समायिक यानि क्या
💐🙏🏻2⃣5⃣समायिक यानि क्या ❓
2⃣5⃣🅰 48 मिनिट तक मन,वचन, काया को समभाव में रखना । इससे समता की प्राप्ति होती है,एवं अनंत कर्मो का नाश होता है ।
1⃣समायिक के कितने प्रकार है ❓
1⃣🅰समायिक के चार प्रकार है ?
१.श्रुत समायिक
२.समकित समायिक
३.देशविरति समायिक
४.सर्वविरति समायिक
2⃣श्रुत समायिक किसे कहते है❓
2⃣🅰इरियावहियं करके जब तक व्याख्यानदि में जिनवाणी का श्रवण करते है। वह श्रुत सामायिक है।
3⃣समकित सामायिक किसे कहते है❓
3⃣🅰सुदेव - सुगुरू - सुधर्मा पर श्रद्धा रखनी यह समकित समायिक हैं। सम्यक्त्व सामायिक लेकर जीव परलोक से आ सकता है
4⃣देशविरति समायिक किसे कहते है❓
4⃣🅰व्रतधारी श्रावक बनना देशविरति सामायिक है। वर्तमान में श्रावक जो "करेमि भंते" का उच्चार पूर्वक 48 मिनिट की समायिक करते है वह "देश विरति" समायिक है।
5⃣सर्व विरति समायिक किसे कहते है❓
5⃣🅰चारित्रिक ग्रहण करना यह सर्व विरति समायिक हैं।
6⃣समायिक कौन कर सकता है❓यानी किस उम्र से समायिक फल देती है।
6⃣🅰प्रभु ने बताया कि 8 वर्ष पहले जीव को सामायिक के परिणाम प्राप्त नहीं होते। इसलिए 8 वर्ष के बालक से लेकर जीवन के अंत समय तक सभी व्यक्ति समायिक कर सकते है।
आठ वर्ष के पहले भी संस्कार हेतु समायिक करवा सकते है।
7⃣समायिक कहाँ बैठकर करनी चाहिये ❓
7⃣🅰हो सके वहा तक सामायिक उपासरे में हि करनी चाहिए। यदि घर पर करो तो एकांत स्थान पर करनी चाहिए।
8⃣🅰 24 घंटे में जब चित्त शांत, प्रशांत, विक्षेप रहित हो तब सामायिक कर सकते हैं।
9⃣समायिक एक साथ कितनी करनी❓
9⃣🅰इसकी कोई सीमा नहीं है।
पुरे दिन में जितनी ज्यादा सामायिक करे उतना लाभ होता है। एक साथ बिना पारे 3 समायिक कर सकते हैं फिर चौथी समायिक लेना हो तो सामायिक पार कर पुन: लेनी चाहिये।
एक साथ 3....6 ya...10 समायिक " अहन्नं भंते......" देशावगासिक के पच्चक्खाण से उच्चर सकते है।
1⃣0⃣सामायिक कैसे करनी❓
1⃣0⃣🅰 सर्व उपकरणों को साथ में लेकर, मन-वचन-काया के 32 दोषों को टालकर आत्मा को समभाव में रखते हुए सामायिक करना।
1⃣1⃣सामायिक कितने समय कि होती है व कहाँ से स्टार्ट मानी जाती है❓
1⃣1⃣🅰करेमि भंते में "जाव नियंम" शब्द के द्धारा सामायिक में 48 मिनिट रहने की मर्यादा बताई है। समायिक लेते ही समय देख लेना चाहिए एवं 48 मिनिट का पूरा उपयोग रखना चाहिए।
1⃣2⃣समायिक अगर समय से पहले पार ले या समय से बाद में पार ले तो कौन सा अतिचार लगता है❓
1⃣2⃣🅰समायिक लेने के तुरंत बाद घड़ी देखना आवश्यक है। मान लो प्रतिदिन प्रतिक्रमण में समायिक आ ही जाती है फिर भी घड़ी देखना इसलिए जरूरी है कि अचानक कोई बुलावा आ जाए तो जिसने घड़ी देखी हो वह सामायिक का समय पूरा होने पर पार सकता है।
अन्यथा अंदाज से पारने पर दोष लगता है तथा समायिक काल से अधिक समय हो गया हो तो भी दोष लगता है।
उपयोग नही रखने पर "स्मृति भंग" नामक अतिचार लगता है।
*Day - 2 ( सामायिक के 32 दोष )*
जय जिनेंन्द्र श्रावकों 🙏🙏
जैसा कि कल बताया था सामायिक में 32 बातें वर्जित हैं। यानी कि सामायिक के 32 दोष। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से मन के प्रथम पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में मन के अंतिम पांच दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*मन के दोष*
