौशल आदि महादेश, अयोध्या आदि महानगर, वन और सीमा सहित गाँव, खेड़ों आदि की भी रचना करता है।
सुकोशल, अवन्ती, पुण्ड्र, उण्ड्र, अश्मक, रम्यक, कुरु, काशी, कलिंग, अंग, वंग, सुह्य, समुद्रक, काश्मीर, उशीनर, आनर्त, वत्स,पंचाल, मालव, दशार्ण, कच्छ, मगध, विदर्भ, कुरुजांगल, करहाट, महाराष्ट्र, सुराष्ट्र, आभीर, कोंकण, वनवास, आन्ध्र, कर्णाट, कौशल, चोल, केरल, दारु, अभिसार, सोवीर, शूरसेन, अपरान्तक, विदेह, सिन्धु, गान्धार, यवन, चेदि, पल्लव, काम्बोज, आरट्ट, बाल्हीक, तुरुष्क, शक और केकय इन देशों की रचना करता है तथा इनके सिवाय और भी अनेक देशों का विभाग कर देता है।
उस समय इन्द्र ने कितने ही देश अदेवमातृक, कितने ही देश देवमातृक और कितने ही देश साधारण बनाएँ। जहाँ नदी और नहरों से सिंचाई होती है वे अदेवमातृक हैं, जहाँ वर्षा के जल से सिंचाई हो जाती है ऐसे प्रदेश देवमातृक कहलाते हैं और जहाँ दोनों प्रकार से सिंचाई संभव हो उन्हें साधारण देश कहते हैं।
‘विजयार्ध पर्वत के समीप से लेकर समुद्रपर्यंत (दक्षिण दिशा में लवण समुद्रपर्यंत) कितने ही देश साधारण थे, कितने ही बहुत जल वाले थे और कितने ही देश जल की दुर्लभता से सहित थे।’ उन सभी देशों से व्याप्त यह पृथ्वी (भरत क्षेत्र का आर्यख्ण्ड) ऐसी प्रतीत हो रही थी मानों यह स्वर्ग का एक टुकड़ा ही हो। जिस प्रकार स्वर्ग के स्थानों की सीमाओं पर लोकपाल देवों के स्थान होते हैं उसी प्रकार उन देशों की अन्त सीमाओं पर भी सब ओर सीमारक्षक पुरुषों के किले बना दिए। उन देशों के मध्य में भी अनेक देश ऐसे थे जो लुब्धक, आरण्य, चरट, पुलिंद तथा शबर आदि म्लेच्छ जाति के लोगों द्वारा रक्षित हो रहे थे। उन देशों के मध्य भाग में कोट, प्राकार, परिखा, गोपुर और अटारी आदि से शोभायमान राजधानी बनाई गई थीं। राजधानी को घेरकर सब ओर शास्त्रोक्त लक्षण वाले गाँवों आदि की रचना हुई थी।
जिनमें बाड़ से घिरे हुए घर हों, अधिकतर शूद्र और किसान लोग रहते हों, जो बगीचे और तालाबों से सहित हों, उन्हें ग्राम कहते हैं। जिसमें सौ घर हों उसे छोटा गाँव कहते हैं। जिसमें पाँच सौ घर हों और किसान धनसंपन्न हों उसे बड़ा गाँव कहते हैं। छोटे गाँवों की सीमा एक कोस की और बड़े गाँवों की सीमा दो कोस की होती है। नदी, पहाड़, गुफा, श्मशान, क्षीरवृक्ष, बबूल आदि कंटीले वृक्ष, वन और पुल, इनसे गाँवों की सीमा का विभाग किया जाता है।
जो परिखा, गोपुर, अटारी, कोट और प्राकार से सुशोभित हो, जिसमें अनेक भवन बने हों और प्रधान पुरुषों के रहने योग्य हो, वह पुर या नगर कहलाता है।
जो नगर नदी और पर्वत से घिरा हो, उसे खेट कहते हैं। जो केवल पर्वत से घिरा हो, उसे कर्वट कहते हैं। जो पाँच सौ गाँवों से घिरा हो, वह मडम्ब कहलाता है। जो समुद्र के किनारे बसा हो, उसे पत्तन कहते हैं। जो नदी के किनारे हो, वह द्रोणमुख है। जो ऊँचे-ऊँचे धान्य के ढेरों से सहित हो, वह संवाह है।
