अठारह पाप

*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 1

नौ तत्त्वों में चौथा तत्त्व *पाप* है।

प्राणी के सु:ख दुख में पुण्य पाप का योग रहता है। सत्क्रिया से पुण्य और असत्क्रिया से पाप का बंध होता है। जैन वाड्मय में पाप का बंध कराने वाली अठारह प्रवृत्तियां बताई गई है। उन्हें *अठारह पाप* कहा जाता है। प्राणी के भवभ्रमण में पाप जिम्मेवार होते हैं। परम सुख की प्राप्ति के लिए इन अठारह पापों  का परित्याग आवश्यक है।

पाप अशुभकर्म का उदय है। पहले बंधा हुआ अशुभ कर्म उदय में आकर जब अशुभ फल देता है तब वह पाप कहलाता है।  पाप अठारह प्रकार का है -- प्राणातिपात पाप,  मृषावाद पाप, अदत्तादान इत्यादि ।

ये भेद वास्तव में पाप तत्त्व के नहीं किंतु जिन कारणों से पाप-कर्म बंधता है, उन कारणों के अनुसार बध्यमान अवस्था की अपेक्षा से पाप को अठारह भागों में विभक्त किया गया है। प्राणों का वियोग करना योग आश्रव कहलाता है और प्राण- वियोग करने से जो कर्म  बंधता है, वह प्राणातिपात कहलाता है। उस पुद्गल-समूह का आत्मा के साथ संबंध होने का हेतु प्राण-वियोजन है। यदि आत्मा के द्वारा प्राण वियोजन नहीं किया जाता, तो वह पुद्गल-समूह भी आत्मा के साथ संबंध नहीं कर सकता  अतः उस क्रिया से जो कर्म बंधता है, वह उसी क्रिया के नाम से पुकारा जाता है।

 जिस कर्म के उदय से जीव हिंसा करता है, असत्य बोलता है तथा उसी प्रकार अन्य पाप करता है, उस कर्म को प्राणातिपात पाप-स्थान,  मृषावाद पाप-स्थान आदि कहा जाता है।

आगम असम्मत कुछ लिखा हो तो मिच्छामि दुक्कडं


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 2

*पहला पाप  --  प्राणातिपात पाप*

जैन वाड्मय में अठारह पाप बताए गए हैं । अठारह पापों में पहला पाप है प्राणातिपात पाप। प्राण-वियोग करने से जो कर्म बंधता है, वह प्राणातिपात पाप है।

प्राणातिपात का अर्थ है -- प्राणी के प्राणों का विसंयोग करना। जैन तत्वविद्या में प्राण के दस प्रकार बताए गए हैं -- श्रोत्रेन्द्रिय प्राण, चक्षुरिन्द्रिय प्राण, घ्राणेन्द्रिय प्राण, रसनेन्द्रिय प्राण, स्पर्शनेन्द्रिय प्राण,  मनोबल, वचनबल, कायबल, श्वासोच्छ्वास प्राण और आयुष्य  प्राण। संसार में जीने वाले सभी प्राणी चाहे  एकेन्द्रिय हों या पंचेन्द्रिय, प्राण सहित होते हैं, किंतु सब प्राणियों में प्राणों की संख्या समान नहीं होती। एक इंद्रिय वाले प्राणियों में चार प्राण, दो इंद्रिय वाले प्राणियों में छह प्राण, तीन इंद्रिय वाले प्राणियों में सात प्राण, चार इंद्रिय वाले प्राणियों में आठ प्राण और पांच इंद्रिय वाले संज्ञी प्राणियों में दस प्राण होते हैं। इनमें से किसी भी प्राण का अतिपात करना प्राणातिपात है। केवल जीव की हिंसा करना ही अतिपात नहीं है, उसको किसी भी प्रकार से कष्ट देना भी प्राणातिपात है।

प्राणातिपात ऐसा पाप है जो आदमी की आत्मा को भारी बनाने वाला होता है। हर व्यक्ति यह सोचे कि मैं हिंसा से अपने आप को कैसे और कितना बचा सकता हूं ? मेरे जीवन में हिंसा का अल्पीकरण कैसे हो सकता है ? अगर अहिंसक चेतना का विकास हो गया और जीव हिंसा से विरत रहने की भावना हमारे मन में जाग गई तो जीवन का उत्थान अवश्यंभावी है।

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- १ :  प्राणातिपात पाप*

*भाग -- १*

जैन साधु पंच महाव्रतधारी होता है। छेदोपस्थापनीय चारित्र को ग्रहण करते समय वह प्रथम महाव्रत में सम्पूर्ण प्राणातिपात से विरत रहने का संकल्प करता है। दसवेआलियं सूत्र में कहा गया है -- *सव्वं भंते! पाणाइवायं पच्चक्खामि-से सुहुमं वा बायरं वा तसं वा थावरं वा, नेव सयं पाणे अइवाएज्जा नेवन्नेहिं पाणे अइवायावेज्जा पाणे अइवायंते वि अन्ने न समणुजाणेज्जा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न करेमि न कारवेमि करंतं पि अन्नं न समणुजाणामि।*

भंते! मैं सर्व प्राणातिपात का प्रत्याख्यान करता हूँ। सूक्ष्म या स्थूल, त्रस या स्थावर जो भी प्राणी हैं, उनके प्राणों का अतिपात मैं स्वयं नहीं करूंगा, दूसरों से नहीं कराऊंगा और अतिपात करने वालों का अनुमोदन भी नहीं करूंगा। यावज्जीवन के लिए तीन करण, तीन योग से-मन से, वचन से, काया से न करूंगा, न कराऊंगा और करने वाले का अनुमोदन भी नहीं करूंगा।

प्राणातिपात का अर्थ है-प्राणी के प्राणों का विसंयोग करना। जैन तत्त्वविद्या में प्राण के दस प्रकार बताए गए हैं -- श्रोत्रेन्द्रिय प्राण, चक्षुरिन्द्रिय प्राण, घ्राणेन्द्रिय प्राण, रसनेन्द्रिय प्राण, स्पर्शनेन्द्रिय प्राण, मनोबल, वचनबल, कायबल, श्वासोच्छ्वास प्राण और आयुष्य प्राण । संसार में जीने वाले सभी प्राणी चाहे एकेन्द्रिय हों या पंचेन्द्रिय, प्राण सहित होते हैं, किन्तु सब प्राणियों में प्राणों की संख्या समान नहीं होती। एक इन्द्रिय वाले प्राणियों में चार प्राण, दो इन्द्रिय वाले प्राणियों में छह प्राण, तीन इन्द्रिय वाले प्राणियों में सात प्राण, चार इन्द्रिय वाले प्राणियों में आठ प्राण और पांच इन्द्रिय वाले संज्ञी प्राणियों में दस प्राण होते हैं। इनमें से किसी भी प्राण का अतिपात करना प्राणातिपात है।

केवल जीव की हिंसा करना ही अतिपात नहीं है, उसको किसी भी प्रकार से कष्ट देना भी प्राणातिपात है।

उत्तराध्ययन सूत्र में कहा गया है- *पाणे य नाइवाएज्जा, से समिए त्ति वुच्चई ताई* अर्थात् जो जीवों की हिंसा नहीं करता वैसे मुनि को समित कहा जाता है। साधु को समित होना ही चाहिए। प्राणियों की हिंसा से बचना उसका धर्म है। हालांकि शरीरधारी के लिए लंबे समय तक हिंसा से पूर्णतया बचना कठिन होता है। शरीर को चलाने के लिए हिंसा का सहारा लेना ही पड़ता है। गृहस्थ के लिए तो हिंसा से पूर्णतया बचना कठिन है ही, साधु के लिए भी द्रव्य हिंसा से पूर्णतया अपना बचाव कर पाना बहुत मुश्किल है। हमारे साधु यदा-कदा रात को आलोयणा लेते हैं। आज हरियाली का स्पर्श हो गया, आज पृथ्वीकाय का स्पर्श हो गया, आज वर्षा के पानी का स्पर्श हो गया, आज वायुकाय की अयत्ना हो गई यानी हिंसा से पूर्णतया बचना उनके लिए भी कठिन हो जाता है। उस अयत्ना के लिए उन्हें आलोचना करनी होती है, शुद्धि करनी होती है। साधु पंचमी समिति के लिए जंगल में जाता है, उस दौरान भी कहीं न कहीं किसी रूप में हरियाली का स्पर्श हो जाता है तो इसमें हुई अयत्ना भी हिंसा की बात है। साधु को कभी नौका विहार भी करना पड़ता है तो वहां भी हिंसा की संभावना रहती है। इस प्रकार यत्र तत्र, कहीं-कहीं साधु भी हिंसा से अपना बचाव नहीं कर पाता।

बहुधा दो शब्द काम में लिए जाते हैं-द्रव्य और भाव। इनके साथ हिंसा शब्द को जोड़ दें तो कह सकते हैं-द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा। एक साधु जागरूक है, केवली है, वीतराग है, उसके द्वारा चलते-चलते आकस्मिक रूप से किसी प्राणी का वध हो गया तो कहा जा सकता है कि उस साधु के द्वारा द्रव्य हिंसा हुई है, भाव हिंसा नहीं हुई। सिद्धान्त कहता है -- वह साधु हिंसा के पाप का भागी नहीं बनता है, अपितु जिस समय जीव हिंसा हुई, उसके तो पुण्य कर्म का बंध ही होता है, पाप कर्म का बंध नहीं होता।

हिंसा का विषय कुछ जटिल है। ओघनिर्युक्ति में एक जगह कहा गया --

*आयाचेव अहिंसा आया हिंसेक्ति निच्छओ एस।*
*जो होइ अप्पमत्तो अहिंसओ हिंसओ इयरो ।॥७५४ ॥*

 आत्मा ही अहिंसा है, आत्मा ही हिंसा है। यह निश्चयनय की बात है। जो अप्रमत्त होता है, वह अहिंसक होता है और जो प्रमत्त होता है, वह हिंसक होता है।

 जैन वाङ्मय में अठारह पाप बताए गए हैं। अठारह पापों में पहला पाप है प्राणातिपात पाप । प्राण-वियोग करने से जो कर्म बंधता है, वह प्राणातिपात पाप है।

*क्रमशः .........*


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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*

.                  *करें आत्मोत्थान बने वर्धमान* 

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- १ :  प्राणातिपात पाप*

*भाग -- २*

हिंसा के तीन प्रकार बताए गए हैं-आरंभजा हिंसा, प्रतिरोधजा हिंसा और संकल्पजा हिंसा।

*आरंभजा हिंसा*-अन्न जीवन की आवश्यकता है। खाने को रोटी चाहिए, रोटी के लिए अन्न उपजाना जरूरी है और अन्न पैदा करने में जीव हिंसा होती ही है। खेत को जोतने, बोने, सिंचाई करने, काटने, फसल को घर लाने और उसका भंडारण करने तक न जाने कितनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है और इस दौरान सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है। यह लक्ष्यपूर्वक की गई हिंसा नहीं है। कृषि और जीवन-निर्वाह के लिए किए जाने वाले उपक्रमों में ऐसा हो जाता है। यह आरंभजा हिंसा है।

मैं मध्यप्रदेश की यात्रा में था एक गांव में थोड़ी देर के लिए रुका तो गांव के किसान लोग एकत्रित होकर मेरे पास आए। उनमें से एक व्यक्ति बोला-महात्माजी ! हम तो पापी लोग हैं। खेती करते हैं, उसमें दवा छिड़कते हैं। उस समय असंख्य जीवों की हिंसा हो जाती है। आप हमें कोई प्रायश्चित दे दें, जिससे हमारी शुद्धि हो जाए। मैंने उन्हें इस विषय में कुछ बता दिया। फिर मैंने सोचा कि खेती में भी हिंसा कैसे कम हो सके, इस पर भी प्रयास होना चाहिए। वहां भी हिंसा का अल्पीकरण होना चाहिए। यदा-कदा जब हमारे पास किसान सम्मेलन होते हैं तब मैं इस विषय में भी चर्चा करता हूं।

*प्रतिरोधजा हिंसा-* अपनी सुरक्षा के साथ-साथ देश की सुरक्षा करना हर आदमी का सांसारिक कर्तव्य होता है। शत्रु की सेना देश पर आक्रमण कर दे तो सैनिक प्राणपण से उसका प्रतिरोध करते हैं। उस प्रतिरोध में बचाव पक्ष के और आक्रान्ता पक्ष के सैनिक बड़ी संख्या में मारे जाते हैं और हताहत होते हैं, यहां मूल लक्ष्य देश की सुरक्षा है। परन्तु प्रतिरोध करने में हिंसा हो जाती है। परमपूज्य गुरुदेव महाप्रज्ञ के दिल्ली प्रवास में मुझे उत्तर प्रदेश के नोएडा क्षेत्र में जाने का निर्देश मिला। मैं वहां गया। उस समय एक पूर्व सैनिक यदा-कदा हमारे पास आता। एक दिन बातचीत के क्रम में वह बोला-महाराज ! मेरी तो इच्छा है कि एक बार हिन्दुस्तान व पाकिस्तान में युद्ध छिड़ जाए और आरपार का फैसला हो जाए। उस समय कारगिल का संघर्ष चल रहा था। हमने कहा-भाई, हम तो शान्ति की बात करते हैं, तुम हिंसा की बात क्यों सोचते हो? वह बोला-महाराज ! मेरी तो हार्दिक इच्छा है कि युद्ध शुरू हो जाए और हम रिटायर्ड फौजियों को भी उसमें भाग लेने का अवसर दिया जाए। मेरे प्राण भी युद्ध में काम आ जाएं। देश के लिए जान देना और जान लेना गौरव की बात होती है। मैंने उस सैनिक में देशभक्ति की उत्कट भावना देखी। इस प्रकार सुरक्षा के लिए प्रतिरोध के रूप में जो हिंसा होती है, वह प्रतिरोधजा हिंसा है। आरंभजा और प्रतिरोधजा हिंसा तो गृहस्थ जीवन में आवश्यक हो सकती है, लेकिन ये हिंसाएं कोई जघन्य अपराध की श्रेणी में नहीं आतीं।

*संकल्पजा हिंसा-* आवेग, आवेश और लोभ के वशीभूत होकर आदमी अपराध और हिंसा में चला जाता है। किसी को मारने का संकल्प करके उसकी हत्या कर देता है। मार-काट में कुछ लोगों को आनंद मिलता है। इस तरह के क्रूर कर्म में उन्हें सुख मिलता है। कुछ लोग आदतन अपराधी हो जाते हैं। दिन भर में जब तक कोई न कोई हिंसक कार्य वे नहीं करते, उन्हें चैन नहीं मिलता। यह संकल्पजा हिंसा है।

दो मित्र साथ-साथ कमाई करने के उद्देश्य से बाहर गए। दोनों ने तय किया था कि साथ मिलकर कमाएंगे। धंधे में घाटा हो या मुनाफा, हिस्सा आधा-आधा रहेगा। एक वर्ष के बाद संचित पूंजी को बराबर बांट लेंगे। दोनों ने ऐसा ही किया। दैवयोग से उन्हें धंधे में अच्छा मुनाफा हुआ। दोनों अपने गांव की ओर चल पड़े। उस समय आज की तरह यातायात के साधन सुलभ नहीं थे। दूर देश की यात्रा भी पैदल होती थी। दोनों मित्र दिन भर पैदल यात्रा करते और शाम को रात्रि विश्राम हेतु कहीं आश्रय ले लेते।

