आदिनाथ भगवान के पूर्व भव ( भाग -४)
आदिनाथ भगवान के पूर्व भव ( भाग -४)
जिनबालक ऋषभदेव को रत्नों के बने पालने में झुलाती हुई देवांगनाएँ तीर्थंकर के पुण्य गीत को गा रही हैं और फूली नहीं समा रही हैं। वे देवांगनाएँ धायरूप में बालक को कभी गोद में लेकर प्यार करती हैं, कभी हँसाती हैं तो कभी माता की गोद में दे देती हैं, पुनः दूसरी देवी आकर झट से अपनी गोद में ले लेती है। प्रजा के लोग दिन पर दिन दर्शन के लिए वहाँ आते रहते हैं और बालक को यदि गोद में ले पाते हैं तो अपने आप को बहुत ही पुण्यशाली समझ लेते हैं। कितनी ही महिलाएं, बालिकाएँ और नववधुएँ आकर बालक को गोद में ले-लेकर खिलाती रहती हैं। जिनबालक के मुखरूपी चन्द्रमा पर मन्द हास्यरूपी चाँदनी सदैव प्रगट रहती है, उससे माता-पिता का सन्तोषरूपी समुद्र अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। ऋषभदेव दूज के चन्द्रमा के समान शरीर की वृद्धि के साथ-साथ अनेक गुणों से भी वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं।
धीरे-धीरे उनके मुखकमल से क्रम-क्रम से अस्पष्टवाणी प्रगट होने लगती है जिसे सुन-सुनकर माता-पिता व प्रजा के लोग अत्यधिक आनन्द का अनुभव करते हुए ऐसा चाहते हैं कि हम लोग सदा प्रभु की वाणी सुनते ही रहें। इन्द्रनील मणियों की भूमि पर धीरे-धीरे गिरते-पड़ते चलते हुए बालक ऋषभदेव बहुत ही सुन्दर लगते हैं। कभी देवियाँ हाथ की अँगुली का सहारा देती हैं और कभी भगवान स्वयं चलना चाहते हैं तब देवियाँ अंगुली छोड़ देती हैं तथा बालक की डगमगाती हुई चाल को देखकर हँसने लगती हैं, तब बालक भी खिलखिलाकर हँसने लगता है। बालक को हँसते हुए देखकर माता मरुदेवी हर्ष के अतिरेक से रोमांचित हो जाती हैं।
बालक ऋषभदेव धीरे-धीरे मणियों की भूमि पर बैठने लगते हैं और देव बालकों के साथ रत्नों की धूलि में क्रीड़ा करने लगते हैं। इन्द्र की आज्ञा से बहुत से देव स्वर्ग से आकर जिनबालक की अवस्था के अनुसार अपने-अपने शरीर को बनाकर बालक के साथ क्रीड़ा करते हुए बहुत ही सुख का अनुभव करते हैं। जिनबालक अपनी बाल्य अवस्था को पार कर कौमार अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। उनके साथ-साथ ही देवगण वैसा ही शरीर बनाकर उनके साथ खेला करते हैं। बालक का मनोहर शरीर, प्यारी बोली, मनोहर अवलोकन और मुस्कराते हुए वार्तालाप करना यह सब संसार की प्रीति को बढ़ा रहे हैं। बालक के शरीर के साथ-साथ उनकी कलाएँ वृद्धिंगत होती जा रही हैं। ऋषभदेव बालक होते हुए भी उनमें बालसुलभ चेष्टाएँ न होकर प्रौढ़ता और गंभीरता विद्यमान है।
बालक ऋषभदेव गर्भ से ही मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञान से समन्वित हैं इसलिए वे समस्त विद्याओं के ईश्वर हैं क्योंकि जन्मान्तर का संस्कार स्मरणशक्ति को सदैव पुष्ट रखता है यही कारण है कि वे समस्त लोक के गुरु हैं उनका कोई भी गुरु नहीं बन सकता है। वे प्रभु बिना शिक्षा के ही समस्त कलाओं में प्रशंसनीय कुशलता को, समस्त विद्याओं में प्रशंसनीय चतुराई को और समस्त क्रियाओं में प्रशंसनीय कर्मठता को प्राप्त हो चुके हैं। वे प्रभु सरस्वती के एकमात्र स्वामी हैं इसलिए समस्त वाङ्मय (शास्त्र) इन्हें प्रत्यक्ष हो गये हैं। ये समस्त प्राचीन इतिहास के ज्ञाता हैं, उत्तम कवि हैं, वक्ता हैं, गमक हैं और सबको प्रिय हैं क्योंकि कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि आदि विद्याएँ उन्हें स्वभाव से प्राप्त हो गई हैं। क्षायिक सम्यग्दर्शन ने उनके मन के समस्त दोषों को दूर कर दिया है और स्वभाव से प्राप्त हुई सरस्वती ने उनके वचनसंबंधी समस्त दोषों का अपहरण कर लिया है। उनके परिणाम बहुत ही शान्त हैं, आठ वर्ष की उम्र में बिना गुरु के ही पाँच अणुव्रतरूप चर्या प्रगट हो चुकी है अतः उनकी सारी चेष्टाएँ जगत का हित करने वाली ही होती हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव कभी तो, जिनका पूर्वभव में अच्छी तरह अभ्यास किया है ऐसे लिपिविद्या तथा संगीतादि कला शास्त्रों का, स्वयं अभ्यास करते हैं और कभी दूसरों को कराते हैं। कभी छन्दशास्त्र, कभी अलंकार शास्त्र, कभी प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, संख्या आदि का विवेचन और कभी चित्र खींचना आदि कला शास्त्रों का मनन करते हैं। कभी वैयाकरणों के साथ व्याकरणसंबंधी चर्चा करते हैं, कभी कवियों के साथ काव्य-चर्चा, कभी अधिक बोलने वाले वादियों के साथ वाद करते हैं, कभी गीतगोष्ठी, कभी नृत्यगोष्ठी, कभी वादित्रगोष्ठी और वीणागोष्ठी के द्वारा विद्वानों का मनोरंजन करते हैं।
कभी मयूरों का रूप धरकर नृत्य करते हुए देवकिंकरों को लय के अनुसार हाथ की ताल दे-देकर नृत्य कराते हैं। कभी विक्रिया शक्ति से तोते के रूपधारी देवकुमारों को स्पष्ट और मधुर अक्षरों से श्लोक पढ़ाते हैं। कभी हंसरूपधारी देवों को अपने हाथ से मृणाल के टुकड़े देकर सम्मानित करते हैं। कभी हाथी का रूप धरकर क्रीड़ा करने वाले देवों के साथ आनन्द से क्रीड़ा करते हैं। कभी मुर्गों का रूप धारण कर रत्नमयी जमीन में पड़ते हुए अपने प्रतिबिंबों के साथ ही युद्ध करने के इच्छुक देवों को देखते हुए उन पर प्रेम से हाथ पेâरते हैं। कभी विक्रिया शक्ति से मल्ल का रूप धारण कर मात्र क्रीड़ा करने के लिए युद्ध के इच्छुक देवों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। कभी क्रौंच और सारस पक्षियों के रूपधारी देवों का उच्च स्वर-व्रेंकार शब्द सुनते हुए उन पर हाथ फिराते हैं। कभी माला आदि आभूषणों से अलंकृत देव बालकों को दण्ड क्रीड़ा (पड़गर का खेल) में लगाकर नचाते हैं। कभी घर के आँगन में देवांगनाओं द्वारा बनायी गयी रत्नचूर्ण की चित्रावली का निरीक्षण करते हैं।
कभी वे देव बालक एक साथ मिलकर गद्य में और पद्य में उनके निर्मल यश का बखान करते हैं उसे प्रभु सुनते हुए मुस्करा देते हैं। कभी उनके दर्शनों के लिए प्रजा के लोग आ जाते हैं तब प्रभु मधुर और स्नेह युक्त दृष्टि से उनका अवलोकन करके किन्हीं के साथ मन्द हास्य से सहित सम्भाषण करके उन्हें प्रसन्न कर देते हैं। उस समय प्रजा को भी ऐसा लगता है मानों हमारा राज्याभिषेक ही हो गया हो। कभी देव बालकों के साथ कृत्रिम बावड़ियों में जल क्रीड़ा का आनन्द लेते हैं तो कभी सरयू नदी में प्रवेश कर लकड़ी के बने हुए यंत्रों से जलक्रीड़ा करते हैं।