इस प्रकार इन्द्र जहाँ-तहाँ उन-उन योग्य स्थानों के अनुसार बड़े ही अच्छे ढंग से गाँव-नगर आदि की रचना कर देता है, उसी समय से वह ‘पुरन्दर’ इस सार्थक नाम को धारण कर लेता है। तदनन्तर वह सौधर्म इन्द्र तीर्थंकर ऋषभदेव की आज्ञा से इन नगर आदि स्थानों में प्रजा को बसाकर कृतकृत्य होता हुआ प्रभु की आज्ञा लेकर अपने स्वर्गधाम को चला जाता है पुनः तीर्थंकर ऋषभदेव अपनी बुद्धि की कुशलता से असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्पकला इन छह क्रियाओं का प्रजा के लिए उपदेश देते हैं। उस समय प्रभु सरागी हैं, गृहस्थावस्था में राज्य सिंहासन पर आरूढ़ हैं, वीतरागी नहीं हैं, इसलिए वो प्रजा को गृहस्थाश्रम की आजीविका का उपाय बतला रहे हैं
‘‘हे प्रजाजनों! असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह क्रियाओं द्वारा तुम लोग आजीविका करो। तलवार आदि धारण करना असि कर्म है। लिखकर आजीविका करना मषिकर्म है। जमीन को जोतना-बोना कृषि कर्म है। शास्त्र पढ़ाकर या नृत्य-गायन आदि सिखाकर आजीविका करना विद्या कर्म है। व्यापार करना वाणिज्य कर्म है और हस्त की कुशलता से जीविका करना शिल्पकर्म है, यह शिल्प चित्र खींचना, पूâल-पत्ते काटना आदि की अपेक्षा अनेक प्रकार है।’’
ऋषभ तीर्थंकर उस समय उन-उन की योग्यतानुसार उन्हें वैसी-वैसी शिक्षा दे रहे हैं। उसी समय आदिब्रह्मा ऋषभदेव तीन वर्ण की स्थापना करते हैं। जो तलवार धारण कर विपत्ति से रक्षा करने में समर्थ हैं उन्हें क्षत्रिय संज्ञा देते हैं, जो खेती, व्यापार तथा पशुपालन आदि के द्वारा आजीविका करने योग्य हैं उन्हें वैश्य संज्ञा दी तथा जो उनकी सेवा शुश्रूषा के योग्य हैं उन्हें शूद्र संज्ञा से अभिहित करते हैं, शूद्र में दो भेद हैं-कारू और अकारू। धोबी आदि शूद्र कारू हैं और उनसे भिन्न अकारू हैं।
प्रभु से उपदेश, आदेश और वर्ण व्यवस्था को प्राप्त कर प्रजा अपने-अपने योग्य कर्मों को यथायोग्य रूप से करना प्रारंभ कर देती है। अपने वर्ण की निश्चित आजीविका को छोड़कर कोई भी मनुष्य दूसरी आजीविका नहीं करता है, इसलिए उनके कार्यों में कभी संकर (मिलावट) दोष नहीं आता है। उस समय उनके विवाह, जाति संबंध तथा व्यवहार आदि सभी कार्य प्रभु ऋषभदेव की आज्ञानुसार ही होते थे। उस काल में जितने भी पापरहित आजीविका के उपाय थे, वे सब प्रभु ऋषभदेव की सम्मति से ही प्रवृत्त हुए थे, क्योंकि सनातन ब्रह्मा प्रभु ऋषभदेव ही माने गए हैं।
युग की आदि में प्रथम तीर्थंकर के अवतार ऋषभदेव ने इस प्रकार से कर्मयुग का प्रारंभ किया था, इसलिए पुराण के जानने वाले महामुनि उन्हें ‘कृतयुग’ नाम से पुकारते हैं। जिस दिन प्रभु ने वर्ण व्यवस्था बनाकर प्रजा को असि, मसि आदि षट्कर्मों का उपदेश दिया था वह पुण्य तिथि मानी जा रही है अतः उसी समय से प्रभु ऋषभदेव को प्रजा ने ‘प्रजापति’ कहकर भी सम्बोधा था। अब प्रभु के द्वारा सदुपदेश प्राप्त कर प्रजा सुख से अपना गार्हस्थ्य जीवन बिता रही है।