वर्ष भर की संचित जमा-पूंजी उनके पास थी। गांव पहुंच जाने के बाद उसका बंटवारा करने का निश्चय किया हुआ था। लेकिन यात्रा संपन्न कर गांव पहुंचने से पूर्व एक मित्र के मन में लोभजनित कुविचार पैदा हो गया। उसके मन में आया कि गांव पहुंचने के बाद तो कमाया हुआ धन बंट जाएगा। क्यों न ऐसा कुछ किया जाए कि सारा धन मेरे अकेले के हिस्से में आ जाए। विचारों का भी संक्रमण होता है। एक के मन में यह विचार उठा तो ही सोचने लगा। सारा धन हस्तगत करने का एक ही उपाय था कि दूसरे को मार दिया जाए। अन्ततः एक-दूसरे को मारने का उन दोनों ने अपने-अपने मन में पक्का निश्चय कर लिया। गुप्त रूप से योजना भी बना ली। एक ने दूसरे को जहर देकर मारने का प्लान बनाया और कहीं से लड्डुओं का प्रबंध उसमें तेज असर वाला विष मिला दिया। सोचा था कि मौका मिलने पर इन्हें मित्र को खिला कर हमेशा के लिए उससे छुटकारा पा लूंगा तो दूसरे ने मित्र को मौत
की घाट उतारने के लिए एक छूरे का प्रबंध कर लिया।

योजना की क्रियान्विति का समय आ गया । रात्रि के समय एक मित्र सो गया, लेकिन दूसरे की आंखों से नींद गायब थी। वह मित्र को नींद आ जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। जब उसे विश्वास हो गया कि यह गहरी नींद में है तो उसने छुरा निकाल कर उसकी छाती में भोंक दिया। सारे धन का अकेला मालिक होने की अनुभूति उसे रोमांचित कर रही थी। उसने अपने मृत साथी की गठरी खोली। अब हिस्सेदार कोई था नहीं। सारा धन और सारे लड्डू उसके थे। मित्र की लाश को बाद में ठिकाने लगाऊंगा, पहले आराम से लड्डुओं का भोग क्यों न लगा लिया जाए ऐसा सोच कर लड्डुओं की वास्तविकता से अनजान उसने उसी समय उनका सेवन कर लिया। अपनी योजना में इतनी आसानी से सफल हो जाने की प्रसन्नता में उसने वे सारे विषैले लड्डू खाकर तृप्ति का अनुभव किया।

जहरीले लड्डुओं ने तत्काल अपना असर दिखाया और कुछ ही देर में उसका प्राणान्त हो गया ।अब वहां पड़ी थी दो लाशें और उनके निकट रखी थी उनकी वर्ष भर की कमाई, जिसका उपभोग करने वाला उन दोनों में से कोई भी नहीं बचा था , यह संकल्पजा हिंसा है।

*क्रमशः .........*

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*
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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- १ :  प्राणातिपात पाप*

*भाग -- ३*

हिंसा का एक कारण आक्रोश भी है। आदमी गुस्से में आकर कितनों को मार सकता है, पीट सकता है और तकलीफ भी दे सकता है। कोई व्यक्ति आवेश के वशीभूत होकर आत्महत्या तक कर लेता है तो कोई परहत्या में तत्पर हो जाता है। उस समय उसे अपने-पराए का कोई भान नहीं रहता। क्रोधावेश के कारण एक पुत्र अपने पिता की हत्या कर सकता है और एक पति अपनी पत्नी की हत्या कर सकता है। जब अर्जुनमाली ने छह पुरुषों को अपनी पत्नी के साथ बलात्कार करते देखा तो आक्रुष्ट होकर अपने इष्ट यक्ष की ललकारते हुए कहने लगा-अरे यक्ष! मैं बचपन से तेरी सेवा कर रहा हूं। पर तुमने मुझे दिया यह पतन, जिसे एक पशु भी नहीं देख सकता। या तो मेरी सहायता कर अन्यथा.... । यक्ष तत्काल अर्जुन के शरीर में प्रविष्ट हो गया। अब अर्जुनमाली यक्ष-प्रतिमा के हाथ में स्थित मुद्गर को लेकर उन छहों पुरुषों की ओर दौड़ा और उन छहों के साथ अपनी पत्नी बन्धुमती को भी समाप्त कर दिया। इन सात व्यक्तियों की हिंसा से भी उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ। पांच महीने और तेरह दिन तक यक्षावेष्टित अर्जुन ने ११४१ मनुष्यों की हत्या का डाली। कहने का तात्पर्य है कि क्रोधावेश में व्यक्ति कितनी हिंसाएं कर सकता है। अगर गुस्से पर नियंत्रण हो जाए, गुस्सा शान्त हो जाए तो आदमी अपने आपको हिंसा से काफी बचा सकता है। आदमी के जीवन में अहिंसा का विकास हो, अहिंसा की साधना चले। व्यक्ति मन, वचन, काया से हिंसा करने, कराने और अनुमोदन करने से बचने का प्रयास करे।

आचार्य भिक्षु के जीवन में कितनी अहिंसा थी। ऐसे कितने ही प्रसंग हैं, जब आचार्य भिक्षु ने विरोधियों के प्रहार का अहिंसक प्रतिकार करते तनावपूर्ण प्रसंग को विनोद में परिवर्तित कर दिया।

एक विश्रुत प्रसंग है। आचार्य भिक्षु को मार्ग में एक आदमी मिला। उसने पूछा-तुम्हारा क्या नाम है ? स्वामीजी ने कहा मुझे भीखण कहते हैं।

उस व्यक्ति ने तीक्ष्ण दृष्टि से स्वामीजी को देखा और कहा-ओह ! यह तो बुरा हुआ।

स्वामीजी ने कहा -- बुरा क्या हुआ भाई ?

आगन्तुक व्यक्ति ने कहा -- बुरा यह हुआ कि सवेरे-सवेरे तुम्हारा मुंह देख लिया। अब नर्क में जाना पड़ेगा। यह निश्चित रूप से अपमानजनक बात है। आज कोई किसी से इस तरह की बात कहे तो उसे कड़ा हिंसक प्रतिकार झेलना पड़ सकता है। लेकिन वे तो आचार्य भिक्षु थे। इतिहास बताता है कि वे अपने उस विरोधी की बात पर आकृष्ट नहीं हुए। उन्होंने पूछा-तुम्हारा मुंह देखने वाले को कहां जाना पड़ता है?

मेरा मुंह देखने वाले को स्वर्ग या मोक्ष मिलता है -- उस व्यक्ति ने किंचित अहंकार की भाषा में कहा।

स्वामीजी ने कहा-यद्यपि मेरी ऐसी मान्यता नहीं है कि किसी का मुंह देखने मात्र से स्वर्ग या नरक मिलता है। स्वर्ग और नरक की प्राप्ति तो नितान्त कर्म पर आधारित है। किन्तु तुम कह रहे हो कि तुम्हारा मुंह देखने से स्वर्ग मिलता है तो मेरे लिए अच्छा ही हुआ, मुझे तो स्वर्ग मिल जाएगा। तुम्हें क्या मिलेगा, यह तुम जानो।

आचार्य भिक्षु का जीवन संघर्षों की महागाथा है। दीर्घकाल तक उन्हें पूरा आहार सुलभ नहीं हुआ। पानी और स्थान की भी समस्या रही। फिर भी अनेकानेक विषम परिस्थितियों से जूझते हुए उन्होंने कठिन तप किया, विशिष्ट साधना की। वे एक गहरे स्वाध्यायी और महान साधक थे। उनके जीवन में अहिंसा मूर्तिमान थी।

प्राणातिपात ऐसा पाप है जो आदमी की आत्मा को भारी बनाने वाला होता है। हर व्यक्ति यह सोचे कि मैं हिंसा से अपने आपको कैसे और कितना बचा सकता हूं? मेरे जीवन में हिंसा का अल्पीकरण कैसे हो सकता है ? अगर अहिंसक चेतना का विकास हो गया और जीव हिंसा से विरत रहने की भावना हमारे मन में जाग गई तो जीवन का उत्थान अवश्यंभावी है।

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो मिच्छामि दुक्कडं।*







*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 3

*दूसरा  पाप  --  मृषावाद पाप*

*मृषावाद पाप*  -- झूठ बोलने से आत्मा के साथ चिपकने वाला पुद्गल समूह। जैन वाड्मय में झूठ बोलने के चार कारण बताए गए हैं -- *कोहा वा, लोहा वा, भया वा, हासा वा --*  आदमी क्रोध के कारण झूठ बोल देता है, लोभ के कारण झूठ बोल देता है, भय के कारण झूठ बोल देता और हंसी मजाक में भी कभी-कभी झूठ बोल देता है।

 अगर समाज में ईमानदारी प्रतिष्ठित रहे, लोग झूठ बोलने से बचते रहें तो समाज की व्यवस्था बहुत अच्छी बन सकती है, समाज की समस्याओं का समाधान हो सकता है।

 सच्चाई की अपने शक्ति होती है। संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध सूक्त है -- *सत्यमेव जयते नानृतम्* अर्थात सत्य की विजय होती है, झूठ की नहीं। सत्य परेशान तो हो सकता है, परास्त नहीं होता। सत्य के सामने कठिनाइयों और संघर्ष तो आ सकते हैं, परंतु जो तत्त्व सत्य से प्राप्त होता है,  वह झूठ से प्राप्त नहीं हो सकता। आदमी पूर्णतया सत्य की साधना न भी कर सके, पर कुछ अंशों में प्रयास अवश्य करे। वह यह संकल्प करें कि मैं छोटा-मोटा कष्ट भले सहन कर लूं, पर झूठ बोलने से बचूं। कहीं सत्य बोलने में कठिनाई हो तो आदमी मौन कर ले, कुछ भी न बोले।

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया -- *स्वल्पप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्* अर्थात धर्म का थोड़ा-सा अंश भी जीवन में आ जाता है तो वह आदमी को महान भय से उबारने वाला होता है। आदमी कोई भी काम-धंधा करे, व्यापार करे, फाइलें देखें, डॉक्टरी करे, वकालत करे, अध्यापन करे, कोई भी काम कर, यह चिंतन रहे कि मेरे कार्य में प्रामाणिकता है या नहीं ?  मेरे कार्य में सच्चाई है या नहीं ? मैं अप्रामाणिकता से स्वयं को कितना बचा सकता हूं ? ऐसा चिंतन करते हुए व्यक्ति अपने आपको सच्चाई के पथ पर आगे बढ़ाने का प्रयास करे, यह जीवन की बहुत बड़ी सफलता है।
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           परमश्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमण की
  परम सुख प्राप्ति हेतु पाप परित्याग उद्बोधक कृति
               *18 पाप : जानो और छोड़ो*
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                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (1)
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           प्रश्न हुआ, दुनिया में सारभूत तत्त्व क्या है ? किसी ने कहा--  *अस्मिन्नसारे संसारे, सारं सारंगलोचना* अर्थात् इस असार संसार में स्त्री यानि भोग सारभूत है। किसी आर्थिक दृष्टि वाले व्यक्ति ने कहा-- *अस्मिन्नसारे संसारे सारं सारस्य प्रापणम्* अर्थात् इस असार संसार में धन का अर्जन करना ही सारभूत है। कोई जुआरी वहां बैठा था, उसने कहा-- *अस्मिन्नसारे संसारे, सारं द्यूतस्य क्रीड़नम्* अर्थात् इस असार संसार में जुआ खेलना सारभूत है। इमानदारी के प्रति आस्था रखने वाले किसी व्यक्ति ने कहा-- *अस्मिन्नसारे संसारे, सारे सत्यस्य सेवनम्* अर्थात सत्य का सेवन करना सारभूत है। आर्हत वाड़्मय में कहा गया-- *सच्चं लोयम्मि सारभूयं* अर्थात् सत्य लोक में सारभूत है। हमारी दुनिया में झूठ भी चलता है और सचाई भी जीवित है। आदमी यदा-कदा झूठ का सहारा ले लेता है। मेरा मानना है *अगर समाज में ईमानदारी प्रतिष्ठित रहे, लोग झूठ बोलने से बचते रहें तो समाज की व्यवस्था बहुत अच्छी बन सकती है।* समाज की समस्याओं का समाधान हो सकता है।
*क्रमशः......*
                      🎍 संप्रसारक 
                      🌻 *संघ संवाद* 🎍🌻
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           परमश्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमण की
  परम सुख प्राप्ति हेतु पाप परित्याग उद्बोधक कृति
               *18 पाप : जानो और छोड़ो*
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                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (2)
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*गंताक से आगे........*
            राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सन् 1927 में श्री हरीभाऊ उपाध्याय जी और जमुनालाल जी ने अपनी घोषणा के अनुरूप एक हरिजन बालक द्वारा निर्मित भोजन ग्रहण किया। इस घटना को समाचार पत्रों ने लाल सुर्खियों में स्थान दिया। फलतः उनके परिवार पर घोर संकट आ पड़ा और बारह-तेरह वर्षों तक जाति से बहिष्कृत रहना पड़ा। एक दिन उनके मित्र ने कहा-- उपाध्याय जी ! आप इतना कह दीजिए कि यह समाचार गलत है। जाति के गणमान्य लोग इसे प्रमाण मांग कर बहिष्कार उठा लेंगे। सिद्धांत एवं सत्य को श्वासोच्छ्वास की तरह मानने वाले श्री हरीभाऊ उपाध्याय जी ने बड़ी निडरता के साथ कहा-- मनुष्य किसी न किसी बल के सहारे जीवित रहता है। किसी के पास धनबल है तो किसी के पास विद्याबल। किसी के पास सत्ताबल है तो किसी के पास शरीरबल। मेरे पास तो सत्यबल के अतिरिक्त कोई बल नहीं है। उसी के सहारे मैं जी रहा हूं। सत्यबल को खोकर मैं जाति में भले ही आ जाऊंगा, लेकिन अपने जीवन से हाथ धो बैठूंगा जिसकी सत्य के प्रति इतनी प्रगाढ़ निष्ठा होती है, उसका जीवन सबके लिए आदर्श बन जाता है।
           जैन वाड़्मय में झूठ बोलने के चार कारण बताए गए हैं-- *कोहा वा, लोहा वा, भया वा, हासा वा*-- आदमी क्रोध के कारण झूठ बोल देता है, लोभ के कारण झूठ बोल देता है, भय के कारण झूठ बोल देता है और हंसी-मजाक में भी कभी-कभी झूठ बोल देता है। 
*क्रमशः.......*
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           परमश्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमण की
  परम सुख प्राप्ति हेतु पाप परित्याग उद्बोधक कृति
               *18 पाप : जानो और छोड़ो*
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                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (3)
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*गंताक से आगे........*
       असत्य बोलने के दस भेद भी मिलते हैं-- १. क्रोध मिश्रित  २. मान मिश्रित ३.माया मिश्रित  ४. लोभ मिश्रित ५.राग मिश्रित ६. द्वेष मिश्रित  ७. हास्य मिश्रित ८. भय मिश्रित  ९.आख्यायिक मिश्रित  १०.उपपात मिश्रित।
          जैन साधु के लिए तो मृषावाद सर्वथा त्याज्य है। वह  धर्म रक्षा या प्राण रक्षा के लिए भी असत्य नहीं बोल सकता। दसवेआलियं सूत्र में कहा गया--
 *मुसावाओ  य लोगम्मि, सव्वसाहूहिं  गरहिओ।*
*अविस्सासो य  भूयाणं, तम्हा मोसं विवज्जए।।* 
        इस समूचे लोक में मृषावाद सब साधुओं द्वारा गर्हित है और वह प्राणियों के लिए अविश्वसनीय है। निर्ग्रंथ असत्य न बोले।
        इसी बात को पुष्ट करते हुए जिनदास चूर्णि में बताया गया है-- बौद्ध भिक्षुओं के पांच शिक्षापदों में  'मृषावाद परिहार' को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसकी आराधना के बिना शेष शिक्षापदों की आराधना भी संभव नहीं होती। एक श्रावक था। उसने मृषावाद को छोड़कर चार अणुव्रत ग्रहण किए। कुछ समय पश्चात् वह एक-एक कर सभी व्रत तोड़ने लगा। एक बार उसके मित्र ने कहा-- तुम व्रतों को क्यों तोड़ते हो ? उसने कहा-- नहीं तो, मैं व्रतों को कहां तोड़ता हूं। मित्र ने कहा-- तुम झूठ बोलते हो। उसने कहा-- मैंने झूठ बोलने का त्याग कब किया था ? सत्य शिक्षापद के अभाव में उसने सारे व्रत तोड़ डाले।
*क्रमशः......*
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           परमश्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमण की
  परम सुख प्राप्ति हेतु पाप परित्याग उद्बोधक कृति
               *18 पाप : जानो और छोड़ो*
                     🎍🎍🧩🎍🎍
                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (4)
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*गंताक से आगे........*
           वह व्यक्ति धन्य हैं, जिन्हें झूठ से घृणा है, जो झूठ का सहारा नहीं लेते। गुस्सा करना पाप है तो झूठ बोलना भी पाप है। कोई आदमी गुस्सा तो नहीं करता, किंतु बात बात में दूसरों को ठगता है, जबान रुपी मीठी छुरी दूसरों के गले पर चलाने का प्रयास करता है तो वह भी बहुत बड़ा पाप है। कभी-कभी तो साफ-साफ कहना और कड़ाई से कहना ज्यादा अच्छा है, बजाय इसके कि मीठा बोल कर किसी को ठगने की चेष्टा की जाए। आदमी को अगर जीवन में अध्यात्म की साधना करना है,  नैतिकता की आराधना करना है तो वह झूठ बोलने से बचने का प्रयास करे।
         सचाई की अपनी शक्ति होती है। संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध सूक्त है *सत्यमेव जयते नानृतम्* अर्थात सत्य की विजय होती है, झूठ की नहीं। सत्य परेशान तो हो सकता है, परास्त नहीं होता। सत्य के सामने कठिनाइयां और संघर्ष तो आ सकते हैं, परन्तु जो तत्त्व सत्य से प्राप्त होता है, वह झूठ से प्राप्त नहीं हो सकता।
*क्रमशः........*
                      🎍 संप्रसारक 
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           परमश्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमण की
  परम सुख प्राप्ति हेतु पाप परित्याग उद्बोधक कृति
               *18 पाप : जानो और छोड़ो*
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                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (5)
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*गंताक से आगे........*
           सत्य की कठोर साधना करना आसान काम नहीं है। कोई मनोबली व्यक्ति, जिसका *यह संकल्प हो कि जीवन भले चला जाए, प्राण छूट जाए, पर मैं सच्चाई को नहीं छोडूंगा, ऐसा व्यक्ति ही ऐसी साधना कर सकता है।* यद्यपि मैं दुनिया में नास्ति तो नहीं मानता। ऐसे महापुरुष भी मिल सकते हैं जो सचाई के प्रति गहरी निष्ठा रखने वाले होते हैं। भले पैसा जाए तो जाए, पर वह सत्य को नहीं जाने देते।
       एक प्रसंग प्राप्त होता है। गांधीजी उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में वकालत कर रहे थे। एक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी व्यक्ति का खून कर डाला। उसके बाद वह अपनी रक्षा के लिए बैरिस्टर गांधी की शरण में आया। वह जानता था कि सत्यनिष्ठ गांधी उसकी वकालत करेंगे तो वह छूट जाएगा। गांधी जी ने उसके मुकदमे का अध्ययन किया तो उन्हें विश्वास हो गया कि उसने सचमुच खून किया है। उस व्यक्ति ने कहा-- वह तो मैंने किया है, इसीलिए तो आपके पास आया हूं। फीस के रूप में आपको एक हजार पौंड दूंगा। गांधीजी हंसे और बोले-- मैं पैसे के लिए वकालत नहीं करता, सत्य के लिए करता हूं। गांधी जी ने वह मुकदमा नहीं लड़ा। उस व्यक्ति ने एक-एक हजार पौंड देकर तीन वकीलों को खड़ा किया और वकीलों ने दांव पर लगाकर उसे छुड़ा भी लिया।  खुशी से फूला वह गांधी जी के पास आया और बोला-- आप समझते थे कि आपके सिवाय दूसरा कोई मुझे बचा नहीं सकता। देखिए, मैं आपके सामने छूटकर आ गया गांधी जी ने कहा-- क्या तुम जानते हो कि तुम्हें अपने छुटकारे के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है ? उस व्यक्ति ने कहा-- आप एक हजार पौंड की बात करते हैं। मैं इससे भी अधिक खर्च कर सकता था। गांधीजी बोले-- मैं पैसे की बात नहीं करता। तुमने सचाई और ईमानदारी का खून किया है। क्या यह तुमने मामूली कीमत चुकाई है ?
*क्रमशः.......*
                      🎍 संप्रसारक 
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                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (6)
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*गंताक से आगे........*
       ईमानदारी और सचाई का जो मूल्य है, उसके सामने पैसा बहुत तुच्छ चीज है। आदमी यह प्रयास करे कि पैसा तो पास में भले कम आए, वह कोई बड़ी बात नहीं, पर ईमानदारीरुपी पैसा मेरे पास रहे। ईमानदारी से कमाए गए दो पैसे का भी बहुत मूल्य है, किंतु बेईमानी से कमाए गए करोड़ों रुपए का भी कोई विशेष मूल्य नहीं है।
       परम पूज्य गुरुदेव महाप्रज्ञ जी अर्थ के संदर्भ में दो शब्दों का प्रयोग करते थे--अर्थ और अर्थाभास। *न्यायोपार्जितं अर्थः* अर्थात् न्याय और इमानदारी से कमाया जाए, वह तो अर्थ है और बेईमानी से कमाया जाए, वह अर्थाभास है। जनता के पास अर्थाभास नहीं रहना चाहिए। अर्थ तो गृहस्थ को रखना पड़ता है, लेकिन अर्थाभास से आदमी बचने का प्रयास करे। कहा गया है--
    *सांच बरोबर तप नहीं, झूठ बरोबर पाप।*
    *जाके हिरदे सांच है, ता हिरदे प्रभु आप।।*
          सत्य एक प्रकार का बड़ा तप है और झूठ एक पाप है। लेकिन जिसके ह्रदय में सचाई विराजमान होती है उसके ह्रदय में भगवत्ता विराजमान होती है।
       साधु के लिए झूठ से बचना फिर भी थोड़ा आसान है, पर गृहस्थ के लिए झूठ से बचना बहुत मुश्किल काम है। कोई व्यक्ति गृहस्थ जीवन जीते हुए गार्हस्थ्य में रहते हुए, व्यापार-धंधा करते हुए, राजनीति में रहते हुए तथा और भी अन्य अनेक काम करते हुए सचाई की साधना करता है तो मैं उसे दुनिया का कोई दिव्य पुरुष मानता हूं। आदमी पूर्णतया सत्य की साधना न भी कर सके, पर कुछ अंशों में प्रयास अवश्य करे। वह यह *संकल्प करे कि मैं छोटा-मोटा कष्ट भले सहन कर लूं, पर झूठ बोलने से बचूंं।* कहीं सत्य बोलने में कठिनाई हो तो आदमी मौन कर ले, कुछ भी न बोले।
*क्रमशः........*