जलक्रीड़ा के समय मेघकुमार जाति के देव भक्ति से धारा-गृह (फव्वारा) की रचना करके चारों ओर जल की धारा छोड़ते हुए प्रभु की सेवा करते हैं। नन्दन के समान अयोध्या के बगीचे में जब प्रभु वन क्रीड़ा के लिए जाते हैं तब पवनकुमार जाति के देव पृथ्वी को धूलि रहित करते हुए बगीचे के वृक्षों को धीरे-धीरे हिलाते हैं तब लताओं से पुष्पों की वर्षा होने लगती है उस समय ऐसा लगता है मानों प्रभु के आगमन की खुशी में ही लताएँ नाच रही हैं और पुष्पाञ्जलि क्षेपण कर रही हैं। इस प्रकार देवगण ऋषभदेव के वय के अनुसार वेष, भूषा और क्रीड़ा से प्रभु का मनोरंजन करने के बहाने स्वयं का मनोरंजन करते हुए प्रभु की सेवा का पुण्य सम्पादन कर रहे हैं तथा प्रभु के सानिध्य में ऊँची से ऊँची व्याकरण, छन्द आदि चर्चाएँ तथा तत्त्वचर्चाएँ करते हुए अपने ज्ञान को विकसित कर रहे हैं।
महाराजा नाभिराय के घर में देव बालकों के साथ समय यापन करते हुए ऋषभदेव सारी प्रजा के नेत्रों को आह्लादित कर रहे हैं। सौधर्म इन्द्र अपने यहाँ के मानस्तंभ के रत्नकरण्डकों में उत्पन्न हुई सुगन्धित मालाएँ, दिव्यलेप आदि दिव्यभोग सामग्री और वस्त्र अलंकार आदि वस्तुएँ नित्य प्रति वहीं (स्वर्ग) से प्रभु के लिए भेजता रहता है। तीर्थंकर कुमार स्वर्ग से लाए हुए उन माला, लेप, वस्त्र, आभरण आदि भोगोपभोग सामग्री का ही उपभोग करते हैं।
यौवन अवस्था में प्रवेश करने पर तीर्थंकर ऋषभदेव का शरीर बहुत ही सुन्दर दिख रहा है। जन्मकाल से ही प्रभु के दश अतिशय प्रगट हो गये थेः
१. उनका रूप बहुत ही सुन्दर और असाधारण था जो कि तपाये हुए स्वर्ण के समान कांतिवाला था
२. पसीना से रहित था
३. धूलि और मल से रहित था,
४. उनका रुधिर दूध के समान था
५. समचतुरस्रनामक सुन्दर संस्थान था
६. वज्रवृषभनाराच नाम का उत्तम संहनन था
७. सुगंधि की परम सीमा प्राप्त कर चुका था
८. एक हजार आठ लक्षणों से अलंकृत था
९. अप्रमेय, महाशक्तिशाली था और
१०. प्रिय तथा हितकारी वचन बोलने वाला था।
ये दश प्रकार की विशेषताएँ तीर्थंकर के अवतार पुण्यशाली दिव्य पुरुष में जन्म से ही विद्यमान रहती हैं।
श्रीवृक्ष, शंख, कमल, स्वस्तिक, अंकुश, तोरण, चम छत्र, सिंहासन, पताका, दो मछली, दो कुम्भ, कच्छप, चक्र, समुद्र, सरोवर, विमान, भवन, हाथी, मनुष्य, स्त्रियाँ, सिंह, वाण, धनुष, मेरु, इन्द्र, देवगंगा, पुर, गोपुर, चंद्रमा, सूर्य, उत्तम घोड़ा, ताल-वृन्त-पंखा, बांसुरी, वीणा, मृदंग, मालाएँ, रेशमीवस्त्र, दुकान, कुंडल आदि चमकते हुए आभूषण, फल सहित उपवन, पके हुए कलमों से सुशोभित खेत, रत्नद्वीप, वङ्का, पृथ्वी, लक्ष्मी, सरस्वती, कामधेनु, वृषभ, चूड़ामणि, महानिधियाँ, कल्पलता, सुवर्ण, जम्बूद्वीप, गरुड़, नक्षत्र, तारे, राजमहल, मंगलादि ग्रह, सिद्धार्थ वृक्ष, आठ प्रातिहार्य और आठ मंगलद्रव्य इन्हें आदि लेकर एक सौ आठ लक्षण और मसूरिका आदि नौ सौ व्यञ्जन तीर्थंकर के शरीर में विद्यमान रहते हैं। इन मनोहर और शुभ लक्षणों से व्याप्त श्री ऋषभदेव का शरीर ऐसा सुन्दर दिख रहा है कि जैसे ज्योतिषी देवों से भरित आकाशरूपी आँगन। उनका मुखरूपी चन्द्र इतना अधिक कांतिमान है कि तीनों लोकों में उसके समान कांति अन्य किसी की भी नहीं है। वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों से उत्पन्न हुई व्याधियाँ तीर्थंकर के शरीर में स्थान नहीं पा सकी थीं सो ठीक ही है, वृक्ष अथवा अन्य पर्वतों को हिलाने वाली वायु मेरुपर्वत पर अपना असर नहीं दिखा सकती। उनके शरीर में न कभी बुढ़ापा आ सकता है, न कभी उन्हें खेद होता है और न कभी असमय में उनका अपघात (मृत्यु) ही हो सकता है। उनके श्रीवत्स से चिन्हित वक्षस्थल पर ‘इन्द्रच्छद’ नाम का दिव्यहार बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रहा है।
किसी एक दिन महाराजा नाभिराय ऋषभदेव की यौवन अवस्था का प्रारंभ देखकर अपने मन में विचार करते हैं- ‘‘ये देव अतिशय सुन्दर शरीर के धारक हैं इनके चित्त को हरण करने वाली कौन सी सुन्दर स्त्री हो सकती है? सुन्दर स्त्री तो मिल सकती है, परन्तु इनका विषयराग अत्यन्त मन्द है इसलिए इनके विवाह का प्रारंभ करना ही कठिन कार्य है। दूसरी बात यह है कि इनका धर्मतीर्थ की प्रवत्ति करने में बहुत बड़ा उद्योग है इसलिए ये नियम से सर्व परिग्रह को छोड़कर वन में प्रवेश करेंगे। तथापि तपस्या करने के लिए जब तक इनका समय आता है तब तक इनके लिए लोकव्यवहार के अनुरोध से योग्य स्त्री का विचार करना चाहिए। जिस प्रकार हंसी कीचड़ रहित मानसरोवर में निवास करती है उसी प्रकार कोई योग्य और कुलीन स्त्री इनके निर्मल मानस में निवास करे।’’
ऐसा विचार कर लक्ष्मीवान् महाराजा नाभिराय बड़े ही आदर और हर्ष के साथ तीर्थंकर ऋषभदेव के पास पहुँचते हैं। पिता को सामने आते देख प्रभु ऋषभदेव उनका स्वागत करते हैं। दोनों यथायोग्य अपने-अपने आसन पर विराजमान हो जाते हैं। तब महाराजा नाभिराय शांतिपूर्वक ऋषभदेव से कहते हैं- ‘‘हे देव! मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ इसलिए आप सावधान होकर सुनिये। आप जगत् के अधिपति हैं इसलिए आपको जगत् का उपकार करना चाहिए। हे देव! आप जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा हैं तथा स्वयंभू हैं-अपने आप ही उत्पन्न हुए हैं, क्योंकि आपकी उत्पत्ति में अपने आपको पिता मानने वाले हम तो एक छलमात्र हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने में उदयाचल निमित्तमात्र है क्योंकि सूर्य तो स्वयं ही उदित होता है उसी प्रकार आपकी उत्पत्ति होने में हम निमित्तमात्र हैं क्योंकि आप स्वयं ही उत्पन्न हुए हैं। आप माता के पवित्र गर्भ-गृह में कमलरूपी दिव्य-आसन पर अपनी उत्कृष्ट शक्ति स्थापन कर उत्पन्न हुए हैं इसलिए वास्तव में आप शरीररहित हैं। यद्यपि मैं आपका यथार्थ में पिता नहीं हूँ, निमित्तमात्र से ही पिता कहलाता हूँ तथापि मैं आपसे एक अभ्यर्थना करता हूँ कि आप इस समय संसार की सृष्टि की ओर भी अपनी बुद्धि लगाइये। आप आदिपुरुष हैं इसलिए आपको देखकर अन्य लोग भी ऐसी ही प्रवृत्ति करेंगे क्योंकि जिनके उत्तम सन्तान होने वाली है ऐसी प्रजा महापुरुषों के ही मार्ग का अनुगमन करती है इसलिए हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ! आप इस संसार में किसी इष्ट कन्या के साथ विवाह करने के लिए मन कीजिए क्योंकि ऐसा करने से प्रजा की संतति का उच्छेद नहीं होगा और प्रजा की संतति का उच्छेद नहीं होने पर धर्म की संतति बढ़ती रहेगी। इसलिए हे देव! मनुष्यों के इस अविनाशीक विवाहरूपी धर्म को आप अवश्य ही स्वीकार कीजिये। हे देव! आप इस विवाह कार्य को गृहस्थों का एक धर्म समझिए क्योंकि गृहस्थों को सन्तान की रक्षा में प्रयत्न अवश्य ही करना चाहिए। यदि आप मुझे किसी भी तरह गुरु (बड़ा) मानते हैं तो आपको मेरे वचनों का किसी भी कारण से उल्लंघन नहीं करना चाहिए क्योंकि गुरुओं के वचन उल्लंघन करना इष्ट नहीं है।’’ इस प्रकार वचन कहकर धीर-वीर महाराजा नाभिराय चुप हो गए, तब ऋषभदेव हँसते हुए-