एक लाख योजन विस्तृत गोलाकार (थाली सदृश) इस जम्बूद्वीप में हिमवान, महाहिमवान, निषध, नील, रुक्मी और शिखरी इन छह कुलाचलों से विभाजित सात क्षेत्र हैं, जिनके नाम-भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत हैं। भरत क्षेत्र का दक्षिण-उत्तर विस्तार ५२६-६/१९ योजन है। आगे पर्वत और क्षेत्र के विस्तार विदेह क्षेत्र तक दूने-दूने हैं पुनः आधे-आधे हैं।
इनमें से भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में षट्काल परिवर्तन से भोगभूमि और कर्मभूमि की व्यवस्था चलती रहती है जो अशाश्वत कहलाती है। हैमवत और हैरण्यवत क्षेत्र में जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था है, हरि और रम्यक क्षेत्र में मध्यम भोगभूमि की व्यवस्था है। विदेहक्षेत्र में दक्षिण-उत्तर में देवकुरु-उत्तरकुरु नाम से क्षेत्र हैं जहाँ पर उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था है। ये छहों भोगभूमियाँ शाश्वत हैं। विदेहक्षेत्र में पूर्व-पश्चिम में १६ वक्षार पर्वत और १२ विभंगा नदियों के निमित्त से ३२ क्षेत्र हो जाते हैं जिनके नाम कच्छा, सुकच्छा आदि हैं। इन बत्तीसों विदेहक्षेत्रों में कर्मभूमि की व्यवस्था सदाकाल एक जैसी रहती है अतः इन्हें शाश्वत कर्मभूमि कहते हैं।
विदेहक्षेत्र का विस्तार (दक्षिण-उत्तर) ३३६८४-४/१९ योजन है और उसकी लम्बाई (पूर्व-पश्चिम) १००००० योजन है। इस विदेह के ठीक मध्य में सुदर्शन मेरु पर्वत है जो एक लाख चालीस योजन ऊँचा है। पृथ्वी पर इसकी चौड़ाई १० हजार है और घटते-घटते ऊपर जाकर ४ योजन मात्र की रह गई है। इस सुमेरु की चारों विदिशाओं में एक-एक गजदन्त पर्वत है जो कि एक तरफ से सुमेरु का स्पर्श कर रहे हैं और दूसरी तरफ से निषध-नील पर्वत को छूते हुए हैं। इन पर्वतों के निमित्तों से भी विदेह की चारों दिशाएँ पृथव्â-पृथक् विभक्त हो गई हैं। सुमेरु से उत्तर की ओर उत्तरकुरु में ईशान कोण में जम्बूवृक्ष है और सुमेरु से दक्षिण की ओर देवकुरु है जिसमें आग्नेय कोण में शाल्मलीवृक्ष है। इन दोनों कुरुओं में दश प्रकार के कल्पवृक्ष होने से वहाँ पर सदा ही उत्तम भोगभूमि की व्यवस्था रहती है।
सुमेरु के पूर्व-पश्चिम में विदेह क्षेत्र में सीता-सीतोदा नदियाँ बहती हैं। इससे पूर्व-पश्चिम विदेह में भी दक्षिण-उत्तर भाग हो जाते हैं। सुमेरु के पूर्व में और सीता नदी के उत्तर में सर्वप्रथम भद्रसाल वन की वेदिका है, पुनः क्षेत्र है, पुनः वक्षार पर्वत है जो कि ५०० योजन विस्तृत, १५५९३-२/१९ योजन लम्बा तथा नील पर्वत के पास ४०० योजन एवं सीता नदी के पास ५०० योजन ऊँचा है। यह पर्वत सुवर्णमय है। इस पर चार वूâट हैं। जिनमें से नदी के पास के वूâट पर जिनमंदिर एवं शेष तीन कूटों पर देव-देवियों के आवास हैं। इस पर्वत के बाद क्षेत्र, पुनः विभंगानदी, पुनः क्षेत्र, पुनः वक्षार पर्वत ऐसे क्रम से चार वक्षार पर्वत और तीन विभंगा नदियों के अन्तराल से तथा एक तरफ भद्रसाल की वेदी और दूसरी तरफ देवारण्य वन की वेदी के निमित्त से इस एक तरफ से विदेह में आठ क्षेत्र हो गए हैं। ऐसे ही सीता नदी के दक्षिण तरफ ८ क्षेत्र हैं तथा पश्चिम विदेह में सीतोदा नदी के दक्षिण-उत्तर में ८-८ क्षेत्र ऐसे बत्तीस क्षेत्र हैं। बत्तीस विदेह क्षेत्रों के नाम-