(6) *निदान* :- सामायिक का कोई भौतिक फल चाहना जैसे अमुक पदार्थ या सांसारिक सुख के लिए समय का फल बेच डालना।
(7) *संशय* :- मैं जो सामायिक करता हूं उसका फल मुझे मिलेगा या नहीं। सामायिक करते-करते इतने दिन हो गये फिर भी कुछ नहीं मिला इत्यादि सामायिक के फल के संबंध में संशय करना।
(8) *रोष* :- सामायिक में क्रोध, मान, माया, लोभ करना। लड़-झगड़ कर या रूठकर सामायिक करना।
(9) *अविनय* :- सामायिक के प्रति आदर भाव न रखना अथवा देव, गुरु, धर्म का अविनय करना।
(10) *अबहुमान* :- बिना श्रद्धा अनादरपूर्वक सामायिक करना एवं किसी के दबाव से सामायिक करना।
*सामायिक के 32 दोष*
जय जिनेंन्द्र 🙏
सामायिक के 32 दोष है। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से मन के अंतिम पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में वचन के प्रथम पांच दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*वचन के दोष*
(1) *कुवचन* -- सामायिक में कुत्सित, गंदे वचन बोलना।
(2) *सहसाकार* -- बिना विचारे सहसा हानिकर वचन बोलना।
(3) *स्वच्छन्द* -- सामयिक में काम-वृद्धि करने वाले गंदे गीत गाना, गंदी बातें करना।
(4) *संक्षेप* -- सामायिक के पाठ को संक्षेप में बोलना।
(5) *कलह* -- कलह पैदा करने वाले वचन बोलना।
*सामायिक के 32 दोष*
जय जिनेंन्द्र 🙏
सामायिक के 32 दोष है। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से वचन के पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में वचन के अन्तिम पांच दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*वचन के दोष*
(6) *विकथा* -- बिना किसी अच्छे उद्देश्य के व्यर्थ ही मनोरंजन की दृष्टि से स्त्री कथा, भक्त कथा, राजकथा, देश कथा आदि करना।
(7) *हास्य* -- सामायिक में हंसी-मजाक करना।
(8) *अशुद्ध* -- सामायिक का पाठ जल्दी-जल्दी एवं अशुद्ध बोलना।
(9) *निरपेक्ष* -- सामायिक में सिद्धांत की अपेक्षा करके वचन बोलना अथवा बिना सावधानी के वचन बोलना।
(10) *मुन्मन* -- सामायिक के पाठ का स्पष्ट उच्चारण नहीं करना।
आगम असम्मत कुछ लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडं
*सामायिक के 32 दोष*
जय जिनेंन्द्र 🙏
सामायिक के 32 दोष है। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से वचन के अंतिम पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में काया के प्रथम छह दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*काया के दोष*
(1) *कुआसन* -- सामायिक में पैर पर पैर चढ़ाकर अभिमान से बैठना।
(2) *चलासन* -- स्थिर आसन से न बैठकर बार-बार आसन बदलना।
(3) *चल दृष्टि* -- अपने दृष्टि को स्थिर न रखना, बार-बार कभी इधर कभी उधर देखना।
(4) *सावद्य क्रिया* -- शरीर से स्वयं सावद्य कार्य ( पाप युक्त क्रिया ) करना या दूसरों को करने के लिए संकेत करना तथा घर की रखवाली वगैरह करना।
(5) *आलम्बन* -- बिना रोग आदि कारण के दीवार आदि का सहारा लेना।
(6) *आकुञ्चन प्रसारण* -- बिना किसी विशेष प्रयोजन के हाथ पैरों को सिकोड़ना और फैलाना।
2⃣5⃣🅰 48 मिनिट तक मन,वचन, काया को समभाव में रखना । इससे समता की प्राप्ति होती है,एवं अनंत कर्मो का नाश होता है ।
1⃣समायिक के कितने प्रकार है ❓
1⃣🅰समायिक के चार प्रकार है ?