‘‘ओम्’’ऐसा कहकर उनके वचन स्वीकार कर लेते हैं। ‘‘अहो! इन्द्रियों को वश में करने वाले भगवान ने जो विवाह कराने की स्वीकृति दी थी वह क्या उनके पिता की चतुराई थी, अथवा प्रजा का उपकार करने की इच्छा थी अथवा वैसा कोई कर्मों का नियोग ही था।’’
ऋषभदेव की अनुमति जानकर नाभिराय निःशंक होकर बड़े हर्ष के साथ विवाह का बड़ा भारी आयोजन करते हैं। पहले सौधर्म इन्द्र की अनुमति से सुशील, सुन्दर लक्षणों वाली, सती, बहुत ही शांत परिणामों वाली और यौवनवती ऐसी यशस्वती तथा सुनन्दा नाम की दो कन्याओं को उनके भ्राता तीर्थंकर महापुरुष के साथ अपनी बहनों का विवाह प्रस्ताव सुनकर रोमांचित हो जाते हैं, उनके हर्ष का पार नहीं रहता है। तभी इन्द्र के साथ बहुत से देवगण आकर आनन्द के साथ बहुत बड़े विवाह मण्डप की रचना कर देते हैं। अयोध्या नगरी की शोभा का तो कहना ही क्या? प्रजा के लोगों में तो आनन्द की विशेष लहर है ही, वे सभी लोग मंगल महोत्सव को मनाने में विशेष तैयारियाँ कर ही रहे हैं, सारी नगरी ध्वजा, पताका, तोरणद्वार और पूâलों की मालाओं से सजायी गई है। देवगण भी उत्साह से सारे महोत्सव को सम्पन्न कराने में दत्तचित्त हैं।
इस प्रकार महामहोत्सव के साथ तीर्थंकर ऋषभदेव का विवाह सम्पन्न होता है। नाभिराय अपने परिवार के लोगों के साथ दोनों पुत्रवधुओं को देखकर बहुत ही सन्तुष्ट हो रहे हैं, सो ठीक ही है क्योंकि संसारीजनों को विवाह आदि लौकिक धर्म ही प्रिय होता है। उस समय माता मरुदेवी बहुत प्रसन्न हो रही हैं, सो सच ही है पुत्र के विवाहोत्सव में माताओं को अधिक प्रेम होता ही है। प्रजा के लोगों का भी आनन्द बढ़ता ही जा रहा है। मनुष्य स्वयं ही भोगों की तृष्णा रखते हैं इसलिए वे स्वामी को भोग स्वीकार करते देखकर उन्हीं का अनुसरण करने लगते हैं। तीर्थंकरदेव का वह विवाहोत्सव केवल मनुष्यलोक की ही प्रीति के लिए नहीं हुआ था, प्रत्युत् उसने स्वर्गलोक में भी भारी प्रीति को उत्पन्न किया था।
नवविवाहिता यशस्वती और सुनन्दा साक्षात् तीर्थंकर ऋषभदेव जैसे वर को प्राप्त कर महासौभाग्यशालिनी हुई ही थीं, साथ ही अपने स्त्रीपर्याय को भी वे उस समय बहुत ही उत्तम गिन रही थीं। उन दोनों की सुन्दरता श्री ऋषभदेव के योग्य थी और गुणों में वे स्त्री सृष्टि में सर्वोच्च थीं, तभी तो उन्हें तीर्थंकर की पत्नी होने का पुण्य अवसर मिला था। वे नाना प्रकार के सुन्दर-सुन्दर स्वर्ग से लाये गये वस्त्र, आभूषणों से अलंकृत थीं। उनके गले में एकावली हार शोभायमान हो रहा था जो कि उनके कण्ठ की शोभा को द्विगुणित कर रहा था।
जहाँ तीर्थंकर ऋषभदेव तो वर हैं और यशस्वती-सुनन्दा जैसी यथा नाम तथा गुणों वाली कन्याएँ वधू हैं, अन्तिम कुलकर महाराजा नाभिराय के साथ ही सौधर्म इन्द्र विवाह महोत्सव करने वाला है और अयोध्या की भाग्यशालिनी प्रजा के साथ-साथ सर्व आर्यखण्ड के लोग तथा स्वर्ग के असंख्य देव-देवियाँ जहाँ उत्सव को देखने वाले हैं, पुरी की पुरन्ध्रिकाएँ और अप्सराएँ जहाँ मंगलगीत गाने वाली और नृत्य करने वाली हैं, वहाँ के उस समय के महामहोत्सव का भला कौन वर्णन कर सकता है?
यशस्वती महादेवी राजहल में सो रही हैं, रात्रि के पिछले प्रहर में कुछ उत्तम-उत्तम स्वप्न देखती हैं, उसी समय तुरही की मंगल ध्वनि बजने लगती है और बंदीजन मंगलपाठ-सुप्रभाती पढ़ने लगते हैं-
‘‘हे दूसरों का कल्याण करने वाली और स्वयं सैकड़ों कल्याणों को प्राप्त होने वाली देवि! अब तुम जागो, क्योंकि यह उषा की मंगल बेला पूर्व दिशा को अनुरक्त (लाल) कर रही है। हे मातः! तुम्हारे द्वारा देखे गये अनेकों मंगलीक शुभ स्वप्न तुम्हारे और जगत् के मंगल के लिए होवें। हे कल्याणि! आपके पतिदेव के स्मरण से आपका यह सुप्रभात आपके लिए मंगलमयी होवे। हे ऋषभदेव की प्रियवल्लभे! अब तुम शय्या छोड़ो और सभी परिवार के जनों को आनन्दित करो।’’ इत्यादि मंगल पदों से सुप्रभाती पढ़ते हुए बंदीजनों का कोलाहल शांत हो रहा है। तब यशस्वती महादेवी शय्या को छोड़कर प्राप्तःकाल का मंगलस्नान कर हर्ष से रोमांचित शरीर हो सबके स्वामी तीर्थंकर ऋषभदेव के समीप पहुँचती हैं। विनय से पतिदेव को प्रणाम कर उनके द्वारा निर्दिष्ट भद्रासन पर बैठ जाती हैं पुनः तीर्थंकर देव के सन्मुख हाथ जोड़कर निवेदन करती हैं- तब ऋषभदेव अपने दिव्य अवधिज्ञान से स्वप्नों के फल को जानकर कहते हैं- ‘‘ हे देवि! स्वप्नों में जो तूने सुमेरु पर्वत देखा है उसका फल यह है कि तेरे चक्रवर्ती पुत्र होगा। सूर्य उसके प्रताप को और चन्द्रमा उसकी कांतिरूपी सम्पदा को सूचित कर रहा है। सरोवर के देखने से तेरा पुत्र अनेक पवित्र लक्षणों से चिन्हित शरीर छोड़कर अपने विस्तृत वक्षस्थल पर कमलवासिनी-लक्ष्मी को धारण करने वाला होगा। हे देवि! पृथ्वी का ग्रसा जाना देखने से तुम्हारा वह पुत्र चक्रवर्ती होकर समुद्ररूपी वस्त्र को धारण करने वाली समस्त छह खण्ड पृथ्वी का स्वामी होगा तथा समुद्र को देखने से वह चरमशरीरी होकर संसाररूपी समुद्र को पार करने वाला होगा। हे कमलनयने! इक्ष्वाकुवंश को आनन्द देने वाला वह पुत्र तेरे सौ पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ होगा।’’
इस प्रकार पति के वचन सुनकर महारानी यशस्वती हर्ष के अतिरेक से रोमांच को प्राप्त होती हुई पतिदेव को प्रणाम कर अपने राजमहल में वापस आ जाती हैं। इधर सर्वार्थसिद्धि से अहमिंद्र का जीव च्युत होकर महादेवी यशस्वती के पवित्र गर्भ में निवास करने लगता है। वह देवी तीर्थंकरदेव के दिव्य प्रभाव से उत्पन्न हुए गर्भ को धारण कर रही है। यही कारण है कि वह अपने ऊपर आकाश में चलते हुए सूर्य को भी नहीं सहन करती है। वीर सम्राट् को गर्भ में धारण करने वाली वह अपने मुख को तलवाररूपी दर्पण में देखती है पुनः अतिशय मान से संयुक्त वह तलवार में पड़ती हुई अपनी प्रतिकूल छाया को भी नहीं सहन कर सकती है। वह रत्नगर्भा भूमि के समान, फलवाली बेल के समान, सूर्यरूपी तेज जिसमें छिपा है ऐसी पूर्व दिशा के समान अतिशय सुन्दरता को प्राप्त हो रही है। यशस्वती देवी के गर्भावस्था में भी उदर की त्रिवली भंग नहीं हुई थी ऐसा लगता था कि मानों बालक अभंग दिग्विजय प्राप्त करेगा। उस देवी को सदा उत्तम-उत्तम दोहले होते रहते हैं जो कि माता मरुदेवी के हर्षसागर की वृद्धि को करने वाले रहते हैं।
इस प्रकार नव महीने व्यतीत हो जाने पर यशस्वती महादेवी देदीप्यमान तेज से परिपूर्ण और महापुण्यशाली पुत्ररत्न को जन्म देती हैं। तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्म के समय में जो शुभ दिन, शुभ लग्न, शुभ योग, शुभ चन्द्रमा और शुभ नक्षत्र आदि थे, वे ही शुभ दिन आदि उस समय भी हैं अर्थात् उस समय चैत्र कृष्ण नवमी, मीन लग्न, ब्रह्मयोग, धनराशि का चंद्रमा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र है। उस समय उत्तम मुहूर्त में जन्मा हुआ वह शिशु अपनी दोनों भुजाओं से पृथ्वी का आलिंगन कर उत्पन्न हुआ है इसलिए निमित्तज्ञानियों ने बतलाया कि ‘यह समस्त पृथ्वी का अधिपति अर्थात् चक्रवर्ती होगा।’ उस समय पुत्र जन्म के अवसर पर उसके दादा-दादी अर्थात् महाराजा नाभिराय और महारानी मरुदेवी दोनों ही परमहर्ष को प्राप्त हो रहे हैं। अतीव हर्ष को प्राप्त हुई पुत्रवती सौभाग्यवती स्त्रियाँ मंगल बधाई गाती हुई यशस्वती देवी को आशीर्वाद देते हुए कहती हैं- ‘‘हे देवि! पुत्राणां शतं प्रसूष्व, शतपुत्रा भव, अर्थात् हे देवि! तू इसी प्रकार सौ पुत्रों को उत्पन्न कर।’’