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           परमश्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमण की
  परम सुख प्राप्ति हेतु पाप परित्याग उद्बोधक कृति
               *18 पाप : जानो और छोड़ो*
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                          *मृषावाद पाप*
                       अध्याय ~ *02* (7)
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*गंताक से आगे........*
          गुरुदेव तुलसी ने अपने गीत में कहा-- 
*सत्यवादिता सझै न थास्यूं तो रहणो चुपचाप है।*
*कपटाई कर  झूठ बोलणो जग में मोटो पाप है।।*
*एक बार तो झूठ सांच कर काम सारलै आप रो,*
*मोड़ो  बेगो फूट्यां सरसी घड़ो भरीज्यां पाप रो।*
*आं लखणां स्यूं आखिर आवै पांती पश्चाताप है।।* 
         झूठ बोलना एक बड़ा पाप माना गया है। बच्चों में सत्यवादिता के संस्कार भरे जाने चाहिए। उन्हें यह बात प्रारंभ से ही ह्रदयगंम करवाई जाए कि बात को आगे-पीछे नहीं करना चाहिए, उसे तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। जो बात जैसी है उसे उसी रूप में प्रस्तुत करनी चाहिए। जोड़-तोड़ करना, उसमें नमक-मिर्च लगाकर कुछ कहना, कुछ अंशों में सचाई को चोट पहुंचाने जैसा है। आदमी सरलतापूर्वक बोले, यथार्थ संभाषण का प्रयास करे। यह यथार्थ संभाषण जिसके जीवन की वृत्ति बन जाता है, उस आदमी का जीवन बड़ा पवित्र बन जाता है, धन्य बन जाता है। उसके जीवन में सचाई आ जाती है और वह अनेकानेक पापों से बचने की स्थिति में आ सकता है।
          श्रीमद् भगवद्गीता में कहा गया-- *स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्*  अर्थात् धर्म का थोड़ा-सा अंश भी जीवन में आ जाता है तो आदमी को महान भय से उबारने वाला होता है। *आदमी कोई भी काम धंधा करे, व्यापार करे, फाइलें देखे, डॉक्टरी करे, वकालत करे, अध्यापन करे, कोई भी काम करे, यह चिंतन रहे कि मेरे कार्य में प्रामाणिकता है या नहीं ?* मेरे कार्य में सचाई है या नहीं ? मैं अप्रामाणिकता से स्वयं को कितना बचा सकता हूं ? ऐसा चिंतन करते हुए व्यक्ति अपने आपको सचाई के पथ पर आगे बढ़ाने का प्रयास करे, यह जीवन की बहुत बड़ी सफलता है।  *इति*
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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- २ :  मृषावाद पाप*

*भाग -- १*

प्रश्न हुआ, दुनिया में सारभूत तत्त्व क्या है? किसी ने कहा -- *अस्मिन्नसारे संसारे सारं सारंगलोचना* अर्थात् इस असार संसार में स्त्री यानी भोग सारभूत है। किसी आर्थिक दृष्टि वाले व्यक्ति ने कहा- *अस्पिन्न संसारे, सारं सारस्य प्रापणम्* अर्थात् इस असार संसार में धन का अर्जन करना ही सारभूत है। कोई जुआरी वहां बैठा था, उसने कहा- *अस्मिन्नसारे संसारे, सारं द्युतस्य क्रीड़नम्* अर्थात् इस असार संसार में जुआ खेलना सारभूत है। ईमानदारी के प्रति आस्था रखने वाले किसी व्यक्ति ने कहा -- *अस्मिन्नसारे संसारे, सारं सत्यस्य सेवनम्* अर्थात् सत्य का सेवन करना सारभूत है। आहेत वाङ्मय में कहा गया- *सच्चं लोयम्मि सारभूयं* अर्थात् सत्य लोक में सारभूत है। हमारी दुनिया में झूठ भी चलता है और सचाई भी जीवित है। आदमी यदा-कदा झूठ का सहारा ले लेता है। मेरा मानना अगर समाज में ईमानदारी प्रतिष्ठित रहे, लोग झूठ बोलने से बचते रहें तो समाज की व्यवस्था बहुत अच्छी बन सकती है, समाज की समस्याओं का समाधान हो सकता है।

राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान सन् १९२७ में श्री हरिभाऊ उपाध्याय जी और जमुनालालजी ने अपनी घोषणा के अनुरूप एक हरिजन बालक द्वारा निर्मित भोजन ग्रहण किया। इस घटना को समाचारपत्रों ने लाल सुर्खियों में स्थान दिया। फलतः उनके परिवार पर घोर संकट आ पड़ा और बारह-तेरह वर्षों तक जाति से बहिष्कृत रहना पड़ा। एक दिन उनके मित्र ने कहा-उपाध्यायजी! आप इतना कह दीजिए कि यह समाचार गलत है। जाति के गणमान्य लोग इसे प्रमाण मानकर बहिष्कार उठा लेंगे। सिद्धान्त एवं सत्य को श्वासोच्छ्वास की तरह मानने वाले श्री हरिभाऊ उपाध्यायजी ने बड़ी निडरता के साथ कहा-मनुष्य किसी न किसी बल के सहारे जीवित रहता है। किसी के पास धनबल है तो किसी के पास विद्याबल। किसी के पास सत्ताबल है तो किसी के पास शरीरबल। मेरे पास तो सत्यबल के अतिरिक्त कोई बल नहीं है। उसी के सहारे में जी रहा हूँ। सत्यबल को खोकर में जाति में भले ही आ जाऊंगा. लेकिन अपने जीवन से हाथ धो बैलूंगा। जिसकी सत्य के प्रति इतनी प्रगाढ निष्ठा होती है, उसका जीवन सबके लिए आदर्श बन जाता है।

जैन वाङ्मय में झूठ बोलने के चार कारण बताए गए हैं -- *कोहा वा, लोहा वा, भया वा, हासा वा* -- आदमी क्रोध के कारण झूठ बोल देता है. लोभ के कारण झूठ बोल देता है, भय के कारण झूठ बोल देता है और हंसी मजाक में भी कभी-कभी झूठ बोल देता है। असत्य बोलने के दस भेद भी मिलते हैं-१, क्रोध मिश्रित २. मान मिश्रित ३. माया मिश्रित ४. लोभ मिश्रित ५. राग मिश्रित ६. द्वेष मिश्रित ७. हास्य मिश्रित ८. भय मिश्रित ९. आख्यायिक मिश्रित १०. उपपात मिश्रित । 

जैन साधु के लिए तो मृषावाद सर्वथा त्याज्य है। वह धर्म रक्षा या प्राण रक्षा के लिए भी असत्य नहीं बोल सकता। दसवेआलियं सूत्र में कहा गया --

 *मुसावाओ य लोगम्मि, सव्वसाहूहिं गरहिओ।*
*अविस्सासो य भूयाणं, तम्हा मोसं विवज्जए।।६/१२।।*

 इस समूचे लोक में मृषावाद सब साधुओं द्वारा गर्हित है और वह प्राणियों के लिए अविश्वसनीय है। निर्ग्रन्थ असत्य न बोले।

इसी बात को पुष्ट करते हुए जिनदास चूर्णि में बताया गया है -- बौद्ध भिक्षुओं के पांच शिक्षापदों में 'मृषावाद परिहार ' को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसकी आराधना के बिना शेष शिक्षापदों की आराधना भी संभव नहीं होती। एक श्रावक था। उसने मृषावाद को छोड़कर चार अणुव्रत ग्रहण किए। कुछ समय पश्चात् वह एक-एक कर सभी व्रत तोड़ने लगा। एक बार उसके मित्र ने कहा-तुम व्रतों को क्यों तोड़ते हो? उसने कहा नहीं तो, मैं व्रतों को कहां तोड़ता हूँ। मित्र ने कहा-तुम झूठ बोलते हो। उसने कहा-मैंने झूठ बोलने का त्याग कब किया था? सत्य शिक्षापद के अभाव में उसने सारे व्रत तोड़ डाले।

*क्रमशः .........*

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*

.                  *करें आत्मोत्थान बने वर्धमान* 

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- २ :  मृषावाद पाप*

*भाग -- २*

वे व्यक्ति धन्य हैं, जिन्हें झूठ से घृणा है, जो झूठ का सहारा नहीं लेते। गुस्सा करना पाप है तो झूठ बोलना भी पाप है। कोई आदमी गुस्सा तो नहीं करता, किन्तु बात-बात में दूसरों को ठगता है, जबानरूपी मीठी छूरी दूसरों के है गले पर चलाने का प्रयास करता है तो वह भी बहुत बड़ा पाप । कभी-कभी तो साफ-साफ कहना और कड़ाई से कहना ज्यादा अच्छा है, बजाय इसके कि मीठा बोल कर किसी को ठगने की चेष्टा की जाए। आदमी को अगर जीवन में अध्यात्म की साधना करना है, नैतिकता की आराधना करना है तो वह झूठ बोलने से बचने का प्रयास करे।

सचाई की अपनी शक्ति होती है। संस्कृत साहित्य का प्रसिद्ध सूक्त है -- *सत्यमेव जयते नानृतम्* अर्थात सत्य की विजय होती है, झूठ की नहीं। सत्य परेशान तो हो सकता है, परास्त नहीं होता । सत्य के सामने कठिनाइयां और संघर्ष तो आ सकते हैं, परन्तु जो तत्त्व सत्य से प्राप्त होता है, वह झूठ से प्राप्त नहीं हो सकता।

सत्य की कठोर साधना करना आसान काम नहीं है। कोई मनोबली व्यक्ति, जिसका यह संकल्प हो कि जीवन भले चला जाए, प्राण छूट जाए, पर मैं सचाई को नहीं छोड़ेगा, ऐसा व्यक्ति ही ऐसी साधना कर सकता है। यद्यपि मैं दुनिया में नास्ति तो नहीं मानता। ऐसे महापुरुष भी मिल सकते हैं, जो सचाई के प्रति बहुत गहरी निष्ठा रखने वाले होते हैं। भले पैसा जाए तो जाए. पर वे सत्य को नहीं जाने देते।

एक प्रसंग प्राप्त होता है। गांधीजी उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में वकालत कर रहे थे। एक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी व्यक्ति का खून कर डाला। उसके बाद वह अपनी रक्षा के लिए बैरिस्टर गांधी की शरण में आया। वह जानता था कि सत्यनिष्ठ गांधी उसकी वकालत करेंगे तो वह छूट जाएगा। गांधीजी ने उसके मुकदमे का अध्ययन किया तो उन्हें विश्वास हो गया कि उसने सचमुच खून किया है। उस व्यक्ति ने कहा-वह तो मैंने किया है, इसीलिए तो आपके पास आया हूँ। फीस के रूप में आपको एक हजार पौंड दूंगा। गांधीजी हंसे और बोले- मैं पैसे के लिए वकालत नहीं करता, सत्य के लिए करता हूं। गांधीजी ने वह मुकदमा नहीं लड़ा। उस व्यक्ति ने एक-एक हजार पौंड देकर तीन वकीलों को खड़ा किया। उन वकीलों ने दांवपेच लगाकर उसे छुड़ा भी लिया। खुशी से फूला वह गांधीजी के पास आया और बोला-आप समझते थे कि आपके सिवाय दूसरा कोई मुझे बचा नहीं सकता। देखिए, मैं आपके सामने छूटकर आ गया। गांधीजी ने कहा-क्या तुम जानते हो कि तुम्हें अपने छुटकारे के लिए कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है? उस व्यक्ति ने गर्व से कहा -आप एक हजार पौंड की बात करते हैं। मैं इससे भी अधिक खर्च कर सकता था। गांधीजी बोले-मैं पेसे की बात नहीं करता तुमने सचाई और ईमानदारी का खून किया है। क्या यह तुमने मामूली कीमत चुकाई है?