१.श्रुत समायिक
२.समकित समायिक
३.देशविरति समायिक
४.सर्वविरति समायिक
2⃣श्रुत समायिक किसे कहते है❓
2⃣🅰इरियावहियं करके जब तक व्याख्यानदि में जिनवाणी का श्रवण करते है। वह श्रुत सामायिक है।
3⃣समकित सामायिक किसे कहते है❓
3⃣🅰सुदेव - सुगुरू - सुधर्मा पर श्रद्धा रखनी यह समकित समायिक हैं। सम्यक्त्व सामायिक लेकर जीव परलोक से आ सकता है
4⃣देशविरति समायिक किसे कहते है❓
4⃣🅰व्रतधारी श्रावक बनना देशविरति सामायिक है। वर्तमान में श्रावक जो "करेमि भंते" का उच्चार पूर्वक 48 मिनिट की समायिक करते है वह "देश विरति" समायिक है।
5⃣सर्व विरति समायिक किसे कहते है❓
5⃣🅰चारित्रिक ग्रहण करना यह सर्व विरति समायिक हैं।
6⃣समायिक कौन कर सकता है❓यानी किस उम्र से समायिक फल देती है।
6⃣🅰प्रभु ने बताया कि 8 वर्ष पहले जीव को सामायिक के परिणाम प्राप्त नहीं होते। इसलिए 8 वर्ष के बालक से लेकर जीवन के अंत समय तक सभी व्यक्ति समायिक कर सकते है।
आठ वर्ष के पहले भी संस्कार हेतु समायिक करवा सकते है।
7⃣समायिक कहाँ बैठकर करनी चाहिये ❓
7⃣🅰हो सके वहा तक सामायिक उपासरे में हि करनी चाहिए। यदि घर पर करो तो एकांत स्थान पर करनी चाहिए।
8⃣🅰 24 घंटे में जब चित्त शांत, प्रशांत, विक्षेप रहित हो तब सामायिक कर सकते हैं।
9⃣समायिक एक साथ कितनी करनी❓
9⃣🅰इसकी कोई सीमा नहीं है।
पुरे दिन में जितनी ज्यादा सामायिक करे उतना लाभ होता है। एक साथ बिना पारे 3 समायिक कर सकते हैं फिर चौथी समायिक लेना हो तो सामायिक पार कर पुन: लेनी चाहिये।
एक साथ 3....6 ya...10 समायिक " अहन्नं भंते......" देशावगासिक के पच्चक्खाण से उच्चर सकते है।
1⃣0⃣सामायिक कैसे करनी❓
1⃣0⃣🅰 सर्व उपकरणों को साथ में लेकर, मन-वचन-काया के 32 दोषों को टालकर आत्मा को समभाव में रखते हुए सामायिक करना।
1⃣1⃣सामायिक कितने समय कि होती है व कहाँ से स्टार्ट मानी जाती है❓
1⃣1⃣🅰करेमि भंते में "जाव नियंम" शब्द के द्धारा सामायिक में 48 मिनिट रहने की मर्यादा बताई है। समायिक लेते ही समय देख लेना चाहिए एवं 48 मिनिट का पूरा उपयोग रखना चाहिए।
1⃣2⃣समायिक अगर समय से पहले पार ले या समय से बाद में पार ले तो कौन सा अतिचार लगता है❓
1⃣2⃣🅰समायिक लेने के तुरंत बाद घड़ी देखना आवश्यक है। मान लो प्रतिदिन प्रतिक्रमण में समायिक आ ही जाती है फिर भी घड़ी देखना इसलिए जरूरी है कि अचानक कोई बुलावा आ जाए तो जिसने घड़ी देखी हो वह सामायिक का समय पूरा होने पर पार सकता है।
अन्यथा अंदाज से पारने पर दोष लगता है तथा समायिक काल से अधिक समय हो गया हो तो भी दोष लगता है।
उपयोग नही रखने पर "स्मृति भंग" नामक अतिचार लगता है।
*Day - 2 ( सामायिक के 32 दोष )*
जय जिनेंन्द्र श्रावकों 🙏🙏
जैसा कि कल बताया था सामायिक में 32 बातें वर्जित हैं। यानी कि सामायिक के 32 दोष। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से मन के प्रथम पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में मन के अंतिम पांच दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*मन के दोष*
(6) *निदान* :- सामायिक का कोई भौतिक फल चाहना जैसे अमुक पदार्थ या सांसारिक सुख के लिए समय का फल बेच डालना।
(7) *संशय* :- मैं जो सामायिक करता हूं उसका फल मुझे मिलेगा या नहीं। सामायिक करते-करते इतने दिन हो गये फिर भी कुछ नहीं मिला इत्यादि सामायिक के फल के संबंध में संशय करना।
(8) *रोष* :- सामायिक में क्रोध, मान, माया, लोभ करना। लड़-झगड़ कर या रूठकर सामायिक करना।
(9) *अविनय* :- सामायिक के प्रति आदर भाव न रखना अथवा देव, गुरु, धर्म का अविनय करना।
(10) *अबहुमान* :- बिना श्रद्धा अनादरपूर्वक सामायिक करना एवं किसी के दबाव से सामायिक करना।