उसी क्षण राजमंदिर में बड़े-बड़े नगाड़े बजने लगते हैं, तुरही, दुंदुभि, झल्लरी, शहनाई, सितार, शंख, काहल और ताल आदि अनेक बाजे बज रहे हैं। देवगण भी आकाश से सुगन्धित पुष्पो की वर्षा कर रहे हैं। सुगंधित कमल पराग से मिश्रित जल के छींटों से सहित ऐसी हवा मंद-मंद चल रही है। देवगण आकाश में जय-जयकार के शब्दोच्चारण से सारे वातावरण को मुखरित कर रहे हैं। देवियाँ शुभ मंगल शब्दों के द्वारा शिशु को शुभाशीर्वाद दे रही हैं- ‘हे तीर्थंकर के सुपुत्र! तुम चिरंजीव रहो, करोड़ों मंगल को प्राप्त करो।’’
नर्तकियाँ मंगल गीत गाते हुए नृत्य कर रही हैं, अयोध्या नगर की गली-गली में चंदन का छिड़काव किया जा रहा है एवं मंगल चौक पूरे जा रहे हैं। रत्ननिर्मित तोरणों से घर-घर के द्वार सजाये गये हैं। सौभाग्यवती स्त्रियाँ रत्नों के चूर्ण से नाना तरह के सुन्दर चौक बनाकर उन पर सुवर्ण कमलों से ढके हुए ऐसे मंगलीक सुवर्ण कलश रख रही हैं। उस समय समस्त अयोध्यानगरी उत्सव को धारण कर रही है।
तीर्थंकर ऋषभदेव स्वयं अपने हाथों से सुवर्ण, रत्न आदि दान से धन की धारा बरसा रहे हैं अर्थात् सुवर्ण रत्न आदि दान दे रहे हैं। वह बालकरूपी चंद्रमा तीर्थंकर ऋषभदेवरूपी उदयाचल से उदय को प्राप्त हुआ है अतएव वह समस्त अंतःपुर सहित नगर भर में आनन्दरूपी अमृत को बरसा रहा है। ‘‘उस समय प्रेम से भरे हुए सभी बंधुगण समस्त भरतक्षेत्र के अधिपति होने वाले उस पुत्र को ‘भरत’ इस नाम से संबोधित कर रहे हैं। इतिहास के जानने वालों का कहना है कि जहाँ अनेक आर्यपुरुष रहते हैं ऐसा यह हिमवान पर्वत से लेकर समुद्रपर्यंत का चक्रवर्तियोें का क्षेत्र उसी ‘भरत’ पुत्र के नाम के कारण ‘भारतवर्ष’ इस नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हो रहा है।’’
उस बालक के चरणकमलों में चक्र, छत्र, तलवार, दण्ड आदि चौदह रत्नों के चिन्ह बने हुए हैं और वे ऐसे मालूम पड़ते हैं कि मानों ये चौदह रत्न लक्षणों के बहाने ही भावी चक्रवर्ती की पहले से ही सेवा कर रहे हों। वह बालक माता यशस्वती के स्तन का पान करता हुआ जब कभी दूध के कुरले को बार-बार उगलता था तब वह ऐसा मालूम पड़ता था कि मानों अपना यश ही दिशाओं में बाँट रहा है। वह बालक ‘भरत’ अपनी मंद मुस्कान, मनोहर हास, मणिमयी भूमि पर चलना और अव्यक्त मधुर भाषण आदि के द्वारा अपने दादा-दादी और माता-पिता के हर्ष समुद्र को बढ़ा रहा है। जैसे-जैसे बालक बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही उसके गुण भी बढ़ते जा रहे हैं।
विधि के विधाता तीर्थंकर ऋषभदेव उस बालक के क्रम से अन्नप्राशन, चौल और उपनयन आदि संस्कार स्वयं करते हैं। बालक भरत शैशव में प्रवेश कर रहे हैं। उस समय उनकी वाणी, कला, विद्या, द्युति, शील और विज्ञान आदि सब कुछ वही हैं जो कि उनके पिता ऋषभदेव के हैं। पिता के साथ तन्मयता को प्राप्त भरत पुत्र को देखकर प्रजा कहा करती है कि ‘पिता का आत्मा ही पुत्र नाम से कहा जाता है’ यह बात बिल्कुल सच है। वह भरत पन्द्रहवें मनु तीर्थंकर ऋषभदेव के मन को भी अपने अधीन कर लेते हैं इसलिए लोग कहने लगे कि- ‘‘अहो! यह सोलहवाँ मनु उत्पन्न हो गया है।’’
केवल मात्र भरत के चरणों का पराक्रम ही समस्त पृथ्वीमंडल पर आक्रमण करने वाला है फिर भला उसके सम्पूर्ण शरीर का पराक्रम कौन सहन कर सकता है? उसके शरीरसम्बन्धी बल का वर्णन केवल इतने से ही समझ लिया जाता था कि वह चरमशरीरी है, और उसकी आत्मासंबंधी बल का वर्णन दिग्विजय आदि बाह्य चिन्हों से जाना जावेगा। चक्रवर्ती के क्षेत्र में रहने वाले समस्त मनुष्य और देवों में जितना बल होता है उससे कई गुना अधिक बल चक्रवर्ती भरत की भुजाओं में है। ‘जहाँ सुन्दर आकार है वहीं समस्त गुण निवास करते हैं’ इस लोकोक्ति के अनुसार सत्य, शौच, क्षमा, त्याग, प्रज्ञा, उत्साह, दया, दम, शम और विनय ये गुण उनकी आत्मा के साथ-साथ रह रहे हैं। सुन्दर शरीर, नीरोगता, ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति, बल, आयु, यश, बुद्धि, सर्वप्रियवचन और चातुर्य आदि इस संसार में जितने भी कुछ सुख के कारण हैं वे सब अभ्युदय कहलाते हैं और वे सब संसारी जीवों को पुण्य के उदय से ही प्राप्त होते हैं। जब तीर्थंकर ऋषभदेव भी अपने प्रिय पुत्र भरत के मुख को देखकर उसके विनयपूर्ण शब्दों को सुनकर प्रणाम के बाद उठाकर खड़े हुए उसका बार-बार आलिंगन कर तथा उसे अपनी गोद में बिठाकर परम संतोष को प्राप्त होते रहते हैं, तब पुनः महाराजा नाभिराज, दादी मरुदेवी और माता यशस्वती तथा सुनन्दा के आनन्द का क्या कहना है! वे तो भरत की चेष्टा को उत्सुकता से देखा ही करते हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव की द्वितीय वल्लभा सुनन्दा महादेवी किसी समय रात्रि के पिछले प्रहर में शुभ स्वप्नों को देखकर सर्वार्थसिद्धि से च्युत हुए अहमिंद्र के जीव को अपने उदर में धारण करती हैं। सुखपूर्वक नवमास व्यतीत कर उत्तम नक्षत्र आदि शुभयोग में पुत्ररत्न को जन्म देती हैं। उस समय भी पूर्ववत् नाना उत्सव किये जाते हैं तथा बालक का ‘बाहुबली’ यह नामकरण किया जाता है जो कि मानों उस बालक के भविष्य में होने वाले अचिन्त्य बाहुबल को ही सूचित कर रहा है। यह बालक भी इस युग के चौबीस कामदेवों में से ‘प्रथम कामदेव’ है अतः इसकी सुन्दरता का वर्णन लेखनी के द्वारा कोई नहीं कर सकता है। इस बालक के शरीर का वर्ण मरकतमणि के समान हरा है जो कि अभूतपूर्व ही सौंदर्य को दिखा रहा है।
इधर माता यशस्वती के क्रम-क्रम से निन्यानवे पुत्र होते हैं। वृषभसेन, अनन्तविजय, अनन्तवीर्य, अच्युत, वीर और वरवीर आदि जिनके अच्छे-अच्छे नाम हैं और ये सभी भी चरमशरीरी महापुण्यवान् हैं। इनके बाद महादेवी यशस्वती के एक सुन्दर कन्या का जन्म होता है जिसका ‘ब्राह्मी’ ऐसा नाम रखा जाता है। उसी प्रकार से सुनन्दा देवी के भी एक पुत्री का जन्म होता है जिसे सुन्दरी नाम से पुकारा जाता है। इस प्रकार तीर्थंकर ऋषभदेव के भरत, बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्र एवं ब्राह्मी-सुन्दरी ऐसी दो पुत्रियाँ हैं। इन सभी परिवार के साथ महाराजा नाभिराय और माता मरुदेवी अपने आप में महान् सुख का अनुभव कर रहे हैं।
क्रमश............
जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
जिनबालक ऋषभदेव को रत्नों के बने पालने में झुलाती हुई देवांगनाएँ तीर्थंकर के पुण्य गीत को गा रही हैं और फूली नहीं समा रही हैं। वे देवांगनाएँ धायरूप में बालक को कभी गोद में लेकर प्यार करती हैं, कभी हँसाती हैं तो कभी माता की गोद में दे देती हैं, पुनः दूसरी देवी आकर झट से अपनी गोद में ले लेती है। प्रजा के लोग दिन पर दिन दर्शन के लिए वहाँ आते रहते हैं और बालक को यदि गोद में ले पाते हैं तो अपने आप को बहुत ही पुण्यशाली समझ लेते हैं। कितनी ही महिलाएं, बालिकाएँ और नववधुएँ आकर बालक को गोद में ले-लेकर खिलाती रहती हैं। जिनबालक के मुखरूपी चन्द्रमा पर मन्द हास्यरूपी चाँदनी सदैव प्रगट रहती है, उससे माता-पिता का सन्तोषरूपी समुद्र अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होता रहता है। ऋषभदेव दूज के चन्द्रमा के समान शरीर की वृद्धि के साथ-साथ अनेक गुणों से भी वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं।
धीरे-धीरे उनके मुखकमल से क्रम-क्रम से अस्पष्टवाणी प्रगट होने लगती है जिसे सुन-सुनकर माता-पिता व प्रजा के लोग अत्यधिक आनन्द का अनुभव करते हुए ऐसा चाहते हैं कि हम लोग सदा प्रभु की वाणी सुनते ही रहें। इन्द्रनील मणियों की भूमि पर धीरे-धीरे गिरते-पड़ते चलते हुए बालक ऋषभदेव बहुत ही सुन्दर लगते हैं। कभी देवियाँ हाथ की अँगुली का सहारा देती हैं और कभी भगवान स्वयं चलना चाहते हैं तब देवियाँ अंगुली छोड़ देती हैं तथा बालक की डगमगाती हुई चाल को देखकर हँसने लगती हैं, तब बालक भी खिलखिलाकर हँसने लगता है। बालक को हँसते हुए देखकर माता मरुदेवी हर्ष के अतिरेक से रोमांचित हो जाती हैं।
बालक ऋषभदेव धीरे-धीरे मणियों की भूमि पर बैठने लगते हैं और देव बालकों के साथ रत्नों की धूलि में क्रीड़ा करने लगते हैं। इन्द्र की आज्ञा से बहुत से देव स्वर्ग से आकर जिनबालक की अवस्था के अनुसार अपने-अपने शरीर को बनाकर बालक के साथ क्रीड़ा करते हुए बहुत ही सुख का अनुभव करते हैं। जिनबालक अपनी बाल्य अवस्था को पार कर कौमार अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। उनके साथ-साथ ही देवगण वैसा ही शरीर बनाकर उनके साथ खेला करते हैं। बालक का मनोहर शरीर, प्यारी बोली, मनोहर अवलोकन और मुस्कराते हुए वार्तालाप करना यह सब संसार की प्रीति को बढ़ा रहे हैं। बालक के शरीर के साथ-साथ उनकी कलाएँ वृद्धिंगत होती जा रही हैं। ऋषभदेव बालक होते हुए भी उनमें बालसुलभ चेष्टाएँ न होकर प्रौढ़ता और गंभीरता विद्यमान है।
बालक ऋषभदेव गर्भ से ही मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञान से समन्वित हैं इसलिए वे समस्त विद्याओं के ईश्वर हैं क्योंकि जन्मान्तर का संस्कार स्मरणशक्ति को सदैव पुष्ट रखता है यही कारण है कि वे समस्त लोक के गुरु हैं उनका कोई भी गुरु नहीं बन सकता है। वे प्रभु बिना शिक्षा के ही समस्त कलाओं में प्रशंसनीय कुशलता को, समस्त विद्याओं में प्रशंसनीय चतुराई को और समस्त क्रियाओं में प्रशंसनीय कर्मठता को प्राप्त हो चुके हैं। वे प्रभु सरस्वती के एकमात्र स्वामी हैं इसलिए समस्त वाङ्मय (शास्त्र) इन्हें प्रत्यक्ष हो गये हैं। ये समस्त प्राचीन इतिहास के ज्ञाता हैं, उत्तम कवि हैं, वक्ता हैं, गमक हैं और सबको प्रिय हैं क्योंकि कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि आदि विद्याएँ उन्हें स्वभाव से प्राप्त हो गई हैं। क्षायिक सम्यग्दर्शन ने उनके मन के समस्त दोषों को दूर कर दिया है और स्वभाव से प्राप्त हुई सरस्वती ने उनके वचनसंबंधी समस्त दोषों का अपहरण कर लिया है। उनके परिणाम बहुत ही शान्त हैं, आठ वर्ष की उम्र में बिना गुरु के ही पाँच अणुव्रतरूप चर्या प्रगट हो चुकी है अतः उनकी सारी चेष्टाएँ जगत का हित करने वाली ही होती हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव कभी तो, जिनका पूर्वभव में अच्छी तरह अभ्यास किया है ऐसे लिपिविद्या तथा संगीतादि कला शास्त्रों का, स्वयं अभ्यास करते हैं और कभी दूसरों को कराते हैं। कभी छन्दशास्त्र, कभी अलंकार शास्त्र, कभी प्रस्तार, नष्ट, उद्दिष्ट, संख्या आदि का विवेचन और कभी चित्र खींचना आदि कला शास्त्रों का मनन करते हैं। कभी वैयाकरणों के साथ व्याकरणसंबंधी चर्चा करते हैं, कभी कवियों के साथ काव्य-चर्चा, कभी अधिक बोलने वाले वादियों के साथ वाद करते हैं, कभी गीतगोष्ठी, कभी नृत्यगोष्ठी, कभी वादित्रगोष्ठी और वीणागोष्ठी के द्वारा विद्वानों का मनोरंजन करते हैं।
कभी मयूरों का रूप धरकर नृत्य करते हुए देवकिंकरों को लय के अनुसार हाथ की ताल दे-देकर नृत्य कराते हैं। कभी विक्रिया शक्ति से तोते के रूपधारी देवकुमारों को स्पष्ट और मधुर अक्षरों से श्लोक पढ़ाते हैं। कभी हंसरूपधारी देवों को अपने हाथ से मृणाल के टुकड़े देकर सम्मानित करते हैं। कभी हाथी का रूप धरकर क्रीड़ा करने वाले देवों के साथ आनन्द से क्रीड़ा करते हैं। कभी मुर्गों का रूप धारण कर रत्नमयी जमीन में पड़ते हुए अपने प्रतिबिंबों के साथ ही युद्ध करने के इच्छुक देवों को देखते हुए उन पर प्रेम से हाथ पेâरते हैं। कभी विक्रिया शक्ति से मल्ल का रूप धारण कर मात्र क्रीड़ा करने के लिए युद्ध के इच्छुक देवों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। कभी क्रौंच और सारस पक्षियों के रूपधारी देवों का उच्च स्वर-व्रेंकार शब्द सुनते हुए उन पर हाथ फिराते हैं। कभी माला आदि आभूषणों से अलंकृत देव बालकों को दण्ड क्रीड़ा (पड़गर का खेल) में लगाकर नचाते हैं। कभी घर के आँगन में देवांगनाओं द्वारा बनायी गयी रत्नचूर्ण की चित्रावली का निरीक्षण करते हैं।
कभी वे देव बालक एक साथ मिलकर गद्य में और पद्य में उनके निर्मल यश का बखान करते हैं उसे प्रभु सुनते हुए मुस्करा देते हैं। कभी उनके दर्शनों के लिए प्रजा के लोग आ जाते हैं तब प्रभु मधुर और स्नेह युक्त दृष्टि से उनका अवलोकन करके किन्हीं के साथ मन्द हास्य से सहित सम्भाषण करके उन्हें प्रसन्न कर देते हैं। उस समय प्रजा को भी ऐसा लगता है मानों हमारा राज्याभिषेक ही हो गया हो। कभी देव बालकों के साथ कृत्रिम बावड़ियों में जल क्रीड़ा का आनन्द लेते हैं तो कभी सरयू नदी में प्रवेश कर लकड़ी के बने हुए यंत्रों से जलक्रीड़ा करते हैं।