ईमानदारी और सचाई का जो मूल्य है, उसके सामने पैसा बहुत तुच्छ चीज है। आदमी यह प्रयास करे कि पैसा तो पास में भले कम आए, वह कोई बड़ी बात नहीं, पर ईमानदारीरूपी पैसा मेरे पास रहे। ईमानदारी से कमाए गए दो पैसे का भी बहुत मूल्य है, किन्तु बेईमानी से कमाए गए करोड़ों रुपये का भी कोई विशेष मूल्य नहीं है।

*क्रमशः .........*

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- २ :  मृषावाद पाप*

*भाग -- ३*

परमपूज्य गुरुदेव महाप्रज्ञजी अर्थ के संदर्भ में दो शब्दों का प्रयोग करते थे -- अर्थ और अर्थाभास । *न्यायोपार्जितं अर्थ:* अर्थात् न्याय और ईमानदारी से कमाया जाए, वह तो अर्थ है और बेईमानी से कमाया जाए, वह अर्थाभास है। जनता के पास अर्थाभास नहीं रहना चाहिए। अर्थ तो गृहस्थ को रखना पड़ता है, लेकिन अर्थाभास से आदमी बचने का प्रयास करे। कहा गया है --

*सांच बरोबर तप नहीं, झूठ बरोबर पाप ।* 
*जाके हिरदे सांच है, ता हिरदे प्रभु आप ।।*

सत्य एक प्रकार का बड़ा तप है और झूठ एक पाप है। लेकिन जिसके हृदय में सचाई विराजमान होती है, उसके हृदय में भगवत्ता विराजमान होती है।

साधु के लिए झूठ से बचना फिर भी थोड़ा आसान है, पर गृहस्थ के लिए झूठ से पूर्णतया बचना बहुत मुश्किल काम है। कोई व्यक्ति गृहस्थ जीवन जीते हुए, गार्हस्थ्य में रहते हुए, व्यापार-धंधा करते हुए, राजनीति में रहते हुए तथा और भी अन्य अनेक काम करते हुए सचाई की साधना करता है तो मैं उसे दुनिया का कोई दिव्य पुरुष मानता हूं। आदमी पूर्णतया सत्य की साधना न भी कर सके, पर कुछ अंशों में प्रयास अवश्य करे। वह यह संकल्प करे कि में छोटा-मोटा कष्ट भले सहन कर लूं, पर झूठ बोलने से बचू। कहीं सत्य बोलने में कठिनाई हो तो आदमी मौन कर ले, कुछ भी न बोले । गुरुदेव तुलसी ने अपने गीत में कहा --

*सत्यवादिता सझै न थांस्यूं तो रहणो चुपचाप है।*
*कपटाई कर झूठ बोलणो जग में मोटो पाप है।।*
*एक बार तो झूठ सांच कर काम सारले आप रो,*
*मोड़ो बेगो फूट्यां सरसी घड़ो भरीज्यां पाप रो।*
*आं लखणां स्यू आखिर आवे पांती पश्चात्ताप है।।*

झूठ बोलना एक बड़ा पाप माना गया है। बच्चों में सत्यवादिता के संस्कार भरे जाने चाहिए। उन्हें यह बात प्रारंभ से ही हृदयंगम कराई जाए कि बात को आगे-पीछे नहीं करना चाहिए, उसे तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। जो बात जैसी है, उसे उसी रूप में प्रस्तुत करनी चाहिए। जोड़-तोड़ करना, उसमें नमक-मिर्च लगाकर कहना, कुछ अंशों में सचाई को चोट पहुंचाने जैसा है। आदमी सरलतापूर्वक बोले, यथार्थ संभाषण का प्रयास करे। यह यथार्थ संभाषण जिसके जीवन की वृत्ति बन जाता है, उस आदमी का जीवन बड़ा पवित्र बन जाता है, धन्य बन जाता है। उसके जीवन में सचाई आ जाती है और वह अनेकानेक पापों से बचने की स्थिति में आ सकता है।

 श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया - *स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्* अर्थात् धर्म का थोड़ा-सा अंश भी जीवन में आ जाता है तो वह आदमी को महान भय से उबारने वाला होता है। आदमी कोई भी काम-धंधा करे, व्यापार करे, फाइलें देखे, डॉक्टरी करे, वकालत करे, अध्यापन करे, कोई भी काम करे, यह चिंतन रहे कि मेरे कार्य में प्रामाणिकता है या नहीं ? मेरे कार्य में सचाई है या नहीं ? मैं अप्रामाणिकता से स्वयं को कितना बचा सकता हूं? ऐसा चिंतन करते हुए व्यक्ति अपने आपको सचाई के पथ पर आगे बढ़ाने का प्रयास करे, यह जीवन की बहुत बड़ी सफलता है।

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*








*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 4

*तीसरा  पाप  --  अदत्तादान पाप*

*अदत्तादान पाप*  -- चोरी करने से आत्मा के साथ चिपकने वाला पुद्गल-समूह।

 जैन वाड्मय में  निर्दिष्ट अठारह पापों में तीसरा पाप है -- अदत्तादान। यह शब्द अदत्त और आदान, इन दो शब्दों से मिलकर बना है। अदत्त का मतलब है नहीं दिया हुआ और आदान यानी ग्रहण करना। जो चीज उसके स्वामी द्वारा नहीं दी गई है, उसका आदान या ग्रहण करना अदत्तादान है। इसका सीधा-सा अर्थ है चोरी।

 आर्हत् वाड्मय में कहा गया है --  संयमी  मुनि सजीव या निर्जीव, अल्प या बहुत, दंतशोधन मात्र वस्तु का भी उसके अधिकारी की आज्ञा लिए बिना स्वयं ग्रहण नहीं करे, न दूसरों से ग्रहण कराए और ग्रहण करने वालों का अनुमोदन भी न करे।

 चोरी करने वाला व्यक्ति उस वस्तु के मालिक के मन को आहत कर सकता है और वहां फिर वहा हिंसा भी हो सकती है। आचार्य सोमप्रभ सूरि जी ने कहा -- "हित के आकांक्षी पुरुषों के लिए चोरी अनुपादेय है, अग्रहणीय हैं, अस्वीकार्य है, अनाचरणीय है। यह चोरी दूसरे मनुष्यों के मन को पीड़ा पहुंचाने वाली है। मारने की भावना का भवनरूप है, भूमंडल में व्याप्त विपत्तिरूप बैलों के लिए मेघमंडल के समान है, कुगति में जाने का मार्ग है, स्वर्ग और मोक्ष के द्वारों के आगे अर्गला है।"

 चोरी करना तो एक प्रकार की हिंसा है। व्यक्ति एक जन्म में चोरी करता है तो पता नहीं अगले जन्म में वे कर्म उसको किस रूप में भोगने पड़ जाएं ? कितनी तकलीफ उसके जीवन में आ जाए ? इसलिए थोड़ा कष्ट पाना स्वीकार कर लेना चाहिए, परंतु आदमी को चोरी जैसा काम नहीं करना चाहिए।

 आदमी को अपराध में तरक्की नहीं करनी चाहिए। अपराध तो कम होना चाहिए, रुकना चाहिए।अदत्तादान जैसा पाप आत्मा को मलिन बनाने वाला होता है। इसलिए आदमी उससे बचने का प्रयास करे।

.                  *करें आत्मोत्थान बने वर्धमान* 

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- ३ : अदत्तादान पाप*

*भाग -- १*

जैन वाङ्मय में निर्दिष्ट अठारह पापों में तीसरा पाप है-अदत्तादान। यह शब्द अदत्त और आदान, इन दो शब्दों से मिलकर बना है। अदत्त का मतलब है नहीं दिया हुआ और आदान यानी ग्रहण करना । जो चीज उसके स्वामी द्वारा नहीं दी गई है, उसका आदान या ग्रहण करना अदत्तादान है। इसका सीधा-सा अर्थ है चोरी। एक जैन मुनि तो जीवनभर के लिए तीन करण और तीन योग से अदत्तादान का प्रत्याख्यान करता है, किन्तु कुछ-कुछ साधक या संन्यासी भी ऐसे होते हैं, जिन्हें अदत्त ग्रहण का त्याग होता है।

अम्बड़ नामक एक संन्यासी था। वह बेले-बेले की तपस्या करता और तीसरे दिन पारणा करता। यद्यपि वह संन्यासी था, किन्तु आर्हत् सम्मत श्रमणोपासक के बारह व्रतों का पालन करता था। तप के प्रभाव से उसे वैक्रिय लब्धि, अवधिज्ञान आदि अनेक सिद्धियां प्राप्त थीं। वह वैक्रिय लब्धि द्वारा एक ही समय में अपने सौ रूप बनाकर सौ घरों से भिक्षा प्राप्त करने में समर्थ था। अनेक लोग उससे प्रभावित हुए। सात सौ व्यक्ति उसके पास संन्यास दीक्षा स्वीकार कर उसके शिष्य बन गए। अंबड़ और उसके शिष्य सचित्त- अचित्त तो कुछ भी ले सकते थे, किन्तु अदत्त नहीं लेते थे। एक बार अम्बड़ ने अपने सभी शिष्यों के साथ कपिलपुर नगर से प्रस्थान किया। चलते-चलते वे मार्ग भूल गए। इधर-उधर भटकने लगे। गर्मी का मौसम था। उनके साथ जो पीने का पानी था, वह समाप्त हो गया। सबको भयंकर प्यास लग गई। पास में गंगा नदी बह रही थी। वे सचित्त जल पीकर अपनी प्यास बुझा सकते थे, किन्तु उन्हें पानी देने वाला अथवा अनुमति देने वाला वहां कोई नहीं था। अदत्त वस्तु ग्रहण करने का उनको त्याग था। वे गंगाजल नहीं पी सके। प्यास से अत्यधिक व्याकुल हो रहे थे। जब यह प्रतीत होने लगा कि अब प्राण पखेरू शीघ्र ही उड़ने वाले हैं, तब अम्बड़ सहित सात सौ शिष्यों ने जीवन पर्यन्त अनशन स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने कृत्यों की आलोचना की, प्रायश्चित किया और कुछ समय बाद सभी का स्वर्गवास हो गया। वे सब पांचवें देवलोक में उत्पन्न हुए। कहने का तात्पर्य है कि अदत्त ग्रहण न करने के संकल्प का उन्होंने कितनी दृढ़ता के साथ पालन किया था।

आर्हत् वाङ्मय में कहा गया है --

*चित्तमंतमचित्तं वा अप्पं वा जड़ वा बहुं।*
*दंतसोहणमेत्तं पि ओग्गहंसि अजाइया।।*

संयमी मुनि सजीव या निर्जीव, अल्प या बहुत, दंतशोधन मात्र वस्तु का भी उसके अधिकारी की आज्ञा लिए बिना स्वयं ग्रहण नहीं करे, न दूसरों से ग्रहण कराए और ग्रहण करने वाले का अनुमोदन भी न करे ।

चोरी करने वाला व्यक्ति उस वस्तु के मालिक के मन को आहत कर सकता है और वहां फिर हिंसा भी हो सकती है।

हम लोग प्रतिदिन दो बार प्रतिक्रमण करते हैं। इस दौरान अदत्त से संबंधित निर्धारित शब्दावली के द्वारा हम अपने स्वीकृत आचार को पुष्ट बनाने का प्रयास करते हैं। वह शब्दावली इस प्रकार है  --

▪️प्रामाणिकता की भावना से मेरा चित्त भावित रहे।

▪️आज्ञा, अनुशासन और मर्यादा की भावना से मेरा चित्त भावित रहे। 

▪️अपने संविभाग से अधिक न लूं. इस भावना से मेरा चित्त भावित रहे।

▪️अपने दायित्व के प्रति जागरूक रहूं, इस भावना से मेरा चित्त भावित रहे।

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- ३ : अदत्तादान पाप*

*भाग -- २*

दसवेआलियं सूत्र में तो यहां तक कह दिया गया -- 

*तवतेणे वयतेणे, रूवतेणे य जे नरे।*
*आयारभावतेणे य, कुव्वइ देवकिब्बिसं।।५/२/४६॥*

 जो मनुष्य तप का चोर, वाणी का चोर, रूप का चोर, आचार का चोर और भाव का चोर होता है, वह किल्विषिक देव योग्य कर्म करता है। प्रश्न हुआ, तप आदि का चोर कैसे होता है? समाधान मिला, किसी दुबले पतले शरीर वाले को देखकर किसी ने पूछा-क्या तपस्वी तुम्हीं हो? मान-सम्मान, यश-प्रतिष्ठा को प्राप्त करने के लिए 'हां, मैं ही हूं' अथवा 'क्या मेरे शरीर से पता नहीं चलता' अथवा 'साधु तो तपस्वी ही होता है' इस प्रकार का प्रतिपादन करने वाला तप का चोर होता है। इसी प्रकार प्रवचन, धर्मकथा आदि न करने पर भी अपने आपको धर्मकथी बताने वाला वाणी का चोर होता है। निम्न जाति में उत्पन्न होने पर भी गर्व के साथ स्वयं को उच्चजातीय बताने वाला रूप का चोर होता है। आचार कुशल न होने पर भी स्वयं को विशिष्ट आचारवान् के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास करने वाला आचार का चोर होता है। किसी सूत्र और अर्थ को नहीं जानने वाला आचार्य आदि से वाचना, व्याख्यान आदि से सुनकर उस ज्ञान को ग्रहण कर लेता है और इस प्रकार का भाव प्रदर्शित करता है कि यह तो मैं पहले से ही जानता था, ऐसा साधु भावचोर कहलाता है।

आचार्य सोमप्रभसूरी ने कहा --

*परजनमनः पीडाक्रीड़ावनं वधभावना,*
*भवनमवनिव्यापिव्यापल्लताघनमण्डलम् ।*
*कुगतिगमने मार्गः स्वर्गापवर्गपुरार्गलं,* *नियतमनुपादेयं स्तेयं नृणां हितकांक्षिणाम् ।।*