कच्छा, सुकच्छा, महाकच्छा, कच्छकावती, आवर्ता, लांगलावर्ता, पुष्कला, पुष्कलावती, वत्सा, सुवत्सा, महावत्सा, वत्सकावती, रम्या, सुरम्या, रमणीया, रम्यकावती, पद्मा, सुपद्मा, महापद्मा, पद्मकावती, शंखा, नलिनी, कुमुदा, सरिता, वप्रा, सुवप्रा, महावप्रा, वप्रकावती, गन्धा, सुगन्धा, गन्धिला और गन्धमालिनी।
कच्छा विदेह का वर्णन-
यह कच्छा विदेह क्षेत्र पूर्व-पश्चिम में २२१२-७/८ योजन विस्तृत है और दक्षिण-उत्तर में १६५९२-२/१९ योजन लम्बा है। इस क्षेत्र के बीचों-बीच में ५० योजन चौड़ा, २२१२-७/८ योजन लम्बा और २५ योजन ऊँचा विजयार्ध पर्वत है। इस विजयार्ध में भी भरतक्षेत्र के विजयार्ध के समान दोनों पाश्र्व भागों में दो-दो विद्याधर श्रेणियाँ हैं। इन दोनों तरफ की श्रेणियों पर विद्याधर मनुष्यों की ५५-५५ नगरियाँ हैं। इस विजयार्ध पर्वत पर ९ कूट हैं, इनमे से एक कूट पर जिनमंदिर और शेष ८ कूटों पर देवों के भवन हैं। नील पर्वत की तलहटी में गंगा-सिंधु नदियों के निकलने के लिए दो कुण्ड बने हैं। इन कुण्डों में से दो नदियाँ निकलकर सीधी बहती हुई विजयार्ध पर्वत की तिमिस्रगुफा और खण्डप्रपातगुफा में प्रवेश कर बाहर निकलकर क्षेत्र में बहती हुई आगे आकर सीता नदी में प्रवेश कर जाती हैं। इस कच्छा देश में विजयार्ध और गंगा-सिंधु के निमित्त से छह खण्ड हो जाते हैं। इनमें से नदी के पास के मध्य में आर्यखण्ड है और शेष पाँचों म्लेच्छ खण्ड हैं। आर्यखण्ड के बीचों-बीच में क्षेमा नाम की नगरी है, जो कि मुख्य राजधानी है। यह एक कच्छा विदेह देश का वर्णन है। इसी प्रकार से महाकच्छा आदि इकतीस विदेह देशों की व्यवस्था है, ऐसा समझना।
विदेह क्षेत्र की व्यवस्था-प्रत्येक विदेह में ९६ करोड़ ग्राम, २६ हजार नगर, १६ हजार खेट,२४ हजार कर्वट, ४ हजार मडंब, ४८ हजार पत्तन, ९९ हजार द्रोण, १४ हजार संवाह और २८ हजार दुर्गाटवी हैं।
जो चारों ओर कांटों की बाड़ से वेष्टित हो, उसे ग्राम कहते हैं। चार दरवाजों युक्त कोट से वेष्टित को नगर कहते हैं। नदी और पर्वत दोनों से वेष्टित को खेट कहते हैं। पर्वत से वेष्टित कर्वट हैं। ५०० ग्रामों से संयुक्त मडंब हैं। जहाँ रत्नादि वस्तुओं की निष्पत्ति होती है, वे पत्तन हैं। नदी से वेष्टित को द्रोण, समुद्र की वेला से वेष्टित संवाह और पर्वत के ऊपर बने हुए को दुर्गाटवी कहते हैं।
प्रत्येक विदेह देश में प्रधान राजधानी और महानदी के बीच स्थित आर्यखण्ड में एक-एक उपसमुद्र है, और उस समुद्र में एक-एक टापू है, जिस पर ५६ अन्तरद्वीप, २६ हजार रत्नाकर और रत्नों के क्रय-विक्रय के स्थानभूत ऐसे ७०० कुक्षिवास होते हैं।