जलक्रीड़ा के समय मेघकुमार जाति के देव भक्ति से धारा-गृह (फव्वारा) की रचना करके चारों ओर जल की धारा छोड़ते हुए प्रभु की सेवा करते हैं। नन्दन के समान अयोध्या के बगीचे में जब प्रभु वन क्रीड़ा के लिए जाते हैं तब पवनकुमार जाति के देव पृथ्वी को धूलि रहित करते हुए बगीचे के वृक्षों को धीरे-धीरे हिलाते हैं तब लताओं से पुष्पों की वर्षा होने लगती है उस समय ऐसा लगता है मानों प्रभु के आगमन की खुशी में ही लताएँ नाच रही हैं और पुष्पाञ्जलि क्षेपण कर रही हैं। इस प्रकार देवगण ऋषभदेव के वय के अनुसार वेष, भूषा और क्रीड़ा से प्रभु का मनोरंजन करने के बहाने स्वयं का मनोरंजन करते हुए प्रभु की सेवा का पुण्य सम्पादन कर रहे हैं तथा प्रभु के सानिध्य में ऊँची से ऊँची व्याकरण, छन्द आदि चर्चाएँ तथा तत्त्वचर्चाएँ करते हुए अपने ज्ञान को विकसित कर रहे हैं।
महाराजा नाभिराय के घर में देव बालकों के साथ समय यापन करते हुए ऋषभदेव सारी प्रजा के नेत्रों को आह्लादित कर रहे हैं। सौधर्म इन्द्र अपने यहाँ के मानस्तंभ के रत्नकरण्डकों में उत्पन्न हुई सुगन्धित मालाएँ, दिव्यलेप आदि दिव्यभोग सामग्री और वस्त्र अलंकार आदि वस्तुएँ नित्य प्रति वहीं (स्वर्ग) से प्रभु के लिए भेजता रहता है। तीर्थंकर कुमार स्वर्ग से लाए हुए उन माला, लेप, वस्त्र, आभरण आदि भोगोपभोग सामग्री का ही उपभोग करते हैं।
यौवन अवस्था में प्रवेश करने पर तीर्थंकर ऋषभदेव का शरीर बहुत ही सुन्दर दिख रहा है। जन्मकाल से ही प्रभु के दश अतिशय प्रगट हो गये थेः
१. उनका रूप बहुत ही सुन्दर और असाधारण था जो कि तपाये हुए स्वर्ण के समान कांतिवाला था
२. पसीना से रहित था
३. धूलि और मल से रहित था,
४. उनका रुधिर दूध के समान था
५. समचतुरस्रनामक सुन्दर संस्थान था
६. वज्रवृषभनाराच नाम का उत्तम संहनन था
७. सुगंधि की परम सीमा प्राप्त कर चुका था
८. एक हजार आठ लक्षणों से अलंकृत था
९. अप्रमेय, महाशक्तिशाली था और
१०. प्रिय तथा हितकारी वचन बोलने वाला था।
ये दश प्रकार की विशेषताएँ तीर्थंकर के अवतार पुण्यशाली दिव्य पुरुष में जन्म से ही विद्यमान रहती हैं।
श्रीवृक्ष, शंख, कमल, स्वस्तिक, अंकुश, तोरण, चम छत्र, सिंहासन, पताका, दो मछली, दो कुम्भ, कच्छप, चक्र, समुद्र, सरोवर, विमान, भवन, हाथी, मनुष्य, स्त्रियाँ, सिंह, वाण, धनुष, मेरु, इन्द्र, देवगंगा, पुर, गोपुर, चंद्रमा, सूर्य, उत्तम घोड़ा, ताल-वृन्त-पंखा, बांसुरी, वीणा, मृदंग, मालाएँ, रेशमीवस्त्र, दुकान, कुंडल आदि चमकते हुए आभूषण, फल सहित उपवन, पके हुए कलमों से सुशोभित खेत, रत्नद्वीप, वङ्का, पृथ्वी, लक्ष्मी, सरस्वती, कामधेनु, वृषभ, चूड़ामणि, महानिधियाँ, कल्पलता, सुवर्ण, जम्बूद्वीप, गरुड़, नक्षत्र, तारे, राजमहल, मंगलादि ग्रह, सिद्धार्थ वृक्ष, आठ प्रातिहार्य और आठ मंगलद्रव्य इन्हें आदि लेकर एक सौ आठ लक्षण और मसूरिका आदि नौ सौ व्यञ्जन तीर्थंकर के शरीर में विद्यमान रहते हैं। इन मनोहर और शुभ लक्षणों से व्याप्त श्री ऋषभदेव का शरीर ऐसा सुन्दर दिख रहा है कि जैसे ज्योतिषी देवों से भरित आकाशरूपी आँगन। उनका मुखरूपी चन्द्र इतना अधिक कांतिमान है कि तीनों लोकों में उसके समान कांति अन्य किसी की भी नहीं है। वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों से उत्पन्न हुई व्याधियाँ तीर्थंकर के शरीर में स्थान नहीं पा सकी थीं सो ठीक ही है, वृक्ष अथवा अन्य पर्वतों को हिलाने वाली वायु मेरुपर्वत पर अपना असर नहीं दिखा सकती। उनके शरीर में न कभी बुढ़ापा आ सकता है, न कभी उन्हें खेद होता है और न कभी असमय में उनका अपघात (मृत्यु) ही हो सकता है। उनके श्रीवत्स से चिन्हित वक्षस्थल पर ‘इन्द्रच्छद’ नाम का दिव्यहार बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रहा है।
किसी एक दिन महाराजा नाभिराय ऋषभदेव की यौवन अवस्था का प्रारंभ देखकर अपने मन में विचार करते हैं- ‘‘ये देव अतिशय सुन्दर शरीर के धारक हैं इनके चित्त को हरण करने वाली कौन सी सुन्दर स्त्री हो सकती है? सुन्दर स्त्री तो मिल सकती है, परन्तु इनका विषयराग अत्यन्त मन्द है इसलिए इनके विवाह का प्रारंभ करना ही कठिन कार्य है। दूसरी बात यह है कि इनका धर्मतीर्थ की प्रवत्ति करने में बहुत बड़ा उद्योग है इसलिए ये नियम से सर्व परिग्रह को छोड़कर वन में प्रवेश करेंगे। तथापि तपस्या करने के लिए जब तक इनका समय आता है तब तक इनके लिए लोकव्यवहार के अनुरोध से योग्य स्त्री का विचार करना चाहिए। जिस प्रकार हंसी कीचड़ रहित मानसरोवर में निवास करती है उसी प्रकार कोई योग्य और कुलीन स्त्री इनके निर्मल मानस में निवास करे।’’
ऐसा विचार कर लक्ष्मीवान् महाराजा नाभिराय बड़े ही आदर और हर्ष के साथ तीर्थंकर ऋषभदेव के पास पहुँचते हैं। पिता को सामने आते देख प्रभु ऋषभदेव उनका स्वागत करते हैं। दोनों यथायोग्य अपने-अपने आसन पर विराजमान हो जाते हैं। तब महाराजा नाभिराय शांतिपूर्वक ऋषभदेव से कहते हैं- ‘‘हे देव! मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ इसलिए आप सावधान होकर सुनिये। आप जगत् के अधिपति हैं इसलिए आपको जगत् का उपकार करना चाहिए। हे देव! आप जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा हैं तथा स्वयंभू हैं-अपने आप ही उत्पन्न हुए हैं, क्योंकि आपकी उत्पत्ति में अपने आपको पिता मानने वाले हम तो एक छलमात्र हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने में उदयाचल निमित्तमात्र है क्योंकि सूर्य तो स्वयं ही उदित होता है उसी प्रकार आपकी उत्पत्ति होने में हम निमित्तमात्र हैं क्योंकि आप स्वयं ही उत्पन्न हुए हैं। आप माता के पवित्र गर्भ-गृह में कमलरूपी दिव्य-आसन पर अपनी उत्कृष्ट शक्ति स्थापन कर उत्पन्न हुए हैं इसलिए वास्तव में आप शरीररहित हैं। यद्यपि मैं आपका यथार्थ में पिता नहीं हूँ, निमित्तमात्र से ही पिता कहलाता हूँ तथापि मैं आपसे एक अभ्यर्थना करता हूँ कि आप इस समय संसार की सृष्टि की ओर भी अपनी बुद्धि लगाइये। आप आदिपुरुष हैं इसलिए आपको देखकर अन्य लोग भी ऐसी ही प्रवृत्ति करेंगे क्योंकि जिनके उत्तम सन्तान होने वाली है ऐसी प्रजा महापुरुषों के ही मार्ग का अनुगमन करती है इसलिए हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ! आप इस संसार में किसी इष्ट कन्या के साथ विवाह करने के लिए मन कीजिए क्योंकि ऐसा करने से प्रजा की संतति का उच्छेद नहीं होगा और प्रजा की संतति का उच्छेद नहीं होने पर धर्म की संतति बढ़ती रहेगी। इसलिए हे देव! मनुष्यों के इस अविनाशीक विवाहरूपी धर्म को आप अवश्य ही स्वीकार कीजिये। हे देव! आप इस विवाह कार्य को गृहस्थों का एक धर्म समझिए क्योंकि गृहस्थों को सन्तान की रक्षा में प्रयत्न अवश्य ही करना चाहिए। यदि आप मुझे किसी भी तरह गुरु (बड़ा) मानते हैं तो आपको मेरे वचनों का किसी भी कारण से उल्लंघन नहीं करना चाहिए क्योंकि गुरुओं के वचन उल्लंघन करना इष्ट नहीं है।’’ इस प्रकार वचन कहकर धीर-वीर महाराजा नाभिराय चुप हो गए, तब ऋषभदेव हँसते हुए-
‘‘ओम्’’ऐसा कहकर उनके वचन स्वीकार कर लेते हैं। ‘‘अहो! इन्द्रियों को वश में करने वाले भगवान ने जो विवाह कराने की स्वीकृति दी थी वह क्या उनके पिता की चतुराई थी, अथवा प्रजा का उपकार करने की इच्छा थी अथवा वैसा कोई कर्मों का नियोग ही था।’’