हित के आकांक्षी पुरुषों के लिए चोरी अनुपादेय है, अग्रहणीय है, अस्वीकार्य है, अनाचरणीय है। यह चोरी दूसरे मनुष्यों के मन को पीड़ा पहुंचाने वाली है। मारने की भावना का भवनरूप है, भूमण्डल में व्याप्त विपत्तिरूप बेलों के लिए मेघमण्डल के समान है, कुगति में जाने का मार्ग है, स्वर्ग और मोक्ष के द्वार के आगे अर्गला है।

कभी कोई व्यक्ति लोभाविष्ट होकर चोरी कर लेता है और कई बार अभाव के कारण भी आदमी चोरी की प्रवृत्ति में चला जाता है। चूंकि आदमी विवश होता है, उसे खाने को पूरा नहीं मिलता है, वह चोरी का रास्ता अपना सकता है। क्योंकि भूख एक बड़ी समस्या है। प्राकृत साहित्य में कहा गया है- *खुहा समा वेयणा णत्थि* अर्थात् भूख के समान वेदना नहीं होती है। राजा का तो फर्ज होता है कि इस बात पर ध्यान दे कि उसकी प्रजा में कोई भूखा न रहे, भूखा न सोए। ऐसे लोग, जिनको कोई रोजगार, धंधा नहीं मिला हुआ है, वे व्यक्ति भी चोरी जैसे कर्म को स्वीकार कर सकते हैं ।

एक उक्ति मैंने सुनी है-'अभाव में स्वभाव बिगड़ता है।' अभाव की स्थिति में आदमी गलत काम में चला जाता है। यद्यपि अभाव में चोरी करना कोई उत्तम काम तो नहीं, पर जो अभावग्रस्त नहीं हैं, वे चोरी में जाएं, यह तो बहुत ज्यादा निदंनीय, गर्हणीय बात हो जाती है। 'पर धन धूलि समान' अर्थात पराई वस्तु को धूल के समान मानना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि रजोगुण से उत्पन्न होने वाली काम और क्रोध दो वृत्तियां हैं, जो आदमी को अपराध की ओर ढकेल देती हैं। इन वृत्तियों पर नियंत्रण हो जाए और अभाव जैसी समस्या न रहे तो आदमी चौर्य कर्म से अपने आपको बचा सकता है। साधु जगह-जगह जाते हैं और लोगों को सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करते हैं। कितनों को उपदेश देते हैं, प्रेरणा देते हैं तब कुछ लोग सन्मार्ग को स्वीकार भी करते हैं।

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*

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*पुस्तक  --   18 पाप*

*लेखक  -- आचार्य श्री महाश्रमण जी*                                 

*अध्याय -- ३ : अदत्तादान पाप*

*भाग -- ३*

बच्चों को ऐसे संस्कार दिए जाएं कि वे चोरी जैसा कोई कृत्य न करें, ईमानदारी के रास्ते पर चलें। आदमी के मन में ऐसा संकल्प जागे कि पराई वस्तु मुझे लेनी ही नहीं है। आज भी कुछ लोग ऐसे मिलेंगे, जिनमें बड़ी ईमानदारी है। वे दूसरों की वस्तु को लेना नहीं चाहते। कहीं कोई वस्तु मिल भी जाए तो वे उसे बता देते हैं, सूचना कर देते हैं। करोड़ों रुपये जहां से लिए जा सकते हैं, वहां से भी न लेना आदमी की पवित्रता का परिचायक होता है। साधु-साध्वियों के उपदेश से भीतर में प्रेरणा जागती है कि मैं ऐसा काम नहीं करूंगा, जिस काम से मेरी आत्मा मलिन बने और वह अधोगति में जाए। चोरी करना तो एक प्रकार की हिंसा है। व्यक्ति एक जन्म में चोरी करता है तो पता नहीं अगले जन्म में वे कर्म उसको किस रूप में भोगने पड़ जाएं ? कितनी तकलीफ उसके जीवन में आ जाए ? इसलिए थोड़ा कष्ट पाना स्वीकार कर लेना चाहिए, परन्तु आदमी को चोरी जैसा काम नहीं करना चाहिए।

चोरी सजीव वस्तु की भी हो सकती है और निर्जीव वस्तु की भी हो सकती है। चोरी छोटी वस्तु की भी हो सकती है और बड़ी वस्तु की भी हो सकती है। चोरी थोड़ी भी हो सकती है और ज्यादा भी हो सकती है। साधु का तो नियम है पूर्ण प्रामाणिकता का पालन करना । साधु को तो किसी के मकान में बैठना भी हो तो पहले मकान वालों की आज्ञा लेनी होती है कि मैं यहां बैठ जाऊ क्या? किसी के घर में प्रवास करना हो तो पहले पूछना होता है कि आपकी आज्ञा हो तो हम इस मकान में रह जाएं यानी पूरी प्रामाणिकता की
 साधना करना साधु का धर्म होता है। 

जहां चोरी जैसे अपराध चलते हैं, वे यदि ऐसे ठीक न हों तो शासक का फर्ज है कि व्यवस्था के द्वारा, कड़ाई के द्वारा, दण्ड संहिता के द्वारा भी चोरी जैसे अपराधों पर नियंत्रण करने का प्रयास करे दुर्जनों के द्वारा सज्जन दुःखित हो जाएं, यह शासक के लिए चिन्तनीय बात होती है। सज्जनों की सुरक्षा करना राजा या शासक का फर्ज है। दुर्जन किसी को दुःख देते रहें, किसी की चोरियां करते रहें, डाका डालते रहें और शासक मौन बैठा रहे, कोई प्रतिकार न करे तो मेरा सोचना है कि उस शासक को गद्दी छोड़ देनी चाहिए। जो प्रतिकार करने की क्षमता न रखें, कुछ कह न सके, कुछ व्यवस्था न दे सके तो अच्छा है कि वह गद्दी से नीचे उतर जाए। गद्दी पर रहे तो अपनी प्रजा की रक्षा करे। वास्तव में राजा जनता की सेवा करने के लिए होता है। जनता अरक्षित या अत्राण नहीं रहनी चाहिए। जनता सुख में है, शांति में है और विकास कर रही है तो वह राजा की सफलता है। जहां चोरी जैसा अपराध चलता है। वहां जनता के लिए अत्राणता की स्थिति बन सकती है तथा दण्ड न हो तो अपराध को रोकना और मुश्किल हो सकता है। उपदेश देने से सारे बदल जाएंगे, इसमें मेरा विश्वास कम है। उपदेश अच्छा है, कुछ प्रतिशत काम हो सकता है, पर सौ प्रतिशत लोग उपदेश को मान लेंगे, यह संभव नहीं है। उपदेश के साथ व्यवस्था तंत्र भी ठीक होना चाहिए।

एक न्यायाधीश के पास अपराधी आया।

न्यायाधीश ने कहा-तुम तो वही हो ना, जब मैं सामान्य वकील था, तब तुमने मुर्गों की चोरी की थी ?

अपराधी हां, साहिब ! मैं वही हूं।

न्यायाधीश-जब मैं हाईकोर्ट में वकील था, तब तुमने बकरी की चोरी की थी ?

अपराधी हां, मैं वही हूं।

न्यायाधीश-अब में जज बन गया तो मेरे पास तुम्हारे खिलाफ यह आरोप आया है कि तुमने भैंस की चोरी की है।

अपराधी यह तो भगवान की कृपा है कि आपने भी तरक्की की है और मैंने भी तरक्की की है। आदमी को अपराध में तरक्की नहीं करनी चाहिए। अपराध तो कम होना चाहिए, रुकना चाहिए। अदत्तादान जैसा पाप आत्मा को मलिन बनाने वाला होता है। इसलिए आदमी उससे बचने का प्रयास करे।

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*लिखने में कुछ गलती हुई हो तो बारंबार खमतखामणा।*






*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 5

*चौथा पाप  --  मैथुन पाप*

*मैथुन पाप*  --  अब्रह्मचर्य सेवन से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

परम पूज्य गुरुदेव तुलसी ने *श्रावक संबोध* नामक काव्य में लिखा है --

*गरीबी गौरव गमाना, अमीरी अभिशाप है।*
*मांग खाना, मान खोना, मानसिक संताप है।।*

 साधु हाथ फैलाए, यह तो गौरव की बात है। पर गृहस्थ हाथ फैलाए, यह स्वाभिमान और गौरव के अनुकूल बात नहीं होती। गृहस्थ जीवन में काम भी चलता है। इसकी संपूर्ति के लिए विवाह का प्रावधान है। भारतीय संस्कृति में विवाह को 'पाणिग्रहण' कहा गया है। पाणिग्रहण यानी एक-दूसरे का हाथ थामना। विवाह के पीछे तीन उद्देश्य होते हैं --
 पहला उद्देश्य --  एक ऐसे जीवनसाथी को प्राप्त करना, जो सुख-दुःख में साथ रह सके।
 दूसरा उद्देश्य -- वंश परंपरा को आगे चलाना।
 तीसरा उद्देश्य -- संयमित रूप में कामेच्छा सम्पूर्ति करना।

साधु पूर्ण संयम की साधना में लीन होते हैं, किंतु गृहस्थ के लिए पूर्ण संयम करना कठिन होता है। गार्हस्थ में काम भी चलता है और उसमें अर्थ की भी अपेक्षा होती है। इन दोनों पर धर्म का अंकुश रहता है तो गृहस्थ जीवन में भी कुछ अंशों में संयम रह सकता है।

 दुनिया में दो चक्र है -- कांता और कांचन यानी स्त्री और पैसा। इनमें तीनों लोक भ्रांत हो रहे हैं, चक्कर काट रहे हैं। इनसे जो विरक्त हो जाता है, वह साधु कहलाता है अथवा यह कहें कि वह परमात्मा का दूसरा रुप होता है। एक साधु के लिए अपेक्षित है कि वह पूर्णतया शील की साधना करे। परंतु जो गृहस्थ है, पूर्ण शील की साधना जिनके लिए संभव न हो, उनके लिए एक व्रत दिया गया -- स्वदार संतोष / स्वपति संतोष व्रत। गृहस्थ को स्वदार में संतोष करना चाहिए। इसके लिए संयम का संकल्प आवश्यक है। अगर संयम का संकल्प नहीं होता है तो बड़ा कठिन है स्वदार संतोष व्रत धारण करना।

संयम न हो तो इंद्रिय-निरोध की साधना में कठिनाई पैदा हो जाती है।

भारतीय संस्कृति में स्वदार संतोष और स्वपति संतोष का एक सुंदर मार्गदर्शन दिया गया है। यह धर्म की दृष्टि से तो अच्छा है ही, सुंदर सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से भी अच्छा है। विवाह करके आदमी जीवन भर के लिए एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए संकल्पित होता है।

जैन वाड्मय में एक सुंदर पथदर्शन दिया गया कि गार्हस्थ्य में स्वदार/ स्वपति संतोष व्रत हो तो वह अध्यात्म की साधना है और समाज व्यवस्था की दृष्टि से भी यह एक अच्छा उपक्रम है।


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 6

*पांचवां पाप  --  परिग्रह पाप*

*परिग्रह  पाप*  --  परिग्रह रखने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *इच्छा उ आगाससमा अणंतिया* अर्थात् इच्छा आकाश के समान अनंत होती है। हमारी दुनिया में सबसे बड़ा कोई पदार्थ है तो वह आकाश है। आकाश से बड़ा कुछ नहीं होता। जो कुछ भी है, वह आकाश में है। जैसे आकाश का कोई ओर-छोर नहीं होता, वैसे ही इच्छाओं का भी अंत नहीं होता है। वे आगे से आगे बढ़ती जाती है, अपार, अनंत, असीम हो जाती है।

 अठारह पापों में पांचवा पाप है -- परिग्रह। *मुच्छा परिग्गहो वुत्तो* अर्थात् मूर्छा परिग्रह हैं। पदार्थों का उपयोग करना एक बात है और उसके पति मूर्छा या आसक्ति का होना अलग बात है। वास्तव में पदार्थों के प्रति जो आसक्ति होती है, वह परिग्रह है। मनुष्य पदार्थों के उपभोग की सीमा करे और उससे भी बड़ी बात यह है कि इच्छा का सीमांकन करे, आसक्ति को निर्मूल करने का प्रयास करे। आसक्ति ही परिग्रह का रूप धारण कर लेती है।

 इच्छा के संदर्भ में तीन शब्दों का प्रयोग होता है -- महेच्छ, अल्पेच्छ, अनिच्छ। महेच्छ वह होता है जिसमें खूब इच्छाएं होती है, ज्यादा आसक्ति होती है। अल्पेच्छ वह होता है, जिसमें इच्छाएं कम होती है। जो पूर्ण रूप से इच्छा रहित हो, वह अनिच्छ होता है।  एक गृहस्थ के लिए अनिच्छ होना बहुत कठिन है, किंतु वह महेच्छ न बने।

परम पूज्य गुरुदेव तुलसी ने विसर्जन का सूत्र दिया था। वह भी एक आसक्ति परिसीमन या आसक्ति अल्पीकरण का प्रयोग माना जा सकता है। आयारो में कहा गया -- *अमरायइ महासड्ढी*  अथार्त् बहुत आसक्ति वाला आदमी सोचता है कि मैं अमर हूं, मुझे मरना नहीं है। मेरी भी एक दिन मृत्यु होगी, पदार्थासक्त आदमी इस बात को भुला देता है और अमर की तरह आचरण करता है। कोई स्वयं को अमर न माने। अमर तो केवल आत्मा है। शरीर नश्वर है और आत्मा अविनश्वर है। इसलिए व्यक्ति पदार्थ में आसक्त न बने और इस नश्वर शरीर से अमर आत्मा के कल्याण का प्रयत्न करे। इसके लिए वह अपनी इच्छाओं का परिसीमन करे और जितना संभव हो सके, परिग्रह के पाप से बचता हुआ अपनी आत्मा को निर्मलता की दिशा में अग्रसर करे।

*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 7

*छठा पाप  --  क्रोध पाप*

*क्रोध पाप*  --  क्रोध करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में कहा गया है *उवसमेण हणे कोहं* अर्थात उपशम के द्वारा क्रोध को जीतो। आदमी में अनेक वृत्तियां होती है। अच्छी वृत्तियां भी होती है और बुरी वृत्तियां भी होती है। उसके भीतर अहिंसा का संस्कार भी होता है और हिंसा का संस्कार भी होता है। सत्संस्कार भी होता है और असत् संस्कार भी होता है। अनादिकाल से राग-द्वेष के संस्कार हैं, इसलिए आदमी कई बार गुस्से में भी आ जाता है, कभी अहंकार में भी आ जाता है, कभी माया में तो कभी लोभ में आ जाता है और पाप का बंध कर लेता है।

 अठारह पापों में छठा पाप है -- क्रोध। आदमी अपने भीतर झांके और देखे तो उसे ज्ञात होगा कि मुझे कितना गुस्सा आता है। पारिवारिक जीवन में गुस्सा आ जाता है और सामाजिक जीवन में भी गुस्सा आ जाता है। गुस्सा करने वाला व्यक्ति दूसरों को भी कष्ट में डाल देता है और स्वयं भी उससे संत्रस्त हो जाता है। कई बार गुस्सा करने वाला स्वयं बड़ा दुखी होता है कि मैंने गुस्सा क्यों किया ? उसे पश्चाताप भी होता है। गलत कार्य के लिए पश्चाताप या अनुपात होना अच्छी बात है। कम से कम उसे अपने द्वारा की गई गलत कार्य की अनुभूति तो हो जाती है।

परम पूज्य गुरुदेव महाप्रज्ञ जी प्रेक्षाध्यान का प्रयोग कराते थे। प्रेक्षाध्यान में गुस्से पर नियंत्रण रखने के लिए ज्योतिकेंद्र प्रेक्षा का प्रयोग निर्दिष्ट किया गया है। प्रयोग के द्वारा आदमी गुस्से पर नियंत्रण करने का प्रयास करे। गुस्सा शांत है तो कितनी शांति रहती है। हम चिंतन करें। चिंतन से भी परिवर्तन ला सकते हैं। जो काम प्रेम से और शांति से हो सकता है, उसके लिए हमें गुस्सा क्यों करना चाहिए ?  गुस्सा नहीं करना भी एक साधना है।

