भव्य और अभव्य जीव
भव्य और अभव्य जीव को कैसे जाने ?
१. जो पाप बंधन से डरे - वह भव्य, और जो पाप बंध से नहीं डरे - अभव्य ।
२. जो मोक्षाभिलाषी है - वह भव्य, जो मोक्षाभिलाषी नहीं - वह अभव्य ।
३. सर्वज्ञता को स्वीकारे - वह भव्य, नहीं माने वह अभव्य ।
४. मैं भव्य हूँ या अभव्य हूँ - ऐसी शंका जिसे हो - वह भव्य, जिसे यह शंका न हो - वह अभव्य ।
५. जो आत्मा के स्वरुप को जान सके - भव्य और जो नहीं जान सके - अभव्य ।
६. आत्मा और पुदगल का भेद विज्ञान जिसे हो - वह भव्य, जिसे भेद विज्ञान न हो - वह अभव्य ।
७. भव्य के ५ ज्ञान, ३ अज्ञान सत्ता में होते है, अभव्य के ३ अज्ञान ही होते है ।
८. भव्य के सम्यक्त्व मोहनीय, मिश्र मोहनीय की भजना होती है, अभव्य के ये २ प्रकृति नहीं होती ।
९. भव्य को मोहनीय की २८ प्रकृति की भजना होती है, अभव्य को २६ प्रकृति की नियमा होती है ।
१०. भव्य १४ पूर्वों का ज्ञाता हो सकता है, अभव्य सिर्फ नौवे पूर की तीसरी आचार वस्तु तक द्रव्यतः जान सकता है ।
११. भव्य में मोक्ष प्राप्ति की योग्यता होती है, अभव्य में नहीं ।
१२. भव्य को क्षयोपशम समकित के रहते शंकादि होते है, पर क्षायिक सम्यक्त्व होने पर नहीं होते है । किंतु अभव्य की शंकादि होते ही नहीं है ।
१३. भव्य समकित प्राप्त नहीं करता है, तब तक मिथ्यात्वी रहता है किंतु अभव्य सदैव मिथ्यात्वी ही रहता है ।
१४. भव्य को भव भ्रमण से भय लगता है, अभव्य को नहीं ।
१५. भव्य के अहिंसात्मक भाव होते है, अभव्य जे हिंसात्मक भाव होते है ।
१६. भव्य में सत्य श्रद्धान है, अभव्य में नहीं ।
१७. भव्य " मेरी मुक्ति होगी या नहीं " इस विचार से कंपित रहता है, अभव्य नहीं ।
१८. भव्य को आत्म-विश्वास होता है, अभव्य को नहीं ।
जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
१. जो पाप बंधन से डरे - वह भव्य, और जो पाप बंध से नहीं डरे - अभव्य ।
२. जो मोक्षाभिलाषी है - वह भव्य, जो मोक्षाभिलाषी नहीं - वह अभव्य ।
३. सर्वज्ञता को स्वीकारे - वह भव्य, नहीं माने वह अभव्य ।
४. मैं भव्य हूँ या अभव्य हूँ - ऐसी शंका जिसे हो - वह भव्य, जिसे यह शंका न हो - वह अभव्य ।
५. जो आत्मा के स्वरुप को जान सके - भव्य और जो नहीं जान सके - अभव्य ।
६. आत्मा और पुदगल का भेद विज्ञान जिसे हो - वह भव्य, जिसे भेद विज्ञान न हो - वह अभव्य ।
७. भव्य के ५ ज्ञान, ३ अज्ञान सत्ता में होते है, अभव्य के ३ अज्ञान ही होते है ।
८. भव्य के सम्यक्त्व मोहनीय, मिश्र मोहनीय की भजना होती है, अभव्य के ये २ प्रकृति नहीं होती ।
९. भव्य को मोहनीय की २८ प्रकृति की भजना होती है, अभव्य को २६ प्रकृति की नियमा होती है ।
१०. भव्य १४ पूर्वों का ज्ञाता हो सकता है, अभव्य सिर्फ नौवे पूर की तीसरी आचार वस्तु तक द्रव्यतः जान सकता है ।
११. भव्य में मोक्ष प्राप्ति की योग्यता होती है, अभव्य में नहीं ।
१२. भव्य को क्षयोपशम समकित के रहते शंकादि होते है, पर क्षायिक सम्यक्त्व होने पर नहीं होते है । किंतु अभव्य की शंकादि होते ही नहीं है ।
१३. भव्य समकित प्राप्त नहीं करता है, तब तक मिथ्यात्वी रहता है किंतु अभव्य सदैव मिथ्यात्वी ही रहता है ।
१४. भव्य को भव भ्रमण से भय लगता है, अभव्य को नहीं ।
१५. भव्य के अहिंसात्मक भाव होते है, अभव्य जे हिंसात्मक भाव होते है ।
१६. भव्य में सत्य श्रद्धान है, अभव्य में नहीं ।
१७. भव्य " मेरी मुक्ति होगी या नहीं " इस विचार से कंपित रहता है, अभव्य नहीं ।
१८. भव्य को आत्म-विश्वास होता है, अभव्य को नहीं ।
जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)
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