हुण्डावसर्पिणी काल

हुण्डावसर्पिणी काल

असंख्यात अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी कालों के व्यतीत हो जाने पर हुण्डावसर्पिणी काल आता है । आजकल यही काल चल रहा है । काल दोष के कारण इसमें कुछ विचित्र अपवाद अथवा असाधारण बातें होती हैं जो आगम के अनुकूल नहीं होती हैं जैसे :-

१ :-चतुर्थ काल में २४ तीर्थंकर होते हैं और ये सभी चौथे काल में ही मोक्ष जाते हैं । किंतु इस काल के प्रभाव से तीसरे काल के अंत में कल्पवृक्षों का अंत और कर्म भूमि का व्यवहार प्रारंभ हो जाता है । इसी कारण वश भगवान् आदिनाथ तीसरे काल में जन्म लेकर तीसरे काल में ही मोक्ष गये ।

२ :-तीर्थंकरों के पुत्री नहीं होती हैं लेकिन काल दोष से भगवान् आदिनाथ के दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुई ।

३ :-तीर्थंकरों पर उपसर्ग नहीं होते हैं । लेकिन सुपार्श्वनाथ , पार्श्वनाथ और महावीर भगवान् पर उपसर्ग हुए ।
( उपसर्ग छद्मस्थ अवस्था में होते हैं केवल ज्ञान के बाद नहीं । जैसे पार्श्वनाथ भगवान् पर उपसर्ग केवलज्ञान प्राप्ति से पूर्व हुआ था ।

४:- सभी तीर्थंकरों का जन्म अयोध्या में होना चाहिए । मगर इस काल दोष के कारण केवल ५ तीर्थंकरों ( वृषभदेव , अजितनाथ , अभिनंदननाथ , सुमतिनाथ , अनंतनाथ ) का जन्म ही अयोध्या में हुआ ।

५ :-सभी तीर्थंकरों का मोक्ष सम्मेद शिखर से होना चाहिए । मगर तीर्थंकर वृषभदेव , वासुपूज्यनाथ , नेमिनाथ और महावीर का मोक्ष अन्य स्थानों से हुआ ।

६ :- ६३ शलाका पुरुष होने चाहिए मगर केवल ५९शलाका पुरुष ही हुए है ।
चतुर्थ काल में ५९ शलाका पुरुष -
भरत क्षेत्र में प्रत्येक उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल में ६३ - ६३ शलाका पुरुष होते हैं । मगर हुण्डावसर्पिणी काल के प्रभाव के कारण वर्तमान अवसर्पिणी के गत चतुर्थ काल में ६३ की जगह ५९ ही शलाका पुरुष हुए हैं । भगवान् शांतिनाथ कुंथुनाथ और अरहनाथ तीर्थंकर व चक्रवर्ती दोनों पद के धारी थे  और भगवान् श्रेयाँसनाथ के समय हुए प्रथम नारायण त्रिपृष्ठ अगले भव में भगवान् महावीर हुए । इस प्रकार  पद कम हो जाने के कारण इस चतुर्थ काल में मात्र ५९ शलाका पुरुष हुए हैं ।

७ - तीर्थंकरों के अन्तराल काल में कुछ अवधि के लिए धर्म नहीं रहा । नवें से सोलहवें तीर्थंकर के अन्तराल काल में चतुर्विध संघ का अभाव रहने से थोड़ी थोड़ी अवधि के लिए धर्म का व्युच्छेद हुआ ।

८ - चक्रवर्ती का मान भंग हुआ । चक्रवर्ती युद्ध में हारते नहीं हैं , लेकिन काल दोष के कारण चक्रवर्ती भरत अपने भ्राता बाहुबली से हार गये थे।

जैनम् जयतु शासनम्
वास्तुगुरू महेन्द्र जैन (कासलीवाल)

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