अगर गुस्सा आए तो और कुछ नहीं, इतना-सा मानसिक संकल्प कर लें कि अभी मैं कुछ देर तक नहीं बोलूंगा। संभव है कुछ समय निकल जाने के बाद गुस्से को प्रकट होने का, कार्य रूप में परिणत होने का, व्यवहार में आने का अवसर ही न मिले।

संस्कृत साहित्य में कहा गया है *क्षमा वीरस्य भूषणम्* अर्थात् क्षमा शूरवीर आदमी का भूषण है। किसी को क्षमा करना कमजोरी नहीं, अपितु शक्तिशाली और सक्षम होने का परिचायक है।

 राष्ट्रकवि दिनकर ने अपने काव्य 'कुरुक्षेत्र' में कहा है -- दंतहीन और विषहीन सर्प शान्त रहे और किसी को दंशित न करे तो यह कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन भयंकर विषदंतवाला, जहर से परिपूर्ण नागराज छेड़ने पर भी शांत रहे, अपना विरोध प्रदर्शित न करे तो यह बड़ी बात है। उसकी क्षमा प्रशस्य है। आदमी उपशम के द्वारा क्रोध को शांत करने का प्रयास करे।


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 8

*सातवां पाप  --  मान पाप*

(भाग  -- 1 )

*मान पाप*  --  मान करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

*मान पाप*

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *माणं मद्दवया जिणे* अर्थात् मृदुता से मान को जीतो। आदमी के भीतर अहंकार की वृत्ति होती है। अहंकार की वृत्ति साधना के क्षेत्र में बाधक होती है। न केवल साधना के क्षेत्र में, व्यवहारिक जगत में भी अहंकार शोभायमान नहीं होता। आदमी दूसरों पर अधिकार जमाना चाहता है। किंतु स्वयं किसी के अधीन रहना नहीं चाहता। इस वृत्ति को कैसे समाप्त किया जाए, यह एक प्रश्न है। शास्त्रकार ने उपाय बताएं कि मार्वद के द्वारा मान को जितना चाहिए। अहंकार विनय का नाश करने वाला होता है तो विनय अहंकार का नाश करने वाला होता है।

 सामाजिक दृष्टि से देखें तो जहां अनेकों का सहवास होता है, वहां अहंकार विगलन आवश्यक होता है। यदि परिवार का हर सदस्य अपने आप को बड़ा मानने लगे हो और सम्मान पाने की इच्छा रहे, किंतु सम्मान देने की इच्छा न रहे तो परिवार में शांतिपूर्ण सहवास नहीं हो सकता है। अहंकार के मुख्य दो रूप हैं -- मैं और मेरा। जहां मेरापन या अपनापन जुड़ जाता है, वहां दुःख होता है। शास्त्रों में अहंकार के आठ स्थान माने गए हैं -- जाति, कुल, बल, रूप, तप, श्रुत, लाभ और ऐश्वर्य। किसी को जाति का मद हो सकता है, किसी को अपने रूप का मद हो सकता है तो किसी को ऐश्वर्य आदि का। आदमी इस सच्चाई को जानता है कि यह धन-वैभव आज तक किसी का नहीं बना और न ही किसी के साथ गया, फिर भी इतना मेरापन का भाव जुड़ जाता है कि वह धन के मद में अंधा बना हुआ किसी भी प्रकार का अवांछनीय काम कर सकता है ।


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 9

*सातवां पाप  --  मान पाप*

(भाग  -- 2 )

अहंकार का भाव मन में आते ही उन सब चीजों का क्षरण शुरू हो जाता है, जिनके कारण व्यक्ति विशिष्ट बना होता है। लेकिन यह व्यक्ति के भीतर मौजूद विजातीय तत्त्वों का प्रभाव है कि आदमी अहंकार में चला जाता है। किसी को रूप का भी अहंकार हो सकता है। रूपवान होना एक बात है, किंतु गुणवत्ता न हो तो पूरा रूप किस काम का ? संस्कृत साहित्य में कहा गया है -- *स्वयमायाति सम्पदः।* अगर पात्रता है तो कई बार संपदा स्वयं व्यक्ति के पास आ जाती है। अगर योग्यता नहीं है और संपदा आ गई तो उसके टिकने और उसके सही उपयोग में संदेह रहता है।

 नम्रता एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति को जोड़ना जानता है। जो झुकना जानता है वह विकास को प्राप्त कर सकता है और जो अकड़कर रहता है वह टूट जाता है, उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है। किसी ने ठीक लिखा है  --

*नमन्ति फलिनो वृक्षा:, नमन्ति गूणिनो जना: ।*
*शुक्ककाष्ठानि मूर्खाश्च, न नमन्ति कदाचन।।*

फल युक्त वृक्ष और गुणवान / ज्ञानी व्यक्ति झुक जाते हैं, किंतु सूखा काष्ठ और मूर्ख टूट जाते हैं, कभी झुकते नहीं।

 व्यवहारिक जीवन में भी विनय का प्रयोग जिसके सामने जितना उचित हो, उतना करना ही चाहिए। साधु मिलें और हाथ न जोड़ें तो यह विनय का अतिक्रमण है। अहंकार विकास में बाधा पैदा करने वाला तत्त्व है,  इसलिए इसे जितना जल्दी हो सके, छोड़ देना चाहिए। कहा गया है -- *लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर।* जो व्यक्ति लाघव को स्वीकार करता है, झुकता है, विनम्र होता है, उसको प्रभुता, महानता, स्वामित्व की प्राप्ति होती है और जो स्वयं को बड़ा और श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास करता है, उससे प्रभुता दूर चली जाती है। आदमी लघुता से प्रभुता को पाने का प्रयास करे।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 10

*आठवां पाप  --  माया पाप*

(भाग  -- 1 )

*माया पाप*  --  माया करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में कहा गया है  -- *मायं चज्जवभावेण* अर्थात् ऋजुता से माया को जीतो। मनुष्य यदा-कदा माया का प्रयोग भी कर लेता है। आयारो में कहा गया है -- *माई पमाई पुणरेई गब्भं*  अर्थात् मायावी और प्रमादी आदमी बार-बार गर्भ ( जन्म ) धारण करता है। आत्मा को मलिन बनाने के लिए माया भी जिम्मेवार तत्त्व है। आचार्य सोमप्रभसूरि ने कहा -- *मायाविश्वास-विलासमंदिरम्*  अर्थात् माया अविश्वास के रमण करने का एक स्थान है। जहां छलना है, प्रवंचना है,  वहां विश्वास को टिकने में कठिनाई होती है। दसवेआलियं में कहा गया -- *माया मित्ताणि नासेइ* अर्थात् माया मित्रता का नाश करने वाली होती है। जो मायाशील है, उसके ज्यादा मित्र बनने कठिन होते हैं, क्योंकि पता नहीं वह कब धोखा दे दे। वे पुरुष, वे मनुष्य पवित्र होते हैं, जो सरलता और निश्चलता का जीवन जीते हैं। संस्कृत साहित्य में कहा गया है --

*मनस्येकं वचस्येकं वपुष्येकं महात्मनाम्।*
*मनस्यन्यद् वचस्यन्यत् वपुष्यन्यद् दुरात्मनाम्।।*

जो महात्मा या संत होते हैं, उनके मन में जो होता है, वही वाणी में होता है और वही उनके आचरण में होता है। जो दुरात्मा होता है, उसके मन में कुछ, वाणी में कुछ और कार्यकलाप में कुछ होता है। कथनी-करनी में असामानता रहती है। सरलता के लिए बच्चे को उद्धत किया जाता है। गुरुदेव महाश्रमण जी ने कहा है -- *मेरा ऐसा मानना है कि बच्चे में सरलता होती है तो उसमें नादानी भी होती है। बच्चे जैसी सरलता को स्वीकार करने के लिए, कोई बच्चे जैसे नादानी कर ले, यह तो अच्छी बात नहीं है। बच्चा अज्ञानी होता है। वह न तो सर्प को समझता है, न अग्नि को समझता है। वह कहीं भी हाथ डाल देता है। ऐसी ही नादानी बीस-पचीस  वर्ष का युवक करने लगे तो वह कैसा लगेगा ? बच्चे की सरलता तो अनुमोदनीय  है, पर उसमें अज्ञानता भी होती है। मैं उस सरलता को अधिक महत्व देना चाहूंगा जो ज्ञान के साथ जुड़ी हुई है। धोखा दे सकने में समर्थ व्यक्ति यदि सरलता को नहीं छोड़ता तो वह विशिष्ट बात होती है।*

*क्रमशः....... अगली पोस्ट में*


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 1

*आठवां पाप  --  माया पाप*

(भाग  -- 2 )

धर्म के क्षेत्र में सरलता का बड़ा महत्व है। उत्तराध्यनन सूत्र में कहा गया है कि निर्वाण वह प्राप्त करता है, जिसके हृदय में धर्म होता है। धर्म उसके ह्रदय में होता है, जो शुद्ध होता है और शुद्ध वह होता है, जो ऋजु होता है, सरल होता है।

गार्हस्थ में  भी सरल रहने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो आदमी को कुटिलता से बचना चाहिए। व्यक्ति को अपने जीवन में पारदर्शिता रखनी चाहिए कि जब चाहो, जहां चाहो, जिस तरफ से भी चाहो, देख लो, हमारे पास छुपाने को कुछ भी नहीं है। व्यापार-धंधा करते हुए भी आदमी को चाहिए कि वह सरलता का दामन कभी न छोड़े। बेईमानी से कमाई गई करोड़ों की दौलत की अपेक्षा इमानदारी से कमाए गए कुछ सौ या हजार कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। इमानदारी और सरलता भी एक बड़ी संपत्ति है। हमारी आस्था सच्चाई के प्रति हो। हमें सच्चाई को खोजने का, सच्चाई को आत्मसात् करने का और वैसा ही व्यवहार करने का प्रयास करना चाहिए। माया और झूठ -- इन दोनों का गठजोड़ है। माया और मृषा -- दोनों मिल जाते हैं तो यों  लगता है, जैसे पाप और ज्यादा सघन हो गया हो।

हमें विचार करना चाहिए कि दिन-रात में कभी कुटिलता का मौका आता है क्या ? आत्म चिंतन करें कि आज सवेरे उठने के बाद से लेकर शयन करने तक किसी के साथ कुटिलता तो नहीं की ? अगर कपटाई की है तो सोचें कि उसके बिना मेरा काम नहीं चल सकता क्या ? बिना कपट किए अगर काम चल सकता है तो कपट पूर्ण व्यवहार मैंने क्यों किया ? क्यों नहीं मैंने सरलता का व्यवहार किया ? जहां सरलता है, वहां माया से होने वाला कर्मबंध नहीं होता। इसके विपरीत जहां कपट है, छलना है, झूठ है, वहां आदमी कर्म बंधन कर लेता है। जो आदमी माया, गूढ़ माया, असत्य वचन और कूट तौल- माप करता है, उसके तिर्यंच गति के आयुष्य का बंध हो सकता है। वह पशु की योनि में भी जा सकता है। फिर पता नहीं कितना कष्ट उसे भोगना पड़ सकता है, उसकी गति खराब हो सकती है। हम अभी मनुष्य हैं तो तिर्यंच गति में क्यों जाएं ? देव गति में जाएं तो वह एक बात है, मोक्ष में जाएं तो वह परम बात है। लेकिन मनुष्य होकर नरक गति में जाना पड़े, तिर्यंच गति में जाना पड़े, यह वांछनीय बात नहीं है। शास्त्रकार ने कहा --  ऋजुता का अभ्यास करके हमें माया को जीतने का प्रयास करना चाहिए।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 12

*आठवां पाप  --  लोभ पाप*

*लोभ पाप*  --  लोभ करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *लोहो सव्वविणासणो* अर्थात् लोभ सर्वनाशक है। विनाश करने वाले अनेक तत्त्व है। क्रोध प्रीति का नाश करता है, मान विनय का नाश करता है, माया मित्रों का नाश करती है, किंतु लोभ तो सब कुछ नष्ट करने वाला है। प्रेम, विनय और मित्रता का नाश सभी लोभ के द्वारा हो सकता है।

 प्रश्न हुआ कि पाप का बाप कौन ? उत्तर में कहा गया -- लोभ पाप का बाप है। एक लोभ के कारण आदमी कितने-कितने पाप कर लेता है। इसके लिए वह हिंसा करता है, झूठ बोलता है, चोरी करता है। अनेक पापों का जनक लोभ हैं। हमारे भीतर अनेक दुर्वृत्तियां हैं। उनमें एक हैं लोभ की वृत्ति। जिस आदमी में लोभ प्रबल है, उसमें तनाव ज्यादा हो सकता है। जो लोभमुक्त है, निर्लोभी है, निःस्पृह है, वह व्यक्ति शांत और तनावमुक्त रह सकता है। इच्छा का कोई पार नहीं है।

आदमी को पैसे के प्रति आसक्ति से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए। लोग संस्थाओं को दान देते हैं और कई बार घोषणा यह करते हैं कि मैंने इतने का विसर्जन किया है। इसे विसर्जन नहीं कहना चाहिए। यह अनुदान है, आर्थिक सहयोग है, सामाजिक या लौकिक कार्य है। इसे विसर्जन की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए। विसर्जन तो शुद्ध त्याग होता है। जैसे -- आपने संकल्प कर लिया कि अमुक दिन के बाद इतनी संपत्ति से ज्यादा अपने पास रखने का मुझे त्याग है। इसे इच्छा परिमाण व्रत कहते हैं। इसमें एक सीमा से अधिक संग्रह का त्याग हो जाता है।

 लोभ को जीतने का उपाय है -- जीवन में संतोष का विकास करना। लोभ से संतोष की ओर आगे बढ़ना महत्वपूर्ण बात है। लोग धनार्जन करते हैं। यदि वे उसमें इमानदारी रखते हैं तो इसे मैं उनके लोभ का त्याग ही मानूंगा। जो लोग प्रामाणिकता से व्यवसाय करते हैं, उनमें एक सीमा तक अलोभ या नैतिकता की चेतना का विकास हुआ है, ऐसा माना जा सकता है। आज भी बहुत से लोग ऐसे मिल सकते हैं जो गलत तरीके से अर्थार्जन से बचते हैं। ऐसे व्यापारियों से बाजार मंदार बन जाता है। नैतिकता के द्वारा लोभ की संज्ञा पर चोट पहुंचाई जा सकती है और लोभ को कम भी किया जा सकता है।


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 13

*दसवां पाप  --  राग पाप*

*राग पाप*  --  राग करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *रागो य दोसो वि य कम्मबीयं* अर्थात् कर्म के दो बीज माने गए हैं --  राग और द्वेष। पाप कर्म का जितना भी बंध होता है, उसके जिम्मेदार ये दो ही है। अन्य किसी भी कारण से पाप कर्म का बंध नहीं हो सकता। तात्त्विक भाषा में कहें तो आठ कर्मों में मूल एक मोहनीय कर्म ही ऐसा है, जो पाप कर्म के बंधन के लिए जिम्मेदार है। अन्य किसी भी कर्म के द्वारा पाप कर्म का बंध नहीं हो सकता। अठारह पापों में दसवां पाप है -- राग। राग एक ऐसी वृत्ति है, जिसे छोड़ना ज्यादा कठिन है। द्वेष को छोड़ना कुछ आसान है। द्वेष पर सीधी दृष्टि जाती है, परंतु राग पर नहीं जाती। द्वेष को छोड़ने पर राग रह जाता है। इसलिए वीतराग कहा जाता है, वीतद्वेष नहीं। परिवार के साथ राग हो जाता है, मित्रों के प्रति मोह या राग हो जाता है। एक वस्तु के गुम हो जाने पर आदमी के मन में अगर पीड़ा हो रही है तो मानना चाहिए कि उसके मन में पदार्थ के प्रति मोह है।