सीता-सीतोदा नदियों के समीप जल में पूर्वादि दिशाओं में मागध, वरतनु और प्रभास नामक व्यंतर देवों के तीन द्वीप हैं। विदेह क्षेत्र में वर्षा ऋतु-विदेह क्षेत्र में वर्षाकाल में सात प्रकार के कालमेघ सात-सात दिन तक अर्थात् ४९ दिनों तक और द्रोण नाम वाले बारह प्रकार के श्वेत मेघ सात-सात दिन तक (१२²७·८४ दिनों तक) बरसते हैं। इस प्रकार वहाँ वर्षा ऋतु में कुल ४९±८४·१३३ दिन मर्यादापूर्वक वर्षा होती है। विदेह देश में क्या-क्या नहीं है ?- विदेह क्षेत्र में सर्वत्र कभी दुर्भिक्ष नहीं पड़ता है। सात प्रकार की ‘‘ईति’’ नहीं है। १. अतिवृष्टि
२. अनावृष्टि
३. मूषक प्रकोप
४. शलभ प्रकोप (टिड्डी)
५. शुक प्रकोप
६. स्वचक्र प्रकोप और
७. परचक्र प्रकोप-ये सात ईतियाँ वहाँ नहीं हैं तथा गाय या मनुष्य आदि जिसमें अधिक मरने लगें, उसे मारि रोग कहते हैं वह भी वहाँ नहीं है। वहाँ कुदेव, कुलिंगी साधु और कुमत भी नहीं है अर्थात् वहाँ पर दुर्भिक्ष, ईति, मारि रोग, कुदेव, कुलिंगी और कुमतों का अभाव है। वहाँ विदेह में हमेशा चतुर्थकाल सदृश ही वर्तना रहती है अर्थात् सतत ही उत्कृष्ट ५०० धनुष की अवगाहना वाले मनुष्य होते हैं और वहाँ मनुष्यों की उत्कृष्ट आयु एक कोटि पूर्व वर्ष की है। वहाँ पर क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये तीन वर्ण होते हैं जो कि असि, मषि, कृषि आदि के द्वारा आजीविका करते हैं। वहाँ पर हमेशा गृहस्थ धर्म और मुनि धर्म चलता रहता है तथा हमेशा ही तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र, नारायण और प्रतिनारायण होते रहते हैं। इस जम्बूद्वीप के ३२ विदेहों में यदि अधिक से अधिक तीर्थंकर आदि होते हैं तो ३२ होते हैं और कम से कम ४ अवश्य होते हैं। वहाँ चार तीर्थंकर आज भी विद्यमान है जिनके नाम हैं-सीमंधर, युगमंधर, बाहु और सुबाहु। ये विहरमाण तीर्थंकर भी कहलाते हैं ऐसे ही पाँचों मेरु संबंधी ३२²५·१६० विदेह होते हैं। उनमें तीर्थंकर, चक्रवर्ती आदि भी अधिक रूप से १६० और कम से कम २० माने गये हैं।
चौदह नदियाँ-हिमवान आदि छह पर्वतों पर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिंच्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ऐसे छह सरोवर हैं इनमें पद्म तथा पुण्डरीक सरोवर से तीन एवं शेष चार सरोवरों से दो-दो नदियाँ निकलती हैं। जिनके नाम हैं-गंगा-सिंधु, रोहित-रोहितास्या, हरित-हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकांता, सुवर्णकूला-रूप्यकूला और रक्ता-रक्तोदा। ये चौदह नदियाँ दो-दो मिलकर भरत आदि सात क्षेत्रों में बहती हैं।
कच्छा विदेह का वर्णन-2