ऋषभदेव की अनुमति जानकर नाभिराय निःशंक होकर बड़े हर्ष के साथ विवाह का बड़ा भारी आयोजन करते हैं। पहले सौधर्म इन्द्र की अनुमति से सुशील, सुन्दर लक्षणों वाली, सती, बहुत ही शांत परिणामों वाली और यौवनवती ऐसी यशस्वती तथा सुनन्दा नाम की दो कन्याओं को उनके भ्राता तीर्थंकर महापुरुष के साथ अपनी बहनों का विवाह प्रस्ताव सुनकर रोमांचित हो जाते हैं, उनके हर्ष का पार नहीं रहता है। तभी इन्द्र के साथ बहुत से देवगण आकर आनन्द के साथ बहुत बड़े विवाह मण्डप की रचना कर देते हैं। अयोध्या नगरी की शोभा का तो कहना ही क्या? प्रजा के लोगों में तो आनन्द की विशेष लहर है ही, वे सभी लोग मंगल महोत्सव को मनाने में विशेष तैयारियाँ कर ही रहे हैं, सारी नगरी ध्वजा, पताका, तोरणद्वार और पूâलों की मालाओं से सजायी गई है। देवगण भी उत्साह से सारे महोत्सव को सम्पन्न कराने में दत्तचित्त हैं।
इस प्रकार महामहोत्सव के साथ तीर्थंकर ऋषभदेव का विवाह सम्पन्न होता है। नाभिराय अपने परिवार के लोगों के साथ दोनों पुत्रवधुओं को देखकर बहुत ही सन्तुष्ट हो रहे हैं, सो ठीक ही है क्योंकि संसारीजनों को विवाह आदि लौकिक धर्म ही प्रिय होता है। उस समय माता मरुदेवी बहुत प्रसन्न हो रही हैं, सो सच ही है पुत्र के विवाहोत्सव में माताओं को अधिक प्रेम होता ही है। प्रजा के लोगों का भी आनन्द बढ़ता ही जा रहा है। मनुष्य स्वयं ही भोगों की तृष्णा रखते हैं इसलिए वे स्वामी को भोग स्वीकार करते देखकर उन्हीं का अनुसरण करने लगते हैं। तीर्थंकरदेव का वह विवाहोत्सव केवल मनुष्यलोक की ही प्रीति के लिए नहीं हुआ था, प्रत्युत् उसने स्वर्गलोक में भी भारी प्रीति को उत्पन्न किया था।
नवविवाहिता यशस्वती और सुनन्दा साक्षात् तीर्थंकर ऋषभदेव जैसे वर को प्राप्त कर महासौभाग्यशालिनी हुई ही थीं, साथ ही अपने स्त्रीपर्याय को भी वे उस समय बहुत ही उत्तम गिन रही थीं। उन दोनों की सुन्दरता श्री ऋषभदेव के योग्य थी और गुणों में वे स्त्री सृष्टि में सर्वोच्च थीं, तभी तो उन्हें तीर्थंकर की पत्नी होने का पुण्य अवसर मिला था। वे नाना प्रकार के सुन्दर-सुन्दर स्वर्ग से लाये गये वस्त्र, आभूषणों से अलंकृत थीं। उनके गले में एकावली हार शोभायमान हो रहा था जो कि उनके कण्ठ की शोभा को द्विगुणित कर रहा था।
जहाँ तीर्थंकर ऋषभदेव तो वर हैं और यशस्वती-सुनन्दा जैसी यथा नाम तथा गुणों वाली कन्याएँ वधू हैं, अन्तिम कुलकर महाराजा नाभिराय के साथ ही सौधर्म इन्द्र विवाह महोत्सव करने वाला है और अयोध्या की भाग्यशालिनी प्रजा के साथ-साथ सर्व आर्यखण्ड के लोग तथा स्वर्ग के असंख्य देव-देवियाँ जहाँ उत्सव को देखने वाले हैं, पुरी की पुरन्ध्रिकाएँ और अप्सराएँ जहाँ मंगलगीत गाने वाली और नृत्य करने वाली हैं, वहाँ के उस समय के महामहोत्सव का भला कौन वर्णन कर सकता है?
यशस्वती महादेवी राजहल में सो रही हैं, रात्रि के पिछले प्रहर में कुछ उत्तम-उत्तम स्वप्न देखती हैं, उसी समय तुरही की मंगल ध्वनि बजने लगती है और बंदीजन मंगलपाठ-सुप्रभाती पढ़ने लगते हैं-
‘‘हे दूसरों का कल्याण करने वाली और स्वयं सैकड़ों कल्याणों को प्राप्त होने वाली देवि! अब तुम जागो, क्योंकि यह उषा की मंगल बेला पूर्व दिशा को अनुरक्त (लाल) कर रही है। हे मातः! तुम्हारे द्वारा देखे गये अनेकों मंगलीक शुभ स्वप्न तुम्हारे और जगत् के मंगल के लिए होवें। हे कल्याणि! आपके पतिदेव के स्मरण से आपका यह सुप्रभात आपके लिए मंगलमयी होवे। हे ऋषभदेव की प्रियवल्लभे! अब तुम शय्या छोड़ो और सभी परिवार के जनों को आनन्दित करो।’’ इत्यादि मंगल पदों से सुप्रभाती पढ़ते हुए बंदीजनों का कोलाहल शांत हो रहा है। तब यशस्वती महादेवी शय्या को छोड़कर प्राप्तःकाल का मंगलस्नान कर हर्ष से रोमांचित शरीर हो सबके स्वामी तीर्थंकर ऋषभदेव के समीप पहुँचती हैं। विनय से पतिदेव को प्रणाम कर उनके द्वारा निर्दिष्ट भद्रासन पर बैठ जाती हैं पुनः तीर्थंकर देव के सन्मुख हाथ जोड़कर निवेदन करती हैं- तब ऋषभदेव अपने दिव्य अवधिज्ञान से स्वप्नों के फल को जानकर कहते हैं- ‘‘ हे देवि! स्वप्नों में जो तूने सुमेरु पर्वत देखा है उसका फल यह है कि तेरे चक्रवर्ती पुत्र होगा। सूर्य उसके प्रताप को और चन्द्रमा उसकी कांतिरूपी सम्पदा को सूचित कर रहा है। सरोवर के देखने से तेरा पुत्र अनेक पवित्र लक्षणों से चिन्हित शरीर छोड़कर अपने विस्तृत वक्षस्थल पर कमलवासिनी-लक्ष्मी को धारण करने वाला होगा। हे देवि! पृथ्वी का ग्रसा जाना देखने से तुम्हारा वह पुत्र चक्रवर्ती होकर समुद्ररूपी वस्त्र को धारण करने वाली समस्त छह खण्ड पृथ्वी का स्वामी होगा तथा समुद्र को देखने से वह चरमशरीरी होकर संसाररूपी समुद्र को पार करने वाला होगा। हे कमलनयने! इक्ष्वाकुवंश को आनन्द देने वाला वह पुत्र तेरे सौ पुत्रों में सबसे ज्येष्ठ होगा।’’
इस प्रकार पति के वचन सुनकर महारानी यशस्वती हर्ष के अतिरेक से रोमांच को प्राप्त होती हुई पतिदेव को प्रणाम कर अपने राजमहल में वापस आ जाती हैं। इधर सर्वार्थसिद्धि से अहमिंद्र का जीव च्युत होकर महादेवी यशस्वती के पवित्र गर्भ में निवास करने लगता है। वह देवी तीर्थंकरदेव के दिव्य प्रभाव से उत्पन्न हुए गर्भ को धारण कर रही है। यही कारण है कि वह अपने ऊपर आकाश में चलते हुए सूर्य को भी नहीं सहन करती है। वीर सम्राट् को गर्भ में धारण करने वाली वह अपने मुख को तलवाररूपी दर्पण में देखती है पुनः अतिशय मान से संयुक्त वह तलवार में पड़ती हुई अपनी प्रतिकूल छाया को भी नहीं सहन कर सकती है। वह रत्नगर्भा भूमि के समान, फलवाली बेल के समान, सूर्यरूपी तेज जिसमें छिपा है ऐसी पूर्व दिशा के समान अतिशय सुन्दरता को प्राप्त हो रही है। यशस्वती देवी के गर्भावस्था में भी उदर की त्रिवली भंग नहीं हुई थी ऐसा लगता था कि मानों बालक अभंग दिग्विजय प्राप्त करेगा। उस देवी को सदा उत्तम-उत्तम दोहले होते रहते हैं जो कि माता मरुदेवी के हर्षसागर की वृद्धि को करने वाले रहते हैं।
इस प्रकार नव महीने व्यतीत हो जाने पर यशस्वती महादेवी देदीप्यमान तेज से परिपूर्ण और महापुण्यशाली पुत्ररत्न को जन्म देती हैं। तीर्थंकर ऋषभदेव के जन्म के समय में जो शुभ दिन, शुभ लग्न, शुभ योग, शुभ चन्द्रमा और शुभ नक्षत्र आदि थे, वे ही शुभ दिन आदि उस समय भी हैं अर्थात् उस समय चैत्र कृष्ण नवमी, मीन लग्न, ब्रह्मयोग, धनराशि का चंद्रमा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र है। उस समय उत्तम मुहूर्त में जन्मा हुआ वह शिशु अपनी दोनों भुजाओं से पृथ्वी का आलिंगन कर उत्पन्न हुआ है इसलिए निमित्तज्ञानियों ने बतलाया कि ‘यह समस्त पृथ्वी का अधिपति अर्थात् चक्रवर्ती होगा।’ उस समय पुत्र जन्म के अवसर पर उसके दादा-दादी अर्थात् महाराजा नाभिराय और महारानी मरुदेवी दोनों ही परमहर्ष को प्राप्त हो रहे हैं। अतीव हर्ष को प्राप्त हुई पुत्रवती सौभाग्यवती स्त्रियाँ मंगल बधाई गाती हुई यशस्वती देवी को आशीर्वाद देते हुए कहती हैं- ‘‘हे देवि! पुत्राणां शतं प्रसूष्व, शतपुत्रा भव, अर्थात् हे देवि! तू इसी प्रकार सौ पुत्रों को उत्पन्न कर।’’