*आयारो में कहा गया* --   मेरी माता, मेरा पिता, मेरा भाई, मेरी बहन, मेरी पत्नी, मेरा पुत्र, मेरी पुत्री, मेरी वधू, मेरा मित्र, मेरा स्वजन, मेरे स्वजन का स्वजन, मेरा सहवासी, मेरे प्रचुर उपकरण, परिवर्तन ( आदान-प्रदान की सामग्री) भोजन, वस्त्र -- इनमें आसक्त पुरूष प्रमत्त होकर उनके साथ वास करता है।

 व्यक्ति की यह भावना होनी चाहिए कि जब अपने कर्मों के अनुसार फल भोगना है तो परिवार में रहते हुए भी जितना संभव हो सके, निर्लिप्त और अनासक्त रहने का प्रयास करूं। पदार्थों के प्रति हमारे मन में ज्यादा मोह न हो। उनका उपयोग करना होता है, उन्हें काम में लेना होता है, किंतु उनमें अनासक्त रहना चाहिए। यह अमोह की साधना है, राग से मुक्त होने की साधना है।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 14

*ग्यारहवां पाप  --  द्वेष पाप*

*भाग  -- 1*

*द्वेष पाप*  --  द्वेष करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में दो बंधन बताए गए हैं -- *पडिक्कमामि दोहिं बंधणेहिं-- रागबंधणेणं दोसबंधणेणं।*  राग भी एक बंधन है और द्वेष भी एक बंधन है। अध्यात्म की साधना में राग-द्वेष का त्याग करना आवश्यक होता है। आत्मा का साक्षात्कार करने के लिए कौन आदमी कितना राग-द्वेष से मुक्त हुआ है, बस यही कसौटी है। आत्मा की शुद्ध अवस्था का नाम ही परमात्मा है। जैनदर्शन में कहा गया है कि आत्मा साधना के द्वारा परमात्मा पद को प्राप्त हो सकती है। जिस प्रकार सोना प्रारंभिक अवस्था में मिट्टी से मिला-जुला रहता है  किंतु जब उससे मिट्टी अलग कर दी जाती है, तब स्वर्ण में निखार आ जाता है। इसी प्रकार आत्मा कर्मों की मिट्टी से आवृत या ढकी हुई है। उन कर्मों को तपस्या, साधना के द्वारा दूर कर दिया जाता है, तब आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट हो जाता है।

 राग-द्वेष की तरंगों से जिसका मन तरंगित नहीं होता है, वह व्यक्ति आत्मा का साक्षात्कार कर सकता है। अन्य किसी को साक्षात्कार का योग प्राप्त नहीं हो सकता। एक तालाब में पानी भरा हुआ है। कोई उस तालाब के भीतरी भाग को देखना चाहे तो उसके लिए दो शर्तें है। पहली शर्त तो यह है कि तालाब का पानी स्वच्छ होना चाहिए और दूसरी शर्त है कि तालाब का पानी स्थिर होना चाहिए। तालाब का पानी गंदा है और उसमें तरंगे उठ गई है तो तालाब के तल को नहीं देखा जा सकता है। इसी प्रकार जब राग-द्वेष की तरंगे शांत हो जाएगी और भाव शुद्ध हो जाएंगे, तब आदमी आत्मसाक्षात्कार कर सकेगा।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 16

*बारहवां पाप  -- कलह पाप*

*भाग  -- 1*

*कलह पाप*  --  कलह करने से आत्मा के साथ चिपकनेवाला पुद्गल-समूह ।

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *कलह विवज्जणा* अर्थात् ऋषियों के लिए, साधुओं के लिए अपेक्षित है कि वह कलह का वर्जन करे। अकेला आदमी होता है, वहां कलह की संभावना नहीं होती। अनेक व्यक्ति जहां साथ में रहते हैं, वहां कलह पैदा हो सकता है। जहां दो है वहां संघर्ष होता हो सकता है। चूड़ियां अनेक थी तो आवाज आ रही थी, संघर्ष हो रहा था। एक ही रह गई तो कोई आवाज नहीं आई। मनुष्य भी अनेक साथ में रहते हैं तो आवाज आ जाती है। सात्त्विक प्रेम की आवाज आए तो दिक्कत नहीं, अपेक्षित आवाज आए तो दिक्कत नहीं, पर कलह की आवाज आने लग जाती है तो कुछ कठिनाई की स्थिति पैदा हो जाती है।

 उपशांत कलह की उदीरणा करना, पुरानी बातों को उठाना, पुरानी बातों को याद करके फिर कलह पैदा कर देना अवांछनीय माना गया है । उपशांत कलंक की उदीरणा नहीं होनी चाहिए। झगड़ा होता है तो उसके पीछे कारण भी होता है।  अहंकार टकराता है, तो आवेग आ जाता है, या सामने वाला मेरा अहित कर रहा है, ऐसा आभास होता है तो परस्पर कलह भी पैदा हो सकता है।

जहां स्वार्थ प्रभावी होता है, वहां कलह को पैदा होने का मौका मिलता है। स्वार्थ की चेतना कलह उत्पत्ति का स्थान है। परार्थ की कामना हो, परहित की भावना हो तो कलह को पनपने से बचाया भी जा सकता है। भाई-भाई में तनाव हो जाता है, पति-पत्नी में तनाव हो जाता है  शादी होते ही नवदंपति को प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि जो नए दंपती बने हैं, वे अपना दांपत्य जीवन सामंजस्यपूर्ण रख सकें। दांपत्य जीवन में अशांति हैं। कलह है तो वह दुःखपूर्ण हो जाता है। अगर कोई दंपति साठ-सत्तर वर्ष तक साथ में रहते हैं और प्रायः शांति में जीते हैं, झगड़ा-कलह नहीं होता है तो मैं उसे दांपत्य जीवन की साधना मानता हूं। अनेक युगल ऐसे मिल सकेंगे जो काफी शांति से जीने वाले हैं। अगर स्वार्थ हावी न हो और सहिष्णुता हो तो कलह से काफी बचा जा सकता है। परिवार मैं सौहार्द और शांति का माहौल रहे  संयुक्त परिवार हो, चार-पांच भाई साथ में रहें, यह कुछ कठिन भी हो सकता है  परंतु उनमें परस्पर वैमनस्य नहीं होना चाहिए। अलग-अलग रहते हुए भी भावात्मक एकता के तार से जुड़े रहे तो वह एक तरह का संयुक्त परिवार का ही छोटा सा रूप बन जाता है।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 17

*बारहवां पाप  -- कलह पाप*

*भाग  -- 2*

आत्मा की दृष्टि से देखें तो कषाय का प्रयोग आत्मा के कर्मों का बंध कराने वाला है और सामाजिक दृष्टि से देखें तो परस्पर के संबंधों को तोड़ने वाला, जीवन में अशांति पैदा करने वाला है। वे परिवार अच्छे और महत्वपूर्ण होते हैं, जिन परिवारों में कलह जैसी स्थिति नहीं होती, परिवार के सभी सदस्य शांति से रहते हैं और अपने से बड़ों को सम्मान देते हैं। यह परिवार के लिए सुंदर बात है। किसी-किसी परिवार में ऐसा देखने सुनने को मिल सकता है कि परिवार के मुखिया ने या मां ने जो कह दिया, वह सबको मान्य होता है। कुछ परिवारों में ऐसी मर्यादा देखने को मिल सकती है, जहां एक को महत्व दिया जाता है यानी परिवार के सभी सदस्य उसकी बात को महत्व देते हैं। व्यक्ति की बात को महत्व तभी मिलेगा, जब वह सबके भले के लिए निःस्वार्थ भाव से चिंतन करेगा। वह परिवार के किसी एक-दो सदस्य का पक्ष लेना शुरू करेगा तो अन्य सदस्यों में उसके प्रति सम्मान की भावना का होना कठिन होगा  पारिवारिक संबंध कलहविहीन हों, शांतिपूर्ण हों, ऐसा प्रयास होना चाहिए।

साधु संस्था में एक-दूसरे का सहयोग किया जाता है। गृहस्थों में भी एक दूसरे के सहयोग से ही काम चलता है। एक परिवार में कोई कमाता है, कोई बाहर की जरूरी चीज खरीद कर लाता है, कोई रसोई बनाता है। इससे परिवार का काम सुचारू रूप से चलता है। अगर कार्य विभाजन न हो, सब एक दूसरे के काम में हस्तक्षेप करें, अपनी-अपनी चलाएं, मनमानी करें तो परिवार का चलना कठिन हो जाए। यह सेवा, सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना साधु-संस्था और गृहस्थ समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। सेवा और सहयोग की भावना एक दूसरे को निकट लाने वाली होती है, परस्पर के संबंधों को मजबूत करने वाली होती है। अगर सेवा से जी चुराया जाता है तो संबंधों में दुराव पैदा हो सकता है। कलह को उत्पन्न होने से रोकने के लिए स्वार्थ से दूर रहना, सेवा सहयोग का भाव रखना अपेक्षित है। कलह के कारणों को निर्धारित करें तो कलहमुक्ति की बात निष्पन्न हो सकेगी।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 17

*तेरहवां पाप  -- अभ्याख्यान पाप*


आर्हत वाड्मय में *अब्भक्खाण* शब्द आता है। अठारह पापों में तेरहवां पाप है -- अभ्याख्यान पाप। आचार्य हेमचंद्र ने इसका अर्थ किया है -- *मिथ्याभियोगोऽभ्याख्यानं* अर्थात् झूठा अभियोग लगाना, झूठा आरोप लगाना अभ्याख्यान होता है। वास्तव में गलती हो, दोष हो तो भी बात को फैलाना नहीं चाहिए, किसी को बदनाम करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। गलती है ही नहीं और ऐसे ही किसी निर्दोष आदमी को दोषोरोपित कर देना और झूठा दोष फैला देना बड़ा पाप होता है। दुर्जन आदमी ही ऐसा काम कर सकता है। सज्जन आदमी तो दोष का पता चल जाए तो भी उसे फैलाने का या उस आदमी को बदनाम करने का प्रयास नहीं करता।

 आदमी से ऐसी गलतियां हो सकती हैं। सामान्य मनुष्य में कितने मिलेंगे जो कभी गलती नहीं करते। कौन आदमी दावे के साथ कह सकता है कि मैं कभी गलती करता ही नहीं। परंतु आदमी का यह लक्ष्य  बनें कि गलती हो जाए तो उसका पुनरावर्तन न करूं। जो मैंने पूर्व हमें अपनी दुर्बलता से, प्रमाद से कर लिया वह आचरण दोबारा नहीं करूंगा।

आदमी को इस तरह से अभ्याख्यान पाप से बचना चाहिए। आदमी को जिंदगी में किसी पर भी झूठा आरोप नहीं लगाना चाहिए। बात की तहकीकात करे कि क्या बात है। बिना जानकारी किए, बिना छानबीन किए, जल्दीबाजी में और दुर्भावना से किसी पर झूठा आरोप नहीं लगाना चाहिए। वह एक बड़ा पाप का काम होता है। अठारह पापों में सारे पापों से पूर्णतया बचना गृहस्थ के लिए कठिन हो सकता है। किंतु अभ्याख्यान जैसे पाप से तो आराम से बचा जा सकता है। किसी पर झूठा आरोप लगाने से कर्मों का बंध हो जाता है। बाद में किसी जन्म में वे कर्म भोगने पड़ते हैं। कभी स्वयं को भी बिना गलती के बदनाम होना पड़ सकता है। इसलिए साधु को तो विशेष सावधान रहना ही चाहिए, परंतु गृहस्थ को भी सावधान रहना चाहिए और इस अभ्याख्यान पाप से बचना चाहिए।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 18

*चौदहवां पाप  -- पैशुन्य पाप*

आर्हत वाड्मय में पैशुन्य को पाप बताया गया है। जिसका अर्थ चुगली खाना, परोक्ष में दूसरों की बुराई करना, निंदा करना है। संस्कृत कोश में आचार्य हेमचंद्र ने बताया है -- *पृष्ठमांसादनं तद्यत् परोक्षे  दोषकीर्तनम्* अर्थात् इसका तात्पर्य है पीठ पीछे किसी की निंदा करना,  बुराई करना, चुगली खाना। इस दुर्वृत्ति से हमें बचना चाहिए। कोई बात हो तो उस आदमी को ही बता दें कि तुम्हारी यह गलती हमारे ध्यान में आई है। यदि गलती है तो तुम उस पर ध्यान देना, उसे ठीक कर लेना। यदि तुम्हारी गलती नहीं है, हमारी गलतफहमी है तो हम अपनी धारणा को ठीक कर लें। सामने नहीं कहना, मूल व्यक्ति को नहीं बताना और परोक्ष में निंदा करते रहना, किसी को आपस में भिड़ा देना, किसी के बारे में गलत धारणा बना लेना, यह पापकर्म है। निंदा करना तो बड़ा आसान काम है। लेकिन यह आसान काम इतने पाप कर्मों का बंध करा देता है कि उदय में आने पर उस व्यक्ति के लिए बड़ी कठिनाई हो जाती है।

जो दूसरों का अहित करता है, मानो अपने अहित की पृष्ठभूमि तैयार करता है। बुराई का दुष्परिणाम भोगना पड़ता है। दूसरों का अहित करने की भावना स्वयं अपना बहुत बड़ा नुकसान करा देती है। कर्मों का फल भोगने में देर तो हो सकती है, किंतु कर्म के साम्राज्य में अंधेर नहीं है। कर्मों का फल भोगे बिना छुटकारा नहीं मिलता।

 व्यक्ति आत्मावलोकन करे कि अठारह पापों में से कौन सा पाप मैंने ज्यादा मात्रा में किया है और उसे कम कैसे किया जाए ? पाप जिसने कम होंगे, हमारी आत्मा उतनी ही निर्मल बनेगी। आदमी पवित्र कार्य न कर सके तो कम से कम पापों से तो बचे।

 आदमी हंसते-हंसते पाप तो कर लेता है, किंतु जब उसका विपाक होता है तो आंसू बहाने पर भी उससे छुटकारा नहीं मिलता है। बाद में रोना-पछताना पड़े, इसकी अपेक्षा यह कहीं ज्यादा ठीक है कि वैसे काम से बचा जाए। इसके लिए संयम का अभ्यास आवश्यक है।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 19

*पन्द्रहवां पाप  -- परपरिवाद पाप*

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *समो निंदापसंसासु* अर्थात् निंदा और प्रशंसा में सम रहना। साधक को समता की साधना करनी चाहिए। कोई निंदा करे तो भी सम रहे और प्रशंसा करे तो भी सम रहे। द्वेषयुक्त परनिंदा से बचना चाहिए। बातें करनी है तो अच्छी और सार्थक बात करें, ज्ञान की बात करें, तात्विक चर्चा करें। इधर-उधर की फालतू बातें करने से समय का अपव्यय तो होता ही है, कर्मों का बंध भी होता है।

 *अठारह पापों में पन्द्रहवां पाप है -- परपरिवाद अर्थात् दूसरों की निंदा करना।* जो दोष दूसरों में है ही नहीं, उसका मिथ्या आरोपण करना। सच्ची बात को सच्ची कहना निंदा नहीं है। किंतु सच्ची बात को भी अवसर देखकर ही कहना चाहिए। बिना अवसर सच्ची बात ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि उस समय मौन रह जाना चाहिए।

 दूसरों का दोष देखने से पहले स्वयं को भी आत्मावलोकन करना चाहिए। स्वयं के दोषों और कमजोरियों पर भी दृष्टिपात करना चाहिए। हम अपनी तर्जनी अंगुली किसी की ओर उठाते हैं तो उसके साथ की तीन अंगुलियां हमारी और हो जाती हैं कि पहले अपने को देखो। किसी को बदनाम करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उस समय मन में यह विचार आना चाहिए कि परनिंदा से मुझे मिलेगा क्या ? कोई तथ्य बताना हो तो एक अलग बात है। किंतु बदनाम करने की भावना से, स्वयं को तुष्ट करने के लिए किसी के बारे में परिवाद करना तुच्छता है।

दूसरों की निंदा करने वाला व्यक्ति सोचें कि मैं कभी स्वयं की भी निंदा करता हूं क्या ? मुझमें भी तो अनेक कमजोरियां हैं। गलतियां और भूलें मुझसे भी तो होती है। अगर वे मुझे दिखाई नहीं देती तो दूसरों का छिद्रान्वेषण मैं क्यों करूं ? अपनी भूलों और कमियों का तो पता भी चल जाता है, वे दिखाई भी दे जाती है, किंतु दूसरों में कमियां है या नहीं, यह पता न हो तो उन्हें दूसरों के सामने प्रकट करने का मुझे क्या अधिकार है ?  व्यक्ति को यह सोचना चाहिए कि भाग्य से मुझे मनुष्य जीवन और भाषा में व्यक्त कर सकने में समर्थ वाणी मिली है तो इसका दुरुपयोग क्यों करूं ? वाणी का उपयोग पाप कर्मों का बंध कराने वाले कार्यों में क्यों करूं ?