इस क्षेत्र का विस्तार ५२६-६/१९ योजन है। इसके बीच में पूर्व-पश्चिम लम्बा, ५० योजन चौड़ा और २५ योजन ऊँचा एक विजयार्ध पर्वत है इसमें दक्षिण उत्तर बाजू में विद्याधरों की नगरियाँ हैं। इस पर्वत में दो गुफाएँ हैं जिनके नाम हैं-तमिस्र गुफा और खण्डप्रपात गुफा। हिमवान पर्वत के पद्म सरोवर के पूर्वतोरण द्वार से गंगा नदी एवं पश्चिम तोरण द्वार से सिंधु नदी निकलकर ५००-५०० योजन तक पूर्व-पश्चिम दिशा में पर्वत पर ही बहकर पुनः दक्षिण की ओर मुड़कर पर्वत के किनारे आ जाती है। वहाँ पर गोमुख आकार वाली नालिका से नीचे गिरती है। हिमवान पर्वत की तलहटी में नदी गिरने के स्थान पर गंगा-सिंधु कुण्ड बने हुए हैं। जिनमें बने कूटों पर गंगा-सिंधु देवी के भवन हैं। भवन की छत पर फूले हुए कमलासन पर अकृत्रिम जिनप्रतिमा विराजमान हैं। उन प्रतिमा के मस्तक पर जटाजूट का आकार बना हुआ है। ऊपर से गिरती हुई गंगा-सिंधु नदियाँ ठीक भगवान की प्रतिमा के मस्तक पर अभिषेक करते हुए के समान पड़ती हैं पुनः कुण्ड से बाहर निकलकर क्षेत्र में कुटिलाकार से बहती हुई पूर्व-पश्चिम की तरफ लवण समुद्र में प्रवेश कर जाती हैं।
इसलिए इस भरतक्षेत्र के विजयार्ध पर्वत और गंगा-सिंधु नदी के निमित्त से छह खण्ड हो जाते हैं। इनमें से जो दक्षिण की तरफ बीच का खण्ड है वह आर्यखण्ड है, शेष पाँच म्लेच्छ खण्ड हैं। उत्तर की तरफ के तीन म्लेच्छ खण्डों में से बीच वाले म्लेच्छ खण्ड में एक वृषभाचल पर्वत है। चक्रवर्ती जब इन छहों खण्डों को जीत लेता है तब अपनी विजय प्रशस्ति इसी पर्वत पर लिखता है।
भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड के मध्य में अयोध्या नगरी है। इस अयोध्या के दक्षिण में ११९ योजन की दूरी पर लवण समुद्र की वेदी है और उत्तर की तरफ इतनी ही दूरी पर विजयार्ध पर्वत की वेदिका है। अयोध्या से पूर्व में १००० योजन की दूरी पर गंगा नदी की तट वेदी है अर्थात् आर्यखण्ड की दक्षिण दिशा में लवण समुद्र, उत्तर दिशा में विजयार्ध, पूर्व दिशा में गंगा नदी एवं पश्चिम दिशा में सिन्धु नदी है, ये चारों आर्यखण्ड की सीमारूप हैं।
अयोध्या से दक्षिण में ४७६००० मील (चार लाख छियत्तर हजार मील) जाने से लवण समुद्र है और उत्तर में ४७६००० मील जाने से विजयार्ध पर्वत है। उसी प्रकार अयोध्या से पूर्व ४०००००० (चालीस लाख) मील दूर पर गंगा नदी तथा पश्चिम में इतनी ही दूर पर सिन्धु नदी है। आज का उपलब्ध सारा विश्व इस आर्यखण्ड में है। हम और आप सभी इस आर्यखण्ड में ही भारतवर्ष में रहते हैं। इस भरत क्षेत्र के आर्यखण्ड से विदेह क्षेत्र की दूरी २० करोड़ मील से अधिक ही है। भरत क्षेत्र और ऐरावत क्षेत्र के आर्यखण्ड में सदा ही अरहट घटीr यंत्र के समान छह कालों का परिवर्तन होता रहता है। षट्काल परिवर्तन-‘‘भरत और ऐरावत क्षेत्र में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी इन दो कालों के द्वारा षट्काल परिवर्तन होता रहता है। इनमें से अवसर्पिणीकाल में जीवों के आयु, शरीर आदि की हानि एवं उत्सर्पिणी में वृद्धि होती रहती है।’’