उसी क्षण राजमंदिर में बड़े-बड़े नगाड़े बजने लगते हैं, तुरही, दुंदुभि, झल्लरी, शहनाई, सितार, शंख, काहल और ताल आदि अनेक बाजे बज रहे हैं। देवगण भी आकाश से सुगन्धित पुष्पो की वर्षा कर रहे हैं। सुगंधित कमल पराग से मिश्रित जल के छींटों से सहित ऐसी हवा मंद-मंद चल रही है। देवगण आकाश में जय-जयकार के शब्दोच्चारण से सारे वातावरण को मुखरित कर रहे हैं। देवियाँ शुभ मंगल शब्दों के द्वारा शिशु को शुभाशीर्वाद दे रही हैं- ‘हे तीर्थंकर के सुपुत्र! तुम चिरंजीव रहो, करोड़ों मंगल को प्राप्त करो।’’
नर्तकियाँ मंगल गीत गाते हुए नृत्य कर रही हैं, अयोध्या नगर की गली-गली में चंदन का छिड़काव किया जा रहा है एवं मंगल चौक पूरे जा रहे हैं। रत्ननिर्मित तोरणों से घर-घर के द्वार सजाये गये हैं। सौभाग्यवती स्त्रियाँ रत्नों के चूर्ण से नाना तरह के सुन्दर चौक बनाकर उन पर सुवर्ण कमलों से ढके हुए ऐसे मंगलीक सुवर्ण कलश रख रही हैं। उस समय समस्त अयोध्यानगरी उत्सव को धारण कर रही है।
तीर्थंकर ऋषभदेव स्वयं अपने हाथों से सुवर्ण, रत्न आदि दान से धन की धारा बरसा रहे हैं अर्थात् सुवर्ण रत्न आदि दान दे रहे हैं। वह बालकरूपी चंद्रमा तीर्थंकर ऋषभदेवरूपी उदयाचल से उदय को प्राप्त हुआ है अतएव वह समस्त अंतःपुर सहित नगर भर में आनन्दरूपी अमृत को बरसा रहा है। ‘‘उस समय प्रेम से भरे हुए सभी बंधुगण समस्त भरतक्षेत्र के अधिपति होने वाले उस पुत्र को ‘भरत’ इस नाम से संबोधित कर रहे हैं। इतिहास के जानने वालों का कहना है कि जहाँ अनेक आर्यपुरुष रहते हैं ऐसा यह हिमवान पर्वत से लेकर समुद्रपर्यंत का चक्रवर्तियोें का क्षेत्र उसी ‘भरत’ पुत्र के नाम के कारण ‘भारतवर्ष’ इस नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हो रहा है।’’
उस बालक के चरणकमलों में चक्र, छत्र, तलवार, दण्ड आदि चौदह रत्नों के चिन्ह बने हुए हैं और वे ऐसे मालूम पड़ते हैं कि मानों ये चौदह रत्न लक्षणों के बहाने ही भावी चक्रवर्ती की पहले से ही सेवा कर रहे हों। वह बालक माता यशस्वती के स्तन का पान करता हुआ जब कभी दूध के कुरले को बार-बार उगलता था तब वह ऐसा मालूम पड़ता था कि मानों अपना यश ही दिशाओं में बाँट रहा है। वह बालक ‘भरत’ अपनी मंद मुस्कान, मनोहर हास, मणिमयी भूमि पर चलना और अव्यक्त मधुर भाषण आदि के द्वारा अपने दादा-दादी और माता-पिता के हर्ष समुद्र को बढ़ा रहा है। जैसे-जैसे बालक बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही उसके गुण भी बढ़ते जा रहे हैं।
विधि के विधाता तीर्थंकर ऋषभदेव उस बालक के क्रम से अन्नप्राशन, चौल और उपनयन आदि संस्कार स्वयं करते हैं। बालक भरत शैशव में प्रवेश कर रहे हैं। उस समय उनकी वाणी, कला, विद्या, द्युति, शील और विज्ञान आदि सब कुछ वही हैं जो कि उनके पिता ऋषभदेव के हैं। पिता के साथ तन्मयता को प्राप्त भरत पुत्र को देखकर प्रजा कहा करती है कि ‘पिता का आत्मा ही पुत्र नाम से कहा जाता है’ यह बात बिल्कुल सच है। वह भरत पन्द्रहवें मनु तीर्थंकर ऋषभदेव के मन को भी अपने अधीन कर लेते हैं इसलिए लोग कहने लगे कि- ‘‘अहो! यह सोलहवाँ मनु उत्पन्न हो गया है।’’
केवल मात्र भरत के चरणों का पराक्रम ही समस्त पृथ्वीमंडल पर आक्रमण करने वाला है फिर भला उसके सम्पूर्ण शरीर का पराक्रम कौन सहन कर सकता है? उसके शरीरसम्बन्धी बल का वर्णन केवल इतने से ही समझ लिया जाता था कि वह चरमशरीरी है, और उसकी आत्मासंबंधी बल का वर्णन दिग्विजय आदि बाह्य चिन्हों से जाना जावेगा। चक्रवर्ती के क्षेत्र में रहने वाले समस्त मनुष्य और देवों में जितना बल होता है उससे कई गुना अधिक बल चक्रवर्ती भरत की भुजाओं में है। ‘जहाँ सुन्दर आकार है वहीं समस्त गुण निवास करते हैं’ इस लोकोक्ति के अनुसार सत्य, शौच, क्षमा, त्याग, प्रज्ञा, उत्साह, दया, दम, शम और विनय ये गुण उनकी आत्मा के साथ-साथ रह रहे हैं। सुन्दर शरीर, नीरोगता, ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति, बल, आयु, यश, बुद्धि, सर्वप्रियवचन और चातुर्य आदि इस संसार में जितने भी कुछ सुख के कारण हैं वे सब अभ्युदय कहलाते हैं और वे सब संसारी जीवों को पुण्य के उदय से ही प्राप्त होते हैं। जब तीर्थंकर ऋषभदेव भी अपने प्रिय पुत्र भरत के मुख को देखकर उसके विनयपूर्ण शब्दों को सुनकर प्रणाम के बाद उठाकर खड़े हुए उसका बार-बार आलिंगन कर तथा उसे अपनी गोद में बिठाकर परम संतोष को प्राप्त होते रहते हैं, तब पुनः महाराजा नाभिराज, दादी मरुदेवी और माता यशस्वती तथा सुनन्दा के आनन्द का क्या कहना है! वे तो भरत की चेष्टा को उत्सुकता से देखा ही करते हैं।
तीर्थंकर ऋषभदेव की द्वितीय वल्लभा सुनन्दा महादेवी किसी समय रात्रि के पिछले प्रहर में शुभ स्वप्नों को देखकर सर्वार्थसिद्धि से च्युत हुए अहमिंद्र के जीव को अपने उदर में धारण करती हैं। सुखपूर्वक नवमास व्यतीत कर उत्तम नक्षत्र आदि शुभयोग में पुत्ररत्न को जन्म देती हैं। उस समय भी पूर्ववत् नाना उत्सव किये जाते हैं तथा बालक का ‘बाहुबली’ यह नामकरण किया जाता है जो कि मानों उस बालक के भविष्य में होने वाले अचिन्त्य बाहुबल को ही सूचित कर रहा है। यह बालक भी इस युग के चौबीस कामदेवों में से ‘प्रथम कामदेव’ है अतः इसकी सुन्दरता का वर्णन लेखनी के द्वारा कोई नहीं कर सकता है। इस बालक के शरीर का वर्ण मरकतमणि के समान हरा है जो कि अभूतपूर्व ही सौंदर्य को दिखा रहा है।
इधर माता यशस्वती के क्रम-क्रम से निन्यानवे पुत्र होते हैं। वृषभसेन, अनन्तविजय, अनन्तवीर्य, अच्युत, वीर और वरवीर आदि जिनके अच्छे-अच्छे नाम हैं और ये सभी भी चरमशरीरी महापुण्यवान् हैं। इनके बाद महादेवी यशस्वती के एक सुन्दर कन्या का जन्म होता है जिसका ‘ब्राह्मी’ ऐसा नाम रखा जाता है। उसी प्रकार से सुनन्दा देवी के भी एक पुत्री का जन्म होता है जिसे सुन्दरी नाम से पुकारा जाता है। इस प्रकार तीर्थंकर ऋषभदेव के भरत, बाहुबली आदि एक सौ एक पुत्र एवं ब्राह्मी-सुन्दरी ऐसी दो पुत्रियाँ हैं। इन सभी परिवार के साथ महाराजा नाभिराय और माता मरुदेवी अपने आप में महान् सुख का अनुभव कर रहे हैं।
क्रमश............
जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
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