 हमारे द्वारा कोई ऐसा शब्द न निकल जाए, जिसके लिए बाद में पछताना पड़े। जरूरत हो तभी बोलें और सोच समझकर विवेकपूर्ण बोलें, इसी में वाणी की सार्थकता है और इसी में अपना कल्याण भी निहित है।


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 20

*सोलहवां पाप  -- रति-अरति पाप*

*भाग  -- 1*

अठारह पापों में सोलहवां पाप है -- रति-अरति। इसमें दो शब्द हैं -- रति और अरति। रति का तात्पर्य है -- रमण करना, अनुरक्त हो जाना, रुचि रखना और अरति का अर्थ है  -- अनुराग न रखना, रूचि न रखना, अरुचि रखना। असंयम में रति का होना और संयम में अरुचि या विकर्षण का होना रति-अरति पाप है। होना तो यह चाहिए कि संयम के प्रति आकर्षण हो और असंयम के प्रति अनाकर्षण हो। जितना-जितना आदमी के जीवन में संयम बढ़ता है, त्याग बढ़ता है, उससे धर्म की पुष्टि होती है और जितना जीवन में असंयम बढ़ता है, उससे अधर्म की वृद्धि होती है। गलत कार्यों का त्याग करना धर्म है। भोग में लिप्त होना अधर्म है, पाप है।

परम पूज्य गुरुदेव तुलसी ने संयम का संदेश दिया था। उन्होंने कहा -- पूरा संयम ग्रहण नहीं कर सको तो अणुव्रतों को स्वीकार करो, कुछ अंशों में भी संयम को स्वीकार करो। जैन हो या अजैन, आस्तिक हो या नास्तिक, संयम का प्रयोग सभी के लिए कल्याणकारी है। अणुव्रत स्वीकार करने के लिए कौन सी जाति और कौन सा धर्म, यह विवेचन अपेक्षित नहीं है। मैं तो यहां तक कहता हूं कि कोई नास्तिक आदमी भी अणुव्रतों को स्वीकार करना चाहे तो मैं उसके लिए भी अनुमोदना करना चाहूंगा। नास्तिक अणुव्रती बनेगा तो उसका भी कल्याण होगा। नास्तिक आदमी परलोक में विश्वास नहीं करता, किंतु वर्तमान लोक तो सामने हैं। वह अणुव्रतों को स्वीकार करेगा तो यहां तो अच्छा जीवन जी पाएगा। इस जीवन में हम दूसरों के लिए कष्ट देनेवाले, समस्या पैदा करने वाले तो न बनें। अच्छा जीवन जी सके, इसलिए नास्तिक आदमी के लिए भी संयम की स्वीकृति सुखद है, आनंदप्रद है, शांतिप्रद है, कल्याणकारी है।


*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 21

*सोलहवां पाप  -- रति-अरति पाप*

*भाग -- 2*

जैन वाड्मय में श्रावक के बारह व्रतों का उल्लेख है। श्रावक बारह व्रतों को स्वीकार करे तो कुछ अंशों में संयम जीवन में आ जाएगा। कोई अजैन व्यक्ति भी अणुव्रतों को स्वीकार करे तो जीवन में संयम आ जाएगा। जीवन में यदि संयम का थोड़ा अंश भी आता है, तो वह भी कल्याणकारी होता है। गृहस्थ यह सोचे -- मैं हिंसा से कितना बच सकता हूं ? जो अनावश्यक हिंसा है, जिसके बिना अच्छी तरह काम चल सकता है, उस हिंसा से बचने का प्रयास करूं। जमीकंद खाए बिना भी काम चल सकता है तो जमीकंद को छोड़ने का नियम स्वीकार करूं। रात में बिना खाए मेरा काम चल सकता है तो रात्रि भोजन का त्याग करूं। वह भी संयम की साधना होगी।

 कषाय  मन्दीकरण का अभ्यास करना चाहिए। व्यक्ति को यह संकल्प करना चाहिए कि मैं किसी को कटु जबान न कहूं, मैं किसी का अपमान न करूं,  अवहेलना न करूं। यह भी संयम का प्रयोग है।


आदमी में त्याग और अपरिग्रह की चेतना जागृत रहनी चाहिए। सांसारिक दृष्टि से दूसरों के हित में दान किया जाता है, वह सांसारिक या लौकिक अनुकंपा की बात हो जाती है। व्यक्ति की अपरिग्रह के प्रति रति हो और परिग्रह के प्रति अरति की भावना हो तो धर्म की साधना हो जाती है।

 हम स्वयं के प्रति आकर्षण बढ़ाने का प्रयास करें, भोग से त्याग की और आगे बढ़ें, राग से विराग की ओर बढ़ें, मनोरंजन से आत्मरंजन की ओर बढ़ें, अज्ञान से ज्ञान की ओर आगे बढ़ें। हमारी अभिमुखता कल्याण की ओर हो जाए। जो अच्छाइयां हैं, विशेषताएं हैं, हम उन्हें आत्मसात् करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में संयम बढ़ेगा तो वह मात्र इस जीवन के लिए ही नहीं, आगे के लिए भी कल्याणकारी है, आत्मा के लिए कल्याणकारी है। हम पापों को छोड़ने का या पापों को कम करने का प्रयास करें और धर्म को समृद्ध करने का, पुष्ट करने का अभ्यास करें।



*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 22

*सतरहवां पाप  -- मायामृषा  पाप*

*भाग -- 1*

आर्हत वाड्मय में कहा गया है *अणुमायं पि मेहावी, मायामोसं विवज्जए* अर्थात् मेधावी पुरुष अणुमात्र यानी थोड़ी-सी भी माया और मृषा का प्रयोग न करे। अठारह पापों में सतरहवां  है मायामृषा पाप। इसमें दो पापों का मिश्रण हुआ है माया और मृषा। वैसे तो दोनों पाप अलग-अलग रूप में अठारह पापों में उल्लेखित हो चुके हैं। मृषावाद पाप भी आ चुका है और माया पाप भी आ चुका है, किंतु सतरहवें पाप में दो पापों का मिश्रण बताया गया है, माया युक्त मृषा बोलना। केवल झूठ ही नहीं, साथ में माया का भी प्रयोग करना। संभवतः बुद्धिमान आदमी ज्यादा मायामृषा का प्रयोग कर सकता है। कम पढ़ा लिखा आदमी उतना न भी कर सके, किंतु बुद्धिमान आदमी अच्छी तरीके से, चातुर्य से, होशियारी के साथ मायामृषा कर सकता है। सामने वाले व्यक्ति को ठग भी सकता है। सच्चाई-सरलता का मार्ग सीधा-सपाट मार्ग है। मायामृषा का मार्ग उबड़-खाबड़, टेढ़ा-मेढ़ा, कंटकाकीर्ण होता है। फिर भी लोग उस पर चल लेते हैं। वे दीर्घकालिक लाभ की या तो उपेक्षा करते हैं या पहचानते नहीं है और तात्कालिक लाभ के लिए शोर्टकट रास्ता ले लेते हैं।

मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि झूठ-कपट का मार्ग जहां पहुंचाएगा, वह मंजिल दुःखद होगी और सच्चाई-सफलता का मार्ग जहां पहुंचाएगा, वह मंजिल सुखद होगी। सच्चाई के पथ में संकट आ सकते हैं। विकट संकट पैदा हो सकते हैं। उन कठिनाइयों में अगर आदमी मनोबल रख सके तो आगे मंजिल बड़ी सुखद होगी। वह शाश्वत सुख देने वाली हो सकेगी। झूठ बोलने वाले को कितनी बात याद रखनी पड़ती है कि मैंने यह कहा था वापस मुझे यही कहना है आदि-आदि। सत्य बोलने वाला निश्चित रहता है कि बस यही बात है भले रात को पूछो, भले दिन में। झूठ बोलने वाले के दिमाग में कितना तनाव रहता है। फिर भी आदमी झूठ का रास्ता ले लेता है। साधना के क्षेत्र में कपट त्याज्य है, सच्चाई-सरलता उपास्य है। व्यवहार के जगत में भी झूठ-कपट आखिर व्यवहारिक समस्या पैदा करने वाला तत्त्व है और सच्चाई-सरलता खुब निश्चिन्तता, तनाव मुक्तता प्रदान करने वाला तत्त्व होता है। छल-कपट करने वाले व्यक्ति की अगली गति खराब हो सकती है।

*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 23

*सतरहवां पाप  -- मायामृषा  पाप*

*भाग -- 2*

मायावी आदमी ठगने का प्रयास करता है, परंतु यह ठगी आत्मा को मलीन बनाने वाली होती है। जो गृहस्थ हैं, वे भले नौकरी करते हों, व्यापार करते हों, कोई भी धंधा करते हों। धंधे के सिवाय भी व्यवहार चलता है। उनका यह प्रयास यह होना चाहिए कि कपट का प्रयोग न हो, माया और मृषा का प्रयोग न हो। लक्ष्य बड़ी चीज है। जिस चीज का लक्ष्य बन जाता है और फिर पुरुषार्थ होता है तो आदमी उस दिशा में आगे बढ़ सकता है। व्यक्ति लक्ष्य बनाए कि मुझे मायामृषा पाप से बचना है। माया और मृषा दोनों पापों को बताने के बाद पुनः दोनों पापों के साहचर्य की ओर संकेत किया गया है, इसमें एक यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि झूठ पाप है, किंतु माया युक्त झूठ बोलना और ज्यादा बड़ा या सघन पाप होता है। अध्यात्म की साधना में माया का स्थान नहीं है। माया युक्त मृषा को भी स्थान नहीं है। झूठ बोलकर एक बार अपना काम निकाल लेना, कोई ज्यादा फायदे वाली बात नहीं होती।

जैन वाड्मय में कहा गया --

*अणायारं परक्कम्म, नेव गूहे न निण्हवे।*
*सुई सया वियडभावे, असंसत्ते जिइंदिए ।।*

 कभी कोई अनाचार का सेवन हो जाए तो उसे छुपाओ मत, अपलाप मत करो। पवित्र हृदय से निष्कपट भाव से स्पष्टतया उसे स्वीकार कर लो। स्वीकार कर लेना भी एक प्रकार से किए हुए दोष पर चोट पहुंचाना है कि मुझसे यह भूल हो गई है। व्यक्ति को अपनी भूल को यथास्थान स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए। भूल को स्वीकार करना बड़ी बात है। जिंदगी में भूलें तो हो सकती है। कभी जानते हुए भी हो सकती हैं और कभी अनजान में भी हो सकती हैं। शास्त्रकार ने कहा -- *बीयं तं न समायरे* अर्थात् एक बार जो भूल हो गई है, दुबारा उस भूल की आवृत्ति मत करो, पुनरावृति मत करो। भूल का परिष्कार करने से जीवन में विकास होता है। ऋजुता एक ऐसा सद् गुण है, जो आत्मा को निर्मल बनाने वाला है  व्यक्ति इस मायामृषा के पाप से बचने का प्रयत्न करे, सरलता का अभ्यास करे तो वह आत्म-कल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

*अठारह पाप*

श्रृंखला  -- 24

*अठारहवां पाप  -- मिथ्यादर्शनशल्य  पाप*

आर्हत वाड्मय में कहा गया है -- *मिच्छत्तं परियाणामि, सम्मत्तं उवसंपज्जामि* अर्थात् मैं मिथ्यात्व का परित्याग करता हूं और सम्यक्त्व को स्वीकार करता हूं। अठारह पापों में अंतिम पाप है मिथ्यादर्शनशल्य पाप। अनेक लोगों का दृष्टिकोण मिथ्या हो सकता है। समग्र जीव जगत की दृष्टि से विचार किया जाए तो अनंत जीव ऐसे हैं, जो मिथ्यात्व से युक्त हैं। संस्कृत साहित्य में कहा गया -- *अतत्त्वे तत्त्वश्रद्धा मिथ्यात्वम्* अर्थात् जो तत्त्व नहीं है, उसे तत्त्व मान लेना मिथ्यात्व है। जैन धर्म में मिथ्यादृष्टि को त्याज्य माना गया है और सम्यक्त्वी बनने की कामना की गई है। यहां देव, गुरु, धर्म की त्रिपदी है। देव कौन,  गुरु कौन और धर्म कौनसा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया -- जो देव नहीं है, धर्म के क्षेत्र में उसे देव मान लेना। जो सुगुरू नहीं है, उसे गुरु मान लेना और जो धर्म नहीं है, उसको धर्म मान लेना मिथ्यात्व है।

जिज्ञासा हो सकती है कि किसमें सम्यक्त्व है, इसका हम निश्चय कैसे करें ? यद्यपि निश्चय को जानना तो हमारे लिए कठिन है, परंतु शास्त्रों में सम्यक्त्व के पांच लक्षण बताए गए हैं। उन लक्षणों से हम अनुमान लगा सकते हैं कि सम्यक्त्व है या नहीं। वे लक्षण ये हैं --

*  जिसके क्रोध आदि कषाय शांत होते हैं।
* जिसमें मोक्ष-प्राप्ति की अभिलाषा रहती है।
* जिसमें संसार से विरति होती है।
* जिसमें प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव होता है।
* जिसका आत्मा, कर्म आदि में विश्वास होता है।

 सम्यक्त्वी है तो मानना चाहिए की नींव मजबूत है। अंक एक के आगे शून्य लगेंगे तो संख्या बढ़ती जाएगी, लेकिन अंक के बिना लाखों शून्यों का भी कोई महत्व नहीं होता। सम्यक्त्व मूल अंक के समान है। उसके साथ साधनारूपी शून्य उसके महत्व को बढ़ाता है।

 परमपूज्य गुरुदेव तुलसी ने 'जैन सिद्धांत दीपिका' में सम्यक्त्व, मिथ्यात्व, संवर आदि का सुंदर विश्लेषण किया है। हमारा तात्विक ज्ञान स्पष्ट हो जाए तो साधना की अनेक बातें समझ में आ सकती हैं। हमारे यहां की तो यह भी है कि किसी को दीक्षा देने से पहले उसे नवतत्त्व का ज्ञान होना जरूरी माना जाता है। नवतत्त्व को जो नहीं जानता, वह दीक्षा का अधिकारी नहीं हो सकता। वैरागी को नवतत्त्व की जानकारी इसलिए आवश्यक है कि उसे मौलिक तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जाए। यदि मूल तत्त्वज्ञान ठीक है, आचार के बारे में सम्यक ज्ञान है, उसके प्रति श्रद्धा है, निष्ठा है, रुचि है तो आचार का सम्यक परिपालन हो सकता है। सम्यक्त्वी साधक ही शुद्ध आचार का पालन कर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।




*👉🏻आचार्य श्री महाश्रमण जी द्वारा लिखित पुस्तक "18 पाप" से साभार🙏🙏*

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लिखने में कुछ गलती हुई तो मिच्छामि दुक्कडं

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*आज शनिवार सायं सात से आठ सामायिक करना ही है।*


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*Evening 7 to 8 pm samayik bhi kare*




*क्रमशः....... अगली पोस्ट में*

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