अवसर्पिणी के सुषमा-सुषमा, सुषमा, सुषमादुःषमा, दुःषमासुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा ऐसे छह भेद हैं। ऐसे ही उत्सर्पिणी के इनसे उल्टे अर्थात् दुःषमादुःषमा, दुःषमा, दुःषमासुषमा, सुषमादुःषम, सुषमा, और सुषमासुषमा ये छह भेद हैं। अवसर्पिणी के सुषमासुषमा की स्थिति ४ कोड़ाकोड़ी सागर, सुषमा की ३ कोड़ाकोड़ी सागर, सुषमादुःषमा की २ कोड़ाकोड़ी सागर, दुःषमासुषमा की ४२ हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागर, दुषमा की २१ हजार वर्ष की एवं अतिदुःषमा की २१ हजार वर्ष की है। ऐसे ही उत्सर्पिणी में २१ हजार वर्ष से समझना। इन छह कालों में से प्रथम, द्वितीय और तृतीय काल में क्रम से उत्तम, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है तथा चौथे, पाँचवे और छठे काल में कर्मभूमि की व्यवस्था हो जाती है। उत्तम भोगभूमि में मनुष्यों के शरीर की ऊँचाई तीन कोश और आयु तीन पल्य प्रमाण होती है। मध्यम भोगभूमि में शरीर की ऊंचाई दो कोश, आयु दो पल्य की होती है और जघन्य भोगभूमि में शरीर की ऊँचाई एक कोश और आयु एक पल्य की है। यहाँ पर दश प्रकार के कल्पवृक्षों से भोगोपभोग सामग्री प्राप्त होती है। चतुर्थ काल में उत्कृष्ट अवगाहना सवा पाँच सौ धनुष और उत्कृष्ट आयु एक पूर्व कोटि वर्ष है। पंचम काल में शरीर की ऊँचाई ७ हाथ और आयु १२० वर्ष है। छठे काल में शरीर २ हाथ का और आयु २० वर्ष है।
इस वर्तमान की अवसर्पिणी में-‘‘तृतीय काल में पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर प्रतिश्रुति, सन्मति, क्षेमंकर, क्षेमन्धर, सीमंकर, सीमन्धर, विमलवाहन, चक्षुष्मान, यशस्वी, अभिचन्द्र, चन्द्राभ, मरुदेव, प्रसेनजित्, नाभिराज और उनके पुत्र ऋषभदेव ये कुलकर उत्पन्न हुए हैं।’’ अन्यत्र ग्रंथों में नाभिराय को १४वाँ अंतिम कुलकर माना है। यहाँ पर नाभिराय के पुत्र प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को भी कुलकर संज्ञा दे दी है। इस युग में कर्मभूमि के प्रारंभ में तीर्थंकर ऋषभदेव के सामने जब प्रजा आजीविका की समस्या लेकर आई, तभी प्रभु की आज्ञा से इन्द्र ने ग्राम, नगर आदि की रचना कर दी पुनः प्रभु ने अपने अवधिज्ञान से विदेह क्षेत्र की सारी व्यवस्था को ज्ञातकर प्रजा में वर्ण व्यवस्था बनाकर उन्हें आजीविका के साधन बतलाये थे।
एक समय स्वर्ग से इन्द्र के साथ देवगण आकर तीर्थंकर ऋषभदेव महाराज का सम्राट पद पर अभिषेक करने के लिए महाराजा नाभिराय से अनुमति प्राप्त कर बहुत वैभव के साथ राज्याभिषेक महोत्सव मनाते हैं। उस समय समस्त आर्यखण्ड आनन्द से भर जाता है और अयोध्या नगर देव-देवियों से खचाखच भर जाता है। देवों ने अयोध्या नगरी को खूब अच्छी तरह से सजाई है। प्रजा के लोगों ने अपने-अपने मकानों के अग्रभाग पर पताकायें लगाई हैं जो कि आकाश में फहरा रही हैं। उस समय राजमन्दिर में आनन्दभेरियाँ बज रही हैं, स्त्रियाँ मंगलगान गा रही हैं और देवांगनाएँ नृत्य कर रही हैं। गन्धर्वजाति के देव मंगलस्तोत्रों के साथ तीर्थंकर प्रभु का पराक्रम गा रहे हैं और देवगण मिलकर-
‘हे नाथ! त्वं जय, जीव, वर्धस्व, वर्धस्व।’’ इत्यादि पदों के द्वारा जय-जयनाद कर रहे हैं।
राज्याभिषेक के पहले देव-कारीगरों ने आनन्दमण्डप बनाया है और उसके मध्य में मिट्टी की वेदी बनाई है, उस पर रत्नों के चूर्ण से रांगोली-चित्ररचना की गई है और सर्वत्र नाना वर्ण के फूल बिखेरे गये हैं। ऊपर से चनेवा बाँधा गया है, मोतियों और मणियों से निर्मित तोरणद्वार सजाये गये हैं। वेदी में मंगलद्रव्य और मंगलकलश स्थापित हैं। देवियाँ अष्ट मंगलद्रव्य को हाथ में धारण कर खड़ी हैं। देवअप्सराएँ चँवर ढोर रही हैं और देवगण मंगलस्नान की सामग्री लेकर वहाँ आ रहे हैं।
उसी समय राजमहल के आँगनरूपी रंगभूमि में सौधर्मइन्द्र योग्य सिंहासन पर पूर्व की ओर मुख करके श्री ऋषभदेव को बैठाते हैं। तब देवों द्वारा मृदंग आदि वाद्य बजाये जाने लगते हैं जिनका गंभीर नाद सारे लोक में व्याप्त हो जाता है। किन्नरियाँ वीणा बजाती हुई संगीत स्वर के साथ प्रभु का यश गाने लगती हैं। प्रभु के अभिषेक के लिए गंगा-सिन्धु इन दोनों महानदियों का जल लाया जा रहा है जो कि हिमवानपर्वत के शिखर से धारारूप में नीचे गिरते समय ही लिया जाता है, नीचे गिरकर पृथ्वीतल से स्पर्शित होने के पहले ही घड़ों में भरा जा रहा है। इसी प्रकार ऊपर पड़ती हुई अन्य नदियों का पवित्र जल भी लाया जा रहा है।
इन्द्र स्वयं खड़े होकर बड़े हर्ष से श्री ऋषभदेव के मस्तक पर घड़े से जलधारा डालते हुए राज्याभिषेक कर रहा है। अन्य देवगण भी भक्ति से विभोर होकर प्रभु का अभिषेक कर रहे हैं। श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी देवियाँ भी अपने-अपने सरोवरों से जल लाकर मंगल अभिषेक कर रही हैं। नन्दीश्वर द्वीप में जो नन्दा, नन्दोत्तरा आदि बावड़ियाँ हैं उनके जल से भी अभिषेक किया जा रहा है। इसके सिवाय लवणसमुद्र, क्षीरसमुद्र, नन्दीश्वर समुद्र, और स्वयंभूरमण समुद्र के जल को लाकर भी देवगण अभिषेक कर रहे हैं। इन्द्र उस समय स्वयं पवित्र जगद्गुरु ऋषभदेव के शरीर का ही प्रक्षालन नहीं कर रहे थे प्रत्युत् देखने वाले देवों और मनुष्यों की मनोवृत्ति, नेत्र और शरीर का भी प्रक्षालन कर रहे थे। अर्थात् उस समय दर्शकों के मन का पाप मैल धुल रहा था, उन्हें पुण्यबंध हो रहा था, उनके नेत्र पवित्र और तृप्त हो रहे थे तथा प्रत्येक दर्शक के शरीर पर अभिषेक के जल के छींटे पड़ने से उनके शरीर भी पवित्र हो रहे थे। उस समय प्रभु के अभिषेक के बहते हुए जल से सब तरफ पृथ्वी व्याप्त हो गई थी सो ऐसा मालूम पड़ता था मानो स्वामी ऋषभदेव की राज्य-सम्पदा से संतुष्ट होकर अपने शुभ भाग्य से यह पृथ्वी बढ़ ही रही है।
जैनम जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
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