*सामायिक के 32 दोष*
जय जिनेंन्द्र 🙏
सामायिक के 32 दोष है। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से मन के अंतिम पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में वचन के प्रथम पांच दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*वचन के दोष*
(1) *कुवचन* -- सामायिक में कुत्सित, गंदे वचन बोलना।
(2) *सहसाकार* -- बिना विचारे सहसा हानिकर वचन बोलना।
(3) *स्वच्छन्द* -- सामयिक में काम-वृद्धि करने वाले गंदे गीत गाना, गंदी बातें करना।
(4) *संक्षेप* -- सामायिक के पाठ को संक्षेप में बोलना।
(5) *कलह* -- कलह पैदा करने वाले वचन बोलना।
*सामायिक के 32 दोष*
जय जिनेंन्द्र 🙏
सामायिक के 32 दोष है। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से वचन के पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में वचन के अन्तिम पांच दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*वचन के दोष*
(6) *विकथा* -- बिना किसी अच्छे उद्देश्य के व्यर्थ ही मनोरंजन की दृष्टि से स्त्री कथा, भक्त कथा, राजकथा, देश कथा आदि करना।
(7) *हास्य* -- सामायिक में हंसी-मजाक करना।
(8) *अशुद्ध* -- सामायिक का पाठ जल्दी-जल्दी एवं अशुद्ध बोलना।
(9) *निरपेक्ष* -- सामायिक में सिद्धांत की अपेक्षा करके वचन बोलना अथवा बिना सावधानी के वचन बोलना।
(10) *मुन्मन* -- सामायिक के पाठ का स्पष्ट उच्चारण नहीं करना।
आगम असम्मत कुछ लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडं
*सामायिक के 32 दोष*
जय जिनेंन्द्र 🙏
सामायिक के 32 दोष है। इन 32 दोषों को तीन भागों में विभक्त किया गया है :--
(1) मन के दस दोष
(2) वचन के दस दोष
(3) काया के बारह दोष
कल इस पोस्ट के माध्यम से वचन के अंतिम पांच दोष बतलाये गये थे। आज की पोस्ट में काया के प्रथम छह दोष बतलाये जा रहे हैं। उनका वर्णन यहां प्रस्तुत है :-
*काया के दोष*
(1) *कुआसन* -- सामायिक में पैर पर पैर चढ़ाकर अभिमान से बैठना।
(2) *चलासन* -- स्थिर आसन से न बैठकर बार-बार आसन बदलना।
(3) *चल दृष्टि* -- अपने दृष्टि को स्थिर न रखना, बार-बार कभी इधर कभी उधर देखना।
(4) *सावद्य क्रिया* -- शरीर से स्वयं सावद्य कार्य ( पाप युक्त क्रिया ) करना या दूसरों को करने के लिए संकेत करना तथा घर की रखवाली वगैरह करना।
(5) *आलम्बन* -- बिना रोग आदि कारण के दीवार आदि का सहारा लेना।
(6) *आकुञ्चन प्रसारण* -- बिना किसी विशेष प्रयोजन के हाथ पैरों को सिकोड़ना और फैलाना।
जय
*काया के दोष*
(7) *आलस्य* -- सामायिक में बैठे हुए आलस्य करना, अंगड़ाई लेना।
(8) *मोड़न* -- हाथ पैर की अंगुलियां चटकाना।
(9) *मल* -- शरीर से मैल उतारना।
(10) *विमासन* -- शोक ग्रस्त की तरह बैठना या बिना पूंजे शरीर खुजलाना या रात्रि में इधर-उधर आना जाना।
(11) *निद्रा* -- ऊंघना एवं निंद्रा लेना।
(12) *वैयावृत्त्य* -- निष्कारण ही आराम के लिए दूसरों से सेवा लेना। स्वाध्याय करते हुए इधर-उधर घूमना या हिलना डुलना अथवा शीत आदि के कारण कांपना।
*काया के दोष*
(7) *आलस्य* -- सामायिक में बैठे हुए आलस्य करना, अंगड़ाई लेना।
(8) *मोड़न* -- हाथ पैर की अंगुलियां चटकाना।
(9) *मल* -- शरीर से मैल उतारना।
(10) *विमासन* -- शोक ग्रस्त की तरह बैठना या बिना पूंजे शरीर खुजलाना या रात्रि में इधर-उधर आना जाना।
(11) *निद्रा* -- ऊंघना एवं निंद्रा लेना।
(12) *वैयावृत्त्य* -- निष्कारण ही आराम के लिए दूसरों से सेवा लेना। स्वाध्याय करते हुए इधर-उधर घूमना या हिलना डुलना अथवा शीत आदि के कारण कांपना।
आगम असम्मत कुछ लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